मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009
बिहार में ग्रेट इंडियन तमाशा
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विकास यात्रा शुरू कर रखी है। सरकारी अभियान, सरकार गांवों की ओर, जरूरत अभी ही। क्यों? क्योंकि चुनाव जो सिर पर है। इसके तहत वे न केवल गली-गली घूम रहे हैं, बल्कि जिले के एक गांव में रात्रि विश्राम भी कर रहे हैं। शाम में लग रही है चौपाल और गांव में लग रहा है जनता दरबार। अगले रोज शहर में जनसभा। अब भई, मुख्यमंत्री घूमेगा तो सरकारी अमला-जमला भी घूमेगा। और जब काफिला होगा ऐसा तो समां बंधेगा कैसा? हां, कहना चाहता हूं कि समां तो खूब बंधेगा, पर काम कुछ नहीं होगा। जी हां, काम ऐसे होता ही नहीं है। ऐसे कहीं काम होता है क्या? यह तो सरकारी पैसे से चुनाव की तैयारी का फंडा है। बिहारी फंडा? हींग लगे न हल्दी, रंग भी चोखा आये। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, लागू हो जाये पूरे देश में भई।
उधर, रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव। ठेठ गंवई स्टायल। प्रतिद्वंद्वी पर पलटवार। प्रतिद्वंद्वी दो। नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। घूम रहे हैं जिला दर जिला। रेल का सहारा। कर रहे हैं घोषणा दर घोषणा। रेलवे के मुहाने को खोल दिया है बिहार की ओर। फायनल पारी। चुनाव में जीतना जो है। कहीं लाइनें बिछ रही हैं तो कहीं रेलमंडल खुल रहे हैं। गाड़ियों के फेरे से काम नहीं चल रहा तो गाड़ियां ही बढ़ायी जा रही हैं। अभी आपने देखा होगा कि भाई साहब ने बजट और अंतरिम बजट का अंतर ही खत्म कर डाला। चार महीने बनाम पांच साल की घोषणा तक रेल बजट में की गयी। यह चुनावी अखाड़े के पहलवान की ललकार थी, जिसे पूरे हिंदुस्तान ने सुनी और समझी, बिहार ने तो शिद्दत से महसूस भी किया। अब चौक-चौराहों पर लालू ही लालू हैं। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, बिहारी फंडा। लागू हो जाये पूरे देश में भई।
और अपने राम विलास पासवान। रेल नहीं मिली तो सेल ही सही। बेतिया जाकर खुलवा दिया स्टील प्लांट। टार्गेट फिक्स, सालोसाल की बात तो छोड़िये, कुछ ही महीनों में आने लगेंगे उत्पादन। अधिकारी बेचारे हलकान हैं, परेशान हैं, पर काम तो करना ही है। नेताजी की इज्जत का सवाल है। सेहत सुधारने की दिशा में बिहार सरकार बहुत कुछ कर रही है, कोई बात नहीं, केन्द्र से प्रोग्राम आ रहे हैं, कोई बात नहीं, नेताजी तो गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले शिविर खोलकर लोगों का इलाज करवाएंगे ही। अब कोई सोचता हो तो सोचे कि आखिर सेल को लोगों के इलाज से क्या मतलब, वह भी मुफ्त? मगर, नहीं। नेताजी को तो मतलब है। अब रेल नहीं, सेल ही सही, नीतीश-लालू को ललकारना जो है। जनता बिना सेवा क्या सुनेगी? ललकार खूंखार हो चुकी है। मंच पर हमेशा साथ दिख रहे हैं सूरजभान, जिनका कहना है कि लोग जब उन्हें बास कहता है, किंग कहता है तो अच्छा लगता है। और सबसे बड़ी खासियत। तीनों नेताओं का टार्गेट वोट एक ही है। दलित जाति, पिछड़े लोग। अब इसमें कांग्रेस ने अपना वजूद खो दिया, भाजपा की मिट्टी पलीद होने पर लगी है तो कोई क्या करे? फिलहाल इतना ही। ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।
बुधवार, 21 जनवरी 2009
श्मशान की एक रात...
यहां से चलकर हम विश्राम (श्मशान) घाट के गेट पर पहुंचे। वहां लिखा था-रात दस बजे के बाद अंतिम संस्कार नहीं होता। गेट बंद था। अंदर दोनों तरफ छोटे-छोटे घर बने हुए थे। इनमें से एक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का दफ्तर था। दूसरा विश्राम घाट के प्रबंधक नारायण सिंह कुशवाहा का निवास। दफ्तर के पास बैठे सज्जन को आवाज देकर हमने कहा, कुशवाहा जी से मिलना है। उन्होंने कहा-वे तो गए। सुबह मिलेंगे। कहा-तो आपसे ही कुछ बात करनी है। वे आए। हमने बताया-कुछ लिखना है, रात भर यहीं बैठना चाहते हैं। अखबार का नाम बताया तो उन्होंने दरवाजा खोल दिया। बातचीत के दौरान चाय पिलवायी और बताया कि मैं ही नारायण सिंह हूं। परिवार के साथ यहीं रहता हूं। हमारी इच्छा के मुताबिक कुशवाहा जी ग्यारह बजे हम दोनों को वहां छोड़ आए, जहां मुरदे जलाए जाते हैं। एक बड़े शेड के नीचे बने सोलह खानों में से दो पर अब चिता जल रही थी। उनके आसपास मंडरा रहे थे चार खूंखार कुत्ते। दो हमें देखकर झपटे। कुशवाहा जी ने रोका। वे हमें वहां से कुछ दूर एक शेड के नीचे बिठाकर चले गए। एक बेंच पर बैठ गए। जहां हम बैठे थे, उसके पीछे यानी दक्षिण में नाला था। उत्तर की ओर जीवित लोगों के लिए विश्राम स्थल बना था। पश्चिम की ओर झाड़-झंखाड़ और पूरब की ओर जीवन-मृत्यु का चक्र दिख रहा था। आबादी के नाम पर दक्षिण में कबाड़खाना नाम की बस्ती।
सामने जल रहे दो मुरदों में एक युवक का था, जिसने आत्महत्या कर ली थी। दूसरी चिता एक बुजुर्ग की थी। दोनों चिताओं के शोले अब भी दहक रहे थे। पास मंडरा रहे कुत्तों के अलावा कहीं दूर भी कुत्ते भौंक रहे थे। बूंदाबांदी अब भी हो रही थी। पास में प्लास्टिक पर पानी गिर रहा था। खड़-खड़ की आवाज हो रही थी। कुत्तों के चुप होते ही माहौल अजीब सा हो गया। डर हमें आगोश में लेने की कोशिश कर रहा था। एक अनजाने रोमांच का इंतजार, जो साढ़े दस बजे तक था, वह अब उतना नहीं था। इतने में किसी फैक्ट्री से सायरन की आवाज गूंजी। हमें लगा, जैसे पास में ही शंख बजा हो। हम जीवन-मौत को छोड़कर फ्रायड की बात करने लगे। फिर स्टेशन से रेलगाड़ी की आवाज आई। लगा, आबादी पास ही है और हम आश्वस्त हुए।
सवा बारह बजे अचानक दो कुत्ते उछलकर खडे़ हो गए। लगा, दो मुरदे उठकर खड़े हुए। बोलते हुए हमारे मित्र चुप हो गए। ...आसपास पसरे भय को झटककर हम फिर बातचीत करने लगे। बूंदाबांदी बंद हो चुकी थी। प्लास्टिक पर पानी नहीं गिर रहा था। कुत्ते नहीं भौंक रहे थे। लगा, जैसे हवाएं भी बंद हो चुकी हों। पास में रेलगाड़ी गुजरने की आवाज न आती तो कहीं कुछ नहीं। पता चला, लोग मरघट सा सन्नाटा क्यों कहते हैं।
बातचीत धीमी हो रही थी। हमारा सारा ध्यान इस बात पर था कि यह वक्त गुजरता क्यों नहीं। डर को दूर करने के लिए हमने तय किया-डर तो दिमाग में होता है। असर भी हुआ। हमें लगा, भारी दबाव हमारे ऊपर से हट गया। बातचीत की गाड़ी फिर बढ़ी।
सवा एक हो चुका था। मरघट में होने का भय फिर दबोचने लगा। इस भय के बावजूद, मुझसे कहीं ज्यादा हमारे मित्र को किसी रोमांचकारी घटना का इंतजार था। क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं था। जाने कैसे॥बात फिर भूतों की होने लगी। बातचीत एकतरफा हो गई। मुझे लगा, अब मैं सोच नहीं सकता तो बोलूं कैसे? लगा, मेरे दिमाग पर किसी और शक्ति का नियंत्रण हो और वह सोचने पर मजबूर कर हो कि एक झक सफेद कपड़ा पहने कोई आदमकद आकृति अभी निकल पड़ेगी। अपने आप से पूछा, क्या घिग्घी बंधना इसे ही कहते हैं? रात डेढ़ बजे हमने मृत्यु से जुड़े सारे तथ्यों को याद किया। कुछ मुक्त हुआ।
बातचीत अब भी एकतरफा थी। मैं सिर्फ सुन पा रहा था। पौने दो बजे मैंने अपने मित्र से कहा-कुछ देर मैनेजर के पास चलकर बैठें। मेरे इतना बोलते ही दहकती चिताओं के पास बैठे चारों कुत्ते उठकर भौंकने लगे। इन खूंखार कुत्तों को देखकर उपजा डर भी मुझे मरघट के पास बैठने का साहस नहीं दे पा रहा था। लेकिन मेरे मित्र कुत्तों को देखकर कुशवाहा जी के पास जाने की हिम्मत छोड़ बैठे। पर मैं उन्हें जबरन उठाकर ले गया। चिता की बगल से गुजरते वक्त कुत्ते तेजी से झपटे। लगा चीर-फाड़ दिए गए। हम दोनों चुपचाप खड़े हो गए। कुत्तों ने जगह-जगह से सूंघा और छोड़ दिया। हम मृत्यु प्रमाणपत्र दफ्तर के पास जाकर बैठ गए। भय भाग गया। दफ्तर और चिता की दूरी सत्तर-अस्सी मीटर थी। कुशवाहा जी सपरिवार आराम की नींद सोए हुए थे। मच्छरों ने परेशान करना शुरू कर दिया तो हम टहलने लगे। ढाई बजे फिर दफ्तर के पास ही बैठ गए। बैठते ही पेट्रोलिंग (पुलिस) वाले आ गए। गेट पर जीप रोकी। हमने कुशवाहा जी के परिवार के एक सदस्य को जगाया। पुलिसवालों ने उससे पूछा-ये लोग कौन हैं? वह बता नहीं पाया। हमने बताया, अखबार से हैं। अच्छा-अच्छा कहकर आठ-दस मिनट गेट पर ही खड़े रहे। भाव भंगिमा कह रही थी, पगला गए हो?
पौने तीन बजे लगा, जैसे हम कुछ छोड़ रहे हैं। फिर एक अनचाहे रोमांच को पाने की इच्छा जोर मारने लगी। भय दूर हो चुका था। जयंत जी बैठे-बैठे सो रहे थे। जबरन उठाया। वहां ले गए, जहां चिता जल रही थी। कुत्तों के डर से यहां वे आना नहीं चाह रहे थे। पर अब कुत्ते जा चुके थे। दोनों ने राहत की सांस ली। वहीं जाकर बैठ गए, जहां शुरुआत में आकर बैठे थे। बैठते ही बिजली चली गई। घुप्प अंधेरा। लगा मरघट के सारे भूत अब हम पर हमला कर देंगे। मैं सस्वर हनुमान चालीसा पढ़ने लगा। मेरे घोर वामपंथी मित्र भी मेरे सुर में सुर मिला रहे थे। मिनट दर मिनट एक दूसरे को टटोलकर देख रहे थे, हैं भी या नहीं? मेरे मित्र का पता नहीं, पर भय की अधिकता की वजह से मुझे भय का अहसास भी नहीं हो पा रहा था।
अंततः रातभर का सबसे कठिन दौर गुजरा। सवा तीन बजे बिजली आ गई। धड़कनों पर काबू पाया। एक मन हुआ वापस कुशवाहा जी के पास भाग जाएं। पर मन मारकर बैठे रहे। अब तक हमें लगने लगा था कि अंधेरे में कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा। हम भयमुक्त हो रहे थे। इस कदर कि बस्ती में किसी बच्चे की जोर-जोर से रोने की आवाज भी हमें नहीं डरा पा रही थी। अब हमें मुरदों के जलने से फैली चिरांध का भी अहसास हो रहा था। हम उस गंध से परेशान होने लगे। चिताएं बुझ चुकी थीं। हल्की बारिश के साथ जोर-जोर से हवा चलने लगी। सांय-सांय की आवाज के चलते हमें फिर लगा कि हम मरघट में बैठे हैं। ठंडी हवा सिहरन पैदा कर रही थी। वक्त तीन पैंतीस का था। कौए अब कांव-कांव करने लगे। दूर कहीं से कोयल की आवाज भी आ रही थी। हमें रातभर में कुछ भी अलग न देख पाने की निराशा घेरने लगी थी। अब हमारी बातचीत बिल्कुल सामान्य थी।
सवा चार बजे मसजिद में अजान हुई। पीछे बस्ती के घर अब साफ-साफ दिखने लगे। हमारे मित्र ने कहा, अब कुछ नहीं होगा, चलिए। गेट खुलवाकर हम श्मशान घाट से निकल पडे़। बस पकड़ी। घर आकर खूब सोए।
यह रात हमने कुछ साल पहले श्मशान घाट में गुजारी थी। साथ में मेरे मित्र जयंत सिंह तोमर भी थे। तोमर साहब मुरैना के हैं। फिलहाल बच्चों को पत्रकारिता पढ़ाते हैं। दिन, साल महीने नहीं दे रहे। वह रात मुझे आज भी कल की ही लगती है। श्मशान घाट भोपाल का है।
बुधवार, 7 जनवरी 2009
मुखिया जी से शिकायत कब तक?
दिल नहीं दिमाग की बात करें तो कोई नहीं कहता कि हमें पाक पर हमला कर देना चाहिए। लेकिन इन दिनों भारत और पाकिस्तान के सुर पर विचार करें तो बात चोरी और सीनाजोरी वाली लगती है। पाकिस्तानी आतंकियों ने हमें इतनी बड़ी चोट दी, इसके बावजूद पाकिस्तान धौंस भरे स्वर में बात कर रहा है। और इक्का-दुक्का बेमतलब के बयानों को छोड़ दें तो हमारी सारी सक्रियता इस बात को लेकर है कि अमेरिका और बाकी देश मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाएं। इतना तो हमने भी मान ही लिया है कि हमारे किए कुछ नहीं होने वाला।
एक बात और। दुनिया भर में अमेरिकी दादागीरी की बात को लेकर कभी-कभी अपने यहां भी बहस होती है। सरकार भी कहती है कि हमारी नीतियां या हम अमेरिका से नहीं प्रभावित होते। ये बातें कितनी निरथॆक हैं, यह एक बार फिर साबित हुई है। भारत पर आतंकियों के हमले के बाद हम फिर अमेरिका पर ही टकटकी लगाए बैठे हैं। सारी उम्मीदें वहीं हैं। अमेरिका दबाव बनाए तो पाक आतंकियों के खिलाफ कोई कारॆवाई करे। वरना वह तो यह भी मानने को तैयार नहीं कि हमला पाकिस्तानियों ने किया।
मानेगा भी क्यों? आपने ऐसा किया ही क्या है? और अमेरिका आपके लिए किस हद तक दबाव बनाएगा, यह तो उसे ही तय करना है। विश्व ग्राम के अघोषित मुखिया जी गांव के इस दुस्साहसी घर के साथ अपने रिश्ते भी देखेंगे। और यह किसे पता नहीं होगा, गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत आज भी पूरी दमदारी के साथ मौजूद है। मार खाने के बाद मुखिया जी से शिकायत करके अपने कतॆव्य की इतिश्री मान लेने वाले लोग आगे भी पिटते रहते हैं। गांव में भी लोग उसीसे भिड़ने से बचते हैं, जो मारपीट भले न करता हो, मारपीट का जवाब देने की हैसियत रखता हो। फिलहाल हमारी स्थिति तो जवाब देने वाली नहीं, मुखिया जी से शिकायत करने वाली ही लगती है। आखिर क्यों नहीं पाकिस्तान को भी उसी की भाषा में जवाब दिया जाए। ऐसे भी पाकिस्तान कहता तो यही है। आप आईएसआई पर हमले की बात करते हैं तो वह रॉ पर आरोप लगाता है। आप जैश, लश्कर प्रमुख और दाऊद को मांगते हैं तो वह बाल ठाकरे, छोटा राजन की सूची सौंपता है। आपके सुबूतों के जवाब में दुनिया को आपके खिलाफ तैयार सीडी सौंपता है।
अब हम भी देते रहें दुनिया को सफाई। आखिर पाकिस्तान के खिलाफ सुबूतों के दम पर हम विश्व समुदाय से अपने साथ खड़े होने की उम्मीद करेंगे तो उन्हें यह भी तो बताना होगा कि नहीं, पाकिस्तान जो कह रहा है, हम वैसा कुछ नहीं करते। इसका मतलब हमें अकारण ही बचाव की मुद्रा में आना होगा। जो हम करते नहीं, उसकी सफाई देनी होगी।
इसे लेकर बहुत किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन आखिर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति क्यों नहीं बननी चाहिए? कब तक हम हर हमले के बाद दुनिया के सामने घिघियाते रहेंगे कि पाक को रोको। यह तो तय है कि पाक के खिलाफ क्या किसी के भी खिलाफ युद्ध की स्थिति में हम नहीं है। युद्ध तो केवल दुनिया का दादा अमेरिका ही छेड़ सकता है। भले ही वह एकतरफा क्यों न हो?
युद्ध के अधिकार और स्थिति से वंचित भारत को भी तो आखिर अपने बचाव के लिए कुछ न कुछ करना होगा। क्या यह जैसे को तैसा की रणनीति के अलावा वतॆमान परिस्थितियों में कुछ और हो सकता है?
कई बार तो यह भी लगता है कि मुंबई पर हमले के बाद से लेकर अब तक हमारी सरकार तय ही नहीं कर पाई है कि उसे करना क्या है। यह मानने में सचमुच हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारे पास वैसे नेतृत्व का अभाव है जो ऐसे मौकों पर उचित निणॆय ले सके। बात सिफॆ प्रधानमंत्री की नहीं है, पूरी सरकार ही इस मामले में लचर दिखाई दे रही है। हमारे नेता गाहे-बगाहे यह दोहराकर देश को संतुष्ट करने की कोशिश भर कर रहे हैं कि हमारे सारे विकल्प खुले हैं। विकल्प बताने को कोई नहीं कहता लेकिन देशवासी न जाने यह बात कितने सालों से सुन रहे हैं। हर बड़े हमले के बाद यह बात बार-बार दोहराई जाती है। होता कुछ नहीं है।
देश की जनता भी हर बार इस तरह की बातें सुन-सुनकर उसी रंग में रंग गई लगती है। वरना कहां हमले के बाद का शोर और कहां अब की उदासीनता। हमले के बाद जितना शोर हमारे नेता मचा रहे थे, जनता भी कुछ उसी अंदाज में उतना ही शोर मचा रही थी और अब वह भी शांत हो गई। आखिर भारत के खिलाफ पाक की इतनी बड़ी-बड़ी साजिशों के बावजूद क्यों नहीं कोई जनांदोलन इस बात के लिए उपजता कि पाक को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए? आखिर जनतंत्र में सबकुछ होता भी तो जनता की इच्छा से ही है।
शनिवार, 27 दिसंबर 2008
वेशभूषा, आप और आपका मिजाज
विचारः आसमानी बिजली हमेशा एक ही जगह नहीं गिरती। अभी इधर गिरी है तो कभी उधर भी गिरेगी। इधर गिरी है तो कुछ बच भी गया है, उधर गिरेगी तो कुछ बचेगा भी, इसकी क्या गारंटी है?
श्री कौशल शुक्ला हमारे मित्र हैं। इन दिनों मुजफ्फरपुर में हैं। ..विचार के लिए विचार के नाम से उनका ब्लॉग है। अपने ब्लॉग पर वे व्यक्तित्व विकास पर सीरीज में लेख लिख रहे हैं। इस श्रृंखला की यह चौथी कड़ी है। कौशल जी से अनुमति लेकर उसे यहां भी पोस्ट किया गया है। अच्छा लगे तो अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।
बुधवार, 17 दिसंबर 2008
पाकिस्तान भी तो यही कह रहा था
महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद हुए या मारे गए? यह बहस थमी तो नई बहस आगे बढ़ाई गई है। इस बहस की शुरुआत दरअसल पाकिस्तानी मीडिया ने की थी। वहां भी बहस आशंका के रूप में थी, करकरे को गोली मालेगांव धमाकों से जुड़े लोगों ने तो नहीं मारी? पाकिस्तानी मीडिया की आशंका पाक सरकार को स्वर देने की कवायद थी। अब कुछ दिनों बाद केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एआर अंतुले भी यही बात कह रहे हैं। पूरा देश जिस केंद्र सरकार से पाकिस्तान पर हमले की मांग कर रहा है, उस सरकार का एक वरिष्ठ मंत्री उसी पाक के सुर में सुर मिला रहा है। इसे ही सियासत कहते हैं। यहां देश की भावनाएं नहीं देखी जाती, वोट देखा जाता है। क्या करेंगे, राजनीति को यूं ही तो दलदल नहीं कहा जाता।
अंतुले की एक और बात पर गौर करें। अंतुले कहते हैं पाकिस्तानी आतंकियों के पास एटीएस प्रमुख करकरे को मारने की कोई वजह नहीं थी। मतलब, मुंबई पर आतंकी हमलों में जितने लोगों ने जान गंवाई, उन्हें मारने की आतंकियों के पास वजह थी। (लगे हाथों अंतुले यह भी बता देते तो ज्यादा अच्छा रहता कि वह वजह क्या है)। अंतुले का यह बयान कहीं न कहीं आतंकियों की कारॆवाई को एक आधार भी देता है। हमारे केंद्रीय मंत्री का बयान हमें बताता है कि आतंकी बेवजह किसी को नहीं मारते। पाक परस्त आतंकी अरसे से भारत में खूनखराबा कर रहे हैं। हम मानते हों या नहीं, मंत्री जी मानते हैं कि इसकी वजह है। और वो मानते हैं, तो आपको सुनना-पढ़ना होगा। क्या करेंगे, अभिव्यक्ति की आजादी तो उनके लिए भी है।
हो सकता है, कुछ लोग अंतुले की आशंका से सहमत हों। तब भी इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना ही माना जाएगा। अगर इस तरह की कोई आशंका है, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए। जांच में यह बात स्थापित होती, तब कही जाती। जांच किए जाने की बात अंतुले भी कह रहे हैं। अंतुले केंद्र के वरिष्ठ मंत्री है। सरकार के स्तर पर अपनी बात रखते। जांच करवाते। तब तक इस पर मुंह खोलने से परहेज करते। लेकिन इतनी शांति से उनका मकसद कहां पूरा होता। पता नहीं, अब भी उनका मकसद पूरा हो पाएगा या नहीं। हो सकता है लेने के देने पड़ जाएं। दरअसल भारतीय राजनीति के कुछ पुराने योद्धा देश की जनता को वतॆमान समय के हिसाब से देख ही नहीं पाते। ये लोग देश की जनता को उसी वक्त के हिसाब से देखते हैं, जब इन्हें विस्मृति दोष नहीं हुआ था। उन्हें याद नहीं कि जनता काफी समझदार हो चुकी है। राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों ने भी यही बताया है। किसी राज्य की जनता ने बयान के आधार पर वोट नहीं दिए। वोट काम पर डाले गए।
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008
मां भारती
किंतु नहीं मैं इसकी सच्ची अधिकारी।
सेवा पथ कदम बढ़ाए थे कई बार
बीच डगर में खींच लाया ये निष्ठुर संसार।
धूप दीप चंदन रोली, सब कुछ था मेरे पास
किंतु दहलीजों तक सिमट गया दीवारों का भाग्य।
कतॆव्य बने बंधन, बंद हुआ मुक्ति का द्वार
उफन रही नदी को बांधेगी कब तक तट की मर्यादा।
एक दिन तो आएगा ज्वार, उस दिन आऊंगी तेरे द्वार
सच्ची होगी मेरी आरती, पुकारेंगी मुझे स्वयं मां भारती।
विजयलक्ष्मी सिंह
शनिवार, 6 दिसंबर 2008
फिर उठा है देशप्रेम का ज्वार
देश पर मर-मिटने वालों की कमी तो हिंदुस्तान में कभी नहीं रही। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद देशप्रेम का जो ज्वार दिख रहा है, वह उत्साहित करनेवाला है। पत्र-पत्रिकाओं में लिखे जाने वाले लेख, पाठकों के पत्र, मोबाइल के जरिए आने वाले संदेश बताते हैं कि मुंबई के आतंकी हमलों ने आम जनता को देश के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है। क्या लोगों को लगने लगा है कि नेताओं के भरोसे रहने का वक्त गुजर चुका है?
दरअसल नेताओं के प्रति इस कदर नाराजगी पहले कभी नहीं देखी गई। यह नाराजगी किसी एक दल या एक नेता के प्रति नहीं, बलि्क सभी से है। नेताओं से लोग जितने निराश हुए हैं, लोगों का खुद पर भरोसा उतना ही बढ़ा है। इसकी एक बानगी जबलपुर में देखने को मिली। बताया जाता है कि यहां के १०० युवकों ने स्थानीय कलक्टर को यह लिखकर दिया है कि वे देश के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। यह अभिव्यक्ति अकारण नहीं है। दरअसल, चंद आतंकियों ने मुंबई को जिस तरह साठ से ज्यादा घंटों तक बंधक बनाए रखा, उससे लोगों का यह विश्वास हिल गया है कि सरकारें हमें महफूज रखेगी। भरोसे की इस मौत ने लोगों के अंदर आक्रोश भी पैदा किया। इसी आक्रोश ने केंद्रीय गृहमंत्री, एक मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री को विदा करने पर मजबूर किया। इंतजार है लोगों के देशप्रेम के ज्वार व भरोसे के कत्ल के खिलाफ आक्रोश के और सकारात्मक नतीजों का।
बुधवार, 3 दिसंबर 2008
इस बार भी नहीं छलकेगा सब्र का पैमाना
सोमवार, 1 दिसंबर 2008
हे प्रभु, इन्हें माफ करना
टिप्पणी एक- कुछ महिलाएं और बहने पाउडर-लिपिस्टिक लगाकर कैंडल मार्च निकालकर पश्चिमी सभ्यता का परिचय देती हैं। यह व्यवहार अलगाववादियों जैसा है जिनका लोकतंत्र में यकीन नहीं। इन महिलाओं को राजनेताओं के खिलाफ नारेबाजी की जगह पाकिस्तान और आईएसआई के खिलाफ नारेबाजी करनी चाहिए। ...मुख्तार अब्बास नकवी, भाजपा नेता (नेताओं के विरोध पर)। टिप्पणी दो- अगर संदीप शहीद नहीं होता तो उसके घर कुत्ता भी नहीं जाता। ...वीएस अच्युतानंद, केरल के मुख्यमंत्री ( शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के दुखी पिता द्वारा आक्रोश जताए जाने के बाद)। टिप्पणी तीन- मुंबई जैसे बड़े शहर में छोटी-मोटी बातें तो होती रहती है। आरआर पाटिल, पूवॆ उपमुख्यमंत्री-महाराष्ट्र। (हमले को रोक पाने संबंधी सवाल पर) सवाल एक-क्या ये लोग अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं? सवाल दो-इन्हें सद्बबुद्धि मिले इसके लिए क्या करना होगा? सवाल तीन-भारत की जनता आखिर इतनी सहनशील क्यों है?
शनिवार, 29 नवंबर 2008
सवाल
साठ घंटे, 183 लोगों की मौत। बीस जांबाज शहीद। 40 अरब की चपत (एसोचैम के मुताबिक)। ...फिर भी जीत गए जंग। कैसे? क्या सिफॆ आतंकियों को मार गिराने से? क्या इतने के बावजूद हम उनके जिंदा रहने की उम्मीद कर रहे थे? इस सवाल का मतलब सिफॆ इतना है कि हम आत्ममुग्धता की हालत में न रहें। आतंकियों की इतनी बड़ी कारॆवाई हमारी कमजोरी के बिना संभव नहीं थी। टटोलें, कहां कमजोर हैं हम? वरना हालात और बुरे होंगे।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2008
यह कैसी बहस?
शहीद नरकगामी नहीं होते..पर टिप्पणियों को देखकर लगता है, जैसे खुद को प्रबुद्ध साबित करने के लिए कुछ लोग, मर चुके कुछ लोगों की चीर-फाड़ में लगे हों। करकरे क्या किसी भी आदमी के अतीत के सभी पन्ने सुनहरे ही नहीं होते। कुछ पन्नों पर काली स्याही से लिखी कुछ इबारतें भी होती हैं। टिप्पणियां करनेवाले भी अपने अंदर टटोलकर देखें तो एेसा ही पाएंगे। घर बैठकर जुगाली करना बहुत आसान होता है। आतंकी हमले के बीच सिफॆ छुपने की बात सोचने वाले लोग ही किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की बजाय तंज कर सकते हैं। वरना इतना तो सच है ही कि हेमंत करकरे हमले के बाद तुरंत अपने दायित्वों का निवॆहन करने निकल पड़े थे। ड्राइंगरूम में अलसाए हुए टीवी नहीं देख रहे थे। साध्वी की गिरफ्तारी जायज है या नाजायज यह अदालत के सिवा कोई और कैसे तय कर सकता है? यह गलत भी हो तो केवल साध्वी को गिरफ्तार भर कर लेने से उनका शहीद कहलाने का हक नहीं छिन जाता। वैसे तो आत्मप्रचार के लिए जानबूझकर किसी की मौत पर मजमा लगाना ही जायज नहीं माना जा सकता। कोई शहीद कहा जाएगा या नहीं यह तो बाद की बात है। अपनी संस्कृति और परंपरा तो यही कहती है कि हम किसी की मौत के बाद उसके बारे में अच्छा ही अच्छा सोचते और कहते हैं। कम से कम इस परंपरा का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए। वैसे भी इस पूरी बहस से नुकसान भले ही हो, किसी का भला होते तो नहीं दिखता।
