बुधवार, 19 अगस्त 2009
केवल आम होने से आप सारे दोषों से बरी नहीं हैं
वाकई हम समाज से बुराइयों समूल नाश की इच्छा रखते हैं। तमाम बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं। तो वैसी बुराइयों से हमें मुक्त होना होगा। भले ही वे बुराइयों छोटी क्यों न हो। एक कलकॆ अपने दफ्तर में रोज रिश्वत लेता हो और वह बोफोसॆ घोटाला, चारा घोटाला करने वालों को कोसे तो कोसते रहे किसे क्या फकॆ पड़ता है। हम कहते हैं, हमारे नेता, अधिकारी पाक-साफ हों, संसद, विधानसभाओं में जनता के काम की बातें हो, सरकारी दफ्तरों में काम हो। यह चाहना गलत नहीं है। लेकिन यह कायॆसंस्कृति विकसित करने में, जिसे आम आदमी कहते हैं, उसकी भी सक्रिय भूमिका है। वह केवल कहने और चाहने का अधिकारी नहीं है। व्यक्तिगत काम तो आम से लेकर खास सभी पूरी तनदेही से करते हैं। लेकिन जैसे ही काम व्यक्तिगत से सावॆजनिक होता है, काम के प्रति दिलचस्पी और गायब हो जाती है। इस रोग से केवल खास ही ग्रसित नहीं है। तो फिर ऊपर से क्यों सावॆजनिक कायॆ के प्रति काहिली के खिलाफ नीचे से ही मुहिम क्यों न शुरू हो?
अब देखिए न। गांव का एक आम आदमी वाडॆ पाषॆद बनता है। पाषॆद बनने से पहले वह बिल्कुल आम था। अपने घर, खेत में वह पूरी निष्ठा से काम करता रहा है। पाषॆद बनते ही सावॆजनिक कामों के प्रति उसकी अरूचि किसी भी गांव में दिख जाएगी। ..यह अरूचि एक आम आदमी पाषॆद बनते ही तो सीख नहीं जाता। यह गुर तो उस आम आदमी के अंदर पहले से ही होगा। ..तो सावॆजनिक कामों के प्रति अरूचि को दूर करने की मुहिम वहीं से क्यों न शुरू हो। वहीं से मतलब हर आम आदमी को अपने अंदर की इस अरूचि को बाहर निकलना होगा।
अक्सर हम दुखी होते हैं। संसद में हंगामे को लेकर। राजनीतिक दलों के धरना-प्रदशॆनों से होने वाली दिक्कतों को लेकर। हड़ताल को लेकर। आम आदमी के अलावा दुखी होने वालों में खास लोग भी शामिल होते हैं। लेकिन हम बात आम आदमी की ही करें। मुझे भी लगता है कि किसी भी ऐसे हंगामे, धरना, प्रदशॆन की निंदा की जानी चाहिए, जिससे ढेर सारे लोगों को परेशानी होती हो। एक समस्या के समाधान के लिए, ढेर सारे लोगों के लिए समस्या पैदा कर देना कहां की समझदारी है। लेकिन साहब यह समस्या पैदा करने में आम आदमी भी पीछे नहीं हैं। कहीं भी कोई दुघॆटना हो, सड़क जाम आम बात हैं। वे आम लोग ही होते हैं, जो किसी दुघॆटना के बाद तमाम वाहनों में तोड़फोड़ करते हैं। आग लगा देते हैं। हड़ताल करके काम ठप कर देने वाले कमॆचारी और बाकी लोग भी खुद को आम आदमी ही कहते हैं।
कहा जा सकता है कि बिना हंगामे के अधिकारी, नेता बात ही नहीं सुनते। दुघॆटना में मृतक के परिजन, घायल को बिना हंगामा किए मुआवजा ही नहीं मिलता। बिना हड़ताल किए वेतन ही नहीं बढ़ता। हो सकता है यह बात सही हो, फिर भी एक बार यह विचार करना होगा कि पहले नेताओं अधिकारियों को आम आदमी की बातें अनसुनी करने की आदत पड़ी, या फिर पहले आम जनता को हंगामा करने की। वैसे भी अपने फायदे के लिए काम बंद कर बाकी आम जनता से अन्याय करने वाला आम कमॆचारी ऐसी उम्मीद क्यों करता है कि सरकार उसकी बेहतरी के लिए चौबीस घंटे, बारह महीने ईमानदारी से काम करती रहे। उसके अधिकारी उसके प्रति न्यायपूणॆ बने रहें। ध्यान रखें, आप किसी से उम्मीदें लगाए बैठे हैं तो आपसे भी किसी को उम्मीद है। पहले आप तय करें कि हम किसी की उम्मीदों पर तुषारापात नहीं करेंगे।
कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी। उसमें कथित रूप से पाप करने वाली एक महिला को कुछ लोग पत्थर मार रहे होते हैं। हीरो आता है और कुछ बातों के बाद कहता है कि इस महिला को अब पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो। किसी ने पत्थर नहीं मारा।
तो आप भी देख लीजिए, जो पत्थर आपके हाथ में है आप उसे चलाने लायक हैं भी या नहीं?
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
हाथ जोड़े खड़ा है हिन्दुस्तान
मेरी बातों पर यकीन नहीं हो तो एक जाति प्रमाण पत्र या एक आवासीय प्रमाण पत्र बनाने प्रखंड कार्यालय पहुंचिए। वहां का चपरासी भी आपसे बात करने की जहमत उठाना नहीं चाहेगा। अधिकारी से बात कर आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी जनतांत्रिक प्रणाली वाले देश के किसी लोकसेवक से बात कर रहे हैं। कोई आपकी सुनने को तैयार नहीं होगा। और यह स्थिति बिहार के नेपाल बार्डर से पंजाब के पाकिस्तान बार्डर तक एकरस में आप महसूस कर सकते हैं। मैंने महसूस किया है। जिला परिवहन का कार्यालय वह उत्तर प्रदेश के किसी जिले का हो या महाराष्ट्र के किसी जिले का, दलालों और बिचौलियों की फौज हर जगह समान रूप से आपका स्वागत करती मिलेगी। और शिकायत किससे करेंगे। जरा शिकायत करने वाले बड़े अधिकारियों तक पहुंचिए। भई क्या मिजाज है बादशाहों के? नवाबों के दौर के बड़े से बड़ा एय्याश तानाशाह भी शरमा जायें। बात कितनी सुनी जायेगी, यह तो जाने पर ही पता चलेगा। यह है न हैरत की बात कि एक सिस्टम का पूरा इंफ्रास्ट्रक्टर खड़ा होने के बावजूद आप दौड़ते रहते हैं, तड़पते रहते हैं, आपका काम नहीं होता। जिन्हें आपका नौकर कहा जाता है, उनके सामने पहुंचते ही आप क्या भिखारी नहीं बन जाते? और उस नौकर को इसी सिस्टम के बड़े नौकर के सामने कभी देख लीजिए, वह भी वहां आपको हाथ जोड़े कृपा की भीख मांगता ही दिख जायेगा। वह बड़ा नौकर कहीं अपने से ऊपर वाले के दरबार में खड़ा दिखा तो हाथ जोड़े ही खड़ा दिखेगा। माफी मांगता, भीख मांगता, दया की भीख।
जिस तरह से आर्थिक विकास की दर को तेज और तेज करने की प्रक्रिया चल रही है, उसके तहत देखने को यह मिल रहा है कि इस देश का अच्छा खासा ग्रेजुएट गले में टाई लगाकर व पैरों में काले जूते डालकर डोर-टू-डोर कंपेन करता चल रहा है। हम रोजगार के अवसर सृजित नहीं कर पाये, इसका खामियाजा वह चौबीसों घंटे कभी सड़क पर तो कभी दफ्तर में आपको हाथ जोड़े ही मिल जायेगा। इस पर भी तुर्रा यह कि वह भूल से भी अपने अधिकारों की बात नहीं कर सकता। किसी गुलाम मुल्क के गुलाम नागरिक जैसी हालत ही है उसकी। सरकारी हो या निजी, आप बस अड्डे पर चले जाइए। जहां सुरक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां आपको पुलिस का एक भी नुमाइंदा नहीं दिखेगा। भूल से दिख भी गया तो वह आपकी किसी हेल्प के लिए नहीं, अपनी जेब गरम करने की मशक्कत में ही जुटा दिखेगा। आप उससे तनकर कुछ भी नहीं कह सकते। वह आप पर गुर्राता है और आपकी स्थिति होती है हाथ जोड़कर खड़े भिखारियों वाली।
कहां जायेंगे आप? अस्पताल? दावे तो बहुत हैं, पर आसानी से करा लीजिए इलाज तो वीर कहे जायेंगे। सरकार के लाख प्रयास के बावजूद सरकारी अस्पतालों में नियुक्त डाक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक नहीं लगायी जा सकी। जो डाक्टर निजी प्रैक्टिस चलाते हैं, उनसे आप सरकारी अस्पताल में इलाज कराकर देखिए, आपको पुर्जा तक फेंककर दिया जायेगा, इसकी मैं गारंटी देता हूं। आपकी दशा उस डाक्टर के सामने अपने अधिकारों से लैस किसी मजबूत नागरिक की तरह नहीं होगी। आप हाथ जोड़े कलपते नजर आयेंगे, डाक्टर साहब, डाक्टर साहब करते नजर आयेंगे। इसी डाक्टर के निजी क्लिनिक पहुंचिए। आजकल तो डाक्टरों ने ब्लड प्रेशर तक की जांच तक करना छोड़ दिया है। इस काम को वे अपनी शान में गुस्ताखी समझते हैं। वहां की कोई दाई तो थर्ड ग्रे़ड का कंपाउंडर यह काम निपटा देगा। पैसा देकर भी आप कलपते नजर आयेंगे और इस रुख से आपको निजात दिलाने वाला कोई सिस्टम आपको कहीं नजर नहीं आयेगा। यह गारंटी है, नजर नहीं आयेगा। और तब आपके श्रीमुख से यदि यह निकल आये कि यह कैसी आजादी, तो मुझे धन्यवाद जरूर कीजिएगा। फिलहाल इतना ही। आजादी के सच्चे अर्थों की तलाश करती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।
सोमवार, 17 अगस्त 2009
सिफॆ भाषण देने से काम नहीं चलेगा
मेरी पिछली बातों (खुद को भी तो बदलिए) का संदभॆ लेते हुए ब्रजेश, चंद्रा एक बात स्पष्ट कर लें कि नेता, अधिकारी या व्यापारी कोई आसमान से नहीं आते। आम लोगों यानी पब्लिक के बीच से ही आते हैं। पिछली बातों से अगर यह भी साफ नहीं हो पाया कि देश, समाज और व्यवस्था सुधरे, इसके लिए क्या करें तो मैं कोशिश करता हूं कि और सहज शब्दों में बात करूं। आपके जैसा, मेरे जैसा, उनके जैसा हर आदमी सुधर जाए। भ्रष्टाचार, अनाचार और विध्वंस से तौबा कर ले तो पूरा समाज सुधरेगा, व्यवस्था सुधरेगी। बुराइयों और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सिफॆ कोसने की जगह बुराइयों को खत्म करने का प्रयास हम खुद करें, तो ही स्थिति सुधरेगी।
यह बात बहुत बार कही गई है। फिर भी कहता हूं। गली में कुछ ईंटें पड़ी हैं। एक ईंट से आपको ठोकर लगती है। आप गिर जाते हैं। आप गाली देते हैं। पता नहीं किसने ईंटें रास्ते पर फेंक दी। इतना भी शऊर नहीं है। यह कहकर आगे बढ़ जाते हैं। आपके पीछे आने वाले और भी लोग ईंट से टकराते हैं। आपका ही अनुसरण करते हैं। आगे बढ़ जाते हैं। समस्या जस की तस है। कोसने, गाली देने के बावजूद।...तो इतना तय है कि कोसने, गलियाने से समस्या दूर नहीं होती। अब कोई और व्यक्ति आता है। वह ईंटें उठाकर तरतीब से किनारे रख देता है। उसके ऐसा करते ही यह तय हो गया कि अब और आने वाले लोग उन ईंटों से नहीं टकराएंगे। मतलब समस्या दूर करने के लिए थोड़ा वक्त देना होगा। थोड़ी मेहनत करनी होगी। भाषण देने से अलग। साथ ही ..हमें क्या मतलब का भाव त्यागना होगा।
मान लें आपको किसी सरकारी दफ्तर में काम है। वक्त लग रहा है। आप समथॆ हैं। दफ्तर के कलकॆ को कुछ पैसे देते हैं। आपका काम हो जाता है। इसके बाद भी देश, समाज में फैले भ्रष्टाचार पर आप लंबा-चौड़ा व्याख्यान देंगे। अधिकारियों, नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएंगे। मन नहीं भरा तो देश की आजादी को बेमानी ठहराएंगे। ...क्या कहने की जरूरत है कि सवॆत्र व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए आप या कोई और घूस देकर काम करवाने वाला भी जिम्मेदार है? सोचें जरा, हर आदमी रिश्वत देना बंद कर दे तो भी क्या रिश्वतखोरी जारी रहेगी? क्या सरकारी बाबू, अधिकारी काम करना ही बंद कर देंगे? रिश्वत देना बंद कर दिया जाए तो भी काम होंगे। कुछ दिनों तक का संक्रमण काल हो सकता है। निश्चित रूप से यहां ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा कि केवल मेरे घूस नहीं देने से क्या होगा। वो गाना याद है..मिले जो कड़ी-कड़ी, एक-एक जंजीर बने...। (शायद ऐसा ही कुछ)
मिलावटखोरी बड़ी समस्या है। सब इससे त्रस्त हैं। मसाले में भी मिलावत होती है। मसाले में मिलावट करने वालों को वह भी गाली देता है, जो रोज दूध में पानी मिलाकर बेचता है। और मसाले में मिलावट करने वाला पतला दूध देखकर, पीकर पानी मिलाने वालों को गलियाता होगा। ...यह सिफॆ यह बताने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार की जड़ें यही हैं। हमारे आपके आसपास। हमें मिलावटी मसाला नहीं खाना है तो दूध में पानी मिलाना भी बंद करें। केवल मसाले में मिलावट करने वालों को गलियाने से काम नहीं चलेगा।....जरा यह भी तय करें कि इस मामले में सरकार कितनी गैरजरूरी है।
बात खत्म नहीं हुई है। संभव हुआ तो इस चरचा को जारी रखना चाहूंगा।
संबोधन से उलझा आजादी का अर्थ
रविवार, 16 अगस्त 2009
खुद को भी तो बदलिए
मुझे लगता है कि हमारे देश की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। हम हर परेशानी, समस्या आफत के लिए किसी को कोस कर मुक्त हो जाते हैं। समस्या दूर हो, खत्म हो, इसके लिए प्रयास नहीं करते। गांव-देहात से लेकर शहर तक जहां देखिए लोग व्यवस्था और शासन-प्रशासन को गरियाते नजर आएंगे। बिजली-पानी नहीं है तो नेता दोषी। हत्या हुई, लूट हुई तो सरकार दोषी। हर समस्या, हर गलत बात के लिए किसी को कोसो और चुपचाप सो जाओ। ऐसा करके हम तो अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लिए। देश, समाज के लिए अब हमें कुछ नहीं करना। यह समस्या का सरलीकरण है। शासन-प्रशासन के किए हर गलत-सही का असर पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए इनके प्रति आशंकित रहना, इन पर नजर रखना और अच्छे-बुरे पर हंगामा करना, इनमें से कुछ भी गलत नहीं है। लोकतंत्र का मतलब भी यही है।
शासन-प्रशासन से अलग हटकर देखें हमारे-आपके स्तर पर ही न जाने कितनी गड़बड़ियां हैं। खुद को टटोलकर इन्हें दूर करने की हम कितनी कोशिश करते हैं। आखिर जिन नेताओं की करतूतों पर हम उन्हें गाली देते हैं, वे भी तो हमारे ही समाज से आते हैं। घूस देकर बच्चों को नौकरी दिलवाकर योग्य का हक मारने, खाद्य पदार्थों में मिलावट कर समाज को जहर खिलाने-पिलाने वाले लोग क्या केवल नेता ही हैं? दूध में पानी मिलाने, जैसे भी हो, एन-केन-प्रकारेण बच्चों का स्कूल और कालेज में एडमिशन करवाने को जब हम मान्यता देंगे तो भविष्य में इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे, हम यह मानकर क्यों न चलें? जिसे जहां मौका मिलता है, अनुशासन और नियम तोड़ता है। और फिर हम ...इतना तो चलता है, मानकर आंख मूंद लेते हैं। भ्रष्टाचार छोटा चलेगा, बड़ा नहीं, ऐसा हो सकता है क्या?
नेताओं के अवसरवाद को कोसने वाले पूरे समाज में पैठ बना चुके अवसरवाद को कोसें, तभी बात बनेगी। चंद हजार रुपयों के लिए देश छोडऩे वाले, संस्थान छोडऩे वालों को तो हम तरक्कीपसंद मानते हैं, लेकिन कोई नेता अपनी बेहतरी के लिए दल छोड़ता है, साथी छोड़ता है तो उसे गाली देते हैं। दोनों तरह के अवसरवाद के नतीजे छोटे-बड़े हो सकते हैं, अर्थ तो नहीं बदलते! समाज में अंतिम पायदान तक जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार और अवसरवाद को हम भ्रष्टाचार और अवसरवाद मानना ही नहीं चाहते। जब मानते ही नहीं तो उस पर भला कोई हंगामा क्यों करेगा, उसे रोकने के उपाय क्यों करेगा? रोकने के उपाय नहीं होंगे तो ये फले-फूलेंगे। फल-फूलकर ये जब बड़े नतीजे देते हैं तो हमें दिक्कत होती है। इतना तो चलता है...न जाने कब ..सब चलता है, में बदल जाए!
सीधी सी बात है, नेताओं के अवसरवाद और भ्रष्टाचार पर रोकर कर्तव्य को पूरा हुआ मान लेने से काम नहीं चलेगा। कमर इस बात के लिए भी कसें कि जहां इसके बीज डाले जाते हैं, वहां भी पहरेदारी हो। अन्यथा दूसरा सहज रास्ता यह है कि जिस तरह हमने समाज में फैले कथित छोटे- छोटे भ्रष्टाचार को सहज मान लिया है, उसी तरह बड़े पैमाने पर होने वाले बड़े भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लें। जाहिर है, दूसरा रास्ता खतरनाक है। बताने की जरूरत नहीं कि बेहतर लोकतंत्र के लिए बेहतर नागरिक भी चाहिए। लेकिन एक नागरिक के रूप में हर कोई...हम नहीं बदलेंगे, का झंडा बुलंद किए हुए है और उम्मीद करते हैं कि हमारे नेता साफ-सुथरे और हमारी चिंता करने वाले हों। हम खुद पान खाकर आफिस और घर की दीवारों पर थूकेंगे लेकिन कल्पना करेंगे सजे-संवरे देश और शहर की। अपना कूड़ा सड़क और पार्क के किनारे फेंकेंगे और गंदगी की समस्या के लिए अधिकारियों को कोसेंगे।
आपका नेतृत्व करने वाले ये लोग उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां सरकारी दफ्तरों में एक फाइल को कर्मचारी और अधिकारी महीनों लटकाते हैं। वे लोग आप जैसे लोगों के बीच से ही हैं, जो इन दफ्तरों में जाकर घूस देकर अपना काम करवा आते हैं और उसे गलत भी नहीं मानते। ज्यादा हुआ तो घर आकर कर्मचारियों-अधिकारियों को बुरा-भला कहकर गुस्सा निकाल लिया। बात फिर वहीं है। सिर्फ इतने से काम नहीं चलेगा। बेहतर नेतृत्व और बेहतर देश चाहते हैं तो बदलना खुद को भी होगा। इसके लिए अपने आप को तैयार करें।
कभी जंग-ए-आजादी, आज जश्न-ए-आजादी
आप खुद को शरीफ शहरी मान लीजिए। अब आप निकले हैं बाजार। आप नसीब वाले भी हैं। मान लेते हैं कि आपका साबका किसी गुंडे-बदमाश से नहीं पड़ा। एक छोटी सी घटना पेश आयी। बाजार की भीड़ में आपका मोबाइल फोन कहीं गिर गया। आपके लिए सबसे पहला काम इसकी रपट थाने में लिखवाना होगा। जाइए थाने, मेरे आग्रह पर ही सही जाइए थाने। मेरी गारंटी है कि आप रपट नहीं लिखवा सकते। पहले तो कोई बात नहीं सुनेगा। सुनेगा भी तो पचीस फच्चर। कोर्ट जाइए, एफेडेबिट कराइए, फिर आइए, फिर आइए, बड़ा बाबू (थानेदार) नहीं हैं, वही फैसला लेंगे। और आपने जरा सा सूंघाया (हरा पत्ता) कि काम दनादन, दामाद जैसी आवभवत। पूरे तामझाम और एकाध दो दिन खराब करने के बीच आपको लग जायेगा कि आप किसी आजाद मुल्क के जनकल्याणकारी व्यवस्था के बीच सांसें नहीं ले रहे हैं। यदि किसी ने बाजार में आपको तमाचा खींच दिया और उसकी शिकायत करने, इंसाफ मांगने आप थाने पहुंच गये तो फिर माफ कीजिए, वहां आपके साथ जो सलूक होगा, उसका अनुभव आप ही कर सकते हैं। मेरा तो अनुभव है कि कोई तमाचा मार दे तो उसे पूज्य बापू को याद करते बर्दाश्त कर जाइए, पर थाने न जाइए। तमाचा तो आप खा ही चुके हैं, फजीहत और जेब की लूट भी वहां जज्ब करने होंगे , इसकी गारंटी देता हूं।और तब मेरी गारंटी है कि आपके जेहन में सिर्फ एक ही सवाल तूफान बनकर गुजरेगा- क्या यही है आजादी?? आजादी के अर्थ, सच्चे अर्थ को समझने की कोशिश का १४ अगस्त से शुरू सिलसिला अभी जारी रहेगा। फिलहाल इतना ही। इस बीच आपके सुझावों का स्वागत होगा। धन्यवाद।
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
कहां है आजादी??
एक ऐसे बोर सब्जेक्ट पर लिखने को जी मचला है , जिसे मुद्दा बनाकर आज हर ओर हर कोई लिख रहा है। लिख रहा है और पूछता चल रहा है कि क्या लिखा है, वाह। मेरा यह लेख आपकी किसी वाह सुनने का मोहताज नहीं। यह पत्थर है, जो तबीयत से उछाला जा रहा है, शायद कहीं कोई सुराख पैदा हो जाय।
आजादी। बड़ा प्यारा नाम। दीवाना बना देने वाला, दिमाग को घूमाकर रख देने वाला भी। मगर यह कहां है? सवाल यह है। आइए, उन दो-चार सवालों से हम-आप इस पंद्रह अगस्त के बहाने रूबरू हो लें। आजादी-आजादी का माला तो हम फेर रहे हैं, पर कहां है आजादी, जरा इस पर गौर कर लें।
आजादी कहां है? उन गरीब की झोपड़ियों में जहां भूख-बीमारी-भय से दिन-रात, सुबह-शाम मशक्कत चल रही है? उन मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा लोगों के घरों में जहां अपराधियों की तो छोड़िये कानून-व्यवस्था के रखवालों तक का भय चल रहा है? उन किसान परिवारों में जो कर्ज तले दबकर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं या सुखाड़ व बाढ़ की चक्की में पिसकर राहत को भी मोहताज हो गये हैं? या उन अमीर घरानों में जहां पैसा पानी की तरह बह रहा है और आजाद मुल्क का हर कुनबा जहां हाथ जोड़े खड़ा है? उन पार्कों में जहां घुसते ही हिदायतें मिलनी शुरू हो जाती है, सिगरेट न पीयें, पान न खायें, फूल न छूएं-न तोड़ें? उन बस अड्डों पर जहां बस के आने-जाने के बारे में पूछना भी गुनाह समझा जाता है? उन रेलवे स्टेशनों पर जहां थूकना भी मना हो चुका है, यहां न थूकें-वहां न थूकें, लेकिन कहां थूकें, यह नहीं बताया जाता? उन स्कूलों में जहां पढ़ने के लिए नाम लिखाना भी एक जहमत भरा काम हो चुका है? उन प्राइवेट संस्थानों में जहां आठ घंटे काम करने या कराने की बात दम तोड़ चुकी है और चौबीस घंटों का शोषण चल रहा है? उन सरकारी संस्थानों में जहां रिश्वत सूंघाये बिना कोई फाइल आगे नहीं बढ़ रही, चहेते लगातार प्रोन्नति पाते जा रहे हों और काम करने वालों का वेतन तक रोक दिया जा रहा हो? उन सरकारी अस्पतालों में जहां मरीज कुत्ते समझे जाते हों? उन निजी नर्सिंग होमों में जहां के डाक्टर फीस के दस-पांच रुपये कम होने से इलाज से ही इनकार कर देते हों?
उफ् कहां है आजादी? बोलने की आजादी है? क्या कहीं भी कुछ भी बोला जा सकता है? अपने मन से काम करने की आजादी है? क्या आप अपनी योग्यता के अनुसार इस देश में काम ढूंढने और उस काम के लिए खुद को मुकर्रर करने को आजाद हैं? बच्चा जन्म लेता है, उसका नाम तक उसकी इच्छा के बगैर रखा जाता है। वह क्या करना चाहता है, यह कभी उससे नहीं पूछा जाता। स्कूल-कालेजों से सफर करता वह दफ्तरों-दुकानों तक पहुंच जाता है और हर जगह उस पर शासन करने वाले, उस पर नियंत्रण करने वालों की कतार खड़ी दिखती है, क्या यही है आजादी? नेतागीरी करने वाले तक क्या आजाद हैं? कोई मनमोहन, कोई जार्ज तक कठपुतलियों की तरह किसी सोनिया तो किसी नीतीश-शरद के इशारों पर नाचते दिखते हैं तो नेताओं के लिए भी क्या आजादी है? देश आज स्वतंत्रता की ६२वीं सालगिरह मना रहा है। ऐसे मौके पर आजादी के अर्थ, सच्चे अर्थ को समझने की कोशिश का यह सिलसिला जो शुरू किया गया है, वह अभी जारी रहेगा। फिलहाल इतना ही। इस बीच सुझावों का स्वागत होगा। धन्यवाद।
रविवार, 26 जुलाई 2009
कारगिल शहीदों, हमें माफ करना
सपना ही है शहीद प्रमोद हाईस्कूल
मुजफ्फरपुर जिले में कुढऩी प्रखंड की माधोपुर-सुस्ता पंचायत के माधोपुर निवासी शहीद प्रमोद कुमार की शहादत के बाद श्रद्धा के फूल चढ़ाने आयीं तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने जो घोषणाएं कीं, उनमें से कई अभी पूरी नहीं हुई हैं। माधोपुर मध्य विद्यालय को उच्च विद्यालय में उत्क्रमित करने के साथ उसका नाम शहीद प्रमोद के नाम पर करने की घोषणा आज तक अमल में नहीं आ पायी। माधोपुर चौक तक जाने वाली सड़क का नाम शहीद प्रमोद पथ नहीं हो पाया। शहीद के परिजन खेती योग्य पांच एकड़ व शहरी क्षेत्र में साढ़े 12 डिसमिल जमीन से भी वंचित है। माधोपुर चौक पर शहीद की प्रतिमा भी नहीं लग सकी।
शहीद अरविंद के नाम स्मारक तक नहीं बना
पू.चंपारण के रामगढ़वा प्रखंड क्षेत्र का भटिया गांव अब कारगिल शहीद अरविंद पांडेय के गांव के नाम से जाना जाता है। कारगिल में तैनात चंपारण का यह वीर सपूत कांस्टेबल अरविंद 29 मई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुआ। यहां लोगों को अरविंद के शहीद होने पर फक्र है, पर इस बात का मलाल भी है कि गांव के प्रवेश द्वार पर उसके नाम से स्मारक बनाने की घोषणा आज तक पूरी नहीं हुई।
भुला दिये गये शहीद ले.अमित
कारगिल में शहीद समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड के महमद्दा पंचायत के ले. अमित सिंह को सरकारी स्तर से भुला-सा दिया गया। इलाके में न तो सरकार द्वारा उनकी स्मृति में अब तक कोई सड़क का नामकरण किया गया है, न ही कोई उद्यान-विहार का निर्माण ही हो सका है।
प्रतिमा के लिए जगह तक नहीं
दरभंगा में बेनीपुर अनुमंडल का हरिपुर गांव। यहां के दो सपूतों ने देश की रक्षा में अपनी कुर्बानी दी है। स्व. भोला झा के पुत्र सीआरपीएफ जवान महाकांत झा कारगिल युद्ध में तैनात हुए तो उनका पार्थिव शरीर ही लौटा। सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि तो की गयी, पर उनकी स्मृति को संजोने के लिए कुछ खास नहीं हो सका। गांव वालों को मलाल है कि उनके गांव के दो-दो सपूत देश के काम आये पर प्रशासन गांव की ओर रुख नहीं करता। परिजनों को मलाल है कि अन्य सुविधाएं तो दूर, प्रतिमा लगाने के लिए सरकार जमीन भी मुहैया नहीं करा सकी।
मिट रहीं शहीद की यादें
शिवहर में पुरनहिया प्रखंड का बखार चंडिहा इतिहास के पन्नों में भले कारगिल के अमर शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी के गांव के रूप में दर्ज हो चुका है, पर यहां ऐसा कोई निशान नहीं दिखता, जिससे आने वाली पीढ़ी अमर शहीद के गांव के रूप में इसकी पहचान कर सके। पत्नी वंदना द्विवेदी को मलाल है कि उनके पति को लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नति के बावजूद मेजर पद का ही लाभ मिला। शहीद का स्मारक कराह रहा है। तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने शहीद के गांव, सड़क, स्कूल, सामुदायिक भवन आदि का नाम शहीद के नाम पर किये जाने की घोषणा की थी, जो एक दशक बाद भी पूरा नहीं हो सकी है।
इस हाल पर हम तो यही कह सकते हैं कि कारगिल शहीदों, हमें माफ करना।
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
क्या इस बार फंसेंगे लालू?
सवाल यह उठता है कि चारा घोटाले में बुरी तरह फंसे लालू तभी बचे चल रहे थे, जब दिल्ली पहुंचकर उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा था। कहने वाले तो कहते हैं कि उनकी मति मारी गयी थी, जो चुनाव के दौरान वे कांग्रेस के खिलाफ हो गये। उनके समर्थकों को भी उनकी चाल समझ में नहीं आयी थी। नतीजा सामने है। अब ऐसा लगता है कि लालू के खिलाफ कांग्रेस ने अपने सारे घोड़े खुले छोड़ दिये हैं। ममता का श्वेत पत्र लाना इसी कार्रवाई का अगला कदम माना जाता है। हालांकि, लालू पर कोई आंच आयी तो उसकी लपटों से कांग्रेस भी अछूती नहीं रह पायेगी, क्योंकि लालू कांग्रेस गठबंधन के ही मंत्री थे। पर, उनके खिलाफ अब फिर से जिस तरह मजबूत आरोपों का सिलसिला चल पड़ा है, उसे देखकर क्या यह कहा जा सकता है कि लालू इस बार फंस जायेंगे? राजनीति के इस माहिर खिलाड़ी की अगली चाल अब कौन सी होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
बुधवार, 22 जुलाई 2009
ट्यूबवेल पानी न उगले, दोष किसका नीतीश जी?
नीतीश जी, बुधवार को विधानसभा में लघु जल संसाधन मंत्री दिनेश प्रसाद कुशवाहा ने सूखे से निपटने में कारगर यंत्र ट्यूबवेलों की जो तस्वीर पेश की, उससे आपकी सरकार की भी क्या लापरवाही उजागर नहीं होती है? कुशवाहा द्वारा पेश आंकड़ों को फिर से यहां रखना चाहूंगा। उनके मुताबिक सूबे के 5147 ट्यूबवेलों में से सिर्फ 1719 ही कार्यरत हैं। यानी सूबे में खेतों की प्यास बुझाने के लिए लगाये गये दो-तिहाई नलकूप ठप हैं, इसे सरकार ने भी मान लिया। जब सूखा गहरा गया, बिचड़े सूख गये, तब ट्यूबवेलों का हिसाब-किताब लिया जा रहा है, यह भी क्या कम त्रासद है? नीतीश जी, इन ट्यूबवेलों की जर्जरता आपकी सरकार के चौथे साल पूरे हो जाने के बाद भी बरकरार है। ऐसा क्यों है, सवाल यह है। कुशवाहा जी की तरह आप भी कह सकते हैं कि अधिकतर ट्यूबवेल 1955-56, 1964-65 और 1973-74 के बीच के लगे हैं। पर, क्या जनता इस जवाब को मान ले?
मुख्यमंत्री जी, अब सूखे से निपटने के लिए आकस्मिक योजना बनाने और रोजाना अनुश्रवण होने का दावा किया जा रहा है। मंत्री ने ही बताया कि मौसम के मिजाज को देखते हुए सरकार 1119 ट्यूबवेलों को चालू करने की योजना पर काम कर रही है। सौ को चालू बताया गया, जबकि सौ के पुनर्स्थापन का काम प्रगति पर होने का दावा किया गया। 919 के लिए सरकार ने नाबार्ड से मदद मांगी है। विद्युत दोष से बंद ट्यूबवेलों को चालू करने के लिए प्रत्येक दिन मुख्य सचिव, विभागीय सचिव और विद्युत बोर्ड के चेयरमैन की बैठक होने का दावा किया गया। मोटर जलने पर उसे तत्काल बदल दिया जाय, इसके लिए हर जिले में पांच-पांच अतिरिक्त मोटर का इंतजाम किया गया है। जहां नाली खराब हो गयी है, उसे दुरुस्त करने के लिए हर ट्यूबवेल को 20-20 हजार रुपये दिये जाने की बात कही गयी है।
सवाल यह उठता है मुख्यमंत्री जी कि ट्यूबवेलों की खोजबीन और प्रयास को लेकर यह सरकारी मशक्कत जुलाई के तीसरे हफ्ते (खत्म होते श्रावण महीने) में क्यों हो रही है? किसानों के अस्सी फीसदी बिचड़े जल चुके हैं। धान की आच्छादन दर सिमट चुकी है। एक तो रोपनी के लिए बिचड़े नहीं दिखते, दूसरे जिन्होंने लेट बिचड़े गिराये, वे भी निराशा की स्थिति में पहुंच चुके हैं। ऐसे में यह सरकारी प्रयास किसानों को कितना लाभ पहुंचा पायेगा, सवाल यह है? कुल मिलाकर इस बार की खरीफ फसल तो मारी ही गयी न? आसमान छूती महंगाई और बढ़ती गरीबी के बीच खरीफ फसलों का मारा जाना प्रदेश में कितनी बड़ी वाही-तबाही का कारण बनेगा, सवाल यह भी है? इस पर भी अभी से ही विचार करने की जरूरत है। सवाल यह है कि आने वाली तबाही पर कब विचार होगा? क्या तब, जब तबाही आकर गुजर जायेगी? ट्यूबवेलों की जर्जरता पर हो रहे विचार की तरह? ध्यान देने की बात यह भी है नीतीश जी कि तब तक प्रदेश में विधान सभा चुनाव भी आ जायेगा और लोग भी हिसाब-किताब में जुट जायेंगे। आपके चिर प्रतिद्वंद्वी लालू जी और रामविलास जी भी गलबहिया कर अब बिहार में ही मटरगश्ती कर रहे हैं, ख्याल इसका भी कीजिए।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2009
ममता दी, आतंकी मामलों पर बजट चुप क्यों?
ममता दीदी को याद दिलाना चाहूंगा कि देश के छोटे-छोटे जंक्शनों की तो बात दूर, मेट्रोपोलिटन शहरों नयी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता तक के रेलवे स्टेशनों पर बिना टिकट घुसना आम है और इस पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सका है। यहां तक कि बड़े रेलवे स्टेशनों की चारों तरफ पुख्ता चहारदीवारी तक नहीं बनायी जा सकी है। इतना ही नहीं, सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम के तहत बड़े रेलवे स्टेशनों के सभी प्रवेश द्वारों पर स्कैनर लगाने थे, जो नहीं लगाये जा सके हैं। उम्मीद थी कि सुरक्षा के इन छोटे-छोटे बिंदुओं पर ग्रास रूट से राजनीति के शिखर पर पहुंचने वाली ममता दीदी का ध्यान जाता और इसके लिए रेल बजट में प्रावधान किया जाता, पर ऐसा नहीं हो सका। सुरक्षा के इन छोटे-छोटे, पर महत्वपूर्ण कदमों के बारे में रेलवे बजट पूरी तरह चुप है। इन सभी खामियों के बावजूद ममता दीदी ने बजट भाषण में यात्रियों को रेल से लेकर स्टेशन और उसके बाहर तक की सुरक्षा का दावा किया है। यह सुरक्षा कैसे होगी और इसके लिए धन कहां से आयेंगे, इसका शुक्रवार को संसद में पेश बजट कोई जवाब नहीं दे पाता। फिलहाल, इस मुद्दे को एक सवाल के रूप में ममता दीदी के समक्ष तो रखा ही जा सकता है कि आखिर आतंकी मामलों पर रेल बजट चुप क्यों है?
मंगलवार, 19 मई 2009
सब कुछ गंवा के होश में आये तो क्या हुआ
सवाल यह नहीं है कि उन्होंने क्या किया और उनके किये का उन्हें जो फल मिला वह अच्छा हुआ या खराब? बल्कि, सवाल दूसरा पैदा हो गया है। यह उनके बदले सुर से भी प्रतिध्वनित हो रहा है। लालू कहा करते थे कि हम मूंज के झूर (ऐसी झाड़ी, जिसके पत्ते धारदार होते हैं) हैं, जो हमें उखाड़ने आयेगा उसका गत्तर-गत्तर (अंग-अंग) कटा (कट) जायेगा। उसी दौरान बाद में नीतीश बोलते नजर आये थे कि हम इस मूंज को काटने या उखाड़ने नहीं जायेंगे, बल्कि इसकी जड़ में मट्ठा झोंक देंगे और पूरे झूर को जला देंगे। गुजरते समय के साथ जब राजनीति बदली और सूबे की सत्ता बदली तो जिस तरह से नीतीश ने विकास और दलित-महादलित कार्ड पर काम करना शुरू किया और अबकी जो चुनाव परिणाम आये, उससे तो यही लगता है कि मूंज के झूर में मट्ठा झोंका जा चुका है।
जब मतलबी गलबहियां ने कांग्रेस को दुलत्ती मारी तो कांग्रेस ने भी हौसला बुलंद करते लड़ाई के लिए ताल ठोंक दी। वोटरों को विकल्प मिला और इसी दौरान मुस्लिम जनाधार पाला बदलता दिखा। गलबहियां गठबंधन के सिरमौर लालू ने आनन-फानन में बयान का मटका फोड़ा कि बाबरी मस्जिद के ढहाने में कांग्रेस का ही हाथ था। मगर, यह भी काम न आया। जो जनाधार दरक चुका था, वह दोबारा पाले में नहीं आया। काका हाथरसी की कविता याद आती है- जो उड़ गयी जवानी, उसको बुलायें कैसे, जो जुड़ गया बुढ़ापा उसको छुड़ायें कैसे ....? सवाल यह हो गया है कि २००५ के विधानसभा चुनाव से जनाधार टूटने का जो सिलसिला शुरू हुआ और जो इस बार २००९ के आम चुनाव में परवान पकड़ गया, उसे आने वाले दिनों में कैसे काबू किया जा सकेगा? क्या यह संभव हो पायेगा, वह भी तब, जब देश में मजबूत इरादे करवट ले चुके हों, अपराधी तत्व सिरे से खारिज किये जा चुके हों और नये तेवर में सरकार बनाने का कांग्रेसी मिजाज जगजाहिर हो चुका हो?
रामविलास २००५ के विधानसभा चुनाव में पूरे सूबे में लालू विरोध में मोर्चा खोले हुए थे। कहते चल रहे थे कि जहर खा लूंगा, मगर लालू का साथ नहीं दूंगा। मगर, वे आम चुनाव में लालू के कसीदे काढ़ने लगे, उनकी मोहब्बत के तराने गाने लगे। यानी जो भीतर था, वह खुलकर दिखाने लगे। समझा था, भोले-भाले लोगों का क्या है, जो बोलूंगा, मानेंगे। अब लोगों को क्या कीजिएगा? जो कभी रिकार्ड वोटों से जीता कर भेजते थे, उसी ने मुंह की पलटी खिला दी। सूपड़ा साफ। सूबे में लोजपा को एक भी सीट नहीं। अब कांग्रेस को क्या बार्गेन कर पाइएगा, चार के कुनबे में सिमटे लालू ही बात सुन लें तो बड़ी बात होगी। उस पर से हद यह कि रामविलास जी कांग्रेस, यूपीए के साथ-साथ लालू चालीसा का भी अब तक पाठ दोहरा रहे हैं। अभी उनके इस बयान पर कि अगला चुनाव भी राजद के साथ ही लड़ेंगे, चारों ओर हास्य का ही माहौल बना हुआ है। कई लोगों ने मजाक में ही यह कहना शुरू कर दिया है कि यह बयान देने से पहले लालू से पूछा था क्या? लालू आपके साथ लड़ेंगे तब न?
दरअसल, केन्द्र में सरकार बनाने का दावा करने वालों की कलई खुल चुकी है, रंग उतर चुका है। कैबिनेट की बैठक में भी जाने की हिम्मत गंवा बैठे ये बड़बोले और हमेशा मतलब साधने वाले राजनेता अब बोलते चल रहे हैं कि बेइज्जती हो रही है। आखिर आपने किसकी इज्जत की, जिससे प्रत्युत्तर में उससे इज्जत पाने की बात कर रहे हैं। अपने अंजाम तक तो देखने की आप हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं और कर रहे हैं इज्जत की बात। अंजाम क्या है? बिहार के एक आम नागरिक की बात सुनिये, वह कहता है- बस, हो गया। सूबे से लालू-रामविलास की राजनीति अब खत्म। पूछा-क्यों, कैसे? नागरिक का कहना था - युवा वोटरों वाले देश में, विकास की लहर वाले प्रदेश में क्या है इनके पास बोलने लायक जो आगे बोलेंगे, क्या है इनके पास करने लायक, जो आगे करेंगे? जिस भूल की वे बात कर रहे हैं, वह भूल बुरा अंजाम प्राप्त करने के बाद समझ में आ रही है? नागरिक का साफ-साफ कहना था- सब कुछ गंवा कर होश में आये तो क्या हुआ?
गुरुवार, 7 मई 2009
राहुल का बयान, सन्नाटे में लालू
राहुल का बयान था ही कुछ ऐसा कि अच्छे-अच्छे के सामने सन्नाटा खिंच गया। उनकी बातों में चुनाव बाद सरकार के गठन की रणनीति के साफ संकेत दिख रहे थे। दरअसल कांग्रेस में इस वक्त राहुल गांधी की हैसियत काफी दिलचस्प और मजबूत समझी जा सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पार्टी और रणनीति के मसले पर कोई खास दिलचस्पी नहीं लेते, न ही कोई टिप्पणी देते हैं, जबकि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी इस प्रकार का खुला बयान देने से सदा परहेज करती हैं। ऐसे में कांग्रेस में पीएम इन वेटिंग समझे जाने वाले राहुल गांधी जब कुछ बोलते हैं तो उस बात का बड़ा मायने हो जाता है। अपने क्रियाकलापों से उन्होंने अब तक गंभीर छवि का प्रदर्शन किया है और इसी के मद्देनजर कोई गंभीर व्यक्ति उनके बयान को व्यक्तिगत और बचकाना समझने की गलती नहीं कर सकता।
तो क्या यह साफ हो गया है कि चुनाव के बाद सरकार बनाने की नौबत आयी तो कांग्रेस के साथ जदयू होगा? जदयू होगा तो यह तो साफ है कि लालू नहीं होंगे। तो क्या कांग्रेस को जदयू की ओर से चुनाव बाद सरकार बनाने के लिए मदद का मजबूत आश्वासन मिल चुका है? हालांकि, नीतीश कुमार ने मजबूती से इसका खंडन किया है और जदयू-भाजपा गठबंधन को मजबूत बताया है, पर जानकार जानते हैं कि यह राजनैतिक चोंचले हैं, जो वक्त-वेवक्त बदल जाते हैं। ऐसे भी विकास और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आज भी कांग्रेस एकमात्र आम ग्राह्य पार्टी की छवि में है। इस पार्टी ने यह भी दिखाया है कि गठबंधन सरकार कैसे अपना कार्यकाल पूरा करती है। ऐसे में नीतीश के बयान के बाद भी यदि जदयू से कांग्रेस का तालमेल हुआ तो शायद ही किसी को आपत्ति हो। व्यक्तिगत रूप से अब तक मेरी जितने लोगों से बात हुई है, उनका यही कहना था कि जदयू को कांग्रेस से तालमेल करना ही चाहिए। यह पार्टी हित के साथ-साथ देश औऱ सूबे के हित में ही होगा।
ऐसा माना जाता है कि राहुल गांधी के बयान के बाद जिस संभावना की तस्वीर बनती है, उसका स्वरूप वास्तव में अगर आकार पा गया और सही मायने में कांग्रेस की जदयू से तालमेल कर सरकार बनी तो यह बिहार की राजनीति करने वाले कम से कम लालू प्रसाद यादव के लिए बेचैनी की बात होगी। वह भी उस हालत में जब रामविलास जी के बारे में तीर-तुक्के लग रहे हों। दरअसल, लालू के लिए आगे का वक्त अकेले सफर वाला ही बन रहा है, क्योंकि भाजपा जैसी दूसरे नंबर की राष्ट्रीय पार्टी से इनके गठबंधन की दूर-दूर तक संभावना जो नहीं दिखती। तो सूबे में आगे की राजनीति काफी भारी होगी, लालू के लिए खतरा इसका हो गया है। ईश्वर न करें, ये चुनाव हारें, पर जीत भी गये तो बदली परिस्थितियों में वह उनके लिए बेमानी ही हो जायेगी। बिल्कुल निर्दलीय जैसी ही तो हालत होगी उनकी? तो जब इतनी बातें वातावरण में तैर रही हों तो कैसे न हों लालू बेचैन? क्यों न बदल जाये उनका स्वाभाविक अंदाज? क्यों न मचे सन्नाटा। वैसे मतदान का चौथा चरण गुरुवार को सूबे में शांति से गुजरा, इसके लिए जनता के साथ-साथ अपने नेतागण भी बधाई के पात्र हैं, वर्ना तो हारने पर प्रलय मचने और मचाने तक की धमकी की अवधि अभी खत्म नहीं हुई है। द ग्रेट इंडियन तमाशा ऊर्फ महासंग्राम ऊर्फ आम चुनावपर चर्चा अभी जारी रहेगी।
रविवार, 3 मई 2009
लालू मचायेंगे प्रलय, उन पर कार्रवाई कौन करेगा?
लालू को सुनना जिन्हें दिलचस्प लगता होगा, उन्हें तो वाकई मजा आया होगा। हंसी फूटी होगी कि वाह, लालू ने क्या बोला है इस बार। मगर, लालू हंसी खेल में ही बड़ी-बड़ी बातें बोल जाते हैं, इसे सभी जानते हैं। चारा घोटाला के दौरान जब उन्होंने कहा था कि वे जेल गये तो वहीं से बिहार की सत्ता संभालेंगे तो लोगों ने हंसा था, मजाक उड़ाया था। मगर, उनके जेल जाते ही राबड़ी देवी जैसे ही गद्दी पर बैठीं, लोगों को लालू की बातों की गंभीरता समझ में आ गयी। अब लालू ने कहा है कि वे चुनाव हारे तो प्रलय आ जायेगा तो इसका भी बड़ा मतलब है। लोग भले हंस लें, पर इसका मतलब तो निकलेगा जरूर। क्या निकलेगा, यह उनके चुनाव हारने के बाद ही पता चल पायेगा। लोकतंत्र के मसीहा कहे जाने वाले लोग इससे पहले उनकी बातों का मतलब निकाल लें तो और बात होगी।
अगली बात। अभी थोड़े दिनों पहले इसी ग्रेट इंडियन तमाशे के दौरान वरुण गांधी ने कुछ उल-जुलूल बक दिया था और वह न केवल जेल चले गये, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन पर रासुका तक लगा दिया। यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन था। अब लालू जो बोल रहे हैं, उसे आयोग किस तरह ले रहा है? क्या यह आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? वे इस बार के चुनाव में दो जगहों से मैदान में हैं। सारण में मतदान हो चुका है, जबकि पटना में चौथे चरण में मतदान होना है। सारण में मतदान समाप्त होने के बाद से ही यह चर्चा आम है कि लालू हारेंगे। चर्चा निश्चित रूप से लालू के पास भी पहुंची होगी। उन्होंने भी आकलन किया होगा। अब उनका घबराना यही बता रहा है कि उन्हें भी अपनी हार का अहसास हो रहा है। तो पटना सीट बचाने की मशक्कत अब उनके लिए वक्त की जरूरत बन गयी है। बताया जाता है कि पटना से भी लालू को तगड़ी टक्कर मिल रही है। ऐसे में ही उनका बयान आया है कि वे हारे तो प्रलय मच जायेगा। यह सरासर धमकी है। पर, वे धमकी किसे दे रहे हैं, यह समझने की जरूरत है। समझने की जरूरत यह भी है कि वे यह धमकी दे कैसे पा रहे हैं?
लोगों को याद होगा, एक केजे राव ने ठान लिया तो बिहार के चुनावों में चूं-चटाक तक नहीं हुआ था। पत्ता तक नहीं खड़का था। लालू को याद होगा कि एक यूएन विश्वास ने ठान लिया था तो चारा घोटाला की सारी परतें अपने आप खुलती चली गयी थीं और यही लालू जेल पहुंच गये थे। एक भरे-पूरे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक लालू पूरे सिस्टम को चैलेंज नहीं कर सकते। समाज को धमकी नहीं दे सकते। लालू भले कहते रहें कि उनके हारने से प्रलय आ जायेगा, मगर वे मान लें कि कोई प्रलय नहीं आयेगा। समाज जब जागता है तो अच्छे-अच्छों को किनारे लगा देता है। लेकिन, यह तो बाद की बात है। ताजा मसला यह है कि जब देश के बड़े-बड़े दिग्गज आचार संहिता की मार से थर्राये चल रहे हैं, शब्दों और बातों तक से किनाराकशी किये घूम रहे हैं, वैसे में लालू की जुबां आग पर आग कैसे उगल पा रही है? उनके मन जो आ रहा है, बोले जा रहे हैं और खूब बोल रहे हैं। प्रलय की घोषणा के दौरान ही उन्होंने सुशील मोदी और नरेन्द्र मोदी को एक दूसरे का साढ़ू कहा। सवाल यह है कि उनकी इस जुबां पर कौन लगायेगा लगाम? कौन?? चुनाव आयोग उन्हें जेल पहुंचायेगा या प्रदेश सरकार उन पर रासुका लगायेगी?
बुधवार, 29 अप्रैल 2009
जार्ज, शरद और मुजफ्फरपुर
सवाल यह नहीं है कि जार्ज मुजफ्फरपुर से जीतेंगे या हारेंगे। जीते तो जीत उनके लिए कोई नई नहीं होगी। कोई क्रांति नहीं होगी, कोई नयी पार्टी नहीं बनेगी, बस वे फिर सांसद बन जायेंगे। हारे तो उनके लंबे जीवन सफर में बस एक लाइन जुड़ जायेगी कि जार्ज जिंदगी की आखिरी पारी में चुनाव हार गये। पर, इसी के साथ गाथा बन जायेगी शरद की चिट्ठी के जवाब में पलटकर उनका चिट्ठी लिखना, सारी आशंकाओं को दरकिनार कर हिम्मत और जोश के साथ आखिरी लड़ाई में भी उतरना, पर्चा भरना, रोड शो करना, लोगों से मिलना, अपनी बातों को मजबूती से रखना आदि...। सवाल यह भी नहीं है कि जदयू के अभिभावक को पार्टी अध्यक्ष ने क्यों नहीं समझा चुनाव लड़ने के काबिल? राजनीति है चलता है। पर, यह राजनीति की किसने है, मैं यहां उसकी चर्चा करना चाहता हूं।
वैसे तो जो चर्चाएं हैं, उसके मुताबिक सारा खेल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दरो-दरवाजों और कांग्रेस के मुहानों से खेला जा रहा है, जिसके पीछे दांव पर है चुनाव के बाद सरकार के गठन की रणनीति और जिसकी बिसात से लालू-रामविलास को गायब करने के बदले जार्ज से पल्ला झाड़ने की है नीति। पर, राजनीति के इस खेल के परवाने पर जिस व्यक्ति ने हस्ताक्षर किये हैं, उनका नाम है शरद यादव। इतिहास उन्हें याद रखेगा। क्योंकि, इतिहास को यह याद है कि वही शरद यादव कभी इंजीनियरिंग का मेधावी छात्र हुआ करते थे और कभी इनके समाजवादी विचारधारा से खुश होकर ही जार्ज ने उन्हें टिकट दिया था। यह २७ वर्षीय शरद का पहला राजनैतिक सफर था, जिसे जार्ज के आशीर्वाद से आगे चलने-बढ़ने और मुकाम पाने का रास्ता मिला था। उस एक आशीर्वाद से शरद की जो राजनैतिक यात्रा शुरू हुई , वह आज तक चल रही है, चलती जा रही है। तब जार्ज समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे। और यह वही शरद हैं, जो बाहैसियत जदयू अध्यक्ष जार्ज का आखिरी टिकट काट चुके हैं। दिनकर ने कुरुक्षेत्र में कहा था- पूजनीय को पूज्य समझने में जो बाधा क्रम है, यही मनुज का अहंकार है, यही मनुज का भ्रम है। मेरा मानना है, यही राजनीति का वीभत्स चेहरा भी है। है कि नहीं?
मंगलवार, 7 अप्रैल 2009
कार्ड पर ट्रंप तो बौखलाहट बढ़ी
रविवार, 5 अप्रैल 2009
मौका है तो मौके को समझना ही पड़ेगा
लोकतंत्र जीवित रहे, सही और सच्चे रास्ते पर चलता रहे, एक सच्चा देशवासी यही तो चाहेगा। ऐसा नहीं होने पर, या इस बाबत कुछ नहीं कर पाने पर आदमी के अंदर जो होता है, उसकी तस्वीर यहां आदरणीय पुरुषोत्तम जी की टिप्पणियों से साफ होती है। लोकतंत्र के महापर्व को लेकर बजते बिगुल के बीच सीन गंभीर, समझने की जरूरत पर बल देते हुए जो इशारा किया गया था, उसे पढ़ने के बाद उन्होंने जो जिज्ञासा प्रकट की है, उसे हूबहू यहां पेश किया जा रहा है। उनकी बातों में जो सवाल छिपे हैं, वह गंभीर सीन को समझने की ओर ही मजबूत इशारा कर रहे हैं। पुरुषोत्तम जी ने जो लिखा -
"शुक्ला जी, सवाल यह भी है कि नेताओं की अवसरवादिता अब कोई मुद्दा है क्या? मुझे तो लगता है कि नेता होने की पहली शतॆ ही है अवसरवादी होना? ऐसे में अवसरवादिता की बात की जाए तो केवल लालू-पासवान ही क्यों? अवसरवादिता पूरे समाज में अपने दमखम के साथ मौजूद है। हम-आप अपने अगले कदम से पहले नफा-नुकसान का आकलन नहीं करते क्या? हां, इससे सहमत हुआ जा सकता है कि नेताओं की अवसरवादिता से नुकसान पूरे समाज और देश को होता है, इसलिए इनकी अवसरवादिता पर टिप्पणी और चरचा करने के अधिकारी आप हैं। बात फिर वहीं आती है कि लालू-पासवान ही क्यों? यह सवाल तो कांग्रेस-भाजपा से लेकर तमाम छोटे-बड़े दलों के लिए है। कभी माया की सरकार को समथॆन देने वाली भाजपा आज उसे जी भर कर कोस रही है तो आप उसे क्या कहेंगे। पासवान के समथॆन से चल रही सरकार की अगुवाई कर रही कांग्रेस रामविलास के खिलाफ उम्मीदवार खड़ाकर उन्हें कोसती है तो इसे अवसरवादिता की बजाय आज की राजनीति की जरूरत ही क्यों न मान लें। और फिर सब तो यही कर रहे हैं। ममता, जयललिता, फारूक, चंद्रबाबू, नवीन पटनायक कल तक भाजपा के साथ थे, अब नहीं है। नीति और सिद्धांतों का ढिंढोरा पीटने वाले वामपंथी अब कांग्रेस पर तमाम तोहमतें लगाते हैं तो क्या यह भरोसा होता है कि ये कभी सरकार के साथी थे? सीधे-सीधे यही कहा जाए तो भी क्या बुरा है कि वैसे राजनेता और दल तो खोजने पर ही मिलेंगे जो वक्त और जरूरत के मुताबिक साथी न बदल रहे हों। वरना, वाकई यह कौन सोचता था कि लालू-मुलायम-पासवान एक साथ खड़े नजर आएंगे।"
अब सवाल यह है कि अर्थ तंत्र की आग में हर दिन भस्म होते जा रहे या भस्म किये जा रहे मूल्यों और अवधारणाओं के बीच देश की आम व भोली-भाली जनता क्या करे? चुनाव का मौका है, चुनना तो पड़ेगा। लेकिन, चुनाव समझदारी से किया जाय, जरूरत इसकी है। पांच साल के बाद मौका आया है तो इस मौके को समझना ही पड़ेगा। और मौके को समझने के लिए आपके पास होने चाहिए सिर्फ दस रुपये। कोई इतना तो कर सकता है कि उसके सामने जो पहलवान ताल ठोंक रहे हैं, उसे ठोंक बजा लिया जाय। उनमें से किसी का चयन करने से पहले उनके बारे में सबकुछ पता कर लिया जाय। सरकारी सुविधाओं के अनुसार अब आम जनता के पास सूचना का यह अधिकार है कि वह अपने जिले के चुनाव अधिकारी के पास दस रुपये का ड्राफ्ट जमा कर अपने प्रत्याशी के बारे में वह संपूर्ण जानकारी हासिल कर सकता है, जो हलफनामे में पेश किया गया है। इतना तो कोई भी मानेगा कि जान-समझ कर किये गये काम में गल्तियों की संभावना कम रहती है या फिर कम से कम यह मलाल तो नहीं होता कि जो मौका था, उसकी नजाकत को नहीं समझ पाये। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव को लेकर अभी चर्चा जारी रहेगी। फिलहाल इतना ही। पुरुषोत्तम जी को साधुवाद कि उन्होंने चर्चा आगे बढ़ायी।
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
सीन गंभीर, समझने की जरूरत
सोमवार, 9 मार्च 2009
नंगा न होइए हम्माम में
खाइए,
पीजिए,
झूमिए,
सब कुछ कीजिए,
पर, परंपराओं को संभालते हुए,
संस्कारों को सहेजते हुए।
अपनों की याद में,
परायों के सम्मान में।
ईमान में, इनाम में,
महफिले खास में और आम में,
ख्याल रहे,
कभी नंगा न होइए,
वहां . . .
कहां ? ?
जी हां, वहीं . . .
हम्माम में।
बुधवार, 4 मार्च 2009
... तो राबड़ी आज भी सीएम होतीं
"शुक्ला जी, जनता अब जाति के आधार पर वोट देने लगी है. कोर्ट की तमाम नकारात्मक टिप्पणियों के बावजूद लालू की पार्टी बिहार में दोबारा सत्ता में आई, यह इस बात का परिचायक है कि सामाजिक समीकरण (जनता) तब भी लालू के पक्ष में था. कोर्ट की टिप्पणियों के आपके जितने भी उदाहरण हैं, सभी सन २००० के पहले के हैं. बिहार में इसके बाद भी चुनाव हुए और लालू की पार्टी २००५ तक सत्ता में बनी रही. हाँ, इसके बाद नीतीश कुमार की बिरादरी और राम विलास पासवान के समर्थक लालू के तिलिस्म से बहार निकल गए, जिसकी वजह से लालू से खार खाए लोगों को मौका मिल गया. कुर्मी और दलितों का अगर लालू से मोह भंग नहीं होता तो राबडी आज भी बिहार की मुख्यमंत्री होतीं. आपने लालू-राबडी राज की समीक्षा बहुत एकपक्षीय होकर की है. लालू की देन पर भी कभी गौर कीजिएगा, तो असली तस्वीर नजर आएगी. मेरे गाँव के कन्हाई साव ८० साल की उम्र में १९८८ में मर गए, लेकिन उन्होंने ताउम्र कभी बैलेट पेपर नहीं देखा, सामन्तियों ने कभी वोट डालने नहीं दिया. आज उनका पुत्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहा है तो इसमें सौ फीसदी लालू का योगदान है. आपसे आग्रह है कि लालू राज की समीक्षा कभी आप कन्हाई साव के नजरिए से भी कीजिये, पत्रकारिता समग्र दृष्टि मांगती है. "
अरविंद जी की किसी बात पर कोई मीन-मेख न निकालते हुए मेरा मानना है कि वे अभी इस चर्चा को जारी रखना चाहते हैं, फिर विधानसभा चुनाव के बाद राजद के नेतृत्व में सरकार कैसे बनी, कैसे चली, इसका राज फाश करवाना चाहते हैं। हालांकि, मैं इस चर्चा की आखिरी किस्त लिख चुका हूं। मुद्दे और भी हैं, बातें और भी हैं। अरविंद जी चर्चा को एकपक्षीय करार देने के दौरान शायद उस प्रश्न को भूल गये, जिसके जवाब को तलाशने के लिए इतिहास को खंगाला जा रहा था। किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष पर यह टिप्पणी नहीं थी। फिलहाल मैं तो इतना ही कहना चाहूंगा कि राबड़ी सरकार का फिर से सत्ता में आना सिर्फ जातिवाद के समीकरण का प्रभावी हो जाना नहीं था, यह बड़ी और मतलबी राजनीतिक गठबंधन का प्रतिफल भी था। हालांकि, यह भी इतिहास को खंगालने जैसा ही है। अरविंद जी की बातों का जवाब शायद उस इतिहास को खंगालने में मिल जाये, जब उन्हें यह बताया जाय कि बिहार में राबड़ी सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन क्यों लगा और कैसे हटा? बहस शुरू हो चुकी है, थोड़ी मशक्कत आप भी क्यों नहीं कर लेते अरविंद जी?
