मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

बिहार में ग्रेट इंडियन तमाशा

ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव का अभी बिगुल ठीक से बजा भी नहीं है, पर पहलवान हैं कि ताल ठोकने लगे हैं। वैसे तो इस प्रकार का समां पूरे देश में बंधा हुआ है, पर बिहार में, भई, यह कुछ खास अंदाज में ही सरंजाम पाता दिख रहा है। अखाड़े आबाद हो गये हैं और मुकाबले की छटपटाहट गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले जुबानों की सुर्खियों पर चढ़ी दिखने लगी है। घात-प्रतिघात में बोले जा रहे शब्दों के नमूने अभी भले ऊपरी स्तर पर ही हों, पर उनका रंग आम मानस पर चढ़ता भी दिख रहा है। जीत जायेंगे हम का बोलबाला कुछ यूं फिजा में तैर रहा है, मानो मतदान कल ही होने वाला है, फैसला कल ही आने वाला है। और इसका श्रेय उन तीन दिग्गजों के नाम जाता है, जो धुरी के रूप में पब्लिक के सामने, ऊपर और अगल-बगल सुदर्शन चक्र की भांति घूम रहे हैं। पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले ये तीन दिग्गज हैं- एनडीए यानी जदयू और भाजपा के संयुक्त प्रयासों के क्षत्रप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद सुप्रीमो व केन्द्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा लोजपा किंग व केन्द्रीय रसायन-उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान। सरकारी अभियान की आड़ में अब ग्रेट इंडियन तमाशे की खासियत देखिए।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विकास यात्रा शुरू कर रखी है। सरकारी अभियान, सरकार गांवों की ओर, जरूरत अभी ही। क्यों? क्योंकि चुनाव जो सिर पर है। इसके तहत वे न केवल गली-गली घूम रहे हैं, बल्कि जिले के एक गांव में रात्रि विश्राम भी कर रहे हैं। शाम में लग रही है चौपाल और गांव में लग रहा है जनता दरबार। अगले रोज शहर में जनसभा। अब भई, मुख्यमंत्री घूमेगा तो सरकारी अमला-जमला भी घूमेगा। और जब काफिला होगा ऐसा तो समां बंधेगा कैसा? हां, कहना चाहता हूं कि समां तो खूब बंधेगा, पर काम कुछ नहीं होगा। जी हां, काम ऐसे होता ही नहीं है। ऐसे कहीं काम होता है क्या? यह तो सरकारी पैसे से चुनाव की तैयारी का फंडा है। बिहारी फंडा? हींग लगे न हल्दी, रंग भी चोखा आये। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, लागू हो जाये पूरे देश में भई।
उधर, रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव। ठेठ गंवई स्टायल। प्रतिद्वंद्वी पर पलटवार। प्रतिद्वंद्वी दो। नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। घूम रहे हैं जिला दर जिला। रेल का सहारा। कर रहे हैं घोषणा दर घोषणा। रेलवे के मुहाने को खोल दिया है बिहार की ओर। फायनल पारी। चुनाव में जीतना जो है। कहीं लाइनें बिछ रही हैं तो कहीं रेलमंडल खुल रहे हैं। गाड़ियों के फेरे से काम नहीं चल रहा तो गाड़ियां ही बढ़ायी जा रही हैं। अभी आपने देखा होगा कि भाई साहब ने बजट और अंतरिम बजट का अंतर ही खत्म कर डाला। चार महीने बनाम पांच साल की घोषणा तक रेल बजट में की गयी। यह चुनावी अखाड़े के पहलवान की ललकार थी, जिसे पूरे हिंदुस्तान ने सुनी और समझी, बिहार ने तो शिद्दत से महसूस भी किया। अब चौक-चौराहों पर लालू ही लालू हैं। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, बिहारी फंडा। लागू हो जाये पूरे देश में भई।
और अपने राम विलास पासवान। रेल नहीं मिली तो सेल ही सही। बेतिया जाकर खुलवा दिया स्टील प्लांट। टार्गेट फिक्स, सालोसाल की बात तो छोड़िये, कुछ ही महीनों में आने लगेंगे उत्पादन। अधिकारी बेचारे हलकान हैं, परेशान हैं, पर काम तो करना ही है। नेताजी की इज्जत का सवाल है। सेहत सुधारने की दिशा में बिहार सरकार बहुत कुछ कर रही है, कोई बात नहीं, केन्द्र से प्रोग्राम आ रहे हैं, कोई बात नहीं, नेताजी तो गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले शिविर खोलकर लोगों का इलाज करवाएंगे ही। अब कोई सोचता हो तो सोचे कि आखिर सेल को लोगों के इलाज से क्या मतलब, वह भी मुफ्त? मगर, नहीं। नेताजी को तो मतलब है। अब रेल नहीं, सेल ही सही, नीतीश-लालू को ललकारना जो है। जनता बिना सेवा क्या सुनेगी? ललकार खूंखार हो चुकी है। मंच पर हमेशा साथ दिख रहे हैं सूरजभान, जिनका कहना है कि लोग जब उन्हें बास कहता है, किंग कहता है तो अच्छा लगता है। और सबसे बड़ी खासियत। तीनों नेताओं का टार्गेट वोट एक ही है। दलित जाति, पिछड़े लोग। अब इसमें कांग्रेस ने अपना वजूद खो दिया, भाजपा की मिट्टी पलीद होने पर लगी है तो कोई क्या करे? फिलहाल इतना ही। ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

श्मशान की एक रात...

बस वाले से हमने कहा-हमें छोला श्मशान घाट के पास उतार देना। कंडक्टर समेत समूची बस ने हमें ऐसे देखा मानो हम उनकी जात से बाहर के हों। श्मशान घाट के पास पुलिया पर हमें उतारकर बस चलती बनी। एक अधखुली दुकान वाले से पूछा-श्मशान घाट किधर है? मरघट सामने है-उसने बताया। रात के दस बजे थे। आसपास के सूनेपन से लगा कि रात काफी गहरी हो चुकी है। बारिश हो रही थी। भींगते हुए हम श्मशान घाट की तरफ बढ़े। रास्ते में हमें शेड दिखा। बारिश से बचने के लिए वहां पहुंचे। फर्श पर दो चबूतरे बने हुए थे। शेड के बाहर पेशाब करते दिखे सज्जन (नशे में धुत) हमारे पास आए। गौर से देखा। हमने पूछा-ये चबूतरे क्यों बने हैं?॥जब आप मरेंगे, आपके ये दोस्त मरेंगे, मैं मरूंगा तो श्मशान घाट ले जाने से पहले अर्थी यहीं रखी जाएगी। वे नरेश चौहान थे। उनके इस जवाब से माहौल भुतहा लगने लगा।

यहां से चलकर हम विश्राम (श्मशान) घाट के गेट पर पहुंचे। वहां लिखा था-रात दस बजे के बाद अंतिम संस्कार नहीं होता। गेट बंद था। अंदर दोनों तरफ छोटे-छोटे घर बने हुए थे। इनमें से एक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का दफ्तर था। दूसरा विश्राम घाट के प्रबंधक नारायण सिंह कुशवाहा का निवास। दफ्तर के पास बैठे सज्जन को आवाज देकर हमने कहा, कुशवाहा जी से मिलना है। उन्होंने कहा-वे तो गए। सुबह मिलेंगे। कहा-तो आपसे ही कुछ बात करनी है। वे आए। हमने बताया-कुछ लिखना है, रात भर यहीं बैठना चाहते हैं। अखबार का नाम बताया तो उन्होंने दरवाजा खोल दिया। बातचीत के दौरान चाय पिलवायी और बताया कि मैं ही नारायण सिंह हूं। परिवार के साथ यहीं रहता हूं। हमारी इच्छा के मुताबिक कुशवाहा जी ग्यारह बजे हम दोनों को वहां छोड़ आए, जहां मुरदे जलाए जाते हैं। एक बड़े शेड के नीचे बने सोलह खानों में से दो पर अब चिता जल रही थी। उनके आसपास मंडरा रहे थे चार खूंखार कुत्ते। दो हमें देखकर झपटे। कुशवाहा जी ने रोका। वे हमें वहां से कुछ दूर एक शेड के नीचे बिठाकर चले गए। एक बेंच पर बैठ गए। जहां हम बैठे थे, उसके पीछे यानी दक्षिण में नाला था। उत्तर की ओर जीवित लोगों के लिए विश्राम स्थल बना था। पश्चिम की ओर झाड़-झंखाड़ और पूरब की ओर जीवन-मृत्यु का चक्र दिख रहा था। आबादी के नाम पर दक्षिण में कबाड़खाना नाम की बस्ती।

सामने जल रहे दो मुरदों में एक युवक का था, जिसने आत्महत्या कर ली थी। दूसरी चिता एक बुजुर्ग की थी। दोनों चिताओं के शोले अब भी दहक रहे थे। पास मंडरा रहे कुत्तों के अलावा कहीं दूर भी कुत्ते भौंक रहे थे। बूंदाबांदी अब भी हो रही थी। पास में प्लास्टिक पर पानी गिर रहा था। खड़-खड़ की आवाज हो रही थी। कुत्तों के चुप होते ही माहौल अजीब सा हो गया। डर हमें आगोश में लेने की कोशिश कर रहा था। एक अनजाने रोमांच का इंतजार, जो साढ़े दस बजे तक था, वह अब उतना नहीं था। इतने में किसी फैक्ट्री से सायरन की आवाज गूंजी। हमें लगा, जैसे पास में ही शंख बजा हो। हम जीवन-मौत को छोड़कर फ्रायड की बात करने लगे। फिर स्टेशन से रेलगाड़ी की आवाज आई। लगा, आबादी पास ही है और हम आश्वस्त हुए।

सवा बारह बजे अचानक दो कुत्ते उछलकर खडे़ हो गए। लगा, दो मुरदे उठकर खड़े हुए। बोलते हुए हमारे मित्र चुप हो गए। ...आसपास पसरे भय को झटककर हम फिर बातचीत करने लगे। बूंदाबांदी बंद हो चुकी थी। प्लास्टिक पर पानी नहीं गिर रहा था। कुत्ते नहीं भौंक रहे थे। लगा, जैसे हवाएं भी बंद हो चुकी हों। पास में रेलगाड़ी गुजरने की आवाज न आती तो कहीं कुछ नहीं। पता चला, लोग मरघट सा सन्नाटा क्यों कहते हैं।

बातचीत धीमी हो रही थी। हमारा सारा ध्यान इस बात पर था कि यह वक्त गुजरता क्यों नहीं। डर को दूर करने के लिए हमने तय किया-डर तो दिमाग में होता है। असर भी हुआ। हमें लगा, भारी दबाव हमारे ऊपर से हट गया। बातचीत की गाड़ी फिर बढ़ी।
सवा एक हो चुका था। मरघट में होने का भय फिर दबोचने लगा। इस भय के बावजूद, मुझसे कहीं ज्यादा हमारे मित्र को किसी रोमांचकारी घटना का इंतजार था। क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं था। जाने कैसे॥बात फिर भूतों की होने लगी। बातचीत एकतरफा हो गई। मुझे लगा, अब मैं सोच नहीं सकता तो बोलूं कैसे? लगा, मेरे दिमाग पर किसी और शक्ति का नियंत्रण हो और वह सोचने पर मजबूर कर हो कि एक झक सफेद कपड़ा पहने कोई आदमकद आकृति अभी निकल पड़ेगी। अपने आप से पूछा, क्या घिग्घी बंधना इसे ही कहते हैं? रात डेढ़ बजे हमने मृत्यु से जुड़े सारे तथ्यों को याद किया। कुछ मुक्त हुआ।

बातचीत अब भी एकतरफा थी। मैं सिर्फ सुन पा रहा था। पौने दो बजे मैंने अपने मित्र से कहा-कुछ देर मैनेजर के पास चलकर बैठें। मेरे इतना बोलते ही दहकती चिताओं के पास बैठे चारों कुत्ते उठकर भौंकने लगे। इन खूंखार कुत्तों को देखकर उपजा डर भी मुझे मरघट के पास बैठने का साहस नहीं दे पा रहा था। लेकिन मेरे मित्र कुत्तों को देखकर कुशवाहा जी के पास जाने की हिम्मत छोड़ बैठे। पर मैं उन्हें जबरन उठाकर ले गया। चिता की बगल से गुजरते वक्त कुत्ते तेजी से झपटे। लगा चीर-फाड़ दिए गए। हम दोनों चुपचाप खड़े हो गए। कुत्तों ने जगह-जगह से सूंघा और छोड़ दिया। हम मृत्यु प्रमाणपत्र दफ्तर के पास जाकर बैठ गए। भय भाग गया। दफ्तर और चिता की दूरी सत्तर-अस्सी मीटर थी। कुशवाहा जी सपरिवार आराम की नींद सोए हुए थे। मच्छरों ने परेशान करना शुरू कर दिया तो हम टहलने लगे। ढाई बजे फिर दफ्तर के पास ही बैठ गए। बैठते ही पेट्रोलिंग (पुलिस) वाले आ गए। गेट पर जीप रोकी। हमने कुशवाहा जी के परिवार के एक सदस्य को जगाया। पुलिसवालों ने उससे पूछा-ये लोग कौन हैं? वह बता नहीं पाया। हमने बताया, अखबार से हैं। अच्छा-अच्छा कहकर आठ-दस मिनट गेट पर ही खड़े रहे। भाव भंगिमा कह रही थी, पगला गए हो?

पौने तीन बजे लगा, जैसे हम कुछ छोड़ रहे हैं। फिर एक अनचाहे रोमांच को पाने की इच्छा जोर मारने लगी। भय दूर हो चुका था। जयंत जी बैठे-बैठे सो रहे थे। जबरन उठाया। वहां ले गए, जहां चिता जल रही थी। कुत्तों के डर से यहां वे आना नहीं चाह रहे थे। पर अब कुत्ते जा चुके थे। दोनों ने राहत की सांस ली। वहीं जाकर बैठ गए, जहां शुरुआत में आकर बैठे थे। बैठते ही बिजली चली गई। घुप्प अंधेरा। लगा मरघट के सारे भूत अब हम पर हमला कर देंगे। मैं सस्वर हनुमान चालीसा पढ़ने लगा। मेरे घोर वामपंथी मित्र भी मेरे सुर में सुर मिला रहे थे। मिनट दर मिनट एक दूसरे को टटोलकर देख रहे थे, हैं भी या नहीं? मेरे मित्र का पता नहीं, पर भय की अधिकता की वजह से मुझे भय का अहसास भी नहीं हो पा रहा था।

अंततः रातभर का सबसे कठिन दौर गुजरा। सवा तीन बजे बिजली आ गई। धड़कनों पर काबू पाया। एक मन हुआ वापस कुशवाहा जी के पास भाग जाएं। पर मन मारकर बैठे रहे। अब तक हमें लगने लगा था कि अंधेरे में कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा। हम भयमुक्त हो रहे थे। इस कदर कि बस्ती में किसी बच्चे की जोर-जोर से रोने की आवाज भी हमें नहीं डरा पा रही थी। अब हमें मुरदों के जलने से फैली चिरांध का भी अहसास हो रहा था। हम उस गंध से परेशान होने लगे। चिताएं बुझ चुकी थीं। हल्की बारिश के साथ जोर-जोर से हवा चलने लगी। सांय-सांय की आवाज के चलते हमें फिर लगा कि हम मरघट में बैठे हैं। ठंडी हवा सिहरन पैदा कर रही थी। वक्त तीन पैंतीस का था। कौए अब कांव-कांव करने लगे। दूर कहीं से कोयल की आवाज भी आ रही थी। हमें रातभर में कुछ भी अलग न देख पाने की निराशा घेरने लगी थी। अब हमारी बातचीत बिल्कुल सामान्य थी।

सवा चार बजे मसजिद में अजान हुई। पीछे बस्ती के घर अब साफ-साफ दिखने लगे। हमारे मित्र ने कहा, अब कुछ नहीं होगा, चलिए। गेट खुलवाकर हम श्मशान घाट से निकल पडे़। बस पकड़ी। घर आकर खूब सोए।

यह रात हमने कुछ साल पहले श्मशान घाट में गुजारी थी। साथ में मेरे मित्र जयंत सिंह तोमर भी थे। तोमर साहब मुरैना के हैं। फिलहाल बच्चों को पत्रकारिता पढ़ाते हैं। दिन, साल महीने नहीं दे रहे। वह रात मुझे आज भी कल की ही लगती है। श्मशान घाट भोपाल का है।

बुधवार, 7 जनवरी 2009

मुखिया जी से शिकायत कब तक?

याद करें, मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकियों के हमले के तुरंत बाद क्या प्रतिक्रिया थी? पूरे देश के साथ-साथ सरकार के स्वर में भी यह बात शामिल थी कि पाक को सबक सिखाया जाएगा। यह स्वर गायब हो चुका है? जनता के स्वर में निराशा का पुट है तो सरकार की चेतावनी भी अब घिघियाहट सी लगती है। इतना तो तय हो ही चुका है कि हम अपने दम पर कुछ नहीं कर सकते। पाक के खिलाफ कारॆवाई की बात तो छोड़ दें, उन आतंकियों के खिलाफ कारॆवाई के लिए भी हम बाकी देशों की चिरौरी कर रहे हैं, जिन्होंने हमारी नाक में दम कर रखा है। न जाने कितने सालों से पाक भारत के खिलाफ आतंकियों को शह दे रहा है, उनकी मदद कर रहा है। बावजूद इसके हमें हर हमले के बाद नए सिरे से हमले में पाकिस्तानी आतंकियों की संलिप्तता के सुबूत देना देने पड़ते हैं। इस बार भी हम वही कर रहे हैं। आपत्ति इस बात पर नहीं है। पाक की करतूतों की जानकारी पूरी दुनिया को होनी चाहिए। कूटनीतिक प्रयास जारी रहें। संभव है, इसके नतीजे बाद में आएं।

दिल नहीं दिमाग की बात करें तो कोई नहीं कहता कि हमें पाक पर हमला कर देना चाहिए। लेकिन इन दिनों भारत और पाकिस्तान के सुर पर विचार करें तो बात चोरी और सीनाजोरी वाली लगती है। पाकिस्तानी आतंकियों ने हमें इतनी बड़ी चोट दी, इसके बावजूद पाकिस्तान धौंस भरे स्वर में बात कर रहा है। और इक्का-दुक्का बेमतलब के बयानों को छोड़ दें तो हमारी सारी सक्रियता इस बात को लेकर है कि अमेरिका और बाकी देश मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाएं। इतना तो हमने भी मान ही लिया है कि हमारे किए कुछ नहीं होने वाला।

एक बात और। दुनिया भर में अमेरिकी दादागीरी की बात को लेकर कभी-कभी अपने यहां भी बहस होती है। सरकार भी कहती है कि हमारी नीतियां या हम अमेरिका से नहीं प्रभावित होते। ये बातें कितनी निरथॆक हैं, यह एक बार फिर साबित हुई है। भारत पर आतंकियों के हमले के बाद हम फिर अमेरिका पर ही टकटकी लगाए बैठे हैं। सारी उम्मीदें वहीं हैं। अमेरिका दबाव बनाए तो पाक आतंकियों के खिलाफ कोई कारॆवाई करे। वरना वह तो यह भी मानने को तैयार नहीं कि हमला पाकिस्तानियों ने किया।

मानेगा भी क्यों? आपने ऐसा किया ही क्या है? और अमेरिका आपके लिए किस हद तक दबाव बनाएगा, यह तो उसे ही तय करना है। विश्व ग्राम के अघोषित मुखिया जी गांव के इस दुस्साहसी घर के साथ अपने रिश्ते भी देखेंगे। और यह किसे पता नहीं होगा, गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत आज भी पूरी दमदारी के साथ मौजूद है। मार खाने के बाद मुखिया जी से शिकायत करके अपने कतॆव्य की इतिश्री मान लेने वाले लोग आगे भी पिटते रहते हैं। गांव में भी लोग उसीसे भिड़ने से बचते हैं, जो मारपीट भले न करता हो, मारपीट का जवाब देने की हैसियत रखता हो। फिलहाल हमारी स्थिति तो जवाब देने वाली नहीं, मुखिया जी से शिकायत करने वाली ही लगती है। आखिर क्यों नहीं पाकिस्तान को भी उसी की भाषा में जवाब दिया जाए। ऐसे भी पाकिस्तान कहता तो यही है। आप आईएसआई पर हमले की बात करते हैं तो वह रॉ पर आरोप लगाता है। आप जैश, लश्कर प्रमुख और दाऊद को मांगते हैं तो वह बाल ठाकरे, छोटा राजन की सूची सौंपता है। आपके सुबूतों के जवाब में दुनिया को आपके खिलाफ तैयार सीडी सौंपता है।

अब हम भी देते रहें दुनिया को सफाई। आखिर पाकिस्तान के खिलाफ सुबूतों के दम पर हम विश्व समुदाय से अपने साथ खड़े होने की उम्मीद करेंगे तो उन्हें यह भी तो बताना होगा कि नहीं, पाकिस्तान जो कह रहा है, हम वैसा कुछ नहीं करते। इसका मतलब हमें अकारण ही बचाव की मुद्रा में आना होगा। जो हम करते नहीं, उसकी सफाई देनी होगी।

इसे लेकर बहुत किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन आखिर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति क्यों नहीं बननी चाहिए? कब तक हम हर हमले के बाद दुनिया के सामने घिघियाते रहेंगे कि पाक को रोको। यह तो तय है कि पाक के खिलाफ क्या किसी के भी खिलाफ युद्ध की स्थिति में हम नहीं है। युद्ध तो केवल दुनिया का दादा अमेरिका ही छेड़ सकता है। भले ही वह एकतरफा क्यों न हो?
युद्ध के अधिकार और स्थिति से वंचित भारत को भी तो आखिर अपने बचाव के लिए कुछ न कुछ करना होगा। क्या यह जैसे को तैसा की रणनीति के अलावा वतॆमान परिस्थितियों में कुछ और हो सकता है?

कई बार तो यह भी लगता है कि मुंबई पर हमले के बाद से लेकर अब तक हमारी सरकार तय ही नहीं कर पाई है कि उसे करना क्या है। यह मानने में सचमुच हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारे पास वैसे नेतृत्व का अभाव है जो ऐसे मौकों पर उचित निणॆय ले सके। बात सिफॆ प्रधानमंत्री की नहीं है, पूरी सरकार ही इस मामले में लचर दिखाई दे रही है। हमारे नेता गाहे-बगाहे यह दोहराकर देश को संतुष्ट करने की कोशिश भर कर रहे हैं कि हमारे सारे विकल्प खुले हैं। विकल्प बताने को कोई नहीं कहता लेकिन देशवासी न जाने यह बात कितने सालों से सुन रहे हैं। हर बड़े हमले के बाद यह बात बार-बार दोहराई जाती है। होता कुछ नहीं है।

देश की जनता भी हर बार इस तरह की बातें सुन-सुनकर उसी रंग में रंग गई लगती है। वरना कहां हमले के बाद का शोर और कहां अब की उदासीनता। हमले के बाद जितना शोर हमारे नेता मचा रहे थे, जनता भी कुछ उसी अंदाज में उतना ही शोर मचा रही थी और अब वह भी शांत हो गई। आखिर भारत के खिलाफ पाक की इतनी बड़ी-बड़ी साजिशों के बावजूद क्यों नहीं कोई जनांदोलन इस बात के लिए उपजता कि पाक को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए? आखिर जनतंत्र में सबकुछ होता भी तो जनता की इच्छा से ही है।

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

वेशभूषा, आप और आपका मिजाज

यह तो सभी जानते हैं कि हर चीज के कम से कम दो पहलू हो सकते हैं। ठीक ठंडा-गरम की भांति। मगर जैसा कि ओशो कहते हैं कि ठंडा व गरम दो चीज नहीं होते, बल्कि एक ही चीज तापमान के दो रूप हैं। थोड़ा कम जो तापमान है, वह ठंडा है। थोड़ा ज्यादा जो तापमान है, वह गरम है। सोचने का मुद्दा यह है कि तापमान के बदल जाने से वस्तु की प्रकृति कितनी बदल जाती है!संदर्भ बदलता हूं। गमछा (अंगोछा या तौलिया) किसके घर में नहीं होता। सोचिए, आप इसका कैसा इस्तेमाल करते हैं? हाथ-मुंह पोंछते हैं, और क्या। अब इस गमछे को आप कंधे पर लेकर घूम रहे हैं। लोग आपको साधारण समझते हैं, आपका मनोमस्तिष्क भी एक साधारण मानव सा बना रहता है। इसी गमछे को जरा पगड़ी की तरह सिर पर बांध लीजिए। नकाबपोश की तरह चेहरे पर कस लीजिए। क्या होगा? लोगों के सामने आपकी पहली जो छवि प्रस्तुत होगी, वह एक बदमाश, गुंडे, लफंगे की होगी। लोगों की तो छोड़िए, आप खुद भी मिजाज में तल्खी, गरमी महसूस करने लगेंगे। तो यह देखा आपने कि एक गमछे के पहनने-बांधने का तरीका बदलने से मनुष्य की प्रकृति कितनी बदल जाती है।मूंछों का किस्सा कहना चाहूंगा। हो सकता है आपको अपनी मूंछों का हमेशा ख्याल न रहता हो। मगर मेरे कहने पर जरा मूंछों को बढ़ाइए, उस पर ताव देना शुरू कीजिए। आप देखेंगे कि जितनी बार आप मूंछों को ताव देते हैं, उतनी बार मिजाज में गरमी का प्रवेश होता है। मूंछों की कोरों को कटवा लीजिए, छंटवा लीजिए, मिजाज बिल्कुल सामान्य बना रहेगा।अब जरा इस पर गौर फरमाइए। एक फटा कुर्ता और मैला-कुचैला पाजामा पहना कोई व्यक्ति आपके बिस्तर पर बैठना चाहता है। आप बैठने देंगे? यदि वह बैठ भी गया तो बहुत देर तक नाक-भौं सिकोड़ते रहेंगे। हो सकता है, उसके जाने के बाद आप चादर को ड्राई-क्लीनर को भेज दें। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि साफ-सुथरा सूट-बूट में कोई व्यक्ति आपके घर आया और आप उसे अपने बिस्तर पर बिठाने में इसलिए हिचक गये कि उसका ड्रेस कहीं पहले से बिछी चादर से गंदा न हो जाये, खराब न हो जाये। उपाय न रहा और वह उसी बिस्तर पर बैठ गया तो वह तो नाक-भौं सिकोड़ता ही रहेगा और जल्दी उठ जाने की हड़बड़ी दिखाता ही रहेगा और जव वह उठकर चला जायेगा तो आप भी लेंगे राहत की सांस।तो कुल मिलाकर बात इतनी है कि आपका ड्रेस सेंस आपके व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव डालता है। इससे आप लापरवाह नहीं हो सकते। रात में सोने के लिए पहने जाने वाले कपड़ों में किसी मेहमान के पास नहीं जा सकते। मेहमान के घर जाने वाले कपड़ों में लक-दक होकर आप दफ्तर नहीं जा सकते। दफ्तर में पहने जाने वाले कपड़ों में आप पूजा पर नहीं बैठ सकते। पूजा पर बैठने वाले कपड़ों में किसी समारोह में हिस्सा नहीं ले सकते। और यदि आप इस ड्रेंस सेंस का ख्याल किये बिना घूमते-फिरते रहे, कहीं के कपड़ों में कहीं पहुंचते रहे तो आपकी क्या छवि बनेगी, यह क्या कहने की जरूरत है? हो सकता है, लोग आपको पागल तक कहने लगें। तो व्यक्तित्व विकास के लिए संवाद पर नियंत्रण के बाद जो ख्याल करने की बात है, वह है ड्रेस सेंस। आज इतना ही, व्यक्तित्व विकास पर अभी बातें जारी रहेंगी।
विचारः आसमानी बिजली हमेशा एक ही जगह नहीं गिरती। अभी इधर गिरी है तो कभी उधर भी गिरेगी। इधर गिरी है तो कुछ बच भी गया है, उधर गिरेगी तो कुछ बचेगा भी, इसकी क्या गारंटी है?

श्री कौशल शुक्ला हमारे मित्र हैं। इन दिनों मुजफ्फरपुर में हैं। ..विचार के लिए विचार के नाम से उनका ब्लॉग है। अपने ब्लॉग पर वे व्यक्तित्व विकास पर सीरीज में लेख लिख रहे हैं। इस श्रृंखला की यह चौथी कड़ी है। कौशल जी से अनुमति लेकर उसे यहां भी पोस्ट किया गया है। अच्छा लगे तो अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

पाकिस्तान भी तो यही कह रहा था

महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद हुए या मारे गए? यह बहस थमी तो नई बहस आगे बढ़ाई गई है। इस बहस की शुरुआत दरअसल पाकिस्तानी मीडिया ने की थी। वहां भी बहस आशंका के रूप में थी, करकरे को गोली मालेगांव धमाकों से जुड़े लोगों ने तो नहीं मारी? पाकिस्तानी मीडिया की आशंका पाक सरकार को स्वर देने की कवायद थी। अब कुछ दिनों बाद केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एआर अंतुले भी यही बात कह रहे हैं। पूरा देश जिस केंद्र सरकार से पाकिस्तान पर हमले की मांग कर रहा है, उस सरकार का एक वरिष्ठ मंत्री उसी पाक के सुर में सुर मिला रहा है। इसे ही सियासत कहते हैं। यहां देश की भावनाएं नहीं देखी जाती, वोट देखा जाता है। क्या करेंगे, राजनीति को यूं ही तो दलदल नहीं कहा जाता।

अंतुले की एक और बात पर गौर करें। अंतुले कहते हैं पाकिस्तानी आतंकियों के पास एटीएस प्रमुख करकरे को मारने की कोई वजह नहीं थी। मतलब, मुंबई पर आतंकी हमलों में जितने लोगों ने जान गंवाई, उन्हें मारने की आतंकियों के पास वजह थी। (लगे हाथों अंतुले यह भी बता देते तो ज्यादा अच्छा रहता कि वह वजह क्या है)। अंतुले का यह बयान कहीं न कहीं आतंकियों की कारॆवाई को एक आधार भी देता है। हमारे केंद्रीय मंत्री का बयान हमें बताता है कि आतंकी बेवजह किसी को नहीं मारते। पाक परस्त आतंकी अरसे से भारत में खूनखराबा कर रहे हैं। हम मानते हों या नहीं, मंत्री जी मानते हैं कि इसकी वजह है। और वो मानते हैं, तो आपको सुनना-पढ़ना होगा। क्या करेंगे, अभिव्यक्ति की आजादी तो उनके लिए भी है।

हो सकता है, कुछ लोग अंतुले की आशंका से सहमत हों। तब भी इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना ही माना जाएगा। अगर इस तरह की कोई आशंका है, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए। जांच में यह बात स्थापित होती, तब कही जाती। जांच किए जाने की बात अंतुले भी कह रहे हैं। अंतुले केंद्र के वरिष्ठ मंत्री है। सरकार के स्तर पर अपनी बात रखते। जांच करवाते। तब तक इस पर मुंह खोलने से परहेज करते। लेकिन इतनी शांति से उनका मकसद कहां पूरा होता। पता नहीं, अब भी उनका मकसद पूरा हो पाएगा या नहीं। हो सकता है लेने के देने पड़ जाएं। दरअसल भारतीय राजनीति के कुछ पुराने योद्धा देश की जनता को वतॆमान समय के हिसाब से देख ही नहीं पाते। ये लोग देश की जनता को उसी वक्त के हिसाब से देखते हैं, जब इन्हें विस्मृति दोष नहीं हुआ था। उन्हें याद नहीं कि जनता काफी समझदार हो चुकी है। राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों ने भी यही बताया है। किसी राज्य की जनता ने बयान के आधार पर वोट नहीं दिए। वोट काम पर डाले गए।

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

मां भारती

मां तेरे अचॆन को व्याकुल हैं मेरे अंतर की नारी
किंतु नहीं मैं इसकी सच्ची अधिकारी।

सेवा पथ कदम बढ़ाए थे कई बार
बीच डगर में खींच लाया ये निष्ठुर संसार।

धूप दीप चंदन रोली, सब कुछ था मेरे पास
किंतु दहलीजों तक सिमट गया दीवारों का भाग्य।

कतॆव्य बने बंधन, बंद हुआ मुक्ति का द्वार
उफन रही नदी को बांधेगी कब तक तट की मर्यादा।

एक दिन तो आएगा ज्वार, उस दिन आऊंगी तेरे द्वार
सच्ची होगी मेरी आरती, पुकारेंगी मुझे स्वयं मां भारती।
विजयलक्ष्मी सिंह

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

फिर उठा है देशप्रेम का ज्वार

देश पर मर-मिटने वालों की कमी तो हिंदुस्तान में कभी नहीं रही। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद देशप्रेम का जो ज्वार दिख रहा है, वह उत्साहित करनेवाला है। पत्र-पत्रिकाओं में लिखे जाने वाले लेख, पाठकों के पत्र, मोबाइल के जरिए आने वाले संदेश बताते हैं कि मुंबई के आतंकी हमलों ने आम जनता को देश के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है। क्या लोगों को लगने लगा है कि नेताओं के भरोसे रहने का वक्त गुजर चुका है?

दरअसल नेताओं के प्रति इस कदर नाराजगी पहले कभी नहीं देखी गई। यह नाराजगी किसी एक दल या एक नेता के प्रति नहीं, बलि्क सभी से है। नेताओं से लोग जितने निराश हुए हैं, लोगों का खुद पर भरोसा उतना ही बढ़ा है। इसकी एक बानगी जबलपुर में देखने को मिली। बताया जाता है कि यहां के १०० युवकों ने स्थानीय कलक्टर को यह लिखकर दिया है कि वे देश के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। यह अभिव्यक्ति अकारण नहीं है। दरअसल, चंद आतंकियों ने मुंबई को जिस तरह साठ से ज्यादा घंटों तक बंधक बनाए रखा, उससे लोगों का यह विश्वास हिल गया है कि सरकारें हमें महफूज रखेगी। भरोसे की इस मौत ने लोगों के अंदर आक्रोश भी पैदा किया। इसी आक्रोश ने केंद्रीय गृहमंत्री, एक मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री को विदा करने पर मजबूर किया। इंतजार है लोगों के देशप्रेम के ज्वार व भरोसे के कत्ल के खिलाफ आक्रोश के और सकारात्मक नतीजों का।

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

इस बार भी नहीं छलकेगा सब्र का पैमाना

एक बार फिर पूरे भारत में पाक के खिलाफ माहौल बन रहा है। कई ब्लॉगर पाकिस्तान पर हमले की इच्छा और उम्मीद जता रहे हैं। भारत के हर कोने से आने वाली आवाजें भी कुछ इसी तरह की हैं। देश की हालत संसद पर हमले के बाद भी ठीक इसी तरह की थी। हर देशभक्त की इच्छा थी कि आतंक को पालने-पोसने वाले को करारा जवाब मिलना ही चाहिए। सीमा पार के आतंकी ठिकानों पर कारॆवाई होनी ही चाहिए। लेकिन उस वक्त भी हम हिम्मत नहीं दिखा पाए। आज फिर वही हालात हैं। टीवी पर दिखने वाले आक्रोश को छोड़ भी दें तो हर देशवासी की इच्छा यही होगी कि देश के दुश्मनों को करारा जवाब मिलना चाहिए। लेकिन यह इच्छा इस बार भी अधूरी ही रहेगी। अंतरराष्ट्रीय दबाव और युद्ध का अथॆशास्त्र हमें सीमा पार किसी भी कारॆवाई से रोके रखेगा। प्रधानमंत्री सब्र के इम्तहान की बात करते हैं। इसी सब्र की दुहाई संसद पर हमले के बाद भी दी गई थी। तब के प्रधानमंत्री ने भी बार-बार यही बात दोहराई थी। तब भी हमने अंततः मान लिया था कि अभी सब्र का पैमाना छलकने का वक्त नहीं आया है। इंतजार करें, इस बार भी हम यही मानेंगे। मिला-जुलाकर यही कि हमारे सब्र को हम नहीं नियंत्रित करते। कह सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय दबाव ही इसे नियंत्रित करता है। देखिए न, जैसे ही यह आशंका हुई कि पाक या पाक अधिकृत कश्मीर के खिलाफ भारत कारॆवाई की हद तक जा सकता है, अमेरिकी विदेश मंत्री दौड़ी-दौड़ी आईं। यह कहने कि पाक हर तरह का सहयोग करने को तैयार है। हमने उससे कह दिया है। मतलब पाक तो हमारी बात मानता है। और हम आपसे भी कहते हैं कि आप भी पाक के खिलाफ कोई कारॆवाई न करें। (अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पहले ही कह चुके हैं, इस हमले में पाक की संलिप्तता के सुबूत नहीं है।)। सभी मसले बातचीत से सुलझाएं। हम तो यह भी कहने की हालत में नहीं है कि महोदया कोंडोलिजा राइस, आतंक फैलाने वाले देश के नाम पर ही तो आपके देश ने इराक और अफगानिस्तान को तबाह कर दिया। लेकिन क्या करें, नहीं कह सकते। पानी में रहकर मगर से बैर तो नहीं हो सकता है न। जमा खातिर रखें, पाक के खिलाफ चेतावनियों की भाषा से आगे की बात नहीं होगी।

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

हे प्रभु, इन्हें माफ करना

टिप्पणी एक- कुछ महिलाएं और बहने पाउडर-लिपिस्टिक लगाकर कैंडल मार्च निकालकर पश्चिमी सभ्यता का परिचय देती हैं। यह व्यवहार अलगाववादियों जैसा है जिनका लोकतंत्र में यकीन नहीं। इन महिलाओं को राजनेताओं के खिलाफ नारेबाजी की जगह पाकिस्तान और आईएसआई के खिलाफ नारेबाजी करनी चाहिए। ...मुख्तार अब्बास नकवी, भाजपा नेता (नेताओं के विरोध पर)। टिप्पणी दो- अगर संदीप शहीद नहीं होता तो उसके घर कुत्ता भी नहीं जाता। ...वीएस अच्युतानंद, केरल के मुख्यमंत्री ( शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के दुखी पिता द्वारा आक्रोश जताए जाने के बाद)। टिप्पणी तीन- मुंबई जैसे बड़े शहर में छोटी-मोटी बातें तो होती रहती है। आरआर पाटिल, पूवॆ उपमुख्यमंत्री-महाराष्ट्र। (हमले को रोक पाने संबंधी सवाल पर) सवाल एक-क्या ये लोग अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं? सवाल दो-इन्हें सद्बबुद्धि मिले इसके लिए क्या करना होगा? सवाल तीन-भारत की जनता आखिर इतनी सहनशील क्यों है?



शनिवार, 29 नवंबर 2008

सवाल

साठ घंटे, 183 लोगों की मौत। बीस जांबाज शहीद। 40 अरब की चपत (एसोचैम के मुताबिक)। ...फिर भी जीत गए जंग। कैसे? क्या सिफॆ आतंकियों को मार गिराने से? क्या इतने के बावजूद हम उनके जिंदा रहने की उम्मीद कर रहे थे? इस सवाल का मतलब सिफॆ इतना है कि हम आत्ममुग्धता की हालत में न रहें। आतंकियों की इतनी बड़ी कारॆवाई हमारी कमजोरी के बिना संभव नहीं थी। टटोलें, कहां कमजोर हैं हम? वरना हालात और बुरे होंगे।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

यह कैसी बहस?

एक ब्लॉग पर टिप्पणियों के माध्यम से यह बहस चल रही है कि आतंकियों की गोलियों का शिकार बने एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद कहलाने का हक रखते हैं या नहीं? पूरी बहस महज बौद्धिकता के प्रदशॆन के लिए मौत के बाद किसी के चरित्रहनन जैसा ही है?
शहीद नरकगामी नहीं होते..पर टिप्पणियों को देखकर लगता है, जैसे खुद को प्रबुद्ध साबित करने के लिए कुछ लोग, मर चुके कुछ लोगों की चीर-फाड़ में लगे हों। करकरे क्या किसी भी आदमी के अतीत के सभी पन्ने सुनहरे ही नहीं होते। कुछ पन्नों पर काली स्याही से लिखी कुछ इबारतें भी होती हैं। टिप्पणियां करनेवाले भी अपने अंदर टटोलकर देखें तो एेसा ही पाएंगे। घर बैठकर जुगाली करना बहुत आसान होता है। आतंकी हमले के बीच सिफॆ छुपने की बात सोचने वाले लोग ही किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की बजाय तंज कर सकते हैं। वरना इतना तो सच है ही कि हेमंत करकरे हमले के बाद तुरंत अपने दायित्वों का निवॆहन करने निकल पड़े थे। ड्राइंगरूम में अलसाए हुए टीवी नहीं देख रहे थे। साध्वी की गिरफ्तारी जायज है या नाजायज यह अदालत के सिवा कोई और कैसे तय कर सकता है? यह गलत भी हो तो केवल साध्वी को गिरफ्तार भर कर लेने से उनका शहीद कहलाने का हक नहीं छिन जाता। वैसे तो आत्मप्रचार के लिए जानबूझकर किसी की मौत पर मजमा लगाना ही जायज नहीं माना जा सकता। कोई शहीद कहा जाएगा या नहीं यह तो बाद की बात है। अपनी संस्कृति और परंपरा तो यही कहती है कि हम किसी की मौत के बाद उसके बारे में अच्छा ही अच्छा सोचते और कहते हैं। कम से कम इस परंपरा का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए। वैसे भी इस पूरी बहस से नुकसान भले ही हो, किसी का भला होते तो नहीं दिखता।

सोमवार, 24 नवंबर 2008

इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं

मालेगांव धमाके की जांच कर रही एटीएस बड़ी जल्दबाजी में है। रोज-रोज नए-नए खुलासे कर रही है। ऐसा जताया जा रहा है जैसे एटीएस बड़ी समझदारी के साथ गुत्थी सुलझाती जा रही है। हर खुलासे को मीडिया मैं जोर-शोर से उछाला जा रहा है। एटीएस और मीडिया की भी भाषा इन खुलासों को लेकर ऐसी ही होती है, जैसे ki बिना मुकदमा चलाए, बिना अदालत ka फैसला आए- निर्णय सुना दिया गया हो। एटीएस ने जिसकa नाम भर ले लिया वह अपराधी। समझ में नहीं आता ki एटीएस खुलासा करने ke मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों बरत रही है? हो सकता है, एटीएस जो खुलासे कर रही है-सच हों। उसke पास सुबूत हों, तथ्य हों। पर इन तथ्यों और सुबूतों को अदालत में परखा जाना तो अभी बाकी है। अदालत में यह तय होना अभी बाकी है ki क्या वास्तव में ये सारे लोग आतंकी हरकतों यानी धमाको में लिप्त हैं, जिनका नाम एटीएस ले रही है। lekin इससे पहले ही पूरी दुनिया में यह संदेश जा chuka है ki भारत में हिंदुओं ने भी आतंकवादी संगठन बना लिया है। इस आतंकी संगठन से जुड़े लोग धमाके कर रहे हैं। ऐसा है या नहीं, इसके पक्ष-विपक्ष में तमाम तर्क दिए जा रहे हैं। इन बातों को छोड़ दें तो जब तक अदालत ka फैसला आएगा पूरी दुनिया में यह बात स्थापित हो चुकी होगी िक भारत के हिंदू जवाबी आतंकी कार्रवाई कर रहे हैं। मान लिया जाए िक अदालत एटीएस द्वारा बताए जा रहे सभी आरोपियों को निर्दोष मान ले, तब क्या यह स्थापना खत्म की जा सकेगी? क्या तब हिंदू आतंकवादी शब्द, जिसे मीडिया में जोर-शोर से उछाला जा रहा है, खत्म हो जाएगा? या यह धब्बा तब भी बना रहेगा। इसके उलट यह मान लें िक अदालत में साबित हो जाता है िक एटीएस ·के द्वारा बताए गए और गिरफ्तार सभी लोग धमाकों में शामिल रहे हैं। तब भी कुछ सवाल हैं-क्या गिरफ्तार kiye गए पुरोहित, साध्वी, दयानंद जैसे चंद लोग पूरे हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं? आखिर हिंदू आतंकवादी क्यों, सिर्फ अपराधी या आतंकवादी क्यों नहीं? हां, यही आपत्ति मुस्लिम आतंकवादी कहने पर भी लागू होना चाहिए। और ऐसी आपत्तियां पूरे विश्व में जोर-शोर से उठती भी रहती हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है ki जब कश्मीर के मुस्लिम युवक kiसी आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं तो समझदार माने/कहे जाने वाले लोग उसे भटके हुए चंद युवकों की कार्रवाई बताते हैं। आश्चर्य होता है ki वही समझदार लोग हिंदू आतंकवादी शब्द पर आपत्ति नहीं करते। एटीएस की थ्योरी सही भी हो तो यहां तो सचमुच चंद भटके हुए लोग हैं। एक जमाना था जब भारत में होने वाली हर आतंकी कार्रवाई के लिए पड़ोसी देश को जिम्मेदार ठहराया जाता था। बात-बात पर उसे आतंकियों को संरक्षण देने वाला देश कहा जाता था। हिंदू आतंकवादी शब्द को आज जिस जोर-शोर से प्रचारित kiya जा रहा है, कल को कोई भी पड़ोसी देश अपने यहां होने वाली आतंकी गतिविधियों के लिए हमें जिम्मेदार ठहराने लगे, तो क्या होगा? हमें सोचना ही होगा ki हमारी अभी ki जल्दबाजी के ऐसे भी परिणाम हो सकते हैं। खासकर मीडिया, अदालत के फैसले के पहले ही फतवा जारी करने की अपनी आदत से बाज आए। िकसी भी जांच एजेंसी की बातों को नतीजे जैसा प्रचारित करने की मीडिया की आदत पर रोक तो लगनी ही चाहिए। अन्यथा होता यह है ki आरोप को ही, जांच एजेंसी की बातों के आधार पर खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया चीख-चीखकर सत्य और तथ्य ka रूप दे देता है। दुखद तो यह भी है ki मीडिया में आरोपों की बात जितनी जोर-शोर से आती है, अदालत में आरोप खारिज होने पर मीडिया की आवाज उतनी ही धीमी होती है। इतनी धीमी ki अधिसंख्य लोग तो उसे सुन भी नहीं पाते।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

दीपावली की शुभकामनाएं

सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

सोमवार, 16 जून 2008

बहुत शोर सुनते थे...

क्या विहिप इनदिनों राम मंदिर मुद्दे से कतरा कर निकलने कि ताक में है? या राम मंदिर के मुद्दे को एक औजार कि तरह अपने पास रखने के लिए इसे लटकाए रहना चाहती है? दरअसल दूसरा सवाल, पहले सवाल का जवाब है। राम मंदिर मुद्दे को लटकाए रखने के लिए विहिप फिलहाल इससे कतरा कर निकल जाना चाहती है। हरिद्वार में विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक का सोमवार को समापन हुआ। बैठक तीन दिनों तक चली। इस बैठक के पहले बहुत शोर हुआ इस बात का कि विहिप यहाँ राम मंदिर के निर्माण कि तिथि घोषित कर सकती है। तिथि तो घोषित नही की गई। अंतिम दिन यह जरूर कहा गया कि विहिप मंदिर निर्माण का मसला अगली संसद पर छोडती है। संदेश है कि अगले आम चुनाव में इतने रामभक्त या कहें मंदिर समर्थक जीतकर आ जायेंगे, जिससे कि मंदिर निर्माण में कोई अड़चन नही आएगी। इस संदेश को और साफ करें तो विहिप kअ मतलब है कि जिन्हें मन्दिर बनवाना है वे रामभक्त को ही चुनें। रामभक्त यानी बीजेपी के उम्मीदवार। जाहिर सी बात है, विहिप तिथि का ऐलान भले कर ले, वह फिलहाल मंदिर bअनवाने कि स्थिति में नही है। स्थिति जो भी उसे तो राम मंदिर के नाम पर वोट cहहिये, जिसके लिए विहिप तमाम तरह के प्रयत्न करती रहती है। ऐसे में विहिप की इस लटकाने वाली निति का अर्थ है कि तिथि घोषित कर, फिर मंदिर बनवाने में नाकाम रहकर अपने ऊपर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगने देना चाहती है और लोगों की आस भी बंधाये रखना चाहती है। यही वजह है कि तीन दिनी बैठक में विहिप ने हिंदू आस्था के अन्य मुद्दों पर बातें की। जैसे गंगा मुक्ति और मंदिर मुक्ति की। विहिप ने उत्तरकाशी में धरने पर बैठे पर्यावरणविद डॉक्टर गुरुदास अग्रवाल को समर्थन कर ऐलान किया। अग्रवाल बिजली के लिए गंगा के प्रवाह को रोकने के खिलाफ धरने पर बैठे हैं। विहिप ने दूसरा मुद्दा उन मंदिरों कर उठाया जिनका सरकार ने अधिग्रहण कर लिया है। विहिप कर कहना है, सरकार (केन्द्र की) इन मंदिरों- मठों को मुक्त करे। जाहिर है विहिप आस्था के मुद्दों को छोड़ना नहीं चाहती और राम मंदिर मुद्दे को औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है। हालांकि इससे विहिप के उन समर्थको को निराशा भी हुई है जो हरिद्वार की बैठक में तिथि घोषित होने की उम्मीद पाल बैठे थे.

बुधवार, 11 जून 2008

मेरी बात

बात चाहे किसी की हो, सुनी जानी चाहिए। यह अलग बात है कि यहाँ बातें सुनी नहीं देखी जाएगी। क्या फर्क पड़ता है। भूमिका बांधने का कोई खास मतलब तो है नहीं। शुरुआत से ही शुरू करें। न जानें कहाँ-कहाँ भटकते हुए यहाँ तक पहुंचे हैं। यहाँ तक पहुँचने में जो चीजें पीछे छूट गयीं, उनकी बहुत याद आती है। कई dafa तो ऐसा लगता है, जैसे सब कुछ bekar हो। sidhi si बात यह है की यहाँ हम सिर्फ़ अपने मन की बात करना चाहते हैं, जो शायद kahin और नहीं कर paate ।