बुधवार, 22 जुलाई 2009
ट्यूबवेल पानी न उगले, दोष किसका नीतीश जी?
नीतीश जी, बुधवार को विधानसभा में लघु जल संसाधन मंत्री दिनेश प्रसाद कुशवाहा ने सूखे से निपटने में कारगर यंत्र ट्यूबवेलों की जो तस्वीर पेश की, उससे आपकी सरकार की भी क्या लापरवाही उजागर नहीं होती है? कुशवाहा द्वारा पेश आंकड़ों को फिर से यहां रखना चाहूंगा। उनके मुताबिक सूबे के 5147 ट्यूबवेलों में से सिर्फ 1719 ही कार्यरत हैं। यानी सूबे में खेतों की प्यास बुझाने के लिए लगाये गये दो-तिहाई नलकूप ठप हैं, इसे सरकार ने भी मान लिया। जब सूखा गहरा गया, बिचड़े सूख गये, तब ट्यूबवेलों का हिसाब-किताब लिया जा रहा है, यह भी क्या कम त्रासद है? नीतीश जी, इन ट्यूबवेलों की जर्जरता आपकी सरकार के चौथे साल पूरे हो जाने के बाद भी बरकरार है। ऐसा क्यों है, सवाल यह है। कुशवाहा जी की तरह आप भी कह सकते हैं कि अधिकतर ट्यूबवेल 1955-56, 1964-65 और 1973-74 के बीच के लगे हैं। पर, क्या जनता इस जवाब को मान ले?
मुख्यमंत्री जी, अब सूखे से निपटने के लिए आकस्मिक योजना बनाने और रोजाना अनुश्रवण होने का दावा किया जा रहा है। मंत्री ने ही बताया कि मौसम के मिजाज को देखते हुए सरकार 1119 ट्यूबवेलों को चालू करने की योजना पर काम कर रही है। सौ को चालू बताया गया, जबकि सौ के पुनर्स्थापन का काम प्रगति पर होने का दावा किया गया। 919 के लिए सरकार ने नाबार्ड से मदद मांगी है। विद्युत दोष से बंद ट्यूबवेलों को चालू करने के लिए प्रत्येक दिन मुख्य सचिव, विभागीय सचिव और विद्युत बोर्ड के चेयरमैन की बैठक होने का दावा किया गया। मोटर जलने पर उसे तत्काल बदल दिया जाय, इसके लिए हर जिले में पांच-पांच अतिरिक्त मोटर का इंतजाम किया गया है। जहां नाली खराब हो गयी है, उसे दुरुस्त करने के लिए हर ट्यूबवेल को 20-20 हजार रुपये दिये जाने की बात कही गयी है।
सवाल यह उठता है मुख्यमंत्री जी कि ट्यूबवेलों की खोजबीन और प्रयास को लेकर यह सरकारी मशक्कत जुलाई के तीसरे हफ्ते (खत्म होते श्रावण महीने) में क्यों हो रही है? किसानों के अस्सी फीसदी बिचड़े जल चुके हैं। धान की आच्छादन दर सिमट चुकी है। एक तो रोपनी के लिए बिचड़े नहीं दिखते, दूसरे जिन्होंने लेट बिचड़े गिराये, वे भी निराशा की स्थिति में पहुंच चुके हैं। ऐसे में यह सरकारी प्रयास किसानों को कितना लाभ पहुंचा पायेगा, सवाल यह है? कुल मिलाकर इस बार की खरीफ फसल तो मारी ही गयी न? आसमान छूती महंगाई और बढ़ती गरीबी के बीच खरीफ फसलों का मारा जाना प्रदेश में कितनी बड़ी वाही-तबाही का कारण बनेगा, सवाल यह भी है? इस पर भी अभी से ही विचार करने की जरूरत है। सवाल यह है कि आने वाली तबाही पर कब विचार होगा? क्या तब, जब तबाही आकर गुजर जायेगी? ट्यूबवेलों की जर्जरता पर हो रहे विचार की तरह? ध्यान देने की बात यह भी है नीतीश जी कि तब तक प्रदेश में विधान सभा चुनाव भी आ जायेगा और लोग भी हिसाब-किताब में जुट जायेंगे। आपके चिर प्रतिद्वंद्वी लालू जी और रामविलास जी भी गलबहिया कर अब बिहार में ही मटरगश्ती कर रहे हैं, ख्याल इसका भी कीजिए।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2009
ममता दी, आतंकी मामलों पर बजट चुप क्यों?
ममता दीदी को याद दिलाना चाहूंगा कि देश के छोटे-छोटे जंक्शनों की तो बात दूर, मेट्रोपोलिटन शहरों नयी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता तक के रेलवे स्टेशनों पर बिना टिकट घुसना आम है और इस पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सका है। यहां तक कि बड़े रेलवे स्टेशनों की चारों तरफ पुख्ता चहारदीवारी तक नहीं बनायी जा सकी है। इतना ही नहीं, सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम के तहत बड़े रेलवे स्टेशनों के सभी प्रवेश द्वारों पर स्कैनर लगाने थे, जो नहीं लगाये जा सके हैं। उम्मीद थी कि सुरक्षा के इन छोटे-छोटे बिंदुओं पर ग्रास रूट से राजनीति के शिखर पर पहुंचने वाली ममता दीदी का ध्यान जाता और इसके लिए रेल बजट में प्रावधान किया जाता, पर ऐसा नहीं हो सका। सुरक्षा के इन छोटे-छोटे, पर महत्वपूर्ण कदमों के बारे में रेलवे बजट पूरी तरह चुप है। इन सभी खामियों के बावजूद ममता दीदी ने बजट भाषण में यात्रियों को रेल से लेकर स्टेशन और उसके बाहर तक की सुरक्षा का दावा किया है। यह सुरक्षा कैसे होगी और इसके लिए धन कहां से आयेंगे, इसका शुक्रवार को संसद में पेश बजट कोई जवाब नहीं दे पाता। फिलहाल, इस मुद्दे को एक सवाल के रूप में ममता दीदी के समक्ष तो रखा ही जा सकता है कि आखिर आतंकी मामलों पर रेल बजट चुप क्यों है?
मंगलवार, 19 मई 2009
सब कुछ गंवा के होश में आये तो क्या हुआ
सवाल यह नहीं है कि उन्होंने क्या किया और उनके किये का उन्हें जो फल मिला वह अच्छा हुआ या खराब? बल्कि, सवाल दूसरा पैदा हो गया है। यह उनके बदले सुर से भी प्रतिध्वनित हो रहा है। लालू कहा करते थे कि हम मूंज के झूर (ऐसी झाड़ी, जिसके पत्ते धारदार होते हैं) हैं, जो हमें उखाड़ने आयेगा उसका गत्तर-गत्तर (अंग-अंग) कटा (कट) जायेगा। उसी दौरान बाद में नीतीश बोलते नजर आये थे कि हम इस मूंज को काटने या उखाड़ने नहीं जायेंगे, बल्कि इसकी जड़ में मट्ठा झोंक देंगे और पूरे झूर को जला देंगे। गुजरते समय के साथ जब राजनीति बदली और सूबे की सत्ता बदली तो जिस तरह से नीतीश ने विकास और दलित-महादलित कार्ड पर काम करना शुरू किया और अबकी जो चुनाव परिणाम आये, उससे तो यही लगता है कि मूंज के झूर में मट्ठा झोंका जा चुका है।
जब मतलबी गलबहियां ने कांग्रेस को दुलत्ती मारी तो कांग्रेस ने भी हौसला बुलंद करते लड़ाई के लिए ताल ठोंक दी। वोटरों को विकल्प मिला और इसी दौरान मुस्लिम जनाधार पाला बदलता दिखा। गलबहियां गठबंधन के सिरमौर लालू ने आनन-फानन में बयान का मटका फोड़ा कि बाबरी मस्जिद के ढहाने में कांग्रेस का ही हाथ था। मगर, यह भी काम न आया। जो जनाधार दरक चुका था, वह दोबारा पाले में नहीं आया। काका हाथरसी की कविता याद आती है- जो उड़ गयी जवानी, उसको बुलायें कैसे, जो जुड़ गया बुढ़ापा उसको छुड़ायें कैसे ....? सवाल यह हो गया है कि २००५ के विधानसभा चुनाव से जनाधार टूटने का जो सिलसिला शुरू हुआ और जो इस बार २००९ के आम चुनाव में परवान पकड़ गया, उसे आने वाले दिनों में कैसे काबू किया जा सकेगा? क्या यह संभव हो पायेगा, वह भी तब, जब देश में मजबूत इरादे करवट ले चुके हों, अपराधी तत्व सिरे से खारिज किये जा चुके हों और नये तेवर में सरकार बनाने का कांग्रेसी मिजाज जगजाहिर हो चुका हो?
रामविलास २००५ के विधानसभा चुनाव में पूरे सूबे में लालू विरोध में मोर्चा खोले हुए थे। कहते चल रहे थे कि जहर खा लूंगा, मगर लालू का साथ नहीं दूंगा। मगर, वे आम चुनाव में लालू के कसीदे काढ़ने लगे, उनकी मोहब्बत के तराने गाने लगे। यानी जो भीतर था, वह खुलकर दिखाने लगे। समझा था, भोले-भाले लोगों का क्या है, जो बोलूंगा, मानेंगे। अब लोगों को क्या कीजिएगा? जो कभी रिकार्ड वोटों से जीता कर भेजते थे, उसी ने मुंह की पलटी खिला दी। सूपड़ा साफ। सूबे में लोजपा को एक भी सीट नहीं। अब कांग्रेस को क्या बार्गेन कर पाइएगा, चार के कुनबे में सिमटे लालू ही बात सुन लें तो बड़ी बात होगी। उस पर से हद यह कि रामविलास जी कांग्रेस, यूपीए के साथ-साथ लालू चालीसा का भी अब तक पाठ दोहरा रहे हैं। अभी उनके इस बयान पर कि अगला चुनाव भी राजद के साथ ही लड़ेंगे, चारों ओर हास्य का ही माहौल बना हुआ है। कई लोगों ने मजाक में ही यह कहना शुरू कर दिया है कि यह बयान देने से पहले लालू से पूछा था क्या? लालू आपके साथ लड़ेंगे तब न?
दरअसल, केन्द्र में सरकार बनाने का दावा करने वालों की कलई खुल चुकी है, रंग उतर चुका है। कैबिनेट की बैठक में भी जाने की हिम्मत गंवा बैठे ये बड़बोले और हमेशा मतलब साधने वाले राजनेता अब बोलते चल रहे हैं कि बेइज्जती हो रही है। आखिर आपने किसकी इज्जत की, जिससे प्रत्युत्तर में उससे इज्जत पाने की बात कर रहे हैं। अपने अंजाम तक तो देखने की आप हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं और कर रहे हैं इज्जत की बात। अंजाम क्या है? बिहार के एक आम नागरिक की बात सुनिये, वह कहता है- बस, हो गया। सूबे से लालू-रामविलास की राजनीति अब खत्म। पूछा-क्यों, कैसे? नागरिक का कहना था - युवा वोटरों वाले देश में, विकास की लहर वाले प्रदेश में क्या है इनके पास बोलने लायक जो आगे बोलेंगे, क्या है इनके पास करने लायक, जो आगे करेंगे? जिस भूल की वे बात कर रहे हैं, वह भूल बुरा अंजाम प्राप्त करने के बाद समझ में आ रही है? नागरिक का साफ-साफ कहना था- सब कुछ गंवा कर होश में आये तो क्या हुआ?
गुरुवार, 7 मई 2009
राहुल का बयान, सन्नाटे में लालू
राहुल का बयान था ही कुछ ऐसा कि अच्छे-अच्छे के सामने सन्नाटा खिंच गया। उनकी बातों में चुनाव बाद सरकार के गठन की रणनीति के साफ संकेत दिख रहे थे। दरअसल कांग्रेस में इस वक्त राहुल गांधी की हैसियत काफी दिलचस्प और मजबूत समझी जा सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पार्टी और रणनीति के मसले पर कोई खास दिलचस्पी नहीं लेते, न ही कोई टिप्पणी देते हैं, जबकि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी इस प्रकार का खुला बयान देने से सदा परहेज करती हैं। ऐसे में कांग्रेस में पीएम इन वेटिंग समझे जाने वाले राहुल गांधी जब कुछ बोलते हैं तो उस बात का बड़ा मायने हो जाता है। अपने क्रियाकलापों से उन्होंने अब तक गंभीर छवि का प्रदर्शन किया है और इसी के मद्देनजर कोई गंभीर व्यक्ति उनके बयान को व्यक्तिगत और बचकाना समझने की गलती नहीं कर सकता।
तो क्या यह साफ हो गया है कि चुनाव के बाद सरकार बनाने की नौबत आयी तो कांग्रेस के साथ जदयू होगा? जदयू होगा तो यह तो साफ है कि लालू नहीं होंगे। तो क्या कांग्रेस को जदयू की ओर से चुनाव बाद सरकार बनाने के लिए मदद का मजबूत आश्वासन मिल चुका है? हालांकि, नीतीश कुमार ने मजबूती से इसका खंडन किया है और जदयू-भाजपा गठबंधन को मजबूत बताया है, पर जानकार जानते हैं कि यह राजनैतिक चोंचले हैं, जो वक्त-वेवक्त बदल जाते हैं। ऐसे भी विकास और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आज भी कांग्रेस एकमात्र आम ग्राह्य पार्टी की छवि में है। इस पार्टी ने यह भी दिखाया है कि गठबंधन सरकार कैसे अपना कार्यकाल पूरा करती है। ऐसे में नीतीश के बयान के बाद भी यदि जदयू से कांग्रेस का तालमेल हुआ तो शायद ही किसी को आपत्ति हो। व्यक्तिगत रूप से अब तक मेरी जितने लोगों से बात हुई है, उनका यही कहना था कि जदयू को कांग्रेस से तालमेल करना ही चाहिए। यह पार्टी हित के साथ-साथ देश औऱ सूबे के हित में ही होगा।
ऐसा माना जाता है कि राहुल गांधी के बयान के बाद जिस संभावना की तस्वीर बनती है, उसका स्वरूप वास्तव में अगर आकार पा गया और सही मायने में कांग्रेस की जदयू से तालमेल कर सरकार बनी तो यह बिहार की राजनीति करने वाले कम से कम लालू प्रसाद यादव के लिए बेचैनी की बात होगी। वह भी उस हालत में जब रामविलास जी के बारे में तीर-तुक्के लग रहे हों। दरअसल, लालू के लिए आगे का वक्त अकेले सफर वाला ही बन रहा है, क्योंकि भाजपा जैसी दूसरे नंबर की राष्ट्रीय पार्टी से इनके गठबंधन की दूर-दूर तक संभावना जो नहीं दिखती। तो सूबे में आगे की राजनीति काफी भारी होगी, लालू के लिए खतरा इसका हो गया है। ईश्वर न करें, ये चुनाव हारें, पर जीत भी गये तो बदली परिस्थितियों में वह उनके लिए बेमानी ही हो जायेगी। बिल्कुल निर्दलीय जैसी ही तो हालत होगी उनकी? तो जब इतनी बातें वातावरण में तैर रही हों तो कैसे न हों लालू बेचैन? क्यों न बदल जाये उनका स्वाभाविक अंदाज? क्यों न मचे सन्नाटा। वैसे मतदान का चौथा चरण गुरुवार को सूबे में शांति से गुजरा, इसके लिए जनता के साथ-साथ अपने नेतागण भी बधाई के पात्र हैं, वर्ना तो हारने पर प्रलय मचने और मचाने तक की धमकी की अवधि अभी खत्म नहीं हुई है। द ग्रेट इंडियन तमाशा ऊर्फ महासंग्राम ऊर्फ आम चुनावपर चर्चा अभी जारी रहेगी।
रविवार, 3 मई 2009
लालू मचायेंगे प्रलय, उन पर कार्रवाई कौन करेगा?
लालू को सुनना जिन्हें दिलचस्प लगता होगा, उन्हें तो वाकई मजा आया होगा। हंसी फूटी होगी कि वाह, लालू ने क्या बोला है इस बार। मगर, लालू हंसी खेल में ही बड़ी-बड़ी बातें बोल जाते हैं, इसे सभी जानते हैं। चारा घोटाला के दौरान जब उन्होंने कहा था कि वे जेल गये तो वहीं से बिहार की सत्ता संभालेंगे तो लोगों ने हंसा था, मजाक उड़ाया था। मगर, उनके जेल जाते ही राबड़ी देवी जैसे ही गद्दी पर बैठीं, लोगों को लालू की बातों की गंभीरता समझ में आ गयी। अब लालू ने कहा है कि वे चुनाव हारे तो प्रलय आ जायेगा तो इसका भी बड़ा मतलब है। लोग भले हंस लें, पर इसका मतलब तो निकलेगा जरूर। क्या निकलेगा, यह उनके चुनाव हारने के बाद ही पता चल पायेगा। लोकतंत्र के मसीहा कहे जाने वाले लोग इससे पहले उनकी बातों का मतलब निकाल लें तो और बात होगी।
अगली बात। अभी थोड़े दिनों पहले इसी ग्रेट इंडियन तमाशे के दौरान वरुण गांधी ने कुछ उल-जुलूल बक दिया था और वह न केवल जेल चले गये, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन पर रासुका तक लगा दिया। यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन था। अब लालू जो बोल रहे हैं, उसे आयोग किस तरह ले रहा है? क्या यह आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? वे इस बार के चुनाव में दो जगहों से मैदान में हैं। सारण में मतदान हो चुका है, जबकि पटना में चौथे चरण में मतदान होना है। सारण में मतदान समाप्त होने के बाद से ही यह चर्चा आम है कि लालू हारेंगे। चर्चा निश्चित रूप से लालू के पास भी पहुंची होगी। उन्होंने भी आकलन किया होगा। अब उनका घबराना यही बता रहा है कि उन्हें भी अपनी हार का अहसास हो रहा है। तो पटना सीट बचाने की मशक्कत अब उनके लिए वक्त की जरूरत बन गयी है। बताया जाता है कि पटना से भी लालू को तगड़ी टक्कर मिल रही है। ऐसे में ही उनका बयान आया है कि वे हारे तो प्रलय मच जायेगा। यह सरासर धमकी है। पर, वे धमकी किसे दे रहे हैं, यह समझने की जरूरत है। समझने की जरूरत यह भी है कि वे यह धमकी दे कैसे पा रहे हैं?
लोगों को याद होगा, एक केजे राव ने ठान लिया तो बिहार के चुनावों में चूं-चटाक तक नहीं हुआ था। पत्ता तक नहीं खड़का था। लालू को याद होगा कि एक यूएन विश्वास ने ठान लिया था तो चारा घोटाला की सारी परतें अपने आप खुलती चली गयी थीं और यही लालू जेल पहुंच गये थे। एक भरे-पूरे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक लालू पूरे सिस्टम को चैलेंज नहीं कर सकते। समाज को धमकी नहीं दे सकते। लालू भले कहते रहें कि उनके हारने से प्रलय आ जायेगा, मगर वे मान लें कि कोई प्रलय नहीं आयेगा। समाज जब जागता है तो अच्छे-अच्छों को किनारे लगा देता है। लेकिन, यह तो बाद की बात है। ताजा मसला यह है कि जब देश के बड़े-बड़े दिग्गज आचार संहिता की मार से थर्राये चल रहे हैं, शब्दों और बातों तक से किनाराकशी किये घूम रहे हैं, वैसे में लालू की जुबां आग पर आग कैसे उगल पा रही है? उनके मन जो आ रहा है, बोले जा रहे हैं और खूब बोल रहे हैं। प्रलय की घोषणा के दौरान ही उन्होंने सुशील मोदी और नरेन्द्र मोदी को एक दूसरे का साढ़ू कहा। सवाल यह है कि उनकी इस जुबां पर कौन लगायेगा लगाम? कौन?? चुनाव आयोग उन्हें जेल पहुंचायेगा या प्रदेश सरकार उन पर रासुका लगायेगी?
बुधवार, 29 अप्रैल 2009
जार्ज, शरद और मुजफ्फरपुर
सवाल यह नहीं है कि जार्ज मुजफ्फरपुर से जीतेंगे या हारेंगे। जीते तो जीत उनके लिए कोई नई नहीं होगी। कोई क्रांति नहीं होगी, कोई नयी पार्टी नहीं बनेगी, बस वे फिर सांसद बन जायेंगे। हारे तो उनके लंबे जीवन सफर में बस एक लाइन जुड़ जायेगी कि जार्ज जिंदगी की आखिरी पारी में चुनाव हार गये। पर, इसी के साथ गाथा बन जायेगी शरद की चिट्ठी के जवाब में पलटकर उनका चिट्ठी लिखना, सारी आशंकाओं को दरकिनार कर हिम्मत और जोश के साथ आखिरी लड़ाई में भी उतरना, पर्चा भरना, रोड शो करना, लोगों से मिलना, अपनी बातों को मजबूती से रखना आदि...। सवाल यह भी नहीं है कि जदयू के अभिभावक को पार्टी अध्यक्ष ने क्यों नहीं समझा चुनाव लड़ने के काबिल? राजनीति है चलता है। पर, यह राजनीति की किसने है, मैं यहां उसकी चर्चा करना चाहता हूं।
वैसे तो जो चर्चाएं हैं, उसके मुताबिक सारा खेल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दरो-दरवाजों और कांग्रेस के मुहानों से खेला जा रहा है, जिसके पीछे दांव पर है चुनाव के बाद सरकार के गठन की रणनीति और जिसकी बिसात से लालू-रामविलास को गायब करने के बदले जार्ज से पल्ला झाड़ने की है नीति। पर, राजनीति के इस खेल के परवाने पर जिस व्यक्ति ने हस्ताक्षर किये हैं, उनका नाम है शरद यादव। इतिहास उन्हें याद रखेगा। क्योंकि, इतिहास को यह याद है कि वही शरद यादव कभी इंजीनियरिंग का मेधावी छात्र हुआ करते थे और कभी इनके समाजवादी विचारधारा से खुश होकर ही जार्ज ने उन्हें टिकट दिया था। यह २७ वर्षीय शरद का पहला राजनैतिक सफर था, जिसे जार्ज के आशीर्वाद से आगे चलने-बढ़ने और मुकाम पाने का रास्ता मिला था। उस एक आशीर्वाद से शरद की जो राजनैतिक यात्रा शुरू हुई , वह आज तक चल रही है, चलती जा रही है। तब जार्ज समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे। और यह वही शरद हैं, जो बाहैसियत जदयू अध्यक्ष जार्ज का आखिरी टिकट काट चुके हैं। दिनकर ने कुरुक्षेत्र में कहा था- पूजनीय को पूज्य समझने में जो बाधा क्रम है, यही मनुज का अहंकार है, यही मनुज का भ्रम है। मेरा मानना है, यही राजनीति का वीभत्स चेहरा भी है। है कि नहीं?
मंगलवार, 7 अप्रैल 2009
कार्ड पर ट्रंप तो बौखलाहट बढ़ी
रविवार, 5 अप्रैल 2009
मौका है तो मौके को समझना ही पड़ेगा
लोकतंत्र जीवित रहे, सही और सच्चे रास्ते पर चलता रहे, एक सच्चा देशवासी यही तो चाहेगा। ऐसा नहीं होने पर, या इस बाबत कुछ नहीं कर पाने पर आदमी के अंदर जो होता है, उसकी तस्वीर यहां आदरणीय पुरुषोत्तम जी की टिप्पणियों से साफ होती है। लोकतंत्र के महापर्व को लेकर बजते बिगुल के बीच सीन गंभीर, समझने की जरूरत पर बल देते हुए जो इशारा किया गया था, उसे पढ़ने के बाद उन्होंने जो जिज्ञासा प्रकट की है, उसे हूबहू यहां पेश किया जा रहा है। उनकी बातों में जो सवाल छिपे हैं, वह गंभीर सीन को समझने की ओर ही मजबूत इशारा कर रहे हैं। पुरुषोत्तम जी ने जो लिखा -
"शुक्ला जी, सवाल यह भी है कि नेताओं की अवसरवादिता अब कोई मुद्दा है क्या? मुझे तो लगता है कि नेता होने की पहली शतॆ ही है अवसरवादी होना? ऐसे में अवसरवादिता की बात की जाए तो केवल लालू-पासवान ही क्यों? अवसरवादिता पूरे समाज में अपने दमखम के साथ मौजूद है। हम-आप अपने अगले कदम से पहले नफा-नुकसान का आकलन नहीं करते क्या? हां, इससे सहमत हुआ जा सकता है कि नेताओं की अवसरवादिता से नुकसान पूरे समाज और देश को होता है, इसलिए इनकी अवसरवादिता पर टिप्पणी और चरचा करने के अधिकारी आप हैं। बात फिर वहीं आती है कि लालू-पासवान ही क्यों? यह सवाल तो कांग्रेस-भाजपा से लेकर तमाम छोटे-बड़े दलों के लिए है। कभी माया की सरकार को समथॆन देने वाली भाजपा आज उसे जी भर कर कोस रही है तो आप उसे क्या कहेंगे। पासवान के समथॆन से चल रही सरकार की अगुवाई कर रही कांग्रेस रामविलास के खिलाफ उम्मीदवार खड़ाकर उन्हें कोसती है तो इसे अवसरवादिता की बजाय आज की राजनीति की जरूरत ही क्यों न मान लें। और फिर सब तो यही कर रहे हैं। ममता, जयललिता, फारूक, चंद्रबाबू, नवीन पटनायक कल तक भाजपा के साथ थे, अब नहीं है। नीति और सिद्धांतों का ढिंढोरा पीटने वाले वामपंथी अब कांग्रेस पर तमाम तोहमतें लगाते हैं तो क्या यह भरोसा होता है कि ये कभी सरकार के साथी थे? सीधे-सीधे यही कहा जाए तो भी क्या बुरा है कि वैसे राजनेता और दल तो खोजने पर ही मिलेंगे जो वक्त और जरूरत के मुताबिक साथी न बदल रहे हों। वरना, वाकई यह कौन सोचता था कि लालू-मुलायम-पासवान एक साथ खड़े नजर आएंगे।"
अब सवाल यह है कि अर्थ तंत्र की आग में हर दिन भस्म होते जा रहे या भस्म किये जा रहे मूल्यों और अवधारणाओं के बीच देश की आम व भोली-भाली जनता क्या करे? चुनाव का मौका है, चुनना तो पड़ेगा। लेकिन, चुनाव समझदारी से किया जाय, जरूरत इसकी है। पांच साल के बाद मौका आया है तो इस मौके को समझना ही पड़ेगा। और मौके को समझने के लिए आपके पास होने चाहिए सिर्फ दस रुपये। कोई इतना तो कर सकता है कि उसके सामने जो पहलवान ताल ठोंक रहे हैं, उसे ठोंक बजा लिया जाय। उनमें से किसी का चयन करने से पहले उनके बारे में सबकुछ पता कर लिया जाय। सरकारी सुविधाओं के अनुसार अब आम जनता के पास सूचना का यह अधिकार है कि वह अपने जिले के चुनाव अधिकारी के पास दस रुपये का ड्राफ्ट जमा कर अपने प्रत्याशी के बारे में वह संपूर्ण जानकारी हासिल कर सकता है, जो हलफनामे में पेश किया गया है। इतना तो कोई भी मानेगा कि जान-समझ कर किये गये काम में गल्तियों की संभावना कम रहती है या फिर कम से कम यह मलाल तो नहीं होता कि जो मौका था, उसकी नजाकत को नहीं समझ पाये। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव को लेकर अभी चर्चा जारी रहेगी। फिलहाल इतना ही। पुरुषोत्तम जी को साधुवाद कि उन्होंने चर्चा आगे बढ़ायी।
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
सीन गंभीर, समझने की जरूरत
सोमवार, 9 मार्च 2009
नंगा न होइए हम्माम में
खाइए,
पीजिए,
झूमिए,
सब कुछ कीजिए,
पर, परंपराओं को संभालते हुए,
संस्कारों को सहेजते हुए।
अपनों की याद में,
परायों के सम्मान में।
ईमान में, इनाम में,
महफिले खास में और आम में,
ख्याल रहे,
कभी नंगा न होइए,
वहां . . .
कहां ? ?
जी हां, वहीं . . .
हम्माम में।
बुधवार, 4 मार्च 2009
... तो राबड़ी आज भी सीएम होतीं
"शुक्ला जी, जनता अब जाति के आधार पर वोट देने लगी है. कोर्ट की तमाम नकारात्मक टिप्पणियों के बावजूद लालू की पार्टी बिहार में दोबारा सत्ता में आई, यह इस बात का परिचायक है कि सामाजिक समीकरण (जनता) तब भी लालू के पक्ष में था. कोर्ट की टिप्पणियों के आपके जितने भी उदाहरण हैं, सभी सन २००० के पहले के हैं. बिहार में इसके बाद भी चुनाव हुए और लालू की पार्टी २००५ तक सत्ता में बनी रही. हाँ, इसके बाद नीतीश कुमार की बिरादरी और राम विलास पासवान के समर्थक लालू के तिलिस्म से बहार निकल गए, जिसकी वजह से लालू से खार खाए लोगों को मौका मिल गया. कुर्मी और दलितों का अगर लालू से मोह भंग नहीं होता तो राबडी आज भी बिहार की मुख्यमंत्री होतीं. आपने लालू-राबडी राज की समीक्षा बहुत एकपक्षीय होकर की है. लालू की देन पर भी कभी गौर कीजिएगा, तो असली तस्वीर नजर आएगी. मेरे गाँव के कन्हाई साव ८० साल की उम्र में १९८८ में मर गए, लेकिन उन्होंने ताउम्र कभी बैलेट पेपर नहीं देखा, सामन्तियों ने कभी वोट डालने नहीं दिया. आज उनका पुत्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहा है तो इसमें सौ फीसदी लालू का योगदान है. आपसे आग्रह है कि लालू राज की समीक्षा कभी आप कन्हाई साव के नजरिए से भी कीजिये, पत्रकारिता समग्र दृष्टि मांगती है. "
अरविंद जी की किसी बात पर कोई मीन-मेख न निकालते हुए मेरा मानना है कि वे अभी इस चर्चा को जारी रखना चाहते हैं, फिर विधानसभा चुनाव के बाद राजद के नेतृत्व में सरकार कैसे बनी, कैसे चली, इसका राज फाश करवाना चाहते हैं। हालांकि, मैं इस चर्चा की आखिरी किस्त लिख चुका हूं। मुद्दे और भी हैं, बातें और भी हैं। अरविंद जी चर्चा को एकपक्षीय करार देने के दौरान शायद उस प्रश्न को भूल गये, जिसके जवाब को तलाशने के लिए इतिहास को खंगाला जा रहा था। किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष पर यह टिप्पणी नहीं थी। फिलहाल मैं तो इतना ही कहना चाहूंगा कि राबड़ी सरकार का फिर से सत्ता में आना सिर्फ जातिवाद के समीकरण का प्रभावी हो जाना नहीं था, यह बड़ी और मतलबी राजनीतिक गठबंधन का प्रतिफल भी था। हालांकि, यह भी इतिहास को खंगालने जैसा ही है। अरविंद जी की बातों का जवाब शायद उस इतिहास को खंगालने में मिल जाये, जब उन्हें यह बताया जाय कि बिहार में राबड़ी सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन क्यों लगा और कैसे हटा? बहस शुरू हो चुकी है, थोड़ी मशक्कत आप भी क्यों नहीं कर लेते अरविंद जी?
मंगलवार, 3 मार्च 2009
जंगल राज के नियम भी ध्वस्त हो गये थे
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009
राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार
फिलहाल इतना ही। लालू के पटना में २२ फरवरी १९९० को रविदासों के समक्ष भोलेपन से पूछे गये सवाल ( सवाल था-आखिर क्यों उन्हें बिहार की सत्ता से बेदखल किया गया) के जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला जारी रहेगा। अगली और आखिरी किस्त में पढ़िए -जंगल राज के भी नियम ध्वस्त हो गये थे।
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009
इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार
१९९० की शुरुआत में ही रोहतास के केसारी में सामंतों में दस दलितों को मार डाला। २६ मार्च को जहानाबाद के लखावर में पांच दलित मारे गये। २० जुलाई को मधुबनी के हरलाखी में सामंतों ने पुलिस के साथ मिलकर मजदूर वर्ग के छह लोगों को मौत के घाट उतार डाला। २६ जुलाई को रांची (तब बिहार में ही था) के हेसार में पुलिस ने तीन लोगों को मार डाला। १७ दिसंबर को दरियापुर (पटना) में किसान संघ के कार्यकर्ताओं ने चार लोगों व १९ फरवरी १९९१ को पटना के तिखरखोरा के १४ लोगों की हत्या कर दी। ७ जनवरी १९९१ को वैशाली जिले के पहाड़पुर गांव में अपराधी तत्वों ने ७ लोगों को मार डाला। विष्णुपुर ढाबा (बेगूसराय) तथा हरपुर सैदाबाद (समस्तीपुर) में ३ फरवरी को पुलिस ने क्रमशः ७ और ३ तीन लोगों को भून डाला। सनलाइट सेना ने ४ जून १९९१ को पलामू के मलवरिया में नौ लोगों को मौत के घाट उतारा। १२ जुलाई १९९१ को अपराधी गिरोह की ओर से संग्रामपुर (सारण) में चार लाशें गिरायी गयीं। जद समर्थकों ने ११ अप्रैल १९९१ को गया के बेलागंज में तीन लोगों को मार डाला। भोजपुर के देवसहियारा में सामंतों ने २२ जून १९९१ को १४ लोगों को मार डाला। १३ जुलाई १९९१ को पुलिस ने मुठभेड़ में मधुबनी के बेनीपट्टी में चार मजदूरों को भून डाला। १९ अक्टूबर को मुजफ्फऱपुर के बेनीबाद में पुलिस की गोली से सात लोग मारे गये। २५ अगस्त १९९१ को पुलिस ने सहरसा के गोदरामा में तीन लोगों को भून डाला, वहीं, सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने जहानाबाद के बावन बिगहा में २१ सितंबर १९९१ को सात लोगों को मौत के घाट उतार डाला। इसी साल जहानाबाद के मेन बरसिम्हा में नौ लोग, करकट बिगहा (पटना) में चार लोग, तिनडीहा (गया) में ७ लोग मार डाले गये।
नये साल १९९२ की शुरूआत बारा नरसंहार से हुई। बारा में १२ फरवरी को एमसीसी समर्थकों ने ३९ लोगों को मार डाला। ३० जून को गोपालगंज के चैनपुर में सामंतों ने पांच तथा एकवारी (भोजपुर) में सामंतों ने १२ सितंबर को ४ लोगों की हत्या कर दी। १९९२ का अंत शहाबुद्दीन समर्थकों के तांडव से हुआ। २२ दिसंबर को शहाबुद्दीन समर्थकों ने जीरादेई (सीवान) में ४ लोगों की हत्या कर दी। यह सिलसिला थमा नहीं। पुलिसकर्मियों ने १७ मार्च १९९४ को नाढ़ी (भोजपुर) में नौ लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया। ४ अप्रैल १९९५ को रणवीर सेना की ओर से भोजपुर के खोपिरा में चार लोगों की लाशें गिरायी गयीं। सामंतों ने ६ जुलाई १९९५ को करमौल बमनौली (सीवान) के छह लोगों को मार डाला। रणवीर सेना ने २५ जुलाई १९९५ को सरथुआ (भोजपुर) में ६ लोगों की हत्या की। ५ अगस्त १९९५ को गंगा सेना की ओर से नोनउर (भोजपुर) के छह लोग मारे गये। वर्ष १९९६ तो नरसंहारों का ही वर्ष रहा। रणवीर सेना ने ७ फरवरी १९९६ को चांदी (भोजपुर) में ४, ९ मार्च को पतलपुरा (भोजपुर) में ३, १२ मार्च को नोनउर में ५, ५ मई को नाढ़ी में ३, ९ मई को इसी गांव में फिर ३, ११ जुलाई को बम्पानी टोला (भोजपुर) में २१, २६ नवंबर पुरहारा (भोजपुर) में ५ तथा २४ दिसंबर को एकबारी (भोजपुर) में ६ लोगों की सामूहिक हत्या की। इसी वर्ष शहाबुद्दीन समर्थकों द्वारा १४ सितंबर को भवराजपुर (सीवान) के ३ तथा ११ दिसंबर को मनिया (सीवान) के ५ लोगों की हत्या कर दी गयीं।
अगले साल राबड़ी देवी के कार्यकाल में पहली दिसंबर १९९७ को रणवीर सेना द्वारा बाथे नरसंहार में ६४ लोगों तथा रामपुर अहियारा चौरम में एमसीसी समर्थकों द्वारा ९ सवर्णों को जीप से खींचकर खत्म कर देने जैसी जघन्यतम घटनाओं को छोड़ भी दिया जाय तो क्या नहीं लगता कि खुद को भगवान कृष्ण का अवतार कहलाने में खुशी महसूस करने वाले लालू प्रसाद यादव के राज में बुद्ध, महावीर की धरती इंसानी लाशों से पटती जा रही थी? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित १ दिसंबर के बाथे नरसंहार के जिम्मेवार रणवीर सेना के राजनैतिक रिश्तों की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग के गठन की बात की गयी। आयोग का कार्यकाल जून १९९८ में समाप्त हो गया तो छह महीने ३१ दिसंबर तक के लिए उसे बढ़ाया गया। जांच आयोग का काम शुरू ही नहीं हो पाया। क्यों? क्योंकि आयोग को इस काम के लिए कर्मचारी ही नहीं मिले। कार्यालय के लिए मकान का आवंटन नवंबर में किया गया। इस नरसंहार के बाद मध्य बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाये रखने के लिए विशेष टास्क फोर्स के गठन की बात कही गयी। यह टास्क फोर्स संचिका में ही कैद रह गयी। उग्रवाद प्रभावित मध्य बिहार में विकास कार्यक्रम चलाने के लिए सौ करोड़ रुपये की योजना तैयार की गयी। योजना कहां चली गयी, किसी को पता नहीं है। बिहार सरकार ने अपने एक दस्तावेज में स्वयं स्वीकार किया था कि सड़क निर्माण से संबंधित दो दर्जन से अधिक घोषित परियोजनाओं में निविदाएं नहीं आयीं, क्योंकि उग्रवादी संगठनों ने निविदा देने वालों से निपट लेने की धमकी दी थी।
फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार।
लालू ने सम्मान से जीना सिखाया
इन सारी बातों के बीच किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वो लालू यादव ही हैं, जिनकी वजह से बिहार की दलित और पिछड़ी आबादी सर उठाकर जीना सीख रही है। कोई भी सामाजिक क्रांति जब होती है तो उसके कुछ न कुछ साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। सब कुछ अच्छा ही अच्छा नहीं होता। साइड इफेक्ट्स को लालू की गलतियों के रूप में प्रचारित कर आप किसका भला करना चाह रहे हैं। क्या बिहार के दलितों और पिछड़ों को सर उठाकर जीने का हक नहीं था? लालू यादव ने सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया तो वह सामाजिक समरसता के कातिल हो गए? सामंती ताकतों का अत्याचार बहुत अच्छा था? सच बात तो यह है कि जिन ताकतों को राज करने की आदत पड़ गई थी, वही लोग पिछड़ों और दलितों का उभार देख नहीं पा रहे हैं।
लालू यादव ने बिहार का विकास रोक दिया, ऐसा कहने वाले पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखते। जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वरी दुबे के कायॆकाल में क्या कम भ्रष्टाचार था। तब विकास की गंगा बह रही थी, तो भी बिहार लालू काल से पहले पिछड़े और बीमारू राज्यों की श्रेणी में क्यों शुमार था?
अब कहा जा रहा है कि एक खास वगॆ के लोग पूरे बिहार में अराजकता मचा रहे थे। लालू यादव से पहले स्वणॆ जातियों के लोग पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के खिलाफ जो मनमानी कर रहे थे, उसे अराजकता क्यों नहीं कहा जाता? क्या सिफॆ इसलिए नहीं कि तब उस अराजकता को ही सिस्टम मान लिया गया था? क्या उस सिस्टम को तोड़ा नहीं जाना चाहिए था? सच बात तो यह है कि सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया गया तो हल्ला इस बात का किया गया कि बिहार में तो स्थिति अराजक हो गई है!
मेरा सिफॆ इतना कहना है कि लालू यादव के कायॆकाल से पहले के कायॆकाल को भी याद किया जाए। भ्रष्टाचार, अपराध और भाई-भतीजावाद की त्रिवेणी तब भी बह रही थी। बिहार तब भी पीछे ही जा रहा था। लेकिन तब आत्मसम्मान के साथ जीने वाले लोग कुछ फीसदी थे। अब स्थिति बदली तो यही कुछ फीसदी लोग बेचैन हो गए। अराजकता-अराजकता का नारा बुलंद करने लगे।
ऐसे में अनुरोध सिफॆ यह है कि स्थितियों को सिफॆ अपने चश्मे से न देखें। दूसरी बात यह कि हमेशा गुण-अवगुण दोनों बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वरना तो आप कोई भी बात कहने के लिए स्वतंत्र हैं हीं। मेरी बात यदि आप यहीं प्रकाशित कर सकें तो मुझे खुशी होगी।
मनोज कुमार, रुनीपुर, नवादा, बिहार
लालू यादव ने जो सवाल पूछा है, उसके जवाब में और भी लोगों के दिमाग में ढेर सारी बातें घुमड़ रही होंगी। इस चरचा में अगर आप भी शामिल होना चाहते हैं तो स्वागत है। आप अपनी बातें हमें लिख भेजें इस पते पर-imtihan08@gmail.com। हम आपकी बातों को आलेख के रूप में प्रकाशित करेंगे।
बुधवार, 25 फ़रवरी 2009
भ्रष्टाचार से ही लालू बने थे सीएम
बात १९९० की है। वीपी सिंह का जमाना था। देश में गैर कांग्रेसवाद की लहर चल रही थी। तब न तो मंडल कमीशन आया था और न ही लालू की मुरलीधरन छवि ही लोगों के नूरेनजर थी। विधान सभा चुनाव में जनता दल बड़ी पार्टी के रूप में सामने आया था। मात्र गैर कांग्रेसवाद को लेकर कांग्रेस का तख्ता पलट दिया गया था, उसे जनता बहुमत से अल्पमत में ले आयी थी। बिहार में ही नहीं, केन्द्र में भी। गैर कांग्रेसवाद के गर्भ से निकला था जनता दल और उस वक्त भी उसके पास स्पष्ट बहुमत नहीं था कि अकेले वह सत्ता चला सके। तालमेल हुआ। झामुमो, भाजपा, माकपा, भाकपा और जद ने समझौता किया और कांग्रेस को सत्ता में आने रोका गया। बिहार में तो नेतृत्व संकट की भीषण स्थिति पैदा हो गयी थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए जनता दल में उठापटक शुरू हो गयी थी। उस वक्त राम सुंदर दास मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। रमई राम, रघुनाथ झा को भी इस दौड़ में शामिल किया जा रहा था। यहां तक कि गैर कांग्रेसवाद का झंडा थामे अगली पांत के नेता युवा तुर्क चंद्रशेखर भी यही चाह रहे थे कि रघुनाथ झा या राम सुंदर दास को ही मुख्यमंत्री बना दिया जाय। मगर, उस वक्त की राजनीति और जनता दल में मजबूत स्थिति रखने वाले देवीलाल ने लालू यादव के नाम का प्रस्ताव कर दिया। और जैसे कालांतर में एचडी देवगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल रातोरात प्रधानमंत्री बने, वैसे ही लालू यादव मुख्यमंत्री बन गये। जनता ने उन्हें नहीं चुना था और जिन्होंने उन्हें चुना था, ऐसा करने का उनके पास कोई अधिकार नहीं था। लालू प्रसाद यादव तो उस वक्त विधायक भी नहीं थे। मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद उन्होंने चुनाव लड़ा और संवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री पद के लायक बने। तो यह था लालू के बिहार की गद्दी पर काबिज होने का सच। सामाजिक समरसता कायम करने वाली पार्टी का पहला मुख्यमंत्री ही अलोकतांत्रिक तौर-तरीके और गैर जनमत से चुना गया। इस प्रक्रिया को भ्रष्टाचार की श्रृंखला में रखा जाय तो लालू के मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित किया जाना भी एक भ्रष्ट प्रक्रिया ही थी, जो खुलेआम लोकतांत्रिक प्रणाली की धज्जियां उड़ा रही थी। फिर भ्रष्टाचार के माध्यम से स्थापित मुख्यमंत्री न्याय औऱ नैतिकता की बात किस मुंह से करता? और इसी का परिणाम हुआ कि पूरे सूबे में अराजकता की स्थिति पैदा होती चली गयी। जनता दल के कार्यकर्ता खुलेआम आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने लगे। हत्या की राजनीति मुखर हो गयी। संतरी से मंत्री तक जातीय समीकरण के तहत बहाल किये जाने लगे। गुण और गुणवत्ता को नजरअंदाज किया जाने लगा। लालू रोज भड़काऊ भाषण देने लगे। जनता के नाम पर जनतंत्र का जितना मजाक लालू ने उड़ाया, इसका आकलन करना या उसे विश्लेषित करना आने वाली पीढ़ी को गलत रास्ते का पाठ पढ़ाने जैसा ही है, पर यह सच है कि एशिया के मानचित्र पर सिंधू घाटी के बाद सबसे पहले सभ्यता का विकास करने, अपनी भौतिक संपदा के साथ-साथ वैचारिक अमृत से मानवता को सींचने और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला बिहार क्रूरतम हिंसा, जघन्यतम अपराध और महाघोटालों की विषबेलियों से इस कदर जकड़ता गया कि उसकी चिरपरिचित अस्मिता पर ही संकट के बादल मंडराने लगे। जिस बिहार के बुद्ध, महावीर, चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, शेरशाह, सूफी-संतों व भक्त कवियों, सामाजिक क्रांतिकारियों और राजनैतिक हस्तियों ने समय-समय पर देश की संस्कृति में नये अध्याय जोड़े, वही बिहार लालू के राज में जंगल राज का पर्याय बन गया था।
फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार।
लालू यादव के सवाल के बहाने
उन आम लोगों से भी पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने लालू और राबड़ी देवी के कायॆकाल में मान लिया था कि अगर बिहार में रहना है तो अपने दम पर, अपने बाहुबल पर भरोसा करके ही रहा जा सकता है। आगे बढ़ना है तो सरकारी मशीनरी से किसी मदद की उम्मीद न करें। अपने संसाधनों से विकास कर सकते हों तो करें।
उनसे भी लालू मुखातिब हों, जो उन परिस्थितियों में वहां रहने की हिम्मत नहीं जुटा सके और पलायन को मजबूर हुए। हालत यह हो गई कि महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल से लेकर देश के लगभग सभी हिस्सों में बिहार के लोगों की भीड़ सी हो गई। मजबूरी में बिहार छोड़ने वाले लोग कहीं दुरदुराए जाते हैं तो कहीं पीटे जाते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वही हैं, जिनके उत्थान और आत्मसम्मान को बहाल करने की बात कहते लालू यादव अघाते नहीं। उत्थान होता आत्मसम्मान बढ़ता या बहाल होता तो क्या वे अपना देस छोड़ने को मजबूर होते। इनके, इनके परिवार वालों के पास भी तो वोट का अधिकार है, लालू यादव इनसे भी क्यों नहीं पूछते कि किन वजहों से उनका वह सिंहासन छीन लिया गया, जिस पर वे बीस साल तक बैठने का दावा करते थे।
सवाल तो उन उद्योगपतियों से भी पूछा जाना चाहिए जो रंगदारी, अपहरण की वारदातों और गुंडागरदी से त्रस्त होकर बिहार छोड़कर भाग जाने को मजबूर हुए। सत्ता में बने रहने के लिए केवल भावुक सवाल और नौटंकी की जरूरत नहीं होती। नागरिकों की बेहतरी और उनकी हिफाजत के उपायों की भी जरूरत होती है। जनता की हिफाजत की स्थिति यह थी कि लोग सवाल पूछने लगे थे कि अगला नरसंहार कब और कहां होगा? ऐसे सवाल पूछने वालों को जवाब देने का हक नहीं था क्या? नरसंहार को छोड़ भी दें तो कानून-व्यवस्था की हालत यह थी कि लोग शाम होते ही अपने घरों में दुबक जाने को मजबूर होते थे। राजधानी पटना तक में शाम होते असामाजिक तत्व ही सड़कों पर बचे रह जाते थे। महिलाएं इज्जत का जोखिम उठाकर ही दिन में भी घर से निकलती थीं। क्या-क्या गिनवाया जाए? लालू यादव को याद हो या न हो, जनता को तो अब भी याद होगा ही। आखिर भुगता तो उन्होंने ही है।
मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार में आग लगी तो उसे बुझाने की जरूरत थी। लेकिन लालू यादव ने यह कहकर उस आग में घी ही तो डाल दिया कि ..भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला-कायस्थ) साफ करो। लालू यादव बाद में भले ही इस पर लीपापोती करते रहे हों लेकिन उनके इस महान आह्वान का खामियाजा केवल भूराबाल ने ही नहीं, पूरे प्रदेश ने भुगता।
इनके साथ उनसे भी तो अपना सवाल पूछिए रेलमंत्री जी जिन्हें आपने चौदह-पंद्रह साल तक अपनी नौटंकी में उलझाए रखा। चरवाहा विद्यालय खोलकर अपने आपको विकास पुरुष कहने और कहलवाने से विकास नहीं होता। होता तो आज भी चरवाहा विद्यालय में पढ़ने वाले आते होते। छात्रों के लिए सिसक-सिसक कर मर नहीं जाते चरवाहा विद्यालय। सिंदुर-टिकुली बांटने से कौन सा विकास होता है? सिवाय अखबारों में बांटने वाले की तस्वीर छपने के और कौन सा भला हुआ उस कवायद का, कोई तो बताए। हप्प-हप्प करके सवालों को खा जाने की उनकी अदा पर मर मिटने वाले भी कब तक वोट देते?
लालू यादव के सवाल का जवाब तलाशती चरचा जारी रहेगी। अगली किस्तों में श्री कौशल शुक्ला कुछ तथ्यों के साथ आपके सामने होंगे।
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009
गलतियां करें आप, खामियाजा भुगते देश?
अब आयें लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान के संदर्भों पर। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी लोक सभा चुनाव के इन दोनों मोहरों में सीट बंटवारे को लेकर आजकल रस्साकशी चल रही है। यूपीए के इन दो महत्वपूर्ण सिपहसालारों में मान-मनौअल के पैंतरे चल रहे हैं। बिहार में सोलह बनाम चालीस का पासवान ने जो पासा फेंका है, वह लालू को कबूल नहीं, मगर वे यह भी नहीं चाहते कि दो की लड़ाई का फायदा तीसरे को यानी जदयू-भाजपा नीत राजग को मिल जाये। यही कारण था कि पिछले दिनों लालू जा पहुंचे पासवान के घर। कुछ देर रुके औऱ फिर निकल पड़े अपनी राह। क्या बात हुई यह तो वे ही जानें, पर हवा उड़ी कि राजनैतिक बिसात पर दांव खेलने और जीतने की कला में माहिर तथा खुद को किंग मेकर कहने वाले मैनेजमेंट गुरु लालू ने पका ली अपनी खिचड़ी, मना लिया रुठ जाने वाले पासवान को। पर, तमाशा तो आखिर तमाशा है। दूसरे ही दिन पासवान के पलटवार से पता चला कि नहीं, बात जमी नहीं, बल्कि वहीं की वहीं अटकी हुई है। पासवान की बातों में इशारा साफ था कि गेंद लालू के पाले में ही है, उन्हें ही अभी मुद्दों को मोड़ देना है। संघर्ष तेज, मशक्कत जारी, निगाहों में बढ़ता इंतजार। फिर मैनेजमेंट गुरु का नारा आया-इस बार दलित प्रधानमंत्री चाहिए। सफलतम राजनीतिज्ञ का बेहतरीन दांव। दलितों को रिझाने के साथ उन्हें पासवान से भटकाने का बेजोड़ हथियार।
पर, लालू के दलित प्रेम का यही नारा देश के लिए हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई के नारे की तरह खतरनाक है। इक्कीसवीं सदी के इस दौर में और आर्थिक मंदी से जूझ रहे देश में जहां हर बड़ा-छोटा, अमीर-गरीब अपनी रोजी-रोटी की चिंता कर रहा है, वहां यह नारा खतरनाक है। खून-खराबे को आमंत्रित करने वाला, एक बड़ा वर्ग भेद कायम करने वाला नारा है यह। लोगों को याद होगा, जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो उनके दिल में भी पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के प्रति सहानुभूति उपजी थी। उन्होंने वर्षों तक पेंडिंग पड़े मंडल आयोग की सिफारिशें एक झटके में लागू कर दी थीं। तब वीपी सिंह के सामने देश के नौजवान धू-धू कर जलने लगे थे और जलने लगा था पूरा देश। जिन गांवों में लोग जात-पांत भूल कर एक दूसरे के दुख-सुख में बिना भेदभाव के शामिल हो रहे थे, वहां लकीरें खिंच गयीं और बिना वितंडा शुरू हो गयी खूनी भिड़ंत। बसें-ट्रेनें रोककर और जाति पूछ-पूछ कर लोगों को मारा-काटा जाने लगा। मंडल कमीशन से शुरू हुआ वर्ग संघर्ष आज तक कायम है, रोज-ब-रोज गहरा रहा है। जिस आरक्षण का प्रावधान देश में दस वर्षों के लिए ही किया गया था, उस पर अब राजनीति जड़े जमा चुकी हैं औऱ इसके खत्म होने के आसार खत्म हो गये हैं।
सवाल यह है कि अपनी जीत और अपनी पार्टी के वजूद को बचाने के लिए सब कुछ करने वाले लालू प्रसाद यादव को क्या हक है कि वे आम जनता को बरगलाते हुए समस्याओं से उलझे देश में एक नया वितंडा खड़ा करें? वह भी तब, जबकि अभी यही साबित होना है कि दलितों का मसीहा कौन है? और दलित प्रधानमंत्री की जिद ही क्यों? सवाल यह है कि दलितों के नाम पर पूरे देश की उपेक्षा क्या जायज है? यहां सवाल यह भी है कि साठ साला आजादी के बाद भी यदि देश में कोई है जो दलित कहे जाने के लायक है तो दोष किसका है? क्या लालू और पासवान जैसे नेताओं का कोई दोष नहीं, जो खुद तो वर्षों से सत्ता पर काबिज होकर मजा लूट रहे हैं और दलित के नाम पर भी खुद को ही आगे पेश कर दे रहे हैं? क्या वे भी दलित ही हैं? और खुद के फायदे के लिए दलित प्रधानमंत्री का नारा देकर क्या वे देश को फिर एक लंबे और अंतहीन खूनी संघर्ष में झोंकने की जुर्रत नहीं कर रहे? सवाल यह भी है कि वर्ग भेद को जिंदा करने वाले वाले और उसे मजबूती प्रदान करने वाले ऐसे नेता को आखिर देश कब तक झेलेगा? उनकी गलतियों का खामियाजा आखिर देश क्यों भुगते? फिलहाल इतना ही, ग्रेट इंडियन तमाशे को लेकर बहस लायक मुद्दों पर अभी चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।
शनिवार, 21 फ़रवरी 2009
लो, आप तो पलटी मार गये दादा
तो पहला सवाल - दादा, आप अपने आप को क्या समझते हैं? इंसान या भगवान? इंसान समझा होता तो आपको मालूम होता कि आपके कहने से कोई कैसे चुनाव हार सकता था और फिर आपके पलटने से कोई कैसे जीत सकता है? सवाल ठीक है न दादा? या आप खुद को भगवान समझते हैं? आपको लगा कि मेरी जुबान से श्राप निकल गया है तो सामने वाले को यह श्राप लग ही जायेगा, इसलिए तुरंत पलटी मार गये? तो क्या भगवानों को इतनी जल्दी पलटी मारना क्या ठीक है? मुझे मालूम है, आप खुद को भगवान मानने की भूल कतई नहीं कर सकते। तो क्या मैं आपसे यह पूछने की हिमाकत कर सकता हूं कि आप खुद को क्या समझते हैं? क्या यह सिर्फ एक बूढ़े का भीषण प्रलाप था? मैं यह नहीं कहना चाहता कि यह एक किस्म का पागलपन था। या पागलपन ही था? यह सवाल पूरी शिद्दत के साथ आपके सामने सुरसा के मुंह की तरह फैला और चौड़ा हुआ खड़ा है। जवाब आपको ही देना है, दादा।
दूसरा सवाल - दादा, इक्कीसवीं सदी में जहां मानव चांद से आगे निकलकर मंगल और शनि तक जा पहुंचा है, उस दौर में विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देश में क्या श्राप और आशीर्वाद से ही राजकाज चलाया जायेगा? कामरेडों की आत्मा को आपकी बातों से कितना सुकून मिलेगा, यह तो उनकी आत्मा ही बतायेगी, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में जहां राजनीति तक का कारपोरेटाइजेशन हो चला है, लालकृष्ण आडवाणी जैसे हिन्दुत्व विचारधारा वाली पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बुजुर्ग नेता युवाओं को रिझाने के लिए साइट औऱ एसएमएस का सहारा ले रहे हैं, उस दौर में कुछ लोगों को साक्षात विजयी भव का आशीर्वाद देकर आपने कितना ठीक किया? बताइए दादा, बताइए।
तीसरा सवाल - और दादा, यह आशीर्वाद यदि एक सामान्य बूढ़े का भीषण प्रलाप था तो हमें लगता है कि आप ही देश को बताएं कि इस प्रकार के एक सामान्य मानसिकता वाले किसी बुजुर्ग को क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी की शोभा बढ़ानी चाहिए? यदि नहीं तो क्या आपको तत्काल अपनी कुर्सी से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए? और यदि आप कुर्सी से इस्तीफा नहीं देते तो क्या यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि आप भी, बुरा मत मानियेगा दादा, आप भी कुर्सी पर चिपके रहने वाले एक वैसे सामान्य नेता से अलग नहीं हैं, जो कुर्सी पर बने रहने के लिए तमाम तरह की तिकड़म करते रहते हैं? मेरा मानना है कि पब्लिक तो सब जानती है, पर एक बार जवाब आपके मुंह से भी आ जाये।
दादा, चुनाव का मौसम चल रहा है। देश में जब से लोकतंत्र की स्थापना हुई है, चुनाव प्रणाली शुरू हुई है, तभी से एक महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित चल रहा है। आप तो विपक्ष की राजनीति में माहिर रहे हैं। चनावों में आपने देखा होगा कि 51 वोट पाने वाला जीत जाता है, विजयश्री का माला पहन कर आशीर्वाद लेता घूमता है, जबकि 48 वोट पाने वाला हार जाता है, सिर छुपा लेता है, भरे-पूरे लोकतंत्र में नकार दिया जाता है। उसके हारने के साथ ही खत्म हो जाती है 48 वोटों की अहमियत और खत्म हो जाते हैं इन वोटों के सपने। दादा, क्या आपको नहीं लगता कि इक्कीसवीं सदी के वैश्विक और मंदी से भरे इस दौर में देश को इन अड़तालीस वोटों के महत्व को समझने की बड़ी जरूरत है। इसके लिए आप जैसे पहुंचे हुए और महान लोगों के विचार किसी काम आ सकते थे। देश का नक्शा बदला जा सकता था। पर, आप तो श्राप और आशीर्वाद बांटते चल रहे हैं, देश आपसे कौन सी उम्मीद पाले? जिन सभी को आपने विजयी भव का आशीर्वाद दिया, आपको पता है कि उनमें से कितने चुनाव लड़ेंगे और कितने चुनाव नहीं लड़ेंगे? यदि नहीं पता तो पूरी गंभीरता से एक आम भारतीय के नाते मेरा सवाल अपनी जगह कायम है कि यह आपने क्या किया? बताइए दादा, यह आपने क्या किया? मैं आपका जवाब चाहता हूं।
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009
दादा, आपने ये क्या कह दिया!
सबसे पहला सवाल-क्या आपको नहीं लगता कि आप बूढ़े गये हैं? बूढ़ा का मतलब बलहीन, तेजहीन। बात-बात पर झल्लाने वाला, हमेशा अपने मतलब की धुन में मगन रहने वाला। आपने भी कुछ वैसा ही तो नहीं किया? वो विपक्षी सांसद थे। कहीं और नहीं, संसद में हल्ला कर रहे थे। दादा, चुनाव सर पर है और आप देख ही रहे हैं कि पब्लिक के पास जाने लायक और वोट मांगने लायक देश में मुद्दों का अभाव चल रहा है। बड़ी-बड़ी हस्तियां मुद्दे तलाश रही हैं। तो यह तो निश्चित ही है कि इस तरह के हल्ले होंगे। यह तो आम पब्लिक भी जान रही है। इसमें क्या इतना झल्लाने की जरूरत थी कि उन्हें अगले चुनाव में हार जाने का शाप देना आपके लिए जरूरी लगने लगा? और शाप भी लोकतंत्र के मसीहाओं की रखवाली करने वाले सरदार की ओर से? सरदार इतना बलहीन, तेजहीन! मगर नहीं, मुझे तो साफ लग रहा है कि यह संसद के मजबूत अध्यक्ष का नहीं, एक लाचार बूढ़े का भीषण प्रलाप था। आप बताएं कि क्या नहीं था? और इससे आगे की बात। दादा, 58 साल के बाद एक इंसान को आप किरानी बनने के लायक नहीं समझते, तो इसके पार का आदमी देश चलाने के लायक क्यों समझ लिया जाता है? यह ऐसा सवाल है, जिसका मौजूं मिजाज आपके संदर्भों में अब आपके ही सामने है। जवाब दे सकते हैं तो दीजिए।
दूसरा सवाल - दादा, क्या आपको नहीं लगता कि आपके शाप के बाद पूरे देश मे एक बड़ी बहस शुरू हो जानी चाहिए? बहस यह कि संसद में सांसदों को हल्ला करना चाहिए या नहीं? इस हल्ले का अर्थ मैं तो विरोध की आवाज से लेता हूं। आप बतायें क्या यह गलत है? मुझे लगता है, आप भी इसे विरोध की आवाज ही कहेंगे। तो सवाल यह है दादा, विपक्ष के लोग विरोध की आवाज उठाएं या नहीं? उठाएं तो उनका अंदाज क्या हो? दादा, क्या आपको नहीं लगता कि पूरे सिस्टम में नकारापन बज रहा है। इस नकारेपन में अपनी आवाज ऊपर उठाने के लिए उसे तेज ही तो करनी होगी। दादा, आतंकवादी विस्फोट पर विस्फोट कर रहे थे औऱ हमारे गृहमंत्री कपड़े बदलने में मशगूल थे। कुछ बोलने के लिए बोला गया तो कहने लगे कि क्या मैं चिल्लाऊं? आप तो इस बात के गवाह हैं कि कैसे उनकी हरकतों के खिलाफ पूरा देश चिल्ला रहा था। इसी चिल्लाहट का नतीजा तो था कि सरकार चेती और उन्हें उनके पद से हटाया गया।
और सबसे अहम सवाल - दादा, क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी भीष्म पितामह की तरह सत्ता के प्रति समर्पित होती है? क्या उसका हर काम, हर मुकाम सत्ता शीर्ष की रखवाली तक समाप्त हो जाता है? औऱ क्या आप इससे इनकार करेंगे कि ऐसा होने पर ही तो महाभारत हुआ? देश ने तो देखा है। गलत-सही की बात मैं नहीं कर रहा, लेकिन इतना तो आप भी मानेंगे दादा कि इसी रास्ते पर चलते हुए आप अपने उन साथियों और घर से बिल्कुल अलग हो गये, जो आपके हमकदम थे, हमसफर थे। सवाल यह कि आम आदमी क्या सबक ले? निष्ठाएं क्या इतनी ही तेजी से बदली जानी चाहिए?
दादा, मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि मुझे आपकी बातों से सरासर इत्तेफाक है। मगर सवाल हैं कि सर उठा रहे हैं। इस देश में एक सबसे बड़ी खराबी थी, वह यह थी कि सवाल उठाने वालों का मुंह बंद कर दिया जाता था। यह सामंती प्रथा का लक्षण था। लोकतंत्र का मतलब ही होता है आवाज की रवानगी। इस रवानगी पर रोक लग गयी, सवाल उठाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो जवाब कहां से आएंगे? दादा, आप बताएं, जवाब कहां से आएंगे? सांसद अगले चुनाव में हारें या जीतें पर सवाल यह है कि सवाल तो फिर भी उठाना होगा, जवाब फिर भी ढूंढ़ने होंगे। होंगे कि नहीं?
