एक ब्लॉग पर टिप्पणियों के माध्यम से यह बहस चल रही है कि आतंकियों की गोलियों का शिकार बने एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद कहलाने का हक रखते हैं या नहीं? पूरी बहस महज बौद्धिकता के प्रदशॆन के लिए मौत के बाद किसी के चरित्रहनन जैसा ही है?
शहीद नरकगामी नहीं होते..पर टिप्पणियों को देखकर लगता है, जैसे खुद को प्रबुद्ध साबित करने के लिए कुछ लोग, मर चुके कुछ लोगों की चीर-फाड़ में लगे हों। करकरे क्या किसी भी आदमी के अतीत के सभी पन्ने सुनहरे ही नहीं होते। कुछ पन्नों पर काली स्याही से लिखी कुछ इबारतें भी होती हैं। टिप्पणियां करनेवाले भी अपने अंदर टटोलकर देखें तो एेसा ही पाएंगे। घर बैठकर जुगाली करना बहुत आसान होता है। आतंकी हमले के बीच सिफॆ छुपने की बात सोचने वाले लोग ही किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की बजाय तंज कर सकते हैं। वरना इतना तो सच है ही कि हेमंत करकरे हमले के बाद तुरंत अपने दायित्वों का निवॆहन करने निकल पड़े थे। ड्राइंगरूम में अलसाए हुए टीवी नहीं देख रहे थे। साध्वी की गिरफ्तारी जायज है या नाजायज यह अदालत के सिवा कोई और कैसे तय कर सकता है? यह गलत भी हो तो केवल साध्वी को गिरफ्तार भर कर लेने से उनका शहीद कहलाने का हक नहीं छिन जाता। वैसे तो आत्मप्रचार के लिए जानबूझकर किसी की मौत पर मजमा लगाना ही जायज नहीं माना जा सकता। कोई शहीद कहा जाएगा या नहीं यह तो बाद की बात है। अपनी संस्कृति और परंपरा तो यही कहती है कि हम किसी की मौत के बाद उसके बारे में अच्छा ही अच्छा सोचते और कहते हैं। कम से कम इस परंपरा का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए। वैसे भी इस पूरी बहस से नुकसान भले ही हो, किसी का भला होते तो नहीं दिखता।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2008
सोमवार, 24 नवंबर 2008
इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं
मालेगांव धमाके की जांच कर रही एटीएस बड़ी जल्दबाजी में है। रोज-रोज नए-नए खुलासे कर रही है। ऐसा जताया जा रहा है जैसे एटीएस बड़ी समझदारी के साथ गुत्थी सुलझाती जा रही है। हर खुलासे को मीडिया मैं जोर-शोर से उछाला जा रहा है। एटीएस और मीडिया की भी भाषा इन खुलासों को लेकर ऐसी ही होती है, जैसे ki बिना मुकदमा चलाए, बिना अदालत ka फैसला आए- निर्णय सुना दिया गया हो। एटीएस ने जिसकa नाम भर ले लिया वह अपराधी। समझ में नहीं आता ki एटीएस खुलासा करने ke मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों बरत रही है? हो सकता है, एटीएस जो खुलासे कर रही है-सच हों। उसke पास सुबूत हों, तथ्य हों। पर इन तथ्यों और सुबूतों को अदालत में परखा जाना तो अभी बाकी है। अदालत में यह तय होना अभी बाकी है ki क्या वास्तव में ये सारे लोग आतंकी हरकतों यानी धमाको में लिप्त हैं, जिनका नाम एटीएस ले रही है। lekin इससे पहले ही पूरी दुनिया में यह संदेश जा chuka है ki भारत में हिंदुओं ने भी आतंकवादी संगठन बना लिया है। इस आतंकी संगठन से जुड़े लोग धमाके कर रहे हैं। ऐसा है या नहीं, इसके पक्ष-विपक्ष में तमाम तर्क दिए जा रहे हैं। इन बातों को छोड़ दें तो जब तक अदालत ka फैसला आएगा पूरी दुनिया में यह बात स्थापित हो चुकी होगी िक भारत के हिंदू जवाबी आतंकी कार्रवाई कर रहे हैं। मान लिया जाए िक अदालत एटीएस द्वारा बताए जा रहे सभी आरोपियों को निर्दोष मान ले, तब क्या यह स्थापना खत्म की जा सकेगी? क्या तब हिंदू आतंकवादी शब्द, जिसे मीडिया में जोर-शोर से उछाला जा रहा है, खत्म हो जाएगा? या यह धब्बा तब भी बना रहेगा। इसके उलट यह मान लें िक अदालत में साबित हो जाता है िक एटीएस ·के द्वारा बताए गए और गिरफ्तार सभी लोग धमाकों में शामिल रहे हैं। तब भी कुछ सवाल हैं-क्या गिरफ्तार kiye गए पुरोहित, साध्वी, दयानंद जैसे चंद लोग पूरे हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं? आखिर हिंदू आतंकवादी क्यों, सिर्फ अपराधी या आतंकवादी क्यों नहीं? हां, यही आपत्ति मुस्लिम आतंकवादी कहने पर भी लागू होना चाहिए। और ऐसी आपत्तियां पूरे विश्व में जोर-शोर से उठती भी रहती हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है ki जब कश्मीर के मुस्लिम युवक kiसी आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं तो समझदार माने/कहे जाने वाले लोग उसे भटके हुए चंद युवकों की कार्रवाई बताते हैं। आश्चर्य होता है ki वही समझदार लोग हिंदू आतंकवादी शब्द पर आपत्ति नहीं करते। एटीएस की थ्योरी सही भी हो तो यहां तो सचमुच चंद भटके हुए लोग हैं। एक जमाना था जब भारत में होने वाली हर आतंकी कार्रवाई के लिए पड़ोसी देश को जिम्मेदार ठहराया जाता था। बात-बात पर उसे आतंकियों को संरक्षण देने वाला देश कहा जाता था। हिंदू आतंकवादी शब्द को आज जिस जोर-शोर से प्रचारित kiya जा रहा है, कल को कोई भी पड़ोसी देश अपने यहां होने वाली आतंकी गतिविधियों के लिए हमें जिम्मेदार ठहराने लगे, तो क्या होगा? हमें सोचना ही होगा ki हमारी अभी ki जल्दबाजी के ऐसे भी परिणाम हो सकते हैं। खासकर मीडिया, अदालत के फैसले के पहले ही फतवा जारी करने की अपनी आदत से बाज आए। िकसी भी जांच एजेंसी की बातों को नतीजे जैसा प्रचारित करने की मीडिया की आदत पर रोक तो लगनी ही चाहिए। अन्यथा होता यह है ki आरोप को ही, जांच एजेंसी की बातों के आधार पर खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया चीख-चीखकर सत्य और तथ्य ka रूप दे देता है। दुखद तो यह भी है ki मीडिया में आरोपों की बात जितनी जोर-शोर से आती है, अदालत में आरोप खारिज होने पर मीडिया की आवाज उतनी ही धीमी होती है। इतनी धीमी ki अधिसंख्य लोग तो उसे सुन भी नहीं पाते।
सोमवार, 27 अक्टूबर 2008
सोमवार, 16 जून 2008
बहुत शोर सुनते थे...
क्या विहिप इनदिनों राम मंदिर मुद्दे से कतरा कर निकलने कि ताक में है? या राम मंदिर के मुद्दे को एक औजार कि तरह अपने पास रखने के लिए इसे लटकाए रहना चाहती है? दरअसल दूसरा सवाल, पहले सवाल का जवाब है। राम मंदिर मुद्दे को लटकाए रखने के लिए विहिप फिलहाल इससे कतरा कर निकल जाना चाहती है। हरिद्वार में विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक का सोमवार को समापन हुआ। बैठक तीन दिनों तक चली। इस बैठक के पहले बहुत शोर हुआ इस बात का कि विहिप यहाँ राम मंदिर के निर्माण कि तिथि घोषित कर सकती है। तिथि तो घोषित नही की गई। अंतिम दिन यह जरूर कहा गया कि विहिप मंदिर निर्माण का मसला अगली संसद पर छोडती है। संदेश है कि अगले आम चुनाव में इतने रामभक्त या कहें मंदिर समर्थक जीतकर आ जायेंगे, जिससे कि मंदिर निर्माण में कोई अड़चन नही आएगी। इस संदेश को और साफ करें तो विहिप kअ मतलब है कि जिन्हें मन्दिर बनवाना है वे रामभक्त को ही चुनें। रामभक्त यानी बीजेपी के उम्मीदवार। जाहिर सी बात है, विहिप तिथि का ऐलान भले कर ले, वह फिलहाल मंदिर bअनवाने कि स्थिति में नही है। स्थिति जो भी उसे तो राम मंदिर के नाम पर वोट cहहिये, जिसके लिए विहिप तमाम तरह के प्रयत्न करती रहती है। ऐसे में विहिप की इस लटकाने वाली निति का अर्थ है कि तिथि घोषित कर, फिर मंदिर बनवाने में नाकाम रहकर अपने ऊपर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगने देना चाहती है और लोगों की आस भी बंधाये रखना चाहती है। यही वजह है कि तीन दिनी बैठक में विहिप ने हिंदू आस्था के अन्य मुद्दों पर बातें की। जैसे गंगा मुक्ति और मंदिर मुक्ति की। विहिप ने उत्तरकाशी में धरने पर बैठे पर्यावरणविद डॉक्टर गुरुदास अग्रवाल को समर्थन कर ऐलान किया। अग्रवाल बिजली के लिए गंगा के प्रवाह को रोकने के खिलाफ धरने पर बैठे हैं। विहिप ने दूसरा मुद्दा उन मंदिरों कर उठाया जिनका सरकार ने अधिग्रहण कर लिया है। विहिप कर कहना है, सरकार (केन्द्र की) इन मंदिरों- मठों को मुक्त करे। जाहिर है विहिप आस्था के मुद्दों को छोड़ना नहीं चाहती और राम मंदिर मुद्दे को औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है। हालांकि इससे विहिप के उन समर्थको को निराशा भी हुई है जो हरिद्वार की बैठक में तिथि घोषित होने की उम्मीद पाल बैठे थे.
बुधवार, 11 जून 2008
मेरी बात
बात चाहे किसी की हो, सुनी जानी चाहिए। यह अलग बात है कि यहाँ बातें सुनी नहीं देखी जाएगी। क्या फर्क पड़ता है। भूमिका बांधने का कोई खास मतलब तो है नहीं। शुरुआत से ही शुरू करें। न जानें कहाँ-कहाँ भटकते हुए यहाँ तक पहुंचे हैं। यहाँ तक पहुँचने में जो चीजें पीछे छूट गयीं, उनकी बहुत याद आती है। कई dafa तो ऐसा लगता है, जैसे सब कुछ bekar हो। sidhi si बात यह है की यहाँ हम सिर्फ़ अपने मन की बात करना चाहते हैं, जो शायद kahin और नहीं कर paate ।
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