गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार

१० मार्च १९९० को लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। इसके पहले यहां कांग्रेस का शासन था। ऐसा नहीं था कि नरसंहारों का सिलसिला लालू के कार्यकाल से ही शुरू हुआ। नरसंहार की पहली वीभत्स घटना १९७७ में पटना जिले के बेलछी में घटी थी और इसके बाद तो जैसे यहां हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर चल पड़ा। कांग्रेस की सरकारों में नरसंहारों पर रोक लगाने की इच्छाशक्ति का घोर अभाव था, क्योंकि इस शासक शक्ति के सामाजिक आधार इन्हें दूर तक जाने की इजाजत नहीं देते थे। दस वर्षों में कांग्रेस यहां छह मुख्यमंत्री बदल चुकी थी। आपरेशन सिद्धार्थ समेत कई घोषणाएं की गयीं, पर सभी कागज पर ही रह गयीं। मुख्यमंत्री बनते ही लालू ने भी यही काम शुरू कर दिया। उन्होंने दलितों को हथियारबंद करने, भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने, मध्य बिहार में शांति बहाल करने के लिए पदयात्रा करने आदि की कई घोषणाएं कीं, पर इनमें से एक पर भी अमल नहीं हुआ। नतीजा, १९९० से ही शुरू हो गया सूबे में नरसंहारों का सिलसिला, जो गुजरते लम्हों के साथ बेकाबू होता चला गया।
१९९० की शुरुआत में ही रोहतास के केसारी में सामंतों में दस दलितों को मार डाला। २६ मार्च को जहानाबाद के लखावर में पांच दलित मारे गये। २० जुलाई को मधुबनी के हरलाखी में सामंतों ने पुलिस के साथ मिलकर मजदूर वर्ग के छह लोगों को मौत के घाट उतार डाला। २६ जुलाई को रांची (तब बिहार में ही था) के हेसार में पुलिस ने तीन लोगों को मार डाला। १७ दिसंबर को दरियापुर (पटना) में किसान संघ के कार्यकर्ताओं ने चार लोगों व १९ फरवरी १९९१ को पटना के तिखरखोरा के १४ लोगों की हत्या कर दी। ७ जनवरी १९९१ को वैशाली जिले के पहाड़पुर गांव में अपराधी तत्वों ने ७ लोगों को मार डाला। विष्णुपुर ढाबा (बेगूसराय) तथा हरपुर सैदाबाद (समस्तीपुर) में ३ फरवरी को पुलिस ने क्रमशः ७ और ३ तीन लोगों को भून डाला। सनलाइट सेना ने ४ जून १९९१ को पलामू के मलवरिया में नौ लोगों को मौत के घाट उतारा। १२ जुलाई १९९१ को अपराधी गिरोह की ओर से संग्रामपुर (सारण) में चार लाशें गिरायी गयीं। जद समर्थकों ने ११ अप्रैल १९९१ को गया के बेलागंज में तीन लोगों को मार डाला। भोजपुर के देवसहियारा में सामंतों ने २२ जून १९९१ को १४ लोगों को मार डाला। १३ जुलाई १९९१ को पुलिस ने मुठभेड़ में मधुबनी के बेनीपट्टी में चार मजदूरों को भून डाला। १९ अक्टूबर को मुजफ्फऱपुर के बेनीबाद में पुलिस की गोली से सात लोग मारे गये। २५ अगस्त १९९१ को पुलिस ने सहरसा के गोदरामा में तीन लोगों को भून डाला, वहीं, सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने जहानाबाद के बावन बिगहा में २१ सितंबर १९९१ को सात लोगों को मौत के घाट उतार डाला। इसी साल जहानाबाद के मेन बरसिम्हा में नौ लोग, करकट बिगहा (पटना) में चार लोग, तिनडीहा (गया) में ७ लोग मार डाले गये।
नये साल १९९२ की शुरूआत बारा नरसंहार से हुई। बारा में १२ फरवरी को एमसीसी समर्थकों ने ३९ लोगों को मार डाला। ३० जून को गोपालगंज के चैनपुर में सामंतों ने पांच तथा एकवारी (भोजपुर) में सामंतों ने १२ सितंबर को ४ लोगों की हत्या कर दी। १९९२ का अंत शहाबुद्दीन समर्थकों के तांडव से हुआ। २२ दिसंबर को शहाबुद्दीन समर्थकों ने जीरादेई (सीवान) में ४ लोगों की हत्या कर दी। यह सिलसिला थमा नहीं। पुलिसकर्मियों ने १७ मार्च १९९४ को नाढ़ी (भोजपुर) में नौ लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया। ४ अप्रैल १९९५ को रणवीर सेना की ओर से भोजपुर के खोपिरा में चार लोगों की लाशें गिरायी गयीं। सामंतों ने ६ जुलाई १९९५ को करमौल बमनौली (सीवान) के छह लोगों को मार डाला। रणवीर सेना ने २५ जुलाई १९९५ को सरथुआ (भोजपुर) में ६ लोगों की हत्या की। ५ अगस्त १९९५ को गंगा सेना की ओर से नोनउर (भोजपुर) के छह लोग मारे गये। वर्ष १९९६ तो नरसंहारों का ही वर्ष रहा। रणवीर सेना ने ७ फरवरी १९९६ को चांदी (भोजपुर) में ४, ९ मार्च को पतलपुरा (भोजपुर) में ३, १२ मार्च को नोनउर में ५, ५ मई को नाढ़ी में ३, ९ मई को इसी गांव में फिर ३, ११ जुलाई को बम्पानी टोला (भोजपुर) में २१, २६ नवंबर पुरहारा (भोजपुर) में ५ तथा २४ दिसंबर को एकबारी (भोजपुर) में ६ लोगों की सामूहिक हत्या की। इसी वर्ष शहाबुद्दीन समर्थकों द्वारा १४ सितंबर को भवराजपुर (सीवान) के ३ तथा ११ दिसंबर को मनिया (सीवान) के ५ लोगों की हत्या कर दी गयीं।
अगले साल राबड़ी देवी के कार्यकाल में पहली दिसंबर १९९७ को रणवीर सेना द्वारा बाथे नरसंहार में ६४ लोगों तथा रामपुर अहियारा चौरम में एमसीसी समर्थकों द्वारा ९ सवर्णों को जीप से खींचकर खत्म कर देने जैसी जघन्यतम घटनाओं को छोड़ भी दिया जाय तो क्या नहीं लगता कि खुद को भगवान कृष्ण का अवतार कहलाने में खुशी महसूस करने वाले लालू प्रसाद यादव के राज में बुद्ध, महावीर की धरती इंसानी लाशों से पटती जा रही थी? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित १ दिसंबर के बाथे नरसंहार के जिम्मेवार रणवीर सेना के राजनैतिक रिश्तों की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग के गठन की बात की गयी। आयोग का कार्यकाल जून १९९८ में समाप्त हो गया तो छह महीने ३१ दिसंबर तक के लिए उसे बढ़ाया गया। जांच आयोग का काम शुरू ही नहीं हो पाया। क्यों? क्योंकि आयोग को इस काम के लिए कर्मचारी ही नहीं मिले। कार्यालय के लिए मकान का आवंटन नवंबर में किया गया। इस नरसंहार के बाद मध्य बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाये रखने के लिए विशेष टास्क फोर्स के गठन की बात कही गयी। यह टास्क फोर्स संचिका में ही कैद रह गयी। उग्रवाद प्रभावित मध्य बिहार में विकास कार्यक्रम चलाने के लिए सौ करोड़ रुपये की योजना तैयार की गयी। योजना कहां चली गयी, किसी को पता नहीं है। बिहार सरकार ने अपने एक दस्तावेज में स्वयं स्वीकार किया था कि सड़क निर्माण से संबंधित दो दर्जन से अधिक घोषित परियोजनाओं में निविदाएं नहीं आयीं, क्योंकि उग्रवादी संगठनों ने निविदा देने वालों से निपट लेने की धमकी दी थी।

फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार।

लालू ने सम्मान से जीना सिखाया

मनोज कुमार हमारे तब के मित्र हैं, जब हमलोग नवादा, बिहार में पढ़ते थे। इन दिनों अध्यापन कर रहे हैं। लालू के सवाल के बहाने यहां जो बातें कही जा रही हैं, उनपर उन्हें आपत्ति हैं। कुछ बातें उन्होंने लिख भेजी है। हम उसे जस का तस पोस्ट कर रहे हैं।

इन सारी बातों के बीच किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वो लालू यादव ही हैं, जिनकी वजह से बिहार की दलित और पिछड़ी आबादी सर उठाकर जीना सीख रही है। कोई भी सामाजिक क्रांति जब होती है तो उसके कुछ न कुछ साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। सब कुछ अच्छा ही अच्छा नहीं होता। साइड इफेक्ट्स को लालू की गलतियों के रूप में प्रचारित कर आप किसका भला करना चाह रहे हैं। क्या बिहार के दलितों और पिछड़ों को सर उठाकर जीने का हक नहीं था? लालू यादव ने सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया तो वह सामाजिक समरसता के कातिल हो गए? सामंती ताकतों का अत्याचार बहुत अच्छा था? सच बात तो यह है कि जिन ताकतों को राज करने की आदत पड़ गई थी, वही लोग पिछड़ों और दलितों का उभार देख नहीं पा रहे हैं।

लालू यादव ने बिहार का विकास रोक दिया, ऐसा कहने वाले पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखते। जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वरी दुबे के कायॆकाल में क्या कम भ्रष्टाचार था। तब विकास की गंगा बह रही थी, तो भी बिहार लालू काल से पहले पिछड़े और बीमारू राज्यों की श्रेणी में क्यों शुमार था?

अब कहा जा रहा है कि एक खास वगॆ के लोग पूरे बिहार में अराजकता मचा रहे थे। लालू यादव से पहले स्वणॆ जातियों के लोग पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के खिलाफ जो मनमानी कर रहे थे, उसे अराजकता क्यों नहीं कहा जाता? क्या सिफॆ इसलिए नहीं कि तब उस अराजकता को ही सिस्टम मान लिया गया था? क्या उस सिस्टम को तोड़ा नहीं जाना चाहिए था? सच बात तो यह है कि सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया गया तो हल्ला इस बात का किया गया कि बिहार में तो स्थिति अराजक हो गई है!

मेरा सिफॆ इतना कहना है कि लालू यादव के कायॆकाल से पहले के कायॆकाल को भी याद किया जाए। भ्रष्टाचार, अपराध और भाई-भतीजावाद की त्रिवेणी तब भी बह रही थी। बिहार तब भी पीछे ही जा रहा था। लेकिन तब आत्मसम्मान के साथ जीने वाले लोग कुछ फीसदी थे। अब स्थिति बदली तो यही कुछ फीसदी लोग बेचैन हो गए। अराजकता-अराजकता का नारा बुलंद करने लगे।

ऐसे में अनुरोध सिफॆ यह है कि स्थितियों को सिफॆ अपने चश्मे से न देखें। दूसरी बात यह कि हमेशा गुण-अवगुण दोनों बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वरना तो आप कोई भी बात कहने के लिए स्वतंत्र हैं हीं। मेरी बात यदि आप यहीं प्रकाशित कर सकें तो मुझे खुशी होगी।
मनोज कुमार, रुनीपुर, नवादा, बिहार

लालू यादव ने जो सवाल पूछा है, उसके जवाब में और भी लोगों के दिमाग में ढेर सारी बातें घुमड़ रही होंगी। इस चरचा में अगर आप भी शामिल होना चाहते हैं तो स्वागत है। आप अपनी बातें हमें लिख भेजें इस पते पर-imtihan08@gmail.com। हम आपकी बातों को आलेख के रूप में प्रकाशित करेंगे।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

भ्रष्टाचार से ही लालू बने थे सीएम

पटना में २२ फरवरी को लालू प्रसाद यादव ने रविदासों के समक्ष भले भोलेपन से यह सवाल किया हो कि आखिर उनसे क्या गलती हो गयी जो बिहार की सत्ता से उन्हें बेदखल कर दिया गया, पर उनका यह सवाल है उत्तर तलाशने के लायक। यह अलग मसला है कि वे आज केन्द्र में उसी कांग्रेस की छत्रछाया में रेलमंत्री बनने का गौरव हासिल कर रहे हैं, जिसे कोस-कोस कर वे राजनीति में जवान हुए, पर कभी जेपी का अनुनायी कहलाकर गर्व से सीना तानने वाले इस शख्स की बिहार के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी भी भ्रष्ट आचरण के तहत ही हुई थी।
बात १९९० की है। वीपी सिंह का जमाना था। देश में गैर कांग्रेसवाद की लहर चल रही थी। तब न तो मंडल कमीशन आया था और न ही लालू की मुरलीधरन छवि ही लोगों के नूरेनजर थी। विधान सभा चुनाव में जनता दल बड़ी पार्टी के रूप में सामने आया था। मात्र गैर कांग्रेसवाद को लेकर कांग्रेस का तख्ता पलट दिया गया था, उसे जनता बहुमत से अल्पमत में ले आयी थी। बिहार में ही नहीं, केन्द्र में भी। गैर कांग्रेसवाद के गर्भ से निकला था जनता दल और उस वक्त भी उसके पास स्पष्ट बहुमत नहीं था कि अकेले वह सत्ता चला सके। तालमेल हुआ। झामुमो, भाजपा, माकपा, भाकपा और जद ने समझौता किया और कांग्रेस को सत्ता में आने रोका गया। बिहार में तो नेतृत्व संकट की भीषण स्थिति पैदा हो गयी थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए जनता दल में उठापटक शुरू हो गयी थी। उस वक्त राम सुंदर दास मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। रमई राम, रघुनाथ झा को भी इस दौड़ में शामिल किया जा रहा था। यहां तक कि गैर कांग्रेसवाद का झंडा थामे अगली पांत के नेता युवा तुर्क चंद्रशेखर भी यही चाह रहे थे कि रघुनाथ झा या राम सुंदर दास को ही मुख्यमंत्री बना दिया जाय। मगर, उस वक्त की राजनीति और जनता दल में मजबूत स्थिति रखने वाले देवीलाल ने लालू यादव के नाम का प्रस्ताव कर दिया। और जैसे कालांतर में एचडी देवगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल रातोरात प्रधानमंत्री बने, वैसे ही लालू यादव मुख्यमंत्री बन गये। जनता ने उन्हें नहीं चुना था और जिन्होंने उन्हें चुना था, ऐसा करने का उनके पास कोई अधिकार नहीं था। लालू प्रसाद यादव तो उस वक्त विधायक भी नहीं थे। मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद उन्होंने चुनाव लड़ा और संवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री पद के लायक बने। तो यह था लालू के बिहार की गद्दी पर काबिज होने का सच। सामाजिक समरसता कायम करने वाली पार्टी का पहला मुख्यमंत्री ही अलोकतांत्रिक तौर-तरीके और गैर जनमत से चुना गया। इस प्रक्रिया को भ्रष्टाचार की श्रृंखला में रखा जाय तो लालू के मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित किया जाना भी एक भ्रष्ट प्रक्रिया ही थी, जो खुलेआम लोकतांत्रिक प्रणाली की धज्जियां उड़ा रही थी। फिर भ्रष्टाचार के माध्यम से स्थापित मुख्यमंत्री न्याय औऱ नैतिकता की बात किस मुंह से करता? और इसी का परिणाम हुआ कि पूरे सूबे में अराजकता की स्थिति पैदा होती चली गयी। जनता दल के कार्यकर्ता खुलेआम आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने लगे। हत्या की राजनीति मुखर हो गयी। संतरी से मंत्री तक जातीय समीकरण के तहत बहाल किये जाने लगे। गुण और गुणवत्ता को नजरअंदाज किया जाने लगा। लालू रोज भड़काऊ भाषण देने लगे। जनता के नाम पर जनतंत्र का जितना मजाक लालू ने उड़ाया, इसका आकलन करना या उसे विश्लेषित करना आने वाली पीढ़ी को गलत रास्ते का पाठ पढ़ाने जैसा ही है, पर यह सच है कि एशिया के मानचित्र पर सिंधू घाटी के बाद सबसे पहले सभ्यता का विकास करने, अपनी भौतिक संपदा के साथ-साथ वैचारिक अमृत से मानवता को सींचने और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला बिहार क्रूरतम हिंसा, जघन्यतम अपराध और महाघोटालों की विषबेलियों से इस कदर जकड़ता गया कि उसकी चिरपरिचित अस्मिता पर ही संकट के बादल मंडराने लगे। जिस बिहार के बुद्ध, महावीर, चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, शेरशाह, सूफी-संतों व भक्त कवियों, सामाजिक क्रांतिकारियों और राजनैतिक हस्तियों ने समय-समय पर देश की संस्कृति में नये अध्याय जोड़े, वही बिहार लालू के राज में जंगल राज का पर्याय बन गया था।

फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार।

लालू यादव के सवाल के बहाने

लालू प्रसाद यादव ने पिछले दिनों पटना में एक समारोह में जनता से बड़े ही भावुक अंदाज में पूछा-मेरा कुसूर क्या था कि मुझे सत्ता से बेदखल कर दिया गया। लालू यादव ने उन वजहों का भी जिक्र किया, जिनके चलते उन्हें सत्ता से बेदखल नहीं किया जाना चाहिए था। क्या लालू यादव वाकई अपने सवाल का जवाब चाहते हैं? अगर हां तो उन्हें कुछ और लोगों के सामने अपने सवाल को रखना चाहिए।

उन आम लोगों से भी पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने लालू और राबड़ी देवी के कायॆकाल में मान लिया था कि अगर बिहार में रहना है तो अपने दम पर, अपने बाहुबल पर भरोसा करके ही रहा जा सकता है। आगे बढ़ना है तो सरकारी मशीनरी से किसी मदद की उम्मीद न करें। अपने संसाधनों से विकास कर सकते हों तो करें।

उनसे भी लालू मुखातिब हों, जो उन परिस्थितियों में वहां रहने की हिम्मत नहीं जुटा सके और पलायन को मजबूर हुए। हालत यह हो गई कि महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल से लेकर देश के लगभग सभी हिस्सों में बिहार के लोगों की भीड़ सी हो गई। मजबूरी में बिहार छोड़ने वाले लोग कहीं दुरदुराए जाते हैं तो कहीं पीटे जाते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वही हैं, जिनके उत्थान और आत्मसम्मान को बहाल करने की बात कहते लालू यादव अघाते नहीं। उत्थान होता आत्मसम्मान बढ़ता या बहाल होता तो क्या वे अपना देस छोड़ने को मजबूर होते। इनके, इनके परिवार वालों के पास भी तो वोट का अधिकार है, लालू यादव इनसे भी क्यों नहीं पूछते कि किन वजहों से उनका वह सिंहासन छीन लिया गया, जिस पर वे बीस साल तक बैठने का दावा करते थे।

सवाल तो उन उद्योगपतियों से भी पूछा जाना चाहिए जो रंगदारी, अपहरण की वारदातों और गुंडागरदी से त्रस्त होकर बिहार छोड़कर भाग जाने को मजबूर हुए। सत्ता में बने रहने के लिए केवल भावुक सवाल और नौटंकी की जरूरत नहीं होती। नागरिकों की बेहतरी और उनकी हिफाजत के उपायों की भी जरूरत होती है। जनता की हिफाजत की स्थिति यह थी कि लोग सवाल पूछने लगे थे कि अगला नरसंहार कब और कहां होगा? ऐसे सवाल पूछने वालों को जवाब देने का हक नहीं था क्या? नरसंहार को छोड़ भी दें तो कानून-व्यवस्था की हालत यह थी कि लोग शाम होते ही अपने घरों में दुबक जाने को मजबूर होते थे। राजधानी पटना तक में शाम होते असामाजिक तत्व ही सड़कों पर बचे रह जाते थे। महिलाएं इज्जत का जोखिम उठाकर ही दिन में भी घर से निकलती थीं। क्या-क्या गिनवाया जाए? लालू यादव को याद हो या न हो, जनता को तो अब भी याद होगा ही। आखिर भुगता तो उन्होंने ही है।

मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार में आग लगी तो उसे बुझाने की जरूरत थी। लेकिन लालू यादव ने यह कहकर उस आग में घी ही तो डाल दिया कि ..भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला-कायस्थ) साफ करो। लालू यादव बाद में भले ही इस पर लीपापोती करते रहे हों लेकिन उनके इस महान आह्वान का खामियाजा केवल भूराबाल ने ही नहीं, पूरे प्रदेश ने भुगता।

इनके साथ उनसे भी तो अपना सवाल पूछिए रेलमंत्री जी जिन्हें आपने चौदह-पंद्रह साल तक अपनी नौटंकी में उलझाए रखा। चरवाहा विद्यालय खोलकर अपने आपको विकास पुरुष कहने और कहलवाने से विकास नहीं होता। होता तो आज भी चरवाहा विद्यालय में पढ़ने वाले आते होते। छात्रों के लिए सिसक-सिसक कर मर नहीं जाते चरवाहा विद्यालय। सिंदुर-टिकुली बांटने से कौन सा विकास होता है? सिवाय अखबारों में बांटने वाले की तस्वीर छपने के और कौन सा भला हुआ उस कवायद का, कोई तो बताए। हप्प-हप्प करके सवालों को खा जाने की उनकी अदा पर मर मिटने वाले भी कब तक वोट देते?

लालू यादव के सवाल का जवाब तलाशती चरचा जारी रहेगी। अगली किस्तों में श्री कौशल शुक्ला कुछ तथ्यों के साथ आपके सामने होंगे।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

गलतियां करें आप, खामियाजा भुगते देश?

चुनाव के बहाने देश में चल रही राजनैतिक चोंचलेबाजियों, खासकर रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव और इस्पात-उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान की मतलबी गलबहियों पर सोच रहा था, पर चिंतन में आ गये पूज्य बापू गांधी जी और जेहन में आ गया उनकी ओर से कभी दिया गया हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा। तब गुलाम देश में ये दोनों कौमें आपस में एक-दूसरे के खून की प्यासी हो रही थीं। देखने की बात यह थी कि देश में तब सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम ही नहीं थे, सिख भी थे, ईसाई भी थे, बुद्ध-जैन सम्प्रदाय के साथ दर्जनों कौमें अलग-अलग वजूद में थीं, पर गांधी जी ने हिंसा की घटनाओं से आहत होकर नारा दे दिया-हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई। गांधी जी एक बड़ी शख्सीयत थे। उनसे बड़ा देश में कोई था ही नहीं। मगर, उनसे यह नारा देकर एक छोटी गलती जो हो गयी, उसका खामियाजा आज तक तक देश भुगत रहा है। इसके खत्म होने की कोई सूरत नहीं दिख रही है। उनके नारे का सीधा सा मतलब था, दोनों कौमों में भाईचारा कायम हो जाये, पर हुआ क्या? इन दोनों जातियों को बड़ा बल मिल गया। उन्हें लगा कि भले देश में दर्जनों जातियां हों, पर उनकी तो कोई बात नहीं। गांधी जी ने कह दिया तो इसका मतलब अब तो सिर्फ वे ही हैं, बाकी गौण। और लोगों ने देखा कि तबसे इन दौ कौमों में भेद मजबूत होता चला गया, एक दूसरे पर विजय पाने का संघर्ष तेज होता चला गया। बड़े लोगों की छोटी गलतियां भी बड़ा असर दिखाती हैं, क्योंकि उनका पटल व्यापक होता है, वे सुनी दूर तक जाती हैं, समझी देर तक जाती हैं।
अब आयें लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान के संदर्भों पर। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी लोक सभा चुनाव के इन दोनों मोहरों में सीट बंटवारे को लेकर आजकल रस्साकशी चल रही है। यूपीए के इन दो महत्वपूर्ण सिपहसालारों में मान-मनौअल के पैंतरे चल रहे हैं। बिहार में सोलह बनाम चालीस का पासवान ने जो पासा फेंका है, वह लालू को कबूल नहीं, मगर वे यह भी नहीं चाहते कि दो की लड़ाई का फायदा तीसरे को यानी जदयू-भाजपा नीत राजग को मिल जाये। यही कारण था कि पिछले दिनों लालू जा पहुंचे पासवान के घर। कुछ देर रुके औऱ फिर निकल पड़े अपनी राह। क्या बात हुई यह तो वे ही जानें, पर हवा उड़ी कि राजनैतिक बिसात पर दांव खेलने और जीतने की कला में माहिर तथा खुद को किंग मेकर कहने वाले मैनेजमेंट गुरु लालू ने पका ली अपनी खिचड़ी, मना लिया रुठ जाने वाले पासवान को। पर, तमाशा तो आखिर तमाशा है। दूसरे ही दिन पासवान के पलटवार से पता चला कि नहीं, बात जमी नहीं, बल्कि वहीं की वहीं अटकी हुई है। पासवान की बातों में इशारा साफ था कि गेंद लालू के पाले में ही है, उन्हें ही अभी मुद्दों को मोड़ देना है। संघर्ष तेज, मशक्कत जारी, निगाहों में बढ़ता इंतजार। फिर मैनेजमेंट गुरु का नारा आया-इस बार दलित प्रधानमंत्री चाहिए। सफलतम राजनीतिज्ञ का बेहतरीन दांव। दलितों को रिझाने के साथ उन्हें पासवान से भटकाने का बेजोड़ हथियार।
पर, लालू के दलित प्रेम का यही नारा देश के लिए हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई के नारे की तरह खतरनाक है। इक्कीसवीं सदी के इस दौर में और आर्थिक मंदी से जूझ रहे देश में जहां हर बड़ा-छोटा, अमीर-गरीब अपनी रोजी-रोटी की चिंता कर रहा है, वहां यह नारा खतरनाक है। खून-खराबे को आमंत्रित करने वाला, एक बड़ा वर्ग भेद कायम करने वाला नारा है यह। लोगों को याद होगा, जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो उनके दिल में भी पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के प्रति सहानुभूति उपजी थी। उन्होंने वर्षों तक पेंडिंग पड़े मंडल आयोग की सिफारिशें एक झटके में लागू कर दी थीं। तब वीपी सिंह के सामने देश के नौजवान धू-धू कर जलने लगे थे और जलने लगा था पूरा देश। जिन गांवों में लोग जात-पांत भूल कर एक दूसरे के दुख-सुख में बिना भेदभाव के शामिल हो रहे थे, वहां लकीरें खिंच गयीं और बिना वितंडा शुरू हो गयी खूनी भिड़ंत। बसें-ट्रेनें रोककर और जाति पूछ-पूछ कर लोगों को मारा-काटा जाने लगा। मंडल कमीशन से शुरू हुआ वर्ग संघर्ष आज तक कायम है, रोज-ब-रोज गहरा रहा है। जिस आरक्षण का प्रावधान देश में दस वर्षों के लिए ही किया गया था, उस पर अब राजनीति जड़े जमा चुकी हैं औऱ इसके खत्म होने के आसार खत्म हो गये हैं।
सवाल यह है कि अपनी जीत और अपनी पार्टी के वजूद को बचाने के लिए सब कुछ करने वाले लालू प्रसाद यादव को क्या हक है कि वे आम जनता को बरगलाते हुए समस्याओं से उलझे देश में एक नया वितंडा खड़ा करें? वह भी तब, जबकि अभी यही साबित होना है कि दलितों का मसीहा कौन है? और दलित प्रधानमंत्री की जिद ही क्यों? सवाल यह है कि दलितों के नाम पर पूरे देश की उपेक्षा क्या जायज है? यहां सवाल यह भी है कि साठ साला आजादी के बाद भी यदि देश में कोई है जो दलित कहे जाने के लायक है तो दोष किसका है? क्या लालू और पासवान जैसे नेताओं का कोई दोष नहीं, जो खुद तो वर्षों से सत्ता पर काबिज होकर मजा लूट रहे हैं और दलित के नाम पर भी खुद को ही आगे पेश कर दे रहे हैं? क्या वे भी दलित ही हैं? और खुद के फायदे के लिए दलित प्रधानमंत्री का नारा देकर क्या वे देश को फिर एक लंबे और अंतहीन खूनी संघर्ष में झोंकने की जुर्रत नहीं कर रहे? सवाल यह भी है कि वर्ग भेद को जिंदा करने वाले वाले और उसे मजबूती प्रदान करने वाले ऐसे नेता को आखिर देश कब तक झेलेगा? उनकी गलतियों का खामियाजा आखिर देश क्यों भुगते? फिलहाल इतना ही, ग्रेट इंडियन तमाशे को लेकर बहस लायक मुद्दों पर अभी चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

लो, आप तो पलटी मार गये दादा

दादा, आपके नाम यह दूसरी पाती नहीं लिखता, यदि आपने भूल सुधार कर जिन्हें श्रापा था, उनके विजयी भव की कामना नहीं की होती। मैं फिर कहना चाहूंगा दादा, आपने यह क्या कह दिया! कुछ कहूं, इससे पहले मेरा हलफनामा ले लीजिए कि इस बार भी मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं, आपको यही करना चाहिए। हमारी संस्कृति भी यही है कि मरने वाले के सभी गुनाह माफ कर दिये जाते हैं, फांसी पर लटकाने से पहले उसकी अंतिम इच्छा तक पूछने और उसे पूरा करने का रिवाज है यहां। दादा, आपने बिल्कुल ठीक किया। पर, कुछ सवाल फिर भी हैं, जो जेहन में चकरा रहे हैं, जवाब ढूंढ़ रहे हैं। और यह जवाब मैं आपसे ही चाहूंगा। कोई गुस्ताखी हुई तो माफ कीजिएगा। माफ तो आप कर देते हैं, इसका नमूना आपने दे ही दिया है। जिस पर आप इतने भड़के हुए थे कि उनके चुनाव हार जाने की कामना कर रहे थे, उन सभी को अभी आपने जीतने का आशीर्वाद दे तो दिया।
तो पहला सवाल - दादा, आप अपने आप को क्या समझते हैं? इंसान या भगवान? इंसान समझा होता तो आपको मालूम होता कि आपके कहने से कोई कैसे चुनाव हार सकता था और फिर आपके पलटने से कोई कैसे जीत सकता है? सवाल ठीक है न दादा? या आप खुद को भगवान समझते हैं? आपको लगा कि मेरी जुबान से श्राप निकल गया है तो सामने वाले को यह श्राप लग ही जायेगा, इसलिए तुरंत पलटी मार गये? तो क्या भगवानों को इतनी जल्दी पलटी मारना क्या ठीक है? मुझे मालूम है, आप खुद को भगवान मानने की भूल कतई नहीं कर सकते। तो क्या मैं आपसे यह पूछने की हिमाकत कर सकता हूं कि आप खुद को क्या समझते हैं? क्या यह सिर्फ एक बूढ़े का भीषण प्रलाप था? मैं यह नहीं कहना चाहता कि यह एक किस्म का पागलपन था। या पागलपन ही था? यह सवाल पूरी शिद्दत के साथ आपके सामने सुरसा के मुंह की तरह फैला और चौड़ा हुआ खड़ा है। जवाब आपको ही देना है, दादा।
दूसरा सवाल - दादा, इक्कीसवीं सदी में जहां मानव चांद से आगे निकलकर मंगल और शनि तक जा पहुंचा है, उस दौर में विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देश में क्या श्राप और आशीर्वाद से ही राजकाज चलाया जायेगा? कामरेडों की आत्मा को आपकी बातों से कितना सुकून मिलेगा, यह तो उनकी आत्मा ही बतायेगी, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में जहां राजनीति तक का कारपोरेटाइजेशन हो चला है, लालकृष्ण आडवाणी जैसे हिन्दुत्व विचारधारा वाली पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बुजुर्ग नेता युवाओं को रिझाने के लिए साइट औऱ एसएमएस का सहारा ले रहे हैं, उस दौर में कुछ लोगों को साक्षात विजयी भव का आशीर्वाद देकर आपने कितना ठीक किया? बताइए दादा, बताइए।
तीसरा सवाल - और दादा, यह आशीर्वाद यदि एक सामान्य बूढ़े का भीषण प्रलाप था तो हमें लगता है कि आप ही देश को बताएं कि इस प्रकार के एक सामान्य मानसिकता वाले किसी बुजुर्ग को क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी की शोभा बढ़ानी चाहिए? यदि नहीं तो क्या आपको तत्काल अपनी कुर्सी से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए? और यदि आप कुर्सी से इस्तीफा नहीं देते तो क्या यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि आप भी, बुरा मत मानियेगा दादा, आप भी कुर्सी पर चिपके रहने वाले एक वैसे सामान्य नेता से अलग नहीं हैं, जो कुर्सी पर बने रहने के लिए तमाम तरह की तिकड़म करते रहते हैं? मेरा मानना है कि पब्लिक तो सब जानती है, पर एक बार जवाब आपके मुंह से भी आ जाये।
दादा, चुनाव का मौसम चल रहा है। देश में जब से लोकतंत्र की स्थापना हुई है, चुनाव प्रणाली शुरू हुई है, तभी से एक महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित चल रहा है। आप तो विपक्ष की राजनीति में माहिर रहे हैं। चनावों में आपने देखा होगा कि 51 वोट पाने वाला जीत जाता है, विजयश्री का माला पहन कर आशीर्वाद लेता घूमता है, जबकि 48 वोट पाने वाला हार जाता है, सिर छुपा लेता है, भरे-पूरे लोकतंत्र में नकार दिया जाता है। उसके हारने के साथ ही खत्म हो जाती है 48 वोटों की अहमियत और खत्म हो जाते हैं इन वोटों के सपने। दादा, क्या आपको नहीं लगता कि इक्कीसवीं सदी के वैश्विक और मंदी से भरे इस दौर में देश को इन अड़तालीस वोटों के महत्व को समझने की बड़ी जरूरत है। इसके लिए आप जैसे पहुंचे हुए और महान लोगों के विचार किसी काम आ सकते थे। देश का नक्शा बदला जा सकता था। पर, आप तो श्राप और आशीर्वाद बांटते चल रहे हैं, देश आपसे कौन सी उम्मीद पाले? जिन सभी को आपने विजयी भव का आशीर्वाद दिया, आपको पता है कि उनमें से कितने चुनाव लड़ेंगे और कितने चुनाव नहीं लड़ेंगे? यदि नहीं पता तो पूरी गंभीरता से एक आम भारतीय के नाते मेरा सवाल अपनी जगह कायम है कि यह आपने क्या किया? बताइए दादा, यह आपने क्या किया? मैं आपका जवाब चाहता हूं।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

दादा, आपने ये क्या कह दिया!

दादा, आपने गुरुवार को संसद में शाप देने के अंदाज में जो कहा, उसमें मैं आपकी कोई गल्ती नहीं देखता। सच मानियेगा। हल्ला-हंगामा करने वाले सांसदों को आने वाले चुनाव में हार जाने का शाप देकर आपने बिल्कुल आम अवाम की आवाज को ही बुलंद किया है। लेकिन, मैं आप ही से पूछना चाहूंगा कि आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं, उस कुर्सी से इस प्रकार की आवाज का सुनना क्या आपको ही अच्छा लगा? कई सवाल मेरे मन में उठ रहे हैं, जो आपसे और सिर्फ आपसे ही पूछना चाहता हूं। निश्चित मानियेगा, ये सवाल आपके खिलाफ जाकर नहीं कर रहा हूं। ये सवाल आपकी आवाज और उसकी मुखरता के साथ रहकर कर रहा हूं।
सबसे पहला सवाल-क्या आपको नहीं लगता कि आप बूढ़े गये हैं? बूढ़ा का मतलब बलहीन, तेजहीन। बात-बात पर झल्लाने वाला, हमेशा अपने मतलब की धुन में मगन रहने वाला। आपने भी कुछ वैसा ही तो नहीं किया? वो विपक्षी सांसद थे। कहीं और नहीं, संसद में हल्ला कर रहे थे। दादा, चुनाव सर पर है और आप देख ही रहे हैं कि पब्लिक के पास जाने लायक और वोट मांगने लायक देश में मुद्दों का अभाव चल रहा है। बड़ी-बड़ी हस्तियां मुद्दे तलाश रही हैं। तो यह तो निश्चित ही है कि इस तरह के हल्ले होंगे। यह तो आम पब्लिक भी जान रही है। इसमें क्या इतना झल्लाने की जरूरत थी कि उन्हें अगले चुनाव में हार जाने का शाप देना आपके लिए जरूरी लगने लगा? और शाप भी लोकतंत्र के मसीहाओं की रखवाली करने वाले सरदार की ओर से? सरदार इतना बलहीन, तेजहीन! मगर नहीं, मुझे तो साफ लग रहा है कि यह संसद के मजबूत अध्यक्ष का नहीं, एक लाचार बूढ़े का भीषण प्रलाप था। आप बताएं कि क्या नहीं था? और इससे आगे की बात। दादा, 58 साल के बाद एक इंसान को आप किरानी बनने के लायक नहीं समझते, तो इसके पार का आदमी देश चलाने के लायक क्यों समझ लिया जाता है? यह ऐसा सवाल है, जिसका मौजूं मिजाज आपके संदर्भों में अब आपके ही सामने है। जवाब दे सकते हैं तो दीजिए।
दूसरा सवाल - दादा, क्या आपको नहीं लगता कि आपके शाप के बाद पूरे देश मे एक बड़ी बहस शुरू हो जानी चाहिए? बहस यह कि संसद में सांसदों को हल्ला करना चाहिए या नहीं? इस हल्ले का अर्थ मैं तो विरोध की आवाज से लेता हूं। आप बतायें क्या यह गलत है? मुझे लगता है, आप भी इसे विरोध की आवाज ही कहेंगे। तो सवाल यह है दादा, विपक्ष के लोग विरोध की आवाज उठाएं या नहीं? उठाएं तो उनका अंदाज क्या हो? दादा, क्या आपको नहीं लगता कि पूरे सिस्टम में नकारापन बज रहा है। इस नकारेपन में अपनी आवाज ऊपर उठाने के लिए उसे तेज ही तो करनी होगी। दादा, आतंकवादी विस्फोट पर विस्फोट कर रहे थे औऱ हमारे गृहमंत्री कपड़े बदलने में मशगूल थे। कुछ बोलने के लिए बोला गया तो कहने लगे कि क्या मैं चिल्लाऊं? आप तो इस बात के गवाह हैं कि कैसे उनकी हरकतों के खिलाफ पूरा देश चिल्ला रहा था। इसी चिल्लाहट का नतीजा तो था कि सरकार चेती और उन्हें उनके पद से हटाया गया।
और सबसे अहम सवाल - दादा, क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी भीष्म पितामह की तरह सत्ता के प्रति समर्पित होती है? क्या उसका हर काम, हर मुकाम सत्ता शीर्ष की रखवाली तक समाप्त हो जाता है? औऱ क्या आप इससे इनकार करेंगे कि ऐसा होने पर ही तो महाभारत हुआ? देश ने तो देखा है। गलत-सही की बात मैं नहीं कर रहा, लेकिन इतना तो आप भी मानेंगे दादा कि इसी रास्ते पर चलते हुए आप अपने उन साथियों और घर से बिल्कुल अलग हो गये, जो आपके हमकदम थे, हमसफर थे। सवाल यह कि आम आदमी क्या सबक ले? निष्ठाएं क्या इतनी ही तेजी से बदली जानी चाहिए?
दादा, मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि मुझे आपकी बातों से सरासर इत्तेफाक है। मगर सवाल हैं कि सर उठा रहे हैं। इस देश में एक सबसे बड़ी खराबी थी, वह यह थी कि सवाल उठाने वालों का मुंह बंद कर दिया जाता था। यह सामंती प्रथा का लक्षण था। लोकतंत्र का मतलब ही होता है आवाज की रवानगी। इस रवानगी पर रोक लग गयी, सवाल उठाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो जवाब कहां से आएंगे? दादा, आप बताएं, जवाब कहां से आएंगे? सांसद अगले चुनाव में हारें या जीतें पर सवाल यह है कि सवाल तो फिर भी उठाना होगा, जवाब फिर भी ढूंढ़ने होंगे। होंगे कि नहीं?

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

मदारी से बंदर को मतलब नहीं

जी हां, आम चुनाव को लेकर बिहार में जो ग्रेट इंडियन तमाशा चल रहा है, उसको देखते हुए अभी यही तय करना बाकी है कि इस खेल में मदारी कौन है और उसके इशारे पर नाचने वाला बंदर कौन? कभी मदारी बंदर की शक्ल में दिख रहा है तो कभी बंदर मदारी की शक्ल में। नजारे तो यह भी नजर आ रहे हैं कि मदारी का बंदर उसे ही घुड़की दे रहा है। बात राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दो मजबूत खंभों जदयू और भाजपा की हो या फिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के तीन तिलंगों राजद, कांग्रेस व लोजपा की, क्रिया बिल्कुल समान हैं, न्यूटन के थर्ड गति नियम के अनुसार प्रतिक्रिया भले बराबर और विपरीत हो। पर, यह बिहारी फंडा है, ग्रेट इंडियन तमाशे में घुसा बिहारी फंडा, नतीजे के लिए सब्र करना होगा।
अभी राबड़ी सरकार के दिनों की यादें कइयों के जेहन में ताजा होंगी। शैडो मुख्यमंत्री के खिलाफ भाजपा के सुशील मोदी लगभग हर रोज विधान सभा में अपनी ऊर्जा खपाते रहते थे। इसके लिए सदन में ही उन्हें क्या-क्या न सुनना पड़ता था। जीभ खींच लेंगे, झाड़ू से मारेंगे। अब जब पति लालू ही ठेठ गंवई स्टायल में ओपन कास्ट चैनल थे, जेल से शासन चलाने का दावा पूरा कर चुके थे तो पत्नी क्या करतीं। मोदी सब कुछ बर्दाश्त करते विपक्ष की भूमिका निभाते जा रहे थे। उभार लोगों के बीच भी कुछ कम कायम नहीं था। लोगों को याद होगा, तब सुशील मोदी नरेन्द्र मोदी की तरह दिख रहे थे। जोश से लबरेज, होश से लैस, दाढ़ी युवा तुर्क नेता की याद दिलाती थी। पर, ग्रेट इंडियन तमाशे ने जब बिहार का रुख लिया तो वे छतरी के नीचे आ गये। कहा तो गया जदयू की छतरी के नीचे, पर दिखा नीतीश कुमार की छतरी के नीचे। नीतीश यानी डेवलपमेंट मैन। नीतीश यानी अपराध और अपराधियों को खत्म करने का दावा करने वाला नेता। नीतीश यानी आनंद मोहन और मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों का समर्थन प्राप्त नेता भी। खैर, बात हो रही थी मोदी की। सरकार बनी तो मुख्यमंत्री पद के दावेदार मोदी बन गये उपमुख्यमंत्री। तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा की भांति बिहार की जनता ने देखा उन्हें हर जगह. हर सभा में नीतीश के साथ, हंसते, मुसकाते, माला पहनते। जो संकट पैदा हुआ, वह यह था कि पूरी कवायद में भाजपा गोल हो गयी। मोदी जी के कंधे पर भाजपा और मोदी जी कहां, यह सवाल आम भाजपाइयों के मन में आज भी सालता है। भाजपा का चेहरा बन गया जदयू का मुखौटा यानी पूरी पहचान का ही संकट। अब राधा मोहन सिंह, जो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं, भलें चिल्ला लें, गुहार लगा लें, होना वही है जो मोदी जी चाहेंगे। और जो सूरतेहाल है, उससे तो यही लगता है कि मोदी जी वही चाहेंगे जो नीतीश बाबू चाहेंगे। भाग-दौड़ शुरू है, गणित बिठाये जा रहे हैं, पर बिहारी फंडे से बिहार में ही अपना वजूद बचाने के लिए इस पार्टी को मशक्कत करनी पड़ रही है, आगे भी बहुत पसीने बहाने पड़ेंगे। सीटों की घोषणा अभी बाकी है, आने वाला समय सबकुछ साफ कर देगा। वैसे भाजपा के लोग अब खुलकर यह कहने लगे हैं कि मोदी बिहार में भाजपा को मटियामेट कर ही दम लेंगे। यदि भाजपा ने उनका निष्कासन तय किया तो वे जदयू के एलानिया मेंबर होंगे, मजबूत खंभे होंगे।
दूसरी धूरी संप्रग, जिसके दो धड़े राजद और लोजपा राष्ट्रीय स्तर पर भले कांग्रेस की छतरी के नीचे दिख रहे हों, पर इस तमाशे का बिहार एपीसोड बिल्कुल अलग परिदृश्य प्रस्तुत करता है। दिल्ली में उन्हें छाया देने वाली कांग्रेस का यहां तो साया तक गायब है। एक आम बिहारी से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का नाम पूछकर देखिए, मेरा दावा है, वह नहीं बता पायेगा। सत्येन्द्र नारायण सिंह ने जो लुटिया डुबोयी, वह आज तक डूबी हुई है। नतीजा, नारंगी की तरह जावों में बंटे राजद, लोजपा और कांग्रेस दिल्ली में एक दिख रही हों, पर यहां तो अलग-अलग रस बांटती ही चल रही हैं। पिछली बार लालू ने अपने करिश्मे से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार खड़े किये और ज्यादा सीटें ले गये। नतीजा, राम विलास पासवान को आज भी रेल मंत्रालय छिनने का गम साल रहा है। इस बार वे कोई चूक नहीं करना चाहते। चालीस सीटों वाले इस प्रदेश में अपने लिए उन्होंने सोलह सीटों का दावा ठोक दिया है और साफ कर दिया है कि यदि इसे नहीं माना गया तो वे चालीस की चालीस सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे। कांग्रेस की तो कोई बात नहीं, पर लालू सकते में हैं। लालू को याद होगा कि विधान सभा चुनाव में रामविलास की जिद से गठबंधन नहीं बन पाने की सूरत में बिहार की गद्दी उनके हाथों से जाती रही थी। बिहार विधान सभा को आज भी वे हसरत भरी निगाहों से देखते हैं। तो ग्रेट इंडियन तमाशे के इस बिहारी फंडे में मदारी का खेल तो चालू है, पर मदारी कौन और बंदर कौन है, यह अभी तय होना है। जो दिख रहा है, उसे देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि फिलहाल मदारी से बंदर को फिलहाल कोई मतलब नहीं है। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा अभी जारी रहेगी। धन्यवाद।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

बिहार में ग्रेट इंडियन तमाशा

ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव का अभी बिगुल ठीक से बजा भी नहीं है, पर पहलवान हैं कि ताल ठोकने लगे हैं। वैसे तो इस प्रकार का समां पूरे देश में बंधा हुआ है, पर बिहार में, भई, यह कुछ खास अंदाज में ही सरंजाम पाता दिख रहा है। अखाड़े आबाद हो गये हैं और मुकाबले की छटपटाहट गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले जुबानों की सुर्खियों पर चढ़ी दिखने लगी है। घात-प्रतिघात में बोले जा रहे शब्दों के नमूने अभी भले ऊपरी स्तर पर ही हों, पर उनका रंग आम मानस पर चढ़ता भी दिख रहा है। जीत जायेंगे हम का बोलबाला कुछ यूं फिजा में तैर रहा है, मानो मतदान कल ही होने वाला है, फैसला कल ही आने वाला है। और इसका श्रेय उन तीन दिग्गजों के नाम जाता है, जो धुरी के रूप में पब्लिक के सामने, ऊपर और अगल-बगल सुदर्शन चक्र की भांति घूम रहे हैं। पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले ये तीन दिग्गज हैं- एनडीए यानी जदयू और भाजपा के संयुक्त प्रयासों के क्षत्रप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद सुप्रीमो व केन्द्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा लोजपा किंग व केन्द्रीय रसायन-उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान। सरकारी अभियान की आड़ में अब ग्रेट इंडियन तमाशे की खासियत देखिए।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विकास यात्रा शुरू कर रखी है। सरकारी अभियान, सरकार गांवों की ओर, जरूरत अभी ही। क्यों? क्योंकि चुनाव जो सिर पर है। इसके तहत वे न केवल गली-गली घूम रहे हैं, बल्कि जिले के एक गांव में रात्रि विश्राम भी कर रहे हैं। शाम में लग रही है चौपाल और गांव में लग रहा है जनता दरबार। अगले रोज शहर में जनसभा। अब भई, मुख्यमंत्री घूमेगा तो सरकारी अमला-जमला भी घूमेगा। और जब काफिला होगा ऐसा तो समां बंधेगा कैसा? हां, कहना चाहता हूं कि समां तो खूब बंधेगा, पर काम कुछ नहीं होगा। जी हां, काम ऐसे होता ही नहीं है। ऐसे कहीं काम होता है क्या? यह तो सरकारी पैसे से चुनाव की तैयारी का फंडा है। बिहारी फंडा? हींग लगे न हल्दी, रंग भी चोखा आये। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, लागू हो जाये पूरे देश में भई।
उधर, रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव। ठेठ गंवई स्टायल। प्रतिद्वंद्वी पर पलटवार। प्रतिद्वंद्वी दो। नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। घूम रहे हैं जिला दर जिला। रेल का सहारा। कर रहे हैं घोषणा दर घोषणा। रेलवे के मुहाने को खोल दिया है बिहार की ओर। फायनल पारी। चुनाव में जीतना जो है। कहीं लाइनें बिछ रही हैं तो कहीं रेलमंडल खुल रहे हैं। गाड़ियों के फेरे से काम नहीं चल रहा तो गाड़ियां ही बढ़ायी जा रही हैं। अभी आपने देखा होगा कि भाई साहब ने बजट और अंतरिम बजट का अंतर ही खत्म कर डाला। चार महीने बनाम पांच साल की घोषणा तक रेल बजट में की गयी। यह चुनावी अखाड़े के पहलवान की ललकार थी, जिसे पूरे हिंदुस्तान ने सुनी और समझी, बिहार ने तो शिद्दत से महसूस भी किया। अब चौक-चौराहों पर लालू ही लालू हैं। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, बिहारी फंडा। लागू हो जाये पूरे देश में भई।
और अपने राम विलास पासवान। रेल नहीं मिली तो सेल ही सही। बेतिया जाकर खुलवा दिया स्टील प्लांट। टार्गेट फिक्स, सालोसाल की बात तो छोड़िये, कुछ ही महीनों में आने लगेंगे उत्पादन। अधिकारी बेचारे हलकान हैं, परेशान हैं, पर काम तो करना ही है। नेताजी की इज्जत का सवाल है। सेहत सुधारने की दिशा में बिहार सरकार बहुत कुछ कर रही है, कोई बात नहीं, केन्द्र से प्रोग्राम आ रहे हैं, कोई बात नहीं, नेताजी तो गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले शिविर खोलकर लोगों का इलाज करवाएंगे ही। अब कोई सोचता हो तो सोचे कि आखिर सेल को लोगों के इलाज से क्या मतलब, वह भी मुफ्त? मगर, नहीं। नेताजी को तो मतलब है। अब रेल नहीं, सेल ही सही, नीतीश-लालू को ललकारना जो है। जनता बिना सेवा क्या सुनेगी? ललकार खूंखार हो चुकी है। मंच पर हमेशा साथ दिख रहे हैं सूरजभान, जिनका कहना है कि लोग जब उन्हें बास कहता है, किंग कहता है तो अच्छा लगता है। और सबसे बड़ी खासियत। तीनों नेताओं का टार्गेट वोट एक ही है। दलित जाति, पिछड़े लोग। अब इसमें कांग्रेस ने अपना वजूद खो दिया, भाजपा की मिट्टी पलीद होने पर लगी है तो कोई क्या करे? फिलहाल इतना ही। ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

श्मशान की एक रात...

बस वाले से हमने कहा-हमें छोला श्मशान घाट के पास उतार देना। कंडक्टर समेत समूची बस ने हमें ऐसे देखा मानो हम उनकी जात से बाहर के हों। श्मशान घाट के पास पुलिया पर हमें उतारकर बस चलती बनी। एक अधखुली दुकान वाले से पूछा-श्मशान घाट किधर है? मरघट सामने है-उसने बताया। रात के दस बजे थे। आसपास के सूनेपन से लगा कि रात काफी गहरी हो चुकी है। बारिश हो रही थी। भींगते हुए हम श्मशान घाट की तरफ बढ़े। रास्ते में हमें शेड दिखा। बारिश से बचने के लिए वहां पहुंचे। फर्श पर दो चबूतरे बने हुए थे। शेड के बाहर पेशाब करते दिखे सज्जन (नशे में धुत) हमारे पास आए। गौर से देखा। हमने पूछा-ये चबूतरे क्यों बने हैं?॥जब आप मरेंगे, आपके ये दोस्त मरेंगे, मैं मरूंगा तो श्मशान घाट ले जाने से पहले अर्थी यहीं रखी जाएगी। वे नरेश चौहान थे। उनके इस जवाब से माहौल भुतहा लगने लगा।

यहां से चलकर हम विश्राम (श्मशान) घाट के गेट पर पहुंचे। वहां लिखा था-रात दस बजे के बाद अंतिम संस्कार नहीं होता। गेट बंद था। अंदर दोनों तरफ छोटे-छोटे घर बने हुए थे। इनमें से एक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का दफ्तर था। दूसरा विश्राम घाट के प्रबंधक नारायण सिंह कुशवाहा का निवास। दफ्तर के पास बैठे सज्जन को आवाज देकर हमने कहा, कुशवाहा जी से मिलना है। उन्होंने कहा-वे तो गए। सुबह मिलेंगे। कहा-तो आपसे ही कुछ बात करनी है। वे आए। हमने बताया-कुछ लिखना है, रात भर यहीं बैठना चाहते हैं। अखबार का नाम बताया तो उन्होंने दरवाजा खोल दिया। बातचीत के दौरान चाय पिलवायी और बताया कि मैं ही नारायण सिंह हूं। परिवार के साथ यहीं रहता हूं। हमारी इच्छा के मुताबिक कुशवाहा जी ग्यारह बजे हम दोनों को वहां छोड़ आए, जहां मुरदे जलाए जाते हैं। एक बड़े शेड के नीचे बने सोलह खानों में से दो पर अब चिता जल रही थी। उनके आसपास मंडरा रहे थे चार खूंखार कुत्ते। दो हमें देखकर झपटे। कुशवाहा जी ने रोका। वे हमें वहां से कुछ दूर एक शेड के नीचे बिठाकर चले गए। एक बेंच पर बैठ गए। जहां हम बैठे थे, उसके पीछे यानी दक्षिण में नाला था। उत्तर की ओर जीवित लोगों के लिए विश्राम स्थल बना था। पश्चिम की ओर झाड़-झंखाड़ और पूरब की ओर जीवन-मृत्यु का चक्र दिख रहा था। आबादी के नाम पर दक्षिण में कबाड़खाना नाम की बस्ती।

सामने जल रहे दो मुरदों में एक युवक का था, जिसने आत्महत्या कर ली थी। दूसरी चिता एक बुजुर्ग की थी। दोनों चिताओं के शोले अब भी दहक रहे थे। पास मंडरा रहे कुत्तों के अलावा कहीं दूर भी कुत्ते भौंक रहे थे। बूंदाबांदी अब भी हो रही थी। पास में प्लास्टिक पर पानी गिर रहा था। खड़-खड़ की आवाज हो रही थी। कुत्तों के चुप होते ही माहौल अजीब सा हो गया। डर हमें आगोश में लेने की कोशिश कर रहा था। एक अनजाने रोमांच का इंतजार, जो साढ़े दस बजे तक था, वह अब उतना नहीं था। इतने में किसी फैक्ट्री से सायरन की आवाज गूंजी। हमें लगा, जैसे पास में ही शंख बजा हो। हम जीवन-मौत को छोड़कर फ्रायड की बात करने लगे। फिर स्टेशन से रेलगाड़ी की आवाज आई। लगा, आबादी पास ही है और हम आश्वस्त हुए।

सवा बारह बजे अचानक दो कुत्ते उछलकर खडे़ हो गए। लगा, दो मुरदे उठकर खड़े हुए। बोलते हुए हमारे मित्र चुप हो गए। ...आसपास पसरे भय को झटककर हम फिर बातचीत करने लगे। बूंदाबांदी बंद हो चुकी थी। प्लास्टिक पर पानी नहीं गिर रहा था। कुत्ते नहीं भौंक रहे थे। लगा, जैसे हवाएं भी बंद हो चुकी हों। पास में रेलगाड़ी गुजरने की आवाज न आती तो कहीं कुछ नहीं। पता चला, लोग मरघट सा सन्नाटा क्यों कहते हैं।

बातचीत धीमी हो रही थी। हमारा सारा ध्यान इस बात पर था कि यह वक्त गुजरता क्यों नहीं। डर को दूर करने के लिए हमने तय किया-डर तो दिमाग में होता है। असर भी हुआ। हमें लगा, भारी दबाव हमारे ऊपर से हट गया। बातचीत की गाड़ी फिर बढ़ी।
सवा एक हो चुका था। मरघट में होने का भय फिर दबोचने लगा। इस भय के बावजूद, मुझसे कहीं ज्यादा हमारे मित्र को किसी रोमांचकारी घटना का इंतजार था। क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं था। जाने कैसे॥बात फिर भूतों की होने लगी। बातचीत एकतरफा हो गई। मुझे लगा, अब मैं सोच नहीं सकता तो बोलूं कैसे? लगा, मेरे दिमाग पर किसी और शक्ति का नियंत्रण हो और वह सोचने पर मजबूर कर हो कि एक झक सफेद कपड़ा पहने कोई आदमकद आकृति अभी निकल पड़ेगी। अपने आप से पूछा, क्या घिग्घी बंधना इसे ही कहते हैं? रात डेढ़ बजे हमने मृत्यु से जुड़े सारे तथ्यों को याद किया। कुछ मुक्त हुआ।

बातचीत अब भी एकतरफा थी। मैं सिर्फ सुन पा रहा था। पौने दो बजे मैंने अपने मित्र से कहा-कुछ देर मैनेजर के पास चलकर बैठें। मेरे इतना बोलते ही दहकती चिताओं के पास बैठे चारों कुत्ते उठकर भौंकने लगे। इन खूंखार कुत्तों को देखकर उपजा डर भी मुझे मरघट के पास बैठने का साहस नहीं दे पा रहा था। लेकिन मेरे मित्र कुत्तों को देखकर कुशवाहा जी के पास जाने की हिम्मत छोड़ बैठे। पर मैं उन्हें जबरन उठाकर ले गया। चिता की बगल से गुजरते वक्त कुत्ते तेजी से झपटे। लगा चीर-फाड़ दिए गए। हम दोनों चुपचाप खड़े हो गए। कुत्तों ने जगह-जगह से सूंघा और छोड़ दिया। हम मृत्यु प्रमाणपत्र दफ्तर के पास जाकर बैठ गए। भय भाग गया। दफ्तर और चिता की दूरी सत्तर-अस्सी मीटर थी। कुशवाहा जी सपरिवार आराम की नींद सोए हुए थे। मच्छरों ने परेशान करना शुरू कर दिया तो हम टहलने लगे। ढाई बजे फिर दफ्तर के पास ही बैठ गए। बैठते ही पेट्रोलिंग (पुलिस) वाले आ गए। गेट पर जीप रोकी। हमने कुशवाहा जी के परिवार के एक सदस्य को जगाया। पुलिसवालों ने उससे पूछा-ये लोग कौन हैं? वह बता नहीं पाया। हमने बताया, अखबार से हैं। अच्छा-अच्छा कहकर आठ-दस मिनट गेट पर ही खड़े रहे। भाव भंगिमा कह रही थी, पगला गए हो?

पौने तीन बजे लगा, जैसे हम कुछ छोड़ रहे हैं। फिर एक अनचाहे रोमांच को पाने की इच्छा जोर मारने लगी। भय दूर हो चुका था। जयंत जी बैठे-बैठे सो रहे थे। जबरन उठाया। वहां ले गए, जहां चिता जल रही थी। कुत्तों के डर से यहां वे आना नहीं चाह रहे थे। पर अब कुत्ते जा चुके थे। दोनों ने राहत की सांस ली। वहीं जाकर बैठ गए, जहां शुरुआत में आकर बैठे थे। बैठते ही बिजली चली गई। घुप्प अंधेरा। लगा मरघट के सारे भूत अब हम पर हमला कर देंगे। मैं सस्वर हनुमान चालीसा पढ़ने लगा। मेरे घोर वामपंथी मित्र भी मेरे सुर में सुर मिला रहे थे। मिनट दर मिनट एक दूसरे को टटोलकर देख रहे थे, हैं भी या नहीं? मेरे मित्र का पता नहीं, पर भय की अधिकता की वजह से मुझे भय का अहसास भी नहीं हो पा रहा था।

अंततः रातभर का सबसे कठिन दौर गुजरा। सवा तीन बजे बिजली आ गई। धड़कनों पर काबू पाया। एक मन हुआ वापस कुशवाहा जी के पास भाग जाएं। पर मन मारकर बैठे रहे। अब तक हमें लगने लगा था कि अंधेरे में कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा। हम भयमुक्त हो रहे थे। इस कदर कि बस्ती में किसी बच्चे की जोर-जोर से रोने की आवाज भी हमें नहीं डरा पा रही थी। अब हमें मुरदों के जलने से फैली चिरांध का भी अहसास हो रहा था। हम उस गंध से परेशान होने लगे। चिताएं बुझ चुकी थीं। हल्की बारिश के साथ जोर-जोर से हवा चलने लगी। सांय-सांय की आवाज के चलते हमें फिर लगा कि हम मरघट में बैठे हैं। ठंडी हवा सिहरन पैदा कर रही थी। वक्त तीन पैंतीस का था। कौए अब कांव-कांव करने लगे। दूर कहीं से कोयल की आवाज भी आ रही थी। हमें रातभर में कुछ भी अलग न देख पाने की निराशा घेरने लगी थी। अब हमारी बातचीत बिल्कुल सामान्य थी।

सवा चार बजे मसजिद में अजान हुई। पीछे बस्ती के घर अब साफ-साफ दिखने लगे। हमारे मित्र ने कहा, अब कुछ नहीं होगा, चलिए। गेट खुलवाकर हम श्मशान घाट से निकल पडे़। बस पकड़ी। घर आकर खूब सोए।

यह रात हमने कुछ साल पहले श्मशान घाट में गुजारी थी। साथ में मेरे मित्र जयंत सिंह तोमर भी थे। तोमर साहब मुरैना के हैं। फिलहाल बच्चों को पत्रकारिता पढ़ाते हैं। दिन, साल महीने नहीं दे रहे। वह रात मुझे आज भी कल की ही लगती है। श्मशान घाट भोपाल का है।

बुधवार, 7 जनवरी 2009

मुखिया जी से शिकायत कब तक?

याद करें, मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकियों के हमले के तुरंत बाद क्या प्रतिक्रिया थी? पूरे देश के साथ-साथ सरकार के स्वर में भी यह बात शामिल थी कि पाक को सबक सिखाया जाएगा। यह स्वर गायब हो चुका है? जनता के स्वर में निराशा का पुट है तो सरकार की चेतावनी भी अब घिघियाहट सी लगती है। इतना तो तय हो ही चुका है कि हम अपने दम पर कुछ नहीं कर सकते। पाक के खिलाफ कारॆवाई की बात तो छोड़ दें, उन आतंकियों के खिलाफ कारॆवाई के लिए भी हम बाकी देशों की चिरौरी कर रहे हैं, जिन्होंने हमारी नाक में दम कर रखा है। न जाने कितने सालों से पाक भारत के खिलाफ आतंकियों को शह दे रहा है, उनकी मदद कर रहा है। बावजूद इसके हमें हर हमले के बाद नए सिरे से हमले में पाकिस्तानी आतंकियों की संलिप्तता के सुबूत देना देने पड़ते हैं। इस बार भी हम वही कर रहे हैं। आपत्ति इस बात पर नहीं है। पाक की करतूतों की जानकारी पूरी दुनिया को होनी चाहिए। कूटनीतिक प्रयास जारी रहें। संभव है, इसके नतीजे बाद में आएं।

दिल नहीं दिमाग की बात करें तो कोई नहीं कहता कि हमें पाक पर हमला कर देना चाहिए। लेकिन इन दिनों भारत और पाकिस्तान के सुर पर विचार करें तो बात चोरी और सीनाजोरी वाली लगती है। पाकिस्तानी आतंकियों ने हमें इतनी बड़ी चोट दी, इसके बावजूद पाकिस्तान धौंस भरे स्वर में बात कर रहा है। और इक्का-दुक्का बेमतलब के बयानों को छोड़ दें तो हमारी सारी सक्रियता इस बात को लेकर है कि अमेरिका और बाकी देश मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाएं। इतना तो हमने भी मान ही लिया है कि हमारे किए कुछ नहीं होने वाला।

एक बात और। दुनिया भर में अमेरिकी दादागीरी की बात को लेकर कभी-कभी अपने यहां भी बहस होती है। सरकार भी कहती है कि हमारी नीतियां या हम अमेरिका से नहीं प्रभावित होते। ये बातें कितनी निरथॆक हैं, यह एक बार फिर साबित हुई है। भारत पर आतंकियों के हमले के बाद हम फिर अमेरिका पर ही टकटकी लगाए बैठे हैं। सारी उम्मीदें वहीं हैं। अमेरिका दबाव बनाए तो पाक आतंकियों के खिलाफ कोई कारॆवाई करे। वरना वह तो यह भी मानने को तैयार नहीं कि हमला पाकिस्तानियों ने किया।

मानेगा भी क्यों? आपने ऐसा किया ही क्या है? और अमेरिका आपके लिए किस हद तक दबाव बनाएगा, यह तो उसे ही तय करना है। विश्व ग्राम के अघोषित मुखिया जी गांव के इस दुस्साहसी घर के साथ अपने रिश्ते भी देखेंगे। और यह किसे पता नहीं होगा, गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत आज भी पूरी दमदारी के साथ मौजूद है। मार खाने के बाद मुखिया जी से शिकायत करके अपने कतॆव्य की इतिश्री मान लेने वाले लोग आगे भी पिटते रहते हैं। गांव में भी लोग उसीसे भिड़ने से बचते हैं, जो मारपीट भले न करता हो, मारपीट का जवाब देने की हैसियत रखता हो। फिलहाल हमारी स्थिति तो जवाब देने वाली नहीं, मुखिया जी से शिकायत करने वाली ही लगती है। आखिर क्यों नहीं पाकिस्तान को भी उसी की भाषा में जवाब दिया जाए। ऐसे भी पाकिस्तान कहता तो यही है। आप आईएसआई पर हमले की बात करते हैं तो वह रॉ पर आरोप लगाता है। आप जैश, लश्कर प्रमुख और दाऊद को मांगते हैं तो वह बाल ठाकरे, छोटा राजन की सूची सौंपता है। आपके सुबूतों के जवाब में दुनिया को आपके खिलाफ तैयार सीडी सौंपता है।

अब हम भी देते रहें दुनिया को सफाई। आखिर पाकिस्तान के खिलाफ सुबूतों के दम पर हम विश्व समुदाय से अपने साथ खड़े होने की उम्मीद करेंगे तो उन्हें यह भी तो बताना होगा कि नहीं, पाकिस्तान जो कह रहा है, हम वैसा कुछ नहीं करते। इसका मतलब हमें अकारण ही बचाव की मुद्रा में आना होगा। जो हम करते नहीं, उसकी सफाई देनी होगी।

इसे लेकर बहुत किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन आखिर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति क्यों नहीं बननी चाहिए? कब तक हम हर हमले के बाद दुनिया के सामने घिघियाते रहेंगे कि पाक को रोको। यह तो तय है कि पाक के खिलाफ क्या किसी के भी खिलाफ युद्ध की स्थिति में हम नहीं है। युद्ध तो केवल दुनिया का दादा अमेरिका ही छेड़ सकता है। भले ही वह एकतरफा क्यों न हो?
युद्ध के अधिकार और स्थिति से वंचित भारत को भी तो आखिर अपने बचाव के लिए कुछ न कुछ करना होगा। क्या यह जैसे को तैसा की रणनीति के अलावा वतॆमान परिस्थितियों में कुछ और हो सकता है?

कई बार तो यह भी लगता है कि मुंबई पर हमले के बाद से लेकर अब तक हमारी सरकार तय ही नहीं कर पाई है कि उसे करना क्या है। यह मानने में सचमुच हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारे पास वैसे नेतृत्व का अभाव है जो ऐसे मौकों पर उचित निणॆय ले सके। बात सिफॆ प्रधानमंत्री की नहीं है, पूरी सरकार ही इस मामले में लचर दिखाई दे रही है। हमारे नेता गाहे-बगाहे यह दोहराकर देश को संतुष्ट करने की कोशिश भर कर रहे हैं कि हमारे सारे विकल्प खुले हैं। विकल्प बताने को कोई नहीं कहता लेकिन देशवासी न जाने यह बात कितने सालों से सुन रहे हैं। हर बड़े हमले के बाद यह बात बार-बार दोहराई जाती है। होता कुछ नहीं है।

देश की जनता भी हर बार इस तरह की बातें सुन-सुनकर उसी रंग में रंग गई लगती है। वरना कहां हमले के बाद का शोर और कहां अब की उदासीनता। हमले के बाद जितना शोर हमारे नेता मचा रहे थे, जनता भी कुछ उसी अंदाज में उतना ही शोर मचा रही थी और अब वह भी शांत हो गई। आखिर भारत के खिलाफ पाक की इतनी बड़ी-बड़ी साजिशों के बावजूद क्यों नहीं कोई जनांदोलन इस बात के लिए उपजता कि पाक को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए? आखिर जनतंत्र में सबकुछ होता भी तो जनता की इच्छा से ही है।

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

वेशभूषा, आप और आपका मिजाज

यह तो सभी जानते हैं कि हर चीज के कम से कम दो पहलू हो सकते हैं। ठीक ठंडा-गरम की भांति। मगर जैसा कि ओशो कहते हैं कि ठंडा व गरम दो चीज नहीं होते, बल्कि एक ही चीज तापमान के दो रूप हैं। थोड़ा कम जो तापमान है, वह ठंडा है। थोड़ा ज्यादा जो तापमान है, वह गरम है। सोचने का मुद्दा यह है कि तापमान के बदल जाने से वस्तु की प्रकृति कितनी बदल जाती है!संदर्भ बदलता हूं। गमछा (अंगोछा या तौलिया) किसके घर में नहीं होता। सोचिए, आप इसका कैसा इस्तेमाल करते हैं? हाथ-मुंह पोंछते हैं, और क्या। अब इस गमछे को आप कंधे पर लेकर घूम रहे हैं। लोग आपको साधारण समझते हैं, आपका मनोमस्तिष्क भी एक साधारण मानव सा बना रहता है। इसी गमछे को जरा पगड़ी की तरह सिर पर बांध लीजिए। नकाबपोश की तरह चेहरे पर कस लीजिए। क्या होगा? लोगों के सामने आपकी पहली जो छवि प्रस्तुत होगी, वह एक बदमाश, गुंडे, लफंगे की होगी। लोगों की तो छोड़िए, आप खुद भी मिजाज में तल्खी, गरमी महसूस करने लगेंगे। तो यह देखा आपने कि एक गमछे के पहनने-बांधने का तरीका बदलने से मनुष्य की प्रकृति कितनी बदल जाती है।मूंछों का किस्सा कहना चाहूंगा। हो सकता है आपको अपनी मूंछों का हमेशा ख्याल न रहता हो। मगर मेरे कहने पर जरा मूंछों को बढ़ाइए, उस पर ताव देना शुरू कीजिए। आप देखेंगे कि जितनी बार आप मूंछों को ताव देते हैं, उतनी बार मिजाज में गरमी का प्रवेश होता है। मूंछों की कोरों को कटवा लीजिए, छंटवा लीजिए, मिजाज बिल्कुल सामान्य बना रहेगा।अब जरा इस पर गौर फरमाइए। एक फटा कुर्ता और मैला-कुचैला पाजामा पहना कोई व्यक्ति आपके बिस्तर पर बैठना चाहता है। आप बैठने देंगे? यदि वह बैठ भी गया तो बहुत देर तक नाक-भौं सिकोड़ते रहेंगे। हो सकता है, उसके जाने के बाद आप चादर को ड्राई-क्लीनर को भेज दें। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि साफ-सुथरा सूट-बूट में कोई व्यक्ति आपके घर आया और आप उसे अपने बिस्तर पर बिठाने में इसलिए हिचक गये कि उसका ड्रेस कहीं पहले से बिछी चादर से गंदा न हो जाये, खराब न हो जाये। उपाय न रहा और वह उसी बिस्तर पर बैठ गया तो वह तो नाक-भौं सिकोड़ता ही रहेगा और जल्दी उठ जाने की हड़बड़ी दिखाता ही रहेगा और जव वह उठकर चला जायेगा तो आप भी लेंगे राहत की सांस।तो कुल मिलाकर बात इतनी है कि आपका ड्रेस सेंस आपके व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव डालता है। इससे आप लापरवाह नहीं हो सकते। रात में सोने के लिए पहने जाने वाले कपड़ों में किसी मेहमान के पास नहीं जा सकते। मेहमान के घर जाने वाले कपड़ों में लक-दक होकर आप दफ्तर नहीं जा सकते। दफ्तर में पहने जाने वाले कपड़ों में आप पूजा पर नहीं बैठ सकते। पूजा पर बैठने वाले कपड़ों में किसी समारोह में हिस्सा नहीं ले सकते। और यदि आप इस ड्रेंस सेंस का ख्याल किये बिना घूमते-फिरते रहे, कहीं के कपड़ों में कहीं पहुंचते रहे तो आपकी क्या छवि बनेगी, यह क्या कहने की जरूरत है? हो सकता है, लोग आपको पागल तक कहने लगें। तो व्यक्तित्व विकास के लिए संवाद पर नियंत्रण के बाद जो ख्याल करने की बात है, वह है ड्रेस सेंस। आज इतना ही, व्यक्तित्व विकास पर अभी बातें जारी रहेंगी।
विचारः आसमानी बिजली हमेशा एक ही जगह नहीं गिरती। अभी इधर गिरी है तो कभी उधर भी गिरेगी। इधर गिरी है तो कुछ बच भी गया है, उधर गिरेगी तो कुछ बचेगा भी, इसकी क्या गारंटी है?

श्री कौशल शुक्ला हमारे मित्र हैं। इन दिनों मुजफ्फरपुर में हैं। ..विचार के लिए विचार के नाम से उनका ब्लॉग है। अपने ब्लॉग पर वे व्यक्तित्व विकास पर सीरीज में लेख लिख रहे हैं। इस श्रृंखला की यह चौथी कड़ी है। कौशल जी से अनुमति लेकर उसे यहां भी पोस्ट किया गया है। अच्छा लगे तो अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

पाकिस्तान भी तो यही कह रहा था

महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद हुए या मारे गए? यह बहस थमी तो नई बहस आगे बढ़ाई गई है। इस बहस की शुरुआत दरअसल पाकिस्तानी मीडिया ने की थी। वहां भी बहस आशंका के रूप में थी, करकरे को गोली मालेगांव धमाकों से जुड़े लोगों ने तो नहीं मारी? पाकिस्तानी मीडिया की आशंका पाक सरकार को स्वर देने की कवायद थी। अब कुछ दिनों बाद केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एआर अंतुले भी यही बात कह रहे हैं। पूरा देश जिस केंद्र सरकार से पाकिस्तान पर हमले की मांग कर रहा है, उस सरकार का एक वरिष्ठ मंत्री उसी पाक के सुर में सुर मिला रहा है। इसे ही सियासत कहते हैं। यहां देश की भावनाएं नहीं देखी जाती, वोट देखा जाता है। क्या करेंगे, राजनीति को यूं ही तो दलदल नहीं कहा जाता।

अंतुले की एक और बात पर गौर करें। अंतुले कहते हैं पाकिस्तानी आतंकियों के पास एटीएस प्रमुख करकरे को मारने की कोई वजह नहीं थी। मतलब, मुंबई पर आतंकी हमलों में जितने लोगों ने जान गंवाई, उन्हें मारने की आतंकियों के पास वजह थी। (लगे हाथों अंतुले यह भी बता देते तो ज्यादा अच्छा रहता कि वह वजह क्या है)। अंतुले का यह बयान कहीं न कहीं आतंकियों की कारॆवाई को एक आधार भी देता है। हमारे केंद्रीय मंत्री का बयान हमें बताता है कि आतंकी बेवजह किसी को नहीं मारते। पाक परस्त आतंकी अरसे से भारत में खूनखराबा कर रहे हैं। हम मानते हों या नहीं, मंत्री जी मानते हैं कि इसकी वजह है। और वो मानते हैं, तो आपको सुनना-पढ़ना होगा। क्या करेंगे, अभिव्यक्ति की आजादी तो उनके लिए भी है।

हो सकता है, कुछ लोग अंतुले की आशंका से सहमत हों। तब भी इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना ही माना जाएगा। अगर इस तरह की कोई आशंका है, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए। जांच में यह बात स्थापित होती, तब कही जाती। जांच किए जाने की बात अंतुले भी कह रहे हैं। अंतुले केंद्र के वरिष्ठ मंत्री है। सरकार के स्तर पर अपनी बात रखते। जांच करवाते। तब तक इस पर मुंह खोलने से परहेज करते। लेकिन इतनी शांति से उनका मकसद कहां पूरा होता। पता नहीं, अब भी उनका मकसद पूरा हो पाएगा या नहीं। हो सकता है लेने के देने पड़ जाएं। दरअसल भारतीय राजनीति के कुछ पुराने योद्धा देश की जनता को वतॆमान समय के हिसाब से देख ही नहीं पाते। ये लोग देश की जनता को उसी वक्त के हिसाब से देखते हैं, जब इन्हें विस्मृति दोष नहीं हुआ था। उन्हें याद नहीं कि जनता काफी समझदार हो चुकी है। राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों ने भी यही बताया है। किसी राज्य की जनता ने बयान के आधार पर वोट नहीं दिए। वोट काम पर डाले गए।

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

मां भारती

मां तेरे अचॆन को व्याकुल हैं मेरे अंतर की नारी
किंतु नहीं मैं इसकी सच्ची अधिकारी।

सेवा पथ कदम बढ़ाए थे कई बार
बीच डगर में खींच लाया ये निष्ठुर संसार।

धूप दीप चंदन रोली, सब कुछ था मेरे पास
किंतु दहलीजों तक सिमट गया दीवारों का भाग्य।

कतॆव्य बने बंधन, बंद हुआ मुक्ति का द्वार
उफन रही नदी को बांधेगी कब तक तट की मर्यादा।

एक दिन तो आएगा ज्वार, उस दिन आऊंगी तेरे द्वार
सच्ची होगी मेरी आरती, पुकारेंगी मुझे स्वयं मां भारती।
विजयलक्ष्मी सिंह

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

फिर उठा है देशप्रेम का ज्वार

देश पर मर-मिटने वालों की कमी तो हिंदुस्तान में कभी नहीं रही। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद देशप्रेम का जो ज्वार दिख रहा है, वह उत्साहित करनेवाला है। पत्र-पत्रिकाओं में लिखे जाने वाले लेख, पाठकों के पत्र, मोबाइल के जरिए आने वाले संदेश बताते हैं कि मुंबई के आतंकी हमलों ने आम जनता को देश के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है। क्या लोगों को लगने लगा है कि नेताओं के भरोसे रहने का वक्त गुजर चुका है?

दरअसल नेताओं के प्रति इस कदर नाराजगी पहले कभी नहीं देखी गई। यह नाराजगी किसी एक दल या एक नेता के प्रति नहीं, बलि्क सभी से है। नेताओं से लोग जितने निराश हुए हैं, लोगों का खुद पर भरोसा उतना ही बढ़ा है। इसकी एक बानगी जबलपुर में देखने को मिली। बताया जाता है कि यहां के १०० युवकों ने स्थानीय कलक्टर को यह लिखकर दिया है कि वे देश के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। यह अभिव्यक्ति अकारण नहीं है। दरअसल, चंद आतंकियों ने मुंबई को जिस तरह साठ से ज्यादा घंटों तक बंधक बनाए रखा, उससे लोगों का यह विश्वास हिल गया है कि सरकारें हमें महफूज रखेगी। भरोसे की इस मौत ने लोगों के अंदर आक्रोश भी पैदा किया। इसी आक्रोश ने केंद्रीय गृहमंत्री, एक मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री को विदा करने पर मजबूर किया। इंतजार है लोगों के देशप्रेम के ज्वार व भरोसे के कत्ल के खिलाफ आक्रोश के और सकारात्मक नतीजों का।

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

इस बार भी नहीं छलकेगा सब्र का पैमाना

एक बार फिर पूरे भारत में पाक के खिलाफ माहौल बन रहा है। कई ब्लॉगर पाकिस्तान पर हमले की इच्छा और उम्मीद जता रहे हैं। भारत के हर कोने से आने वाली आवाजें भी कुछ इसी तरह की हैं। देश की हालत संसद पर हमले के बाद भी ठीक इसी तरह की थी। हर देशभक्त की इच्छा थी कि आतंक को पालने-पोसने वाले को करारा जवाब मिलना ही चाहिए। सीमा पार के आतंकी ठिकानों पर कारॆवाई होनी ही चाहिए। लेकिन उस वक्त भी हम हिम्मत नहीं दिखा पाए। आज फिर वही हालात हैं। टीवी पर दिखने वाले आक्रोश को छोड़ भी दें तो हर देशवासी की इच्छा यही होगी कि देश के दुश्मनों को करारा जवाब मिलना चाहिए। लेकिन यह इच्छा इस बार भी अधूरी ही रहेगी। अंतरराष्ट्रीय दबाव और युद्ध का अथॆशास्त्र हमें सीमा पार किसी भी कारॆवाई से रोके रखेगा। प्रधानमंत्री सब्र के इम्तहान की बात करते हैं। इसी सब्र की दुहाई संसद पर हमले के बाद भी दी गई थी। तब के प्रधानमंत्री ने भी बार-बार यही बात दोहराई थी। तब भी हमने अंततः मान लिया था कि अभी सब्र का पैमाना छलकने का वक्त नहीं आया है। इंतजार करें, इस बार भी हम यही मानेंगे। मिला-जुलाकर यही कि हमारे सब्र को हम नहीं नियंत्रित करते। कह सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय दबाव ही इसे नियंत्रित करता है। देखिए न, जैसे ही यह आशंका हुई कि पाक या पाक अधिकृत कश्मीर के खिलाफ भारत कारॆवाई की हद तक जा सकता है, अमेरिकी विदेश मंत्री दौड़ी-दौड़ी आईं। यह कहने कि पाक हर तरह का सहयोग करने को तैयार है। हमने उससे कह दिया है। मतलब पाक तो हमारी बात मानता है। और हम आपसे भी कहते हैं कि आप भी पाक के खिलाफ कोई कारॆवाई न करें। (अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पहले ही कह चुके हैं, इस हमले में पाक की संलिप्तता के सुबूत नहीं है।)। सभी मसले बातचीत से सुलझाएं। हम तो यह भी कहने की हालत में नहीं है कि महोदया कोंडोलिजा राइस, आतंक फैलाने वाले देश के नाम पर ही तो आपके देश ने इराक और अफगानिस्तान को तबाह कर दिया। लेकिन क्या करें, नहीं कह सकते। पानी में रहकर मगर से बैर तो नहीं हो सकता है न। जमा खातिर रखें, पाक के खिलाफ चेतावनियों की भाषा से आगे की बात नहीं होगी।

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

हे प्रभु, इन्हें माफ करना

टिप्पणी एक- कुछ महिलाएं और बहने पाउडर-लिपिस्टिक लगाकर कैंडल मार्च निकालकर पश्चिमी सभ्यता का परिचय देती हैं। यह व्यवहार अलगाववादियों जैसा है जिनका लोकतंत्र में यकीन नहीं। इन महिलाओं को राजनेताओं के खिलाफ नारेबाजी की जगह पाकिस्तान और आईएसआई के खिलाफ नारेबाजी करनी चाहिए। ...मुख्तार अब्बास नकवी, भाजपा नेता (नेताओं के विरोध पर)। टिप्पणी दो- अगर संदीप शहीद नहीं होता तो उसके घर कुत्ता भी नहीं जाता। ...वीएस अच्युतानंद, केरल के मुख्यमंत्री ( शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के दुखी पिता द्वारा आक्रोश जताए जाने के बाद)। टिप्पणी तीन- मुंबई जैसे बड़े शहर में छोटी-मोटी बातें तो होती रहती है। आरआर पाटिल, पूवॆ उपमुख्यमंत्री-महाराष्ट्र। (हमले को रोक पाने संबंधी सवाल पर) सवाल एक-क्या ये लोग अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं? सवाल दो-इन्हें सद्बबुद्धि मिले इसके लिए क्या करना होगा? सवाल तीन-भारत की जनता आखिर इतनी सहनशील क्यों है?



शनिवार, 29 नवंबर 2008

सवाल

साठ घंटे, 183 लोगों की मौत। बीस जांबाज शहीद। 40 अरब की चपत (एसोचैम के मुताबिक)। ...फिर भी जीत गए जंग। कैसे? क्या सिफॆ आतंकियों को मार गिराने से? क्या इतने के बावजूद हम उनके जिंदा रहने की उम्मीद कर रहे थे? इस सवाल का मतलब सिफॆ इतना है कि हम आत्ममुग्धता की हालत में न रहें। आतंकियों की इतनी बड़ी कारॆवाई हमारी कमजोरी के बिना संभव नहीं थी। टटोलें, कहां कमजोर हैं हम? वरना हालात और बुरे होंगे।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

यह कैसी बहस?

एक ब्लॉग पर टिप्पणियों के माध्यम से यह बहस चल रही है कि आतंकियों की गोलियों का शिकार बने एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद कहलाने का हक रखते हैं या नहीं? पूरी बहस महज बौद्धिकता के प्रदशॆन के लिए मौत के बाद किसी के चरित्रहनन जैसा ही है?
शहीद नरकगामी नहीं होते..पर टिप्पणियों को देखकर लगता है, जैसे खुद को प्रबुद्ध साबित करने के लिए कुछ लोग, मर चुके कुछ लोगों की चीर-फाड़ में लगे हों। करकरे क्या किसी भी आदमी के अतीत के सभी पन्ने सुनहरे ही नहीं होते। कुछ पन्नों पर काली स्याही से लिखी कुछ इबारतें भी होती हैं। टिप्पणियां करनेवाले भी अपने अंदर टटोलकर देखें तो एेसा ही पाएंगे। घर बैठकर जुगाली करना बहुत आसान होता है। आतंकी हमले के बीच सिफॆ छुपने की बात सोचने वाले लोग ही किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की बजाय तंज कर सकते हैं। वरना इतना तो सच है ही कि हेमंत करकरे हमले के बाद तुरंत अपने दायित्वों का निवॆहन करने निकल पड़े थे। ड्राइंगरूम में अलसाए हुए टीवी नहीं देख रहे थे। साध्वी की गिरफ्तारी जायज है या नाजायज यह अदालत के सिवा कोई और कैसे तय कर सकता है? यह गलत भी हो तो केवल साध्वी को गिरफ्तार भर कर लेने से उनका शहीद कहलाने का हक नहीं छिन जाता। वैसे तो आत्मप्रचार के लिए जानबूझकर किसी की मौत पर मजमा लगाना ही जायज नहीं माना जा सकता। कोई शहीद कहा जाएगा या नहीं यह तो बाद की बात है। अपनी संस्कृति और परंपरा तो यही कहती है कि हम किसी की मौत के बाद उसके बारे में अच्छा ही अच्छा सोचते और कहते हैं। कम से कम इस परंपरा का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए। वैसे भी इस पूरी बहस से नुकसान भले ही हो, किसी का भला होते तो नहीं दिखता।

सोमवार, 24 नवंबर 2008

इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं

मालेगांव धमाके की जांच कर रही एटीएस बड़ी जल्दबाजी में है। रोज-रोज नए-नए खुलासे कर रही है। ऐसा जताया जा रहा है जैसे एटीएस बड़ी समझदारी के साथ गुत्थी सुलझाती जा रही है। हर खुलासे को मीडिया मैं जोर-शोर से उछाला जा रहा है। एटीएस और मीडिया की भी भाषा इन खुलासों को लेकर ऐसी ही होती है, जैसे ki बिना मुकदमा चलाए, बिना अदालत ka फैसला आए- निर्णय सुना दिया गया हो। एटीएस ने जिसकa नाम भर ले लिया वह अपराधी। समझ में नहीं आता ki एटीएस खुलासा करने ke मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों बरत रही है? हो सकता है, एटीएस जो खुलासे कर रही है-सच हों। उसke पास सुबूत हों, तथ्य हों। पर इन तथ्यों और सुबूतों को अदालत में परखा जाना तो अभी बाकी है। अदालत में यह तय होना अभी बाकी है ki क्या वास्तव में ये सारे लोग आतंकी हरकतों यानी धमाको में लिप्त हैं, जिनका नाम एटीएस ले रही है। lekin इससे पहले ही पूरी दुनिया में यह संदेश जा chuka है ki भारत में हिंदुओं ने भी आतंकवादी संगठन बना लिया है। इस आतंकी संगठन से जुड़े लोग धमाके कर रहे हैं। ऐसा है या नहीं, इसके पक्ष-विपक्ष में तमाम तर्क दिए जा रहे हैं। इन बातों को छोड़ दें तो जब तक अदालत ka फैसला आएगा पूरी दुनिया में यह बात स्थापित हो चुकी होगी िक भारत के हिंदू जवाबी आतंकी कार्रवाई कर रहे हैं। मान लिया जाए िक अदालत एटीएस द्वारा बताए जा रहे सभी आरोपियों को निर्दोष मान ले, तब क्या यह स्थापना खत्म की जा सकेगी? क्या तब हिंदू आतंकवादी शब्द, जिसे मीडिया में जोर-शोर से उछाला जा रहा है, खत्म हो जाएगा? या यह धब्बा तब भी बना रहेगा। इसके उलट यह मान लें िक अदालत में साबित हो जाता है िक एटीएस ·के द्वारा बताए गए और गिरफ्तार सभी लोग धमाकों में शामिल रहे हैं। तब भी कुछ सवाल हैं-क्या गिरफ्तार kiye गए पुरोहित, साध्वी, दयानंद जैसे चंद लोग पूरे हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं? आखिर हिंदू आतंकवादी क्यों, सिर्फ अपराधी या आतंकवादी क्यों नहीं? हां, यही आपत्ति मुस्लिम आतंकवादी कहने पर भी लागू होना चाहिए। और ऐसी आपत्तियां पूरे विश्व में जोर-शोर से उठती भी रहती हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है ki जब कश्मीर के मुस्लिम युवक kiसी आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं तो समझदार माने/कहे जाने वाले लोग उसे भटके हुए चंद युवकों की कार्रवाई बताते हैं। आश्चर्य होता है ki वही समझदार लोग हिंदू आतंकवादी शब्द पर आपत्ति नहीं करते। एटीएस की थ्योरी सही भी हो तो यहां तो सचमुच चंद भटके हुए लोग हैं। एक जमाना था जब भारत में होने वाली हर आतंकी कार्रवाई के लिए पड़ोसी देश को जिम्मेदार ठहराया जाता था। बात-बात पर उसे आतंकियों को संरक्षण देने वाला देश कहा जाता था। हिंदू आतंकवादी शब्द को आज जिस जोर-शोर से प्रचारित kiya जा रहा है, कल को कोई भी पड़ोसी देश अपने यहां होने वाली आतंकी गतिविधियों के लिए हमें जिम्मेदार ठहराने लगे, तो क्या होगा? हमें सोचना ही होगा ki हमारी अभी ki जल्दबाजी के ऐसे भी परिणाम हो सकते हैं। खासकर मीडिया, अदालत के फैसले के पहले ही फतवा जारी करने की अपनी आदत से बाज आए। िकसी भी जांच एजेंसी की बातों को नतीजे जैसा प्रचारित करने की मीडिया की आदत पर रोक तो लगनी ही चाहिए। अन्यथा होता यह है ki आरोप को ही, जांच एजेंसी की बातों के आधार पर खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया चीख-चीखकर सत्य और तथ्य ka रूप दे देता है। दुखद तो यह भी है ki मीडिया में आरोपों की बात जितनी जोर-शोर से आती है, अदालत में आरोप खारिज होने पर मीडिया की आवाज उतनी ही धीमी होती है। इतनी धीमी ki अधिसंख्य लोग तो उसे सुन भी नहीं पाते।