सोमवार, ७ सितम्बर २००९
...और बदल गई दुनिया
पक्की सड़क से दो सौ मीटर अंदर बसे इस गांव में मुसहरों के अलावा खरबार, बैंगा व चैरो जनजाति के लोग रहते हैं। पास का पूरा गांव बस्ती के लोगों घृणा करता था। अधिकांश तो इनसे कोई वास्ता ही नहीं रखते थे। परंतु कुमकुम इस बस्ती को लेकर चिंतित रहती थीं। उन्होंने आरोग्य सेविका बनते समय ही अपने गांव को स्वच्छ एवं रोगमुक्त करने का संकल्प लिया था। कुमकुम ने गांव में तो घर-घर कचरा फेंकने वाले सोखते गड्ढे बनवाए। कुओं में ब्लीचिंग पाउडर डलवाया। लेकिन, इस बस्ती पर अब तक उनका बस नहीं चला था। बातें तो वे लोग भी गौर से सुनते थे। साफ-सुथरा रहने की बात मान लेते थे। पर परिणाम हर बार वही ढाक के तीन पांत।
कुमकुम हर वक्त इसी उधेड़बुन में रहतीं कि ऐसा क्या किया जाए कि बस्ती वालों का जीवन स्तर सुधरे। नरक सा यह माहौल बदले। उन्होंने अपनी समस्या आरोग्य संच प्रशिछिका सिंधु दीदी को बताई। सिंधु दीदी ने जो रास्ता उन्हें बताया, उस पर चलना आसन नहीं था। ब्राह्मण परिवार की लड़की मुसहर बस्ती में जाकर नाली साफ करे, यह बात कोई कैसे बरदाश्त करेगा। लेकिन धुन की पक्की कुमकुम ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जुट गई सफाई अभियान में। साथ में थीं सिंधु दीदी, आचायॆ लोकपति और कुछ साथी। तीन दिनों तक तो यह टोली नालियों और घरों की सफाई करती रही। चौथे दिन से बस्ती के लोग भी उनके साथ हो लिए। पांच दिन ये सिलसिला चला। छठे दिन तक तो आमूल-चूल परिवतॆन हो चुका था। रामपति ने कुमकुम दीदी के हाथ से झाड़ू छीनी। ...अब बस करिए दीदी, हमें अहसास होगया है। अब हम अपने घरों और बच्चों को साफ ऱखेंगे। बस्ती के शेष लोग सर झुकाए मौन समथॆन कर रहे थे। कुमकुम, सिंधु दीदी का उद्देश्य पूरा हो चुका था।
पांच दिनों की मेहनत रंग लाई। लोगों को प्रेरणा मिल चुकी थी। अगले ही दिन से बस्ती में घरों के आगे बने सुअर के बाड़े हट गए। बरसों बाद बस्ती के लोगों ने परचून की दुकान से साबुन-सफॆ खरीदा। महिलाओं नेबच्चों को रगड़-रगड़कर नहलाया। साफ-सुथरे कपड़े पहनाकर उन्हें एकलविद्यालय में पढ़ने भेजा। आचायॆ लोकपति की आंखें भी उन्हें देखकर खुशी से चमक उठी। पहली बार बस्ती के बच्चों ने विद्यालय में प्रवेश किया था। अबतक जैसे-तैसे जीवन बिता रहे इन मासूम बच्चों के जीवन में पढ़ाई और संस्कार का नया प्रभात आया था। अब वे भी अन्य बच्चों के साथ गायत्रीमंत्र का सस्वर जाप दुहरा रहे थे।
बदलाव की इस बयार से गांव के सामाजिक समीकरण भी बदल गए। मुसहर जाति के लोगों सेदूरी बनाए रखने वाले लोग अब उनके घर के ओसारे में बैठकर गप करते नजर आते। जवाहर और रामपति ग्राम समिति के सक्रिय सदस्य हैं। अब वो दिन भूलना चाहते हैं जब गांव के लोग इन्हें देखकर नाक-भौं सिकोड़ते थे। इतना ही ग्राम समिति के प्रयासों से नरेगा के तहत पूरे गांव (बस्ती समेत) में खरंजा बिछ गया है।
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में खलियारी गांव है।
शुक्रवार, ४ सितम्बर २००९
कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 4
ध्यान रखिए, सार्वजनिक होते लागू हो जाता है कोड
कुछ साथियों ने हमें कठघरे में रखा है और कहा है कि कोई तो मानक हो ब्लाक लेखन का सीरीज के तहत आप टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं। उनकी टिप्पणी इसी सीरीज की पोस्ट के साथ प्रकाशित हैं। एक डाक्टर साहब ने टिप्पणी में लगाकर रखे गये माडरेशन पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा है कि जब उन्होंने देखा कि माडरेशन लगा है तो वे अपनी टिप्पणी लिखना भूल गये। खैर।
जहां तक टीआरपी बढ़ाने का सवाल है, हम इसका जवाब एक कथा से देना चाहेंगे। शायद उस कथा से यह पता चले कि टीआरपी बढ़ायी नहीं जाती, जिसकी टीआरपी बढऩी होती है, खुद-ब-खुद बढ़ ही जाती है, उसे कोई नहीं रोक सकता। जी हां, उसे कोई नहीं रोक सकता। मेरा आपसे सवाल है कि क्या उसे कोई रोक सकता है? तो कथा सुनिए।
बोधिसत्व के अंदर जब ज्ञान का प्रस्फुटन हो रहा था तो उनके संगी-साथी उनसे बिछुड़ चुके थे। ऐसा कहिए कि उनका साथ छोड़ चुके थे। अब उनके अंदर जो ज्ञान प्रस्फुटित हो रहा था, वह बाहर निकलने और वायुमंडल में व्याप्त हो जाने को बेताब था। बुद्ध क्या करते? जंगल में ही एक बड़े पत्थर पर बैठ गए और लगे प्रवचन करने। सुनने वाला कोई नहीं, मगर वे करने लगे प्रवचन। मगर, नहीं। सुनने वाले थे। पूरा जंगल उन्हें सुनने लगा। जब वे प्रवचन करते, चिडिय़ां चहचहाना भूल जाती, जानवर शोर मचाना भूल जाते, यहां तक कि हवाएं तक शांत हो जाती थीं। बाद में उस शांति ने उनके साथियों को भी चौंकाया और जब उन्हें जंगल की इस शांति का पता चला तो वे भी बुद्ध की शरण में पहुंच गये।
क्या मतलब है इस कथा का? इस कथा का मतलब है, आप जब अपना काम सही तरीके से और पूरी निष्ठा से करेंगे तो उसका उचित और सही फलाफल मिलेगा ही। टीआरपी बढऩे के पीछे भी कुछ ऐसा ही मामला होता है। हमारा लेखन कुछ और सिलसिले में चल रहा है। हम ये नहीं कहना चाहते कि हम बुद्ध की भांति किसी नीरव जंगल में अपना प्रवचन कर रहे हैं। हम एक मानक, एक मर्यादा की बात कर रहे हैं। दुनिया का शायद कोई ऐसा इंसान न हो, जिसकी अपनी कोई मर्यादा नहीं हो। हां, यह और बात है कि इस मर्यादा के मूल्यांकन का पैमाना वक्त और परिस्थितियों के मुताबिक अलग-अलग हो सकता है।
एक दफ्तर में एक चपरासी के लिए मानक और उसी दफ्तर में उसके बास के लिए मानक में थोड़ा अंतर तो हो सकता है, पर दफ्तर एक होने के नाते एक समान मर्यादा तो कायम करनी ही पड़ती है, समान मानक पर काम करना ही पड़ता है। हां, दो दफ्तरों के बीच समान मानक होना जरूरी नहीं है। बात ब्लाग लेखन में मानक की हो रही है, जो व्यक्ति अपने दायरे के लिए लिखता होता है, पर उसका आवेग और परिणाम सब सार्वजनिक होता है। और जब कभी आप सार्वजनिक होते हैं, आपके ऊपर एक मानक, एक कोड लागू हो जाता है। भले ही वह अदृश्य क्यों न हो। हो जाता है कि नहीं? और यदि हो जाता है तो इसकी बात करना, इसके लिए बहस छेडऩा क्या टीआरपी बढ़ाने के लिए है? इस सवाल को हम बकवास मानते हैं।
हम डाक्टर साहब से कहना चाहेंगे कि माडरेशन से आपको बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए था। माडरेशन सिर्फ इसलिए रखा गया है कि कोई भी कभी भी उल-जुलूल न डाल दे। कभी ऐसा हुआ तो उस आलेख को ही नष्ट करना पड़ेगा। अभी यह कला हम नहीं सीख पाए हैं कि एक बार कमेंट पब्लिश करने के बाद उसे कैसे हटाया जा सकता है। वैसी स्थिति में पूरी पोस्ट को ही किल करना पड़ जाएगा। आप भी मानेंगे डाक्टर साहब कि यह ठीक नहीं होगा। हम वादा करते हैं कि हमारे ऊपर आप तीखी से तीखी टिप्पणी करें, उसे आप प्रकाशित पाएंगे। हम फिर से आश्वस्त करते हैं कि इम्तिहान की टिप्पणियों पर जो माडरेशन लगा है, वह सिर्फ अश्लील जुबां वाली टिप्पणियों को प्रकाशित होने से रोकने के लिए ही लगा है। डाक्टर साहब, आप जैसा व्यस्त व्यक्ति हमारे ब्लाग पर आया, आलेख पढ़ा और टिप्पणी के लिए तैयार हुआ, इसके हम आभारी हैं। फिलहाल ब्लाग लेखन के मानक को लेकर अभी बहस जारी रहेगी। आपके सुझावों, टिप्पणियों का स्वागत है। इस खुली बहस में भाग लेने के लिए आप आमंत्रित हैं।
कौशल, पुरुषोत्तम।
सोमवार, ३१ अगस्त २००९
कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का-तीन
लगता है बात गलत दिशा में मुड़ गई है। ऐसे में सीधी बात करें तो बेहतर। पिछले दो पोस्ट पर जो टिप्पणियां आईं, उनमें से कुछ का मतलब यह है कि ब्लागजगत में मानक की बात करना बेमानी है। ऐसा क्यों?क्या सिफॆ इसलिए कि हमारे पास यह सुविधा है कि हम कुछ भी लिखें प्रकाशित होगी।
हम अक्सर इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि राजनीति में आने के लिए कोई मानक तय नहीं है। हालत यह है कि हम भ्रष्टाचार, अनाचार और सियासी गुंडा तत्वों को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। हमारे नीति निमाॆताओं ने सियासत में सबके लिए समान अवसर देने के लिए कोई मानक नहीं तय किया था। जाहिर है, कोई मानक न होने को तब विशेषता ही माना गया होगा।
मतलब रोक-टोक न होने का दुरुपयोग हर जगह धड़ल्ले से होता है। ऐसे में कुछ नैतिक जिम्मेदारियां ब्लाग लेखकों के लिए भी तय की जाए तो बेहतर हो।
आखिर क्यों हम सेक्स और हिंसा से भरपूर, दोहरे अथॆ वाले फूहड़ संवादों वाली फिल्मों की आलोचना करते हैं। कई बार इसके लिए तकॆ दिया जाता है कि फिल्में समाज का आईना है। समाज में जो कुछ हो रहा है, वही दिखाया जा रहा है। हम इस तकॆ को नहीं मानते। कहते हैं, यह बहानेबाजी है। न ही हम इस तकॆ को मानते हैं कि दशॆक जो देखना चाहता है, हम वही तो दिखाते हैं।
हमें लगता है, ठीक वैसे ही हमें यह तकॆ भी नहीं मानना चाहिए कि कुछ भी लिखा जाए, ब्लाग पढने वाले उसे पढ़ते हैं, इसलिए सबकुछ जायज है। फिल्मों से ही समझें, पैसा लगाने वाला जैसी फिल्म चाहे दिखा सकता है क्या। उससे लिए कुछ बंदिशें हैं। नैतिकता का तकाजा है। सेंसर बोडॆ है। फिल्म बनाने वालों का यह तकॆ भी नहीं माना जाता कि जिसे फिल्म देखना है देखे, जिसे नहीं देखना नहीं देखे। ब्लागों पर पढ़ाने, दिखाने का पैसा नहीं लगता, इसका मतलब यह तो नहीं कि कुछ भी लिखा जाए। हमें लगता है कि जैसी नैतिकता हम फिल्म बनाने वालों के पास देखना चाहते हैं, जैसी नैतिकता की हम सड़क पर चलने वाले एक आदमी से उम्मीद करते हैं, ठीक वैसी ही नैतिकता की उम्मीद ब्लाग लेखन करने वालों से क्यों नहीं होनी चाहिए।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि....
-ब्लाग पर लिखने की पहली शतॆ भाषा की शुद्धता हो।
-अश्लीलता और हिंसा से परहेज किया जाए।
-हम एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले वाले लेख न लिखे जाएं।
-एक दूसरे की छीछालेदार की कोशिश में न लगे रहें।
(आखिर इससे कौन सा भला और किसका मनोरंजन होता है, सिवाय लिखने वालों के)
-तू मुझे मुल्ला कहे, मैं तुझे काजी कहूं की परंपरा बंद हो।
-बच्चा पैदा होने से लेकर श्राद्ध तक वाह-वाह बंद हो।
-एक दूसरे को ईमानदारी से पढ़ने और राय देने की कोशिश हो।
(एक बार फिर से, ब्लागों पर बात भय, भूख और भ्रष्टाचार से लड़ने की भी होनी चाहिए)
बातें अभी और हैं। बहस जारी रहेगी। आपके विचार आमंत्रित हैं।
पुरुषोत्तम, कौशल
कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 2
ब्लाग पर बकवास लिखने से पहले ब्लाग लिखने वालों को यह जरूर सोचना चाहिए कि जो कोई भी उन्हें पढ़ रहा है, वह अपने पाकेट का पैसा खर्च कर पढ़ रहा है। नेट का लिंक मुफ्त में तो नहीं मिलता? और आज के उपभोक्ता युग में क्या किसी को यह राइट बनता है कि अपने उपभोक्ता को झांसा दे, उसे फ्लर्ट करे या निरर्थक बातों में उसका समय जाया करे? मैंने पिछली पोस्ट में ही कहा था कि अभी लिखे जा रहे सत्तर फीसदी ब्लाग को पढ़ने से यह पता ही नहीं चलता कि आखिर वे क्या लिख रहे हैं और किसके लिए लिख रहे हैं। कई ब्लाग तो ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर बच्चा भी कह देगा कि लेखक अपने लिए भी नहीं लिख रहा है। मुझे तो ऐसे ब्लागों को देखने से यही लगा कि लेखक आखिर कैसे किसी को यह बता पाएगा कि वैसा वकवास उसी ने लिखा है। मगर, एक कहावत पढ़ी थी। एक दारूबाज पति अपनी पत्नी से गाहेबगाहे पीने के लिए पैसे झटके करता था और इसके लिए वह रोज नये-नये बहाने किया करता था। एक दिन वह घर गया और लगा पैसे मांगने। पत्नी के पूछने पर उसने बताया कि आज एक सट्टा लगा है। लोग कहते हैं बकरी की चार टांगें होती हैं। मैंने कहा है कि पांच होती हैं। मैं जीतूंगा। पैसे लाओ, डबल मुनाफे की बात है। पत्नी बोली, बेवकूफ आदमी, बकरी की चार टांगें ही होती हैं। पति बोला - मैं मानूंगा ही नहीं। पत्नी बोली - लोग बकरी को सामने लाकर टांगें गिनवा देंगे। पति बोला - गिनवाते रहें, मैं मानूंगा ही नहीं। पत्नी ने माथा पीट लिया। अब ब्लागों पर बकवास पढ़ने वाले क्या ऐसे ही अपना माथा पीटें? या कोई है इसका निदान?
(फिलहाल इतना ही। बहस जारी रहेगी। इस ब्लाग को पढ़ने वाला हर व्यक्ति इस बहस में भाग लेने के लिए आमंत्रित है।)
कौशल, पुरुषोत्तम।
रविवार, ३० अगस्त २००९
कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 1
ब्लागजगत और ब्लागरों पर लिखने का चलन तो कुछ ऐसा है कि इस चलन में शामिल होने से हम भी खुद को रोक नहीं पाए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सत्तर फीसदी ब्लाग लेखन में सिर्फ लेखक की कुंठाएं झलकती हैं। आप कहीं अपनी वजह से पिट गए और आपको बचाने कोई वहां नहीं आया तो आप सारी दुनिया को कोस रहे हैं कि दुनिया में कोई मददगार नहीं रहा। आप कोई संस्था चलाते हैं, कर्मचारियों का शोषण करते हैं और कोई कर्मचारी आपके खिलाफ आवाज उठा गया तो आप सभी कर्मचारियों को मालिक का पिट्ठू बने रहने की नसीहत देते चल रहे हैं। आपको एमबीबीएस का फुल फामॆ मालूम नहीं है और आप सारी बीमारियों का इलाज बताते चल रहे हैं। आपने कभी कोर्ट नहीं देखा, कचहरी नहीं देखी और आप सारी दुनिया को कानून पढ़ाते चल रहे हैं। जी हां, अधिकतर ब्लागों पर कुछ इसी तरह का तमाशा दिख रहा है।
ब्लाग पर कुछ हम भी लिखते हैं और इसी सिलिसले में अन्य ब्लागों को पढ़ते भी हैं। सबसे ज्यादा दुख तो तब होता है जब लोगों को अपने घर के किस्से भी ब्लाग पर सार्वजनिक करते देखा जाता है। उफ, कोई मर्यादा नहीं, कोई सीमा नहीं। जिस तरह से ब्लागचर्चा प्रसिद्धि पा रही है, अखबारों के संपादकीय पन्नों का हिस्सा बन रही है, वैसे समय में अब ब्लाग पर क्या लिखा जाए, क्या नहीं लिखा जाए, यह तय किया जाना चाहिए। यह जरूरी लगता है। पर, यह सीमा तय करेगा कौन? बेहतर तो यह होता कि अनर्गल प्रलाप की जगह ब्लाग को भय, भूख और भ्रष्टाचार से समाज को बचाने का माध्यम बनाया जाता। ब्लागों पर समाज में व्याप्त कुरुतियों से लड़ने का कोई नया तरीका सामने आता। फिलहाल इतना ही। बहस जारी रहेगी। इस बहस में शामिल होने का खुला आमंत्रण है।
पुरुषोत्तम, कौशल
शनिवार, २२ अगस्त २००९
गुलामी का था अहसास न आजादी का मतलब जाना
एक और बात यह है कि गुलामी के दिनों में आजादी के लिए संघर्ष करने वालों की संख्या भी यहां गिनी-चुनी ही थी। आपको यहां गांव के गांव मिल जायेंगे, जहां से शहादत की एक भी दास्तां आप जुबां पर नहीं चढ़ा पायेंगे। वियतनाम का इतिहास पढ़ रहा था। अमेरिका से आजादी के लिए जब वहां के लोग संघर्ष कर रहे थे तो उन्हें एक बड़ी शक्ति से छापामार लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। हर घर का युवक स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा ले रहा था। मोर्चे पर ठंडक से बचने के लिए हर घर से खिड़की - दरवाजे तक उखाड़कर लकड़ियां भेजी जा रही थीं। आज वियतनाम अपनी आजादी का मतलब समझता है और अमेरिका की हिम्मत नहीं है कि उसकी ओर टेढ़ी नजर से भी देख सके। उल्टे वहां का राष्ट्राध्यक्ष जब-तब महाशक्ति को खुलेआम चैलेंज ठोकता है। हमारे यहां थोड़ी उल्टी स्थिति है। जब आपके देश का बड़ा हिस्सा जानता ही नहीं कि आजादी किन मूल्यों पर पायी गयी, गुलामी का मतलब क्या था तो वह उन मूल्यों को बचाने के लिए संघर्ष क्यों करे?
क्या त्रासदी थी, जब देश आजाद हो रहा था तो गद्दी पर काबिज होने के लिए स्वार्थ की बड़ी लड़ाई में भाई-भाई देश के कलेजे का टुकड़ा कर चुके थे। वह भी कौमी जज्बातों को सामने रखकर। जब नये और आजाद भारत का सपना देखा जाना था, तभी धरती पर सीमा रेखा खींच दी गयी और अदावत के अंतहीन सिलसिले का बीजारोपण कर दिया गया। और आज हम जिन नेताओं की पूजा कर रहे हैं, जिनके नाम पर सीना चौड़ा कर दुनिया को आजादी का मतलब समझा रहे हैं, यह सब उनकी मौजूदगी और उनकी निगहबानी में हुआ। वे नहीं रोक पाये यह सब कुछ। क्या मतलब था आजादी का? क्या इसका मतलब भाइयों द्वारा भाइयों का रक्तपातनहीं था? क्या इसका मतलब बंटवारा नहीं था? क्या इसका मतलब कौमी अदावत नहीं थी? क्या इसका मतलब गद्दी पर येन-केन-प्रकारेण काबिज होने की परिघटनाओं का सूत्रपात नहीं था? गांधी जी ने तो कहा था कि भारत के आजाद होते कांग्रेस का उद्देश्य पूरा हो गया, अब इस पार्टी को भंग कर देना चाहिए। क्यों नहीं मानी गयी उनकी बात? आज कांग्रेस वजूद में क्यों है? और है भी तो वह किस कांग्रेस के उद्देश्यों का पालन कर रही है? फिलहाल इतना ही। आजादी के सच्चे अर्थों की तलाश करती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।
बुधवार, १९ अगस्त २००९
केवल आम होने से आप सारे दोषों से बरी नहीं हैं
वाकई हम समाज से बुराइयों समूल नाश की इच्छा रखते हैं। तमाम बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं। तो वैसी बुराइयों से हमें मुक्त होना होगा। भले ही वे बुराइयों छोटी क्यों न हो। एक कलकॆ अपने दफ्तर में रोज रिश्वत लेता हो और वह बोफोसॆ घोटाला, चारा घोटाला करने वालों को कोसे तो कोसते रहे किसे क्या फकॆ पड़ता है। हम कहते हैं, हमारे नेता, अधिकारी पाक-साफ हों, संसद, विधानसभाओं में जनता के काम की बातें हो, सरकारी दफ्तरों में काम हो। यह चाहना गलत नहीं है। लेकिन यह कायॆसंस्कृति विकसित करने में, जिसे आम आदमी कहते हैं, उसकी भी सक्रिय भूमिका है। वह केवल कहने और चाहने का अधिकारी नहीं है। व्यक्तिगत काम तो आम से लेकर खास सभी पूरी तनदेही से करते हैं। लेकिन जैसे ही काम व्यक्तिगत से सावॆजनिक होता है, काम के प्रति दिलचस्पी और गायब हो जाती है। इस रोग से केवल खास ही ग्रसित नहीं है। तो फिर ऊपर से क्यों सावॆजनिक कायॆ के प्रति काहिली के खिलाफ नीचे से ही मुहिम क्यों न शुरू हो?
अब देखिए न। गांव का एक आम आदमी वाडॆ पाषॆद बनता है। पाषॆद बनने से पहले वह बिल्कुल आम था। अपने घर, खेत में वह पूरी निष्ठा से काम करता रहा है। पाषॆद बनते ही सावॆजनिक कामों के प्रति उसकी अरूचि किसी भी गांव में दिख जाएगी। ..यह अरूचि एक आम आदमी पाषॆद बनते ही तो सीख नहीं जाता। यह गुर तो उस आम आदमी के अंदर पहले से ही होगा। ..तो सावॆजनिक कामों के प्रति अरूचि को दूर करने की मुहिम वहीं से क्यों न शुरू हो। वहीं से मतलब हर आम आदमी को अपने अंदर की इस अरूचि को बाहर निकलना होगा।
अक्सर हम दुखी होते हैं। संसद में हंगामे को लेकर। राजनीतिक दलों के धरना-प्रदशॆनों से होने वाली दिक्कतों को लेकर। हड़ताल को लेकर। आम आदमी के अलावा दुखी होने वालों में खास लोग भी शामिल होते हैं। लेकिन हम बात आम आदमी की ही करें। मुझे भी लगता है कि किसी भी ऐसे हंगामे, धरना, प्रदशॆन की निंदा की जानी चाहिए, जिससे ढेर सारे लोगों को परेशानी होती हो। एक समस्या के समाधान के लिए, ढेर सारे लोगों के लिए समस्या पैदा कर देना कहां की समझदारी है। लेकिन साहब यह समस्या पैदा करने में आम आदमी भी पीछे नहीं हैं। कहीं भी कोई दुघॆटना हो, सड़क जाम आम बात हैं। वे आम लोग ही होते हैं, जो किसी दुघॆटना के बाद तमाम वाहनों में तोड़फोड़ करते हैं। आग लगा देते हैं। हड़ताल करके काम ठप कर देने वाले कमॆचारी और बाकी लोग भी खुद को आम आदमी ही कहते हैं।
कहा जा सकता है कि बिना हंगामे के अधिकारी, नेता बात ही नहीं सुनते। दुघॆटना में मृतक के परिजन, घायल को बिना हंगामा किए मुआवजा ही नहीं मिलता। बिना हड़ताल किए वेतन ही नहीं बढ़ता। हो सकता है यह बात सही हो, फिर भी एक बार यह विचार करना होगा कि पहले नेताओं अधिकारियों को आम आदमी की बातें अनसुनी करने की आदत पड़ी, या फिर पहले आम जनता को हंगामा करने की। वैसे भी अपने फायदे के लिए काम बंद कर बाकी आम जनता से अन्याय करने वाला आम कमॆचारी ऐसी उम्मीद क्यों करता है कि सरकार उसकी बेहतरी के लिए चौबीस घंटे, बारह महीने ईमानदारी से काम करती रहे। उसके अधिकारी उसके प्रति न्यायपूणॆ बने रहें। ध्यान रखें, आप किसी से उम्मीदें लगाए बैठे हैं तो आपसे भी किसी को उम्मीद है। पहले आप तय करें कि हम किसी की उम्मीदों पर तुषारापात नहीं करेंगे।
कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी। उसमें कथित रूप से पाप करने वाली एक महिला को कुछ लोग पत्थर मार रहे होते हैं। हीरो आता है और कुछ बातों के बाद कहता है कि इस महिला को अब पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो। किसी ने पत्थर नहीं मारा।
तो आप भी देख लीजिए, जो पत्थर आपके हाथ में है आप उसे चलाने लायक हैं भी या नहीं?
मंगलवार, १८ अगस्त २००९
हाथ जोड़े खड़ा है हिन्दुस्तान
मेरी बातों पर यकीन नहीं हो तो एक जाति प्रमाण पत्र या एक आवासीय प्रमाण पत्र बनाने प्रखंड कार्यालय पहुंचिए। वहां का चपरासी भी आपसे बात करने की जहमत उठाना नहीं चाहेगा। अधिकारी से बात कर आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी जनतांत्रिक प्रणाली वाले देश के किसी लोकसेवक से बात कर रहे हैं। कोई आपकी सुनने को तैयार नहीं होगा। और यह स्थिति बिहार के नेपाल बार्डर से पंजाब के पाकिस्तान बार्डर तक एकरस में आप महसूस कर सकते हैं। मैंने महसूस किया है। जिला परिवहन का कार्यालय वह उत्तर प्रदेश के किसी जिले का हो या महाराष्ट्र के किसी जिले का, दलालों और बिचौलियों की फौज हर जगह समान रूप से आपका स्वागत करती मिलेगी। और शिकायत किससे करेंगे। जरा शिकायत करने वाले बड़े अधिकारियों तक पहुंचिए। भई क्या मिजाज है बादशाहों के? नवाबों के दौर के बड़े से बड़ा एय्याश तानाशाह भी शरमा जायें। बात कितनी सुनी जायेगी, यह तो जाने पर ही पता चलेगा। यह है न हैरत की बात कि एक सिस्टम का पूरा इंफ्रास्ट्रक्टर खड़ा होने के बावजूद आप दौड़ते रहते हैं, तड़पते रहते हैं, आपका काम नहीं होता। जिन्हें आपका नौकर कहा जाता है, उनके सामने पहुंचते ही आप क्या भिखारी नहीं बन जाते? और उस नौकर को इसी सिस्टम के बड़े नौकर के सामने कभी देख लीजिए, वह भी वहां आपको हाथ जोड़े कृपा की भीख मांगता ही दिख जायेगा। वह बड़ा नौकर कहीं अपने से ऊपर वाले के दरबार में खड़ा दिखा तो हाथ जोड़े ही खड़ा दिखेगा। माफी मांगता, भीख मांगता, दया की भीख।
जिस तरह से आर्थिक विकास की दर को तेज और तेज करने की प्रक्रिया चल रही है, उसके तहत देखने को यह मिल रहा है कि इस देश का अच्छा खासा ग्रेजुएट गले में टाई लगाकर व पैरों में काले जूते डालकर डोर-टू-डोर कंपेन करता चल रहा है। हम रोजगार के अवसर सृजित नहीं कर पाये, इसका खामियाजा वह चौबीसों घंटे कभी सड़क पर तो कभी दफ्तर में आपको हाथ जोड़े ही मिल जायेगा। इस पर भी तुर्रा यह कि वह भूल से भी अपने अधिकारों की बात नहीं कर सकता। किसी गुलाम मुल्क के गुलाम नागरिक जैसी हालत ही है उसकी। सरकारी हो या निजी, आप बस अड्डे पर चले जाइए। जहां सुरक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां आपको पुलिस का एक भी नुमाइंदा नहीं दिखेगा। भूल से दिख भी गया तो वह आपकी किसी हेल्प के लिए नहीं, अपनी जेब गरम करने की मशक्कत में ही जुटा दिखेगा। आप उससे तनकर कुछ भी नहीं कह सकते। वह आप पर गुर्राता है और आपकी स्थिति होती है हाथ जोड़कर खड़े भिखारियों वाली।
कहां जायेंगे आप? अस्पताल? दावे तो बहुत हैं, पर आसानी से करा लीजिए इलाज तो वीर कहे जायेंगे। सरकार के लाख प्रयास के बावजूद सरकारी अस्पतालों में नियुक्त डाक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक नहीं लगायी जा सकी। जो डाक्टर निजी प्रैक्टिस चलाते हैं, उनसे आप सरकारी अस्पताल में इलाज कराकर देखिए, आपको पुर्जा तक फेंककर दिया जायेगा, इसकी मैं गारंटी देता हूं। आपकी दशा उस डाक्टर के सामने अपने अधिकारों से लैस किसी मजबूत नागरिक की तरह नहीं होगी। आप हाथ जोड़े कलपते नजर आयेंगे, डाक्टर साहब, डाक्टर साहब करते नजर आयेंगे। इसी डाक्टर के निजी क्लिनिक पहुंचिए। आजकल तो डाक्टरों ने ब्लड प्रेशर तक की जांच तक करना छोड़ दिया है। इस काम को वे अपनी शान में गुस्ताखी समझते हैं। वहां की कोई दाई तो थर्ड ग्रे़ड का कंपाउंडर यह काम निपटा देगा। पैसा देकर भी आप कलपते नजर आयेंगे और इस रुख से आपको निजात दिलाने वाला कोई सिस्टम आपको कहीं नजर नहीं आयेगा। यह गारंटी है, नजर नहीं आयेगा। और तब आपके श्रीमुख से यदि यह निकल आये कि यह कैसी आजादी, तो मुझे धन्यवाद जरूर कीजिएगा। फिलहाल इतना ही। आजादी के सच्चे अर्थों की तलाश करती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।



