सोमवार, 7 सितंबर 2009

...और बदल गई दुनिया

खलियारी बस्ती में घुसते ही नाक पर हाथ रखना पड़ता था। मन तो करता था कि आंखें भी बंद कर लें। उफ, इतनी गंदगी। घरों में ही सुअर के बाड़े, गंदी बदबूदार नालियां, उसमें लोट-पोट होते सुअर। चारों ओर भिनभिनाते मच्छर। क्या नरक इसी को कहते हैं? बस्ती के लोगों पर सवालनुमा यह जुमला भी बेअसर था। पीढ़ियों से सुअर पालने, उसका मांस खाने वाले ये परिवार गंदगी और बीमारियों के अभ्यस्त हो चले थे। कितने ही बच्चे अकाल मृत्यु का ग्रास बन चुके थे। फिर भी बस्ती के लोग खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं थे।

पक्की सड़क से दो सौ मीटर अंदर बसे इस गांव में मुसहरों के अलावा खरबार, बैंगा व चैरो जनजाति के लोग रहते हैं। पास का पूरा गांव बस्ती के लोगों घृणा करता था। अधिकांश तो इनसे कोई वास्ता ही नहीं रखते थे। परंतु कुमकुम इस बस्ती को लेकर चिंतित रहती थीं। उन्होंने आरोग्य सेविका बनते समय ही अपने गांव को स्वच्छ एवं रोगमुक्त करने का संकल्प लिया था। कुमकुम ने गांव में तो घर-घर कचरा फेंकने वाले सोखते गड्ढे बनवाए। कुओं में ब्लीचिंग पाउडर डलवाया। लेकिन, इस बस्ती पर अब तक उनका बस नहीं चला था। बातें तो वे लोग भी गौर से सुनते थे। साफ-सुथरा रहने की बात मान लेते थे। पर परिणाम हर बार वही ढाक के तीन पांत।

कुमकुम हर वक्त इसी उधेड़बुन में रहतीं कि ऐसा क्या किया जाए कि बस्ती वालों का जीवन स्तर सुधरे। नरक सा यह माहौल बदले। उन्होंने अपनी समस्या आरोग्य संच प्रशिछिका सिंधु दीदी को बताई। सिंधु दीदी ने जो रास्ता उन्हें बताया, उस पर चलना आसन नहीं था। ब्राह्मण परिवार की लड़की मुसहर बस्ती में जाकर नाली साफ करे, यह बात कोई कैसे बरदाश्त करेगा। लेकिन धुन की पक्की कुमकुम ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जुट गई सफाई अभियान में। साथ में थीं सिंधु दीदी, आचायॆ लोकपति और कुछ साथी। तीन दिनों तक तो यह टोली नालियों और घरों की सफाई करती रही। चौथे दिन से बस्ती के लोग भी उनके साथ हो लिए। पांच दिन ये सिलसिला चला। छठे दिन तक तो आमूल-चूल परिवतॆन हो चुका था। रामपति ने कुमकुम दीदी के हाथ से झाड़ू छीनी। ...अब बस करिए दीदी, हमें अहसास होगया है। अब हम अपने घरों और बच्चों को साफ ऱखेंगे। बस्ती के शेष लोग सर झुकाए मौन समथॆन कर रहे थे। कुमकुम, सिंधु दीदी का उद्देश्य पूरा हो चुका था।

पांच दिनों की मेहनत रंग लाई। लोगों को प्रेरणा मिल चुकी थी। अगले ही दिन से बस्ती में घरों के आगे बने सुअर के बाड़े हट गए। बरसों बाद बस्ती के लोगों ने परचून की दुकान से साबुन-सफॆ खरीदा। महिलाओं नेबच्चों को रगड़-रगड़कर नहलाया। साफ-सुथरे कपड़े पहनाकर उन्हें एकलविद्यालय में पढ़ने भेजा। आचायॆ लोकपति की आंखें भी उन्हें देखकर खुशी से चमक उठी। पहली बार बस्ती के बच्चों ने विद्यालय में प्रवेश किया था। अबतक जैसे-तैसे जीवन बिता रहे इन मासूम बच्चों के जीवन में पढ़ाई और संस्कार का नया प्रभात आया था। अब वे भी अन्य बच्चों के साथ गायत्रीमंत्र का सस्वर जाप दुहरा रहे थे।

बदलाव की इस बयार से गांव के सामाजिक समीकरण भी बदल गए। मुसहर जाति के लोगों सेदूरी बनाए रखने वाले लोग अब उनके घर के ओसारे में बैठकर गप करते नजर आते। जवाहर और रामपति ग्राम समिति के सक्रिय सदस्य हैं। अब वो दिन भूलना चाहते हैं जब गांव के लोग इन्हें देखकर नाक-भौं सिकोड़ते थे। इतना ही ग्राम समिति के प्रयासों से नरेगा के तहत पूरे गांव (बस्ती समेत) में खरंजा बिछ गया है।
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में खलियारी गांव है।

7 टिप्‍पणियां:

Kaushal ने कहा…

पुरुषोत्तम जी, नमूना मजेदार है। और ठीक ही है। झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए। पर, बतोलाबाजी करने वालों को उससे क्या?

देवेन्द्र ने कहा…

ब्लाग लेखन का मानक समझाते-समझाते आपने यह क्या लिख दिया?

chandra ने कहा…

nonsence item.

ब्रजेश ने कहा…

कहानी का निहितार्थ समझ में नहीं आया। वैसे कहानी हिम्मत और हौसले को बढ़ाने वाली है। आपको कुछ करना है तो शुरुआत करने की हिम्मत करनी ही होगी। इतना ही नहीं, यदि चाहते हैं कि कुछ बेहतर हो तो अच्छा है कि उसे आप खुद करें। फिलहाल फालतू ब्लाग लेखन की भीड़ में आपका यह आलेख कुछ सुकून देने वाला है।

Kaushal ने कहा…

सारी, यह विजयलक्ष्मी जी का आलेख था। जल्दबाजी में टिप्पणी आपके नाम प्रेषित हो गया पुरुषोत्तम जी।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा आप ने

cp ने कहा…

congratulation. that's call HAQIQAT.

CP SRIVASTAVA