रविवार, 3 मई 2009

लालू मचायेंगे प्रलय, उन पर कार्रवाई कौन करेगा?

लालू को सुनना सदा से ही दिलचस्प रहा है। ग्रेट इंडियन तमाशा ऊर्फ महासंग्राम ऊर्फ आम चुनाव में उनकी जुबां पर कुछ ज्यादा ही तुर्शी छायी है, मिजाज कुछ ज्यादा ही तड़क दिख रहा है। लालू यानी चारा घोटाला के आरोप में जेल जाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, वर्तमान में केन्द्रीय रेलमंत्री, तथाकथित मैनेजमेंट गुरु, हंसोड़-मजाकिया, पल भर में दुश्मन को दोस्त और दोस्त को दुश्मन बनाने-बताने में माहिर। लालू यानी कभी समाजवाद को जिंदा करने वाले जेपी का साथ देने वाला एक बेजोड़ अनुनायी भी। लालू को याद होगा कि इन्हीं समाजवादियों के प्रयास व एकजुटता से कभी देश की दुर्गा कही जाने वाली इंदिरा गांधी तक को चुनाव हार जाना पड़ा था। तब तो इंदिरा जी ने प्रलय मचाने की घोषणा नहीं की थी। लोकतंत्र में प्रत्याशियों के वश में परचा दाखिल करना और चुनाव लड़ना ही तो होता है। परिणाम तो जनता देती है। पब्लिक ने फैसला किया और इंदिरा ने हार को स्वीकार किया। और इंदिरा जी ही क्यों, बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं, पर कभी प्रलय आ जाने या मचा देने का ऐलान नहीं करते। मगर, लालू कर सकते हैं। अभी शनिवार को ही उन्होंने ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि यदि वे सारण या पटना से चुनाव हार गये तो प्रलय आ जायेगा।

लालू को सुनना जिन्हें दिलचस्प लगता होगा, उन्हें तो वाकई मजा आया होगा। हंसी फूटी होगी कि वाह, लालू ने क्या बोला है इस बार। मगर, लालू हंसी खेल में ही बड़ी-बड़ी बातें बोल जाते हैं, इसे सभी जानते हैं। चारा घोटाला के दौरान जब उन्होंने कहा था कि वे जेल गये तो वहीं से बिहार की सत्ता संभालेंगे तो लोगों ने हंसा था, मजाक उड़ाया था। मगर, उनके जेल जाते ही राबड़ी देवी जैसे ही गद्दी पर बैठीं, लोगों को लालू की बातों की गंभीरता समझ में आ गयी। अब लालू ने कहा है कि वे चुनाव हारे तो प्रलय आ जायेगा तो इसका भी बड़ा मतलब है। लोग भले हंस लें, पर इसका मतलब तो निकलेगा जरूर। क्या निकलेगा, यह उनके चुनाव हारने के बाद ही पता चल पायेगा। लोकतंत्र के मसीहा कहे जाने वाले लोग इससे पहले उनकी बातों का मतलब निकाल लें तो और बात होगी।

अगली बात। अभी थोड़े दिनों पहले इसी ग्रेट इंडियन तमाशे के दौरान वरुण गांधी ने कुछ उल-जुलूल बक दिया था और वह न केवल जेल चले गये, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन पर रासुका तक लगा दिया। यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन था। अब लालू जो बोल रहे हैं, उसे आयोग किस तरह ले रहा है? क्या यह आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? वे इस बार के चुनाव में दो जगहों से मैदान में हैं। सारण में मतदान हो चुका है, जबकि पटना में चौथे चरण में मतदान होना है। सारण में मतदान समाप्त होने के बाद से ही यह चर्चा आम है कि लालू हारेंगे। चर्चा निश्चित रूप से लालू के पास भी पहुंची होगी। उन्होंने भी आकलन किया होगा। अब उनका घबराना यही बता रहा है कि उन्हें भी अपनी हार का अहसास हो रहा है। तो पटना सीट बचाने की मशक्कत अब उनके लिए वक्त की जरूरत बन गयी है। बताया जाता है कि पटना से भी लालू को तगड़ी टक्कर मिल रही है। ऐसे में ही उनका बयान आया है कि वे हारे तो प्रलय मच जायेगा। यह सरासर धमकी है। पर, वे धमकी किसे दे रहे हैं, यह समझने की जरूरत है। समझने की जरूरत यह भी है कि वे यह धमकी दे कैसे पा रहे हैं?

लोगों को याद होगा, एक केजे राव ने ठान लिया तो बिहार के चुनावों में चूं-चटाक तक नहीं हुआ था। पत्ता तक नहीं खड़का था। लालू को याद होगा कि एक यूएन विश्वास ने ठान लिया था तो चारा घोटाला की सारी परतें अपने आप खुलती चली गयी थीं और यही लालू जेल पहुंच गये थे। एक भरे-पूरे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक लालू पूरे सिस्टम को चैलेंज नहीं कर सकते। समाज को धमकी नहीं दे सकते। लालू भले कहते रहें कि उनके हारने से प्रलय आ जायेगा, मगर वे मान लें कि कोई प्रलय नहीं आयेगा। समाज जब जागता है तो अच्छे-अच्छों को किनारे लगा देता है। लेकिन, यह तो बाद की बात है। ताजा मसला यह है कि जब देश के बड़े-बड़े दिग्गज आचार संहिता की मार से थर्राये चल रहे हैं, शब्दों और बातों तक से किनाराकशी किये घूम रहे हैं, वैसे में लालू की जुबां आग पर आग कैसे उगल पा रही है? उनके मन जो आ रहा है, बोले जा रहे हैं और खूब बोल रहे हैं। प्रलय की घोषणा के दौरान ही उन्होंने सुशील मोदी और नरेन्द्र मोदी को एक दूसरे का साढ़ू कहा। सवाल यह है कि उनकी इस जुबां पर कौन लगायेगा लगाम? कौन?? चुनाव आयोग उन्हें जेल पहुंचायेगा या प्रदेश सरकार उन पर रासुका लगायेगी?

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

जार्ज, शरद और मुजफ्फरपुर

यह राजनीति का वीभत्स चेहरा है जो इस बार के चुनाव में मुजफ्फरपुर संसदीय क्षेत्र में नजर आया है। उफ, इतना कुरूप, इतना कुत्सित! जदयू के गठन से लेकर हाल तक महान समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडीस पार्टी के गार्जियन समझे जाते थे। अभी कुछ महीनों पहले राजगीर में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में इस पार्टी के हालिया कर्ता-धर्ता व पुरोधा बने तथा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरेआम कहा था कि जार्ज जहां से चाहेंगे, टिकट दिया जायेगा। उन्होंने उन्हें खास तौर से मुजफ्फरपुर से टिकट देने का न केवल एलान किया था, बल्कि तब तक अभिभावक तुल्य रहे जार्ज से इसका वादा भी किया था। पर, देखते ही देखते राजनीति पलटी खा गयी। पार्टी पुराधाओं के लिए जार्ज बीमार हो गये। बीमार भी ऐसे कि लोकसभा के चुनाव के लिए तो नक्कारा बताये गये, पर राज्यसभा के लिए दरवाजा खोलकर रखा गया। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने उन्हें इस बाबत एक पत्र लिखा। मसौदा था- शरद यादव जार्ज के गिरते स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे और नहीं चाहते थे कि चुनाव लड़कर और प्रचार की जहमत में फंसकर उनकी सेहत और गिरे। हां, इसी पत्र में उन्होंने जार्ज को सीट खाली होने पर बिहार से राज्यसभा का सांसद बनाने का आश्वासन भी दे डाला था। मगर, वाह रे जार्ज।जिस दिन शरद ने उन्हें चिट्ठी लिखी, उसी रोज उन्होंने पलटकर जवाब भेज डाला। इरादा साफ था- समाजवादी हूं, राज्यसभा में बैठना कबूल नहीं और सेहत खराब तो फिर राज्य सभा से भी भेजे जाने का प्रस्ताव क्यों? जार्ज नहीं माने। नतीजा- मुजफ्फरपुर से वे निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। परिणाम अभी आना है।

सवाल यह नहीं है कि जार्ज मुजफ्फरपुर से जीतेंगे या हारेंगे। जीते तो जीत उनके लिए कोई नई नहीं होगी। कोई क्रांति नहीं होगी, कोई नयी पार्टी नहीं बनेगी, बस वे फिर सांसद बन जायेंगे। हारे तो उनके लंबे जीवन सफर में बस एक लाइन जुड़ जायेगी कि जार्ज जिंदगी की आखिरी पारी में चुनाव हार गये। पर, इसी के साथ गाथा बन जायेगी शरद की चिट्ठी के जवाब में पलटकर उनका चिट्ठी लिखना, सारी आशंकाओं को दरकिनार कर हिम्मत और जोश के साथ आखिरी लड़ाई में भी उतरना, पर्चा भरना, रोड शो करना, लोगों से मिलना, अपनी बातों को मजबूती से रखना आदि...। सवाल यह भी नहीं है कि जदयू के अभिभावक को पार्टी अध्यक्ष ने क्यों नहीं समझा चुनाव लड़ने के काबिल? राजनीति है चलता है। पर, यह राजनीति की किसने है, मैं यहां उसकी चर्चा करना चाहता हूं।

वैसे तो जो चर्चाएं हैं, उसके मुताबिक सारा खेल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दरो-दरवाजों और कांग्रेस के मुहानों से खेला जा रहा है, जिसके पीछे दांव पर है चुनाव के बाद सरकार के गठन की रणनीति और जिसकी बिसात से लालू-रामविलास को गायब करने के बदले जार्ज से पल्ला झाड़ने की है नीति। पर, राजनीति के इस खेल के परवाने पर जिस व्यक्ति ने हस्ताक्षर किये हैं, उनका नाम है शरद यादव। इतिहास उन्हें याद रखेगा। क्योंकि, इतिहास को यह याद है कि वही शरद यादव कभी इंजीनियरिंग का मेधावी छात्र हुआ करते थे और कभी इनके समाजवादी विचारधारा से खुश होकर ही जार्ज ने उन्हें टिकट दिया था। यह २७ वर्षीय शरद का पहला राजनैतिक सफर था, जिसे जार्ज के आशीर्वाद से आगे चलने-बढ़ने और मुकाम पाने का रास्ता मिला था। उस एक आशीर्वाद से शरद की जो राजनैतिक यात्रा शुरू हुई , वह आज तक चल रही है, चलती जा रही है। तब जार्ज समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे। और यह वही शरद हैं, जो बाहैसियत जदयू अध्यक्ष जार्ज का आखिरी टिकट काट चुके हैं। दिनकर ने कुरुक्षेत्र में कहा था- पूजनीय को पूज्य समझने में जो बाधा क्रम है, यही मनुज का अहंकार है, यही मनुज का भ्रम है। मेरा मानना है, यही राजनीति का वीभत्स चेहरा भी है। है कि नहीं?

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

कार्ड पर ट्रंप तो बौखलाहट बढ़ी

यह ग्रेट इंडियन तमाशे का ऐसा परिस्कृत और संशोधित बिहारी रूप है , जिसमें दुश्मन को दुश्मन की चाल से ही मात देने की तैयारी पूरी हो गयी है और अपने-अपने फन में माहिर फनकारों के भी छक्के छूटे हुए हैं। बौखलाहट में गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप, यहां तक कि उलटबासी बयानबाजियों के साथ केस दर्ज होने, जेल जाने और जमानत लेने का दौर तक शुरू हो चुका है। बातों की शुरुआत बिहार से और गलबहियां डाले घूम रहे राजद सुप्रीमो लालूप्रसाद यादव व लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान बनाम कांग्रेस से की जाय। टिकट बंटवारे के वक्त ही लालू-रामविलास के मतलबी गठबंधन ने बिहार की चालीस सीटों में सैंतीस खुद रख ली और कांग्रेस के लिए तीन सीटें छोड़ दीं। इस पैंतरे के जवाब में अगले ही दिन कांगेस ने फुफकारते हुए सभी सीटों पर लड़ने की घोषणा करते हुए लालू-रामविलास गठबंधन के लिए तीन सीटें छोड़ीं तो इस दांव को गठबंधन ने मजाक समझा और मुस्कुराते हुए बातों को हंसी में उड़ा डाला। अब जबकि द्वितीय चरण के चुनाव के लिए नामांकन कंपलीट है और अन्य चरणों के लिए भी उम्मीदवारों के लिए तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है तो गठबंधन पूरी तरह सकते में है। क्यों? दरअसल लालू-रामविलास को कांग्रेस ने उन्हीं की तर्ज पर जवाब देने की तैयारी में समर सजा दिया। तीन-सैतीस का मुकाबला वैसे तो अब चालीस-चालीस पर पहुंच चुका है पर मतलबी गठबंधन की जो सबसे बड़ी चिंता है, वह कांग्रेस का अपने पुराने चोले को उतार कर उसी रंग को अख्तियार कर लेने को लेकर है, जिस रंग में लालू-रामविलास खुद को रंगे बताते हैं। यानी कार्ड पर कार्ड और ट्रंप पर ट्रंप। लालू के साले साधु यादव ने जब परिवार से बगावत की तो कांग्रेस ने उन्हें शरण दे दी। अब उन्हें पश्चिमी चंपारण से टिकट देकर कांग्रेस ने सूबे के यादवों पर बड़े सलीके से डोरे डाल दिये हैं। इतना ही नहीं, यादव उम्मीदवारों को टिकट देने में कांग्रेस इस गठबंधन से आगे ही निकलती दिख रही है। उधर, राजद के माय (मुसलमान-यादव) के दूसरे टार्गेट मुसलमान भी कांग्रेस में तरजीह पा चुके हैं और उनके बीच अब तो प्रधानमंत्री कौन पर विचार चलने लगा है। मतलबी गठबंधन का अगला टार्गेट पिछड़ी जाति के लोग और सवर्ण दोनों हैं, जबकि शुरू से कांग्रेस का वोट बैंक रही इन दोनों जातियों में कांग्रेस के सूबे में खड़ा हो जाने से एक नयी आस जग गयी है। द्वितीय चरण में उत्तर बिहार की जिन बारह सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पूर्ण हुई है, उसका आकलन करने से इसी तस्वीर का पता चलता है। वफापरस्ती के बदले जफापरस्ती का तर्जुमा कुछ यूं है कि लालू-रामविलास-नीतीश के बागी जिन्होंने भी दरवाजा खटखटाया, उन्हें कांग्रेस में टिकट मिला। साधु यादव, रमई राम, गिरधारी यादव, हिंदकेशरी यादव, लवली आनंद ऐसे ही कुछ नाम हैं। अब बौखलाहट देखिए। लालू की धर्मपत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने सारण में एक सभा को संबोधित करते हुए विकास मैन नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह को एक-दूसरे का साला-बहनोई कह डाला। नीतीश बौखलाये और एलान किया कि ऐसी गुंडागर्दी नहीं चलेगी। केस दर्ज हुआ और इस मामले की सीडी चुनाव आयुक्त दिल्ली ले गये। इस मामले का अभी एक ही दिन गुजरा कि पत्नी से एक कदम आगे बढ़ते हुए लालू जी ने पूर्णिया में एक सभा को संबोधित करते हुए यह कह डाला कि यदि वे गृह मंत्री होते तो वरुण गांधी को बुलडोजर से कुचलवा देते। यह भाषण कुछ वरुण गांधी के भड़काऊ भाषण जैसा ही तो था। अंजाम , लालू का गिरफ्तारी वारंट निकल चुका है। यानी ग्रेट इंडियन तमाशा बिहार में रवानी पकड़ चुका है। लोग आशंकित है। रवानी से नहीं, रवानी के रक्तरंजित हो जाने से, जिसके लिए बिहार कुख्यात रहा है औऱ जिस पर एक बड़े संकल्प और मशक्कत के साथ काबू पाने का सफलतम प्रयास चल रहा है। फिलहाल इतना ही। आम चुनाव को लेकर चर्चा जारी रहेगी।

रविवार, 5 अप्रैल 2009

मौका है तो मौके को समझना ही पड़ेगा

लोकतंत्र जीवित रहे, सही और सच्चे रास्ते पर चलता रहे, एक सच्चा देशवासी यही तो चाहेगा। ऐसा नहीं होने पर, या इस बाबत कुछ नहीं कर पाने पर आदमी के अंदर जो होता है, उसकी तस्वीर यहां आदरणीय पुरुषोत्तम जी की टिप्पणियों से साफ होती है। लोकतंत्र के महापर्व को लेकर बजते बिगुल के बीच सीन गंभीर, समझने की जरूरत पर बल देते हुए जो इशारा किया गया था, उसे पढ़ने के बाद उन्होंने जो जिज्ञासा प्रकट की है, उसे हूबहू यहां पेश किया जा रहा है। उनकी बातों में जो सवाल छिपे हैं, वह गंभीर सीन को समझने की ओर ही मजबूत इशारा कर रहे हैं। पुरुषोत्तम जी ने जो लिखा -

"शुक्ला जी, सवाल यह भी है कि नेताओं की अवसरवादिता अब कोई मुद्दा है क्या? मुझे तो लगता है कि नेता होने की पहली शतॆ ही है अवसरवादी होना? ऐसे में अवसरवादिता की बात की जाए तो केवल लालू-पासवान ही क्यों? अवसरवादिता पूरे समाज में अपने दमखम के साथ मौजूद है। हम-आप अपने अगले कदम से पहले नफा-नुकसान का आकलन नहीं करते क्या? हां, इससे सहमत हुआ जा सकता है कि नेताओं की अवसरवादिता से नुकसान पूरे समाज और देश को होता है, इसलिए इनकी अवसरवादिता पर टिप्पणी और चरचा करने के अधिकारी आप हैं। बात फिर वहीं आती है कि लालू-पासवान ही क्यों? यह सवाल तो कांग्रेस-भाजपा से लेकर तमाम छोटे-बड़े दलों के लिए है। कभी माया की सरकार को समथॆन देने वाली भाजपा आज उसे जी भर कर कोस रही है तो आप उसे क्या कहेंगे। पासवान के समथॆन से चल रही सरकार की अगुवाई कर रही कांग्रेस रामविलास के खिलाफ उम्मीदवार खड़ाकर उन्हें कोसती है तो इसे अवसरवादिता की बजाय आज की राजनीति की जरूरत ही क्यों न मान लें। और फिर सब तो यही कर रहे हैं। ममता, जयललिता, फारूक, चंद्रबाबू, नवीन पटनायक कल तक भाजपा के साथ थे, अब नहीं है। नीति और सिद्धांतों का ढिंढोरा पीटने वाले वामपंथी अब कांग्रेस पर तमाम तोहमतें लगाते हैं तो क्या यह भरोसा होता है कि ये कभी सरकार के साथी थे? सीधे-सीधे यही कहा जाए तो भी क्या बुरा है कि वैसे राजनेता और दल तो खोजने पर ही मिलेंगे जो वक्त और जरूरत के मुताबिक साथी न बदल रहे हों। वरना, वाकई यह कौन सोचता था कि लालू-मुलायम-पासवान एक साथ खड़े नजर आएंगे।"

अब सवाल यह है कि अर्थ तंत्र की आग में हर दिन भस्म होते जा रहे या भस्म किये जा रहे मूल्यों और अवधारणाओं के बीच देश की आम व भोली-भाली जनता क्या करे? चुनाव का मौका है, चुनना तो पड़ेगा। लेकिन, चुनाव समझदारी से किया जाय, जरूरत इसकी है। पांच साल के बाद मौका आया है तो इस मौके को समझना ही पड़ेगा। और मौके को समझने के लिए आपके पास होने चाहिए सिर्फ दस रुपये। कोई इतना तो कर सकता है कि उसके सामने जो पहलवान ताल ठोंक रहे हैं, उसे ठोंक बजा लिया जाय। उनमें से किसी का चयन करने से पहले उनके बारे में सबकुछ पता कर लिया जाय। सरकारी सुविधाओं के अनुसार अब आम जनता के पास सूचना का यह अधिकार है कि वह अपने जिले के चुनाव अधिकारी के पास दस रुपये का ड्राफ्ट जमा कर अपने प्रत्याशी के बारे में वह संपूर्ण जानकारी हासिल कर सकता है, जो हलफनामे में पेश किया गया है। इतना तो कोई भी मानेगा कि जान-समझ कर किये गये काम में गल्तियों की संभावना कम रहती है या फिर कम से कम यह मलाल तो नहीं होता कि जो मौका था, उसकी नजाकत को नहीं समझ पाये। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव को लेकर अभी चर्चा जारी रहेगी। फिलहाल इतना ही। पुरुषोत्तम जी को साधुवाद कि उन्होंने चर्चा आगे बढ़ायी।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

सीन गंभीर, समझने की जरूरत

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देश में फिर लोकतंत्र की परीक्षा की घड़ी आ चुकी है। आजादी प्राप्ति के बाद पंद्रहवीं बार। बड़े-बड़े वादों, मजबूत लगने वाले इरादों , नये गानों और मदहोश कर देने वाले तरानों के साथ चुनावी पहलवान तो ताल ठोक ही रहे हैं, बरसाती मेढक की तरह कुछ वैसे लोग भी समाज के पैरोकार बने टर्राने लगे हैं, जिनका किसी से कभी कोई न तो नाता रहा, न सरोकार दिखा। पूरा माहौल गफलत का ही बना दिख रहा है। हर कोई एक दूसरे को समझाने की समझदारी दिखा रहा है। अब तक नाच रहे थे, गा रहे थे, तमाशा बने सरेआम तमाशा दिखा रहे थे, पर अभी समझा रहे हैं। शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं। सीन गंभीर है। शिकारी शिकार को फंसने से बचने की सलाह देने लगा है। जाल गहरा, साजिश गहरी नहीं तो और क्या है? अभी चार साल पहले बिहार में विधानसभा चुनाव हुए थे। रामविलास पासवान पूरे सूबे में घूम-घूम कर लालू को उखाड़ फेंकने का आह्वान कर रहे थे और सरेआम सत्ता की चाबी नीतीश कुमार को थमायी थी। अब कोई भी रामविलास पासवान को लालू के साथ गलबिहयां करते हंसते-मुस्कुराते बड़े-बड़े फोटुओं में देख सकता है। कांग्रेस की सरकार बचाने के लिए सबकुछ कर चुकने वाले समाजवादी पार्टी के कर्ता-धर्ता मुलायम सिंह यादव स्वतंत्र हो गये हैं और लालू-रामविलास के साथ त्रिवेणी बना चुके हैं। कांग्रेस न होती तो लालू का क्या होता, यह तो वे ही बेहतर बता सकते हैं, पर चुनाव में सतह पर आ चुकी तथाकथित वजूद की लड़ाई के जेरेसाया यह तालमेल ध्वस्त हो चुका है और कांग्रेस त्रिवेणी के खिलाफ अपना पहलवान मैदान में उतार रही है। ऐसे में बरसाती मेढक अपनी टर्र-टर्र से लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं ...लोभ में उसमें फंसना नहीं। फंसें नहीं तो क्या करें? बगावत के सुरों के बीच आखिरकार पस्ती का आगाज भी बुलंद है और उसकी आवाज इस बगावत के साथ ही सुनी जा सकती है - हम अलग-अलग लड़ रहे हैं, पर चुनाव के बाद हम मिलजुलकर सरकार बनाएंगे। वाह भई वाह। पब्लिक क्या है? और जो नहीं है, आप तो उसे वही समझते हैं। मुश्किल घड़ी है, कम से कम बिहार - यूपी - झारखंड में सीन गंभीर ही है। सवाल चयन का नहीं, सब्र की परीक्षा का उठ खड़ा हुआ है। ऐसे में मुझे किसी को समझाने का कम, खुद समझने का मौका ज्यादा नजर आता है। जी हां, एक-एक पब्लिक को खुद को समझना होगा। समझदारी इस बात की कि आखिर पूरे परिदृश्य को वे किस रूप में देखते हैं और किस रूप में ढालना चाहते हैं। समझना यह होगा कि चूकने की कीमत है फिर पांच साल। परमाणु संधि वाले मुद्दे पर अभी आपने देखा ही है कि किस तरह से पब्लिक से उसके फैसले का अधिकार छीन लिया गया। संसद में नोट लहराते हैं तो लहरायें, अब किसे फिक्र है?? चुनाव आया है तो यह परीक्षा की घड़ी सिर्फ उनके लिए ही नहीं है , जो मैदान में लहरा रहे हैं और भोंपू बजा रहे हैं, उनके लिए भी है, जो जज हैं, जिन्हें फैसला करना है। चुनाव को लेकर चर्चा अभी जारी रहेगी।

सोमवार, 9 मार्च 2009

नंगा न होइए हम्माम में

आप सभी को मेरी तरफ से रंगोत्‍सव की ढेर सारी शुभकामनाएं।

खाइए,

पीजिए,

झूमिए,

सब कुछ कीजिए,

पर, परंपराओं को संभालते हुए,

संस्कारों को सहेजते हुए।

अपनों की याद में,

परायों के सम्मान में।


ईमान में, इनाम में,

महफिले खास में और आम में,

ख्याल रहे,

कभी नंगा न होइए,

वहां . . .

कहां ? ?

जी हां, वहीं . . .

हम्माम में।

बुधवार, 4 मार्च 2009

... तो राबड़ी आज भी सीएम होतीं

अरविंद जी ने पूर्व की पोस्ट 'जंगल राज के भी नियम ध्वस्त हो गये थे' पर अपनी कुछ टिप्पणियां दी हैं। उनकी बातें यहां हू-ब-हू पोस्ट कर रहा हूं। उन्होंने कहा है -
"शुक्ला जी, जनता अब जाति के आधार पर वोट देने लगी है. कोर्ट की तमाम नकारात्मक टिप्पणियों के बावजूद लालू की पार्टी बिहार में दोबारा सत्ता में आई, यह इस बात का परिचायक है कि सामाजिक समीकरण (जनता) तब भी लालू के पक्ष में था. कोर्ट की टिप्पणियों के आपके जितने भी उदाहरण हैं, सभी सन २००० के पहले के हैं. बिहार में इसके बाद भी चुनाव हुए और लालू की पार्टी २००५ तक सत्ता में बनी रही. हाँ, इसके बाद नीतीश कुमार की बिरादरी और राम विलास पासवान के समर्थक लालू के तिलिस्म से बहार निकल गए, जिसकी वजह से लालू से खार खाए लोगों को मौका मिल गया. कुर्मी और दलितों का अगर लालू से मोह भंग नहीं होता तो राबडी आज भी बिहार की मुख्यमंत्री होतीं. आपने लालू-राबडी राज की समीक्षा बहुत एकपक्षीय होकर की है. लालू की देन पर भी कभी गौर कीजिएगा, तो असली तस्वीर नजर आएगी. मेरे गाँव के कन्हाई साव ८० साल की उम्र में १९८८ में मर गए, लेकिन उन्होंने ताउम्र कभी बैलेट पेपर नहीं देखा, सामन्तियों ने कभी वोट डालने नहीं दिया. आज उनका पुत्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहा है तो इसमें सौ फीसदी लालू का योगदान है. आपसे आग्रह है कि लालू राज की समीक्षा कभी आप कन्हाई साव के नजरिए से भी कीजिये, पत्रकारिता समग्र दृष्टि मांगती है. "
अरविंद जी की किसी बात पर कोई मीन-मेख न निकालते हुए मेरा मानना है कि वे अभी इस चर्चा को जारी रखना चाहते हैं, फिर विधानसभा चुनाव के बाद राजद के नेतृत्व में सरकार कैसे बनी, कैसे चली, इसका राज फाश करवाना चाहते हैं। हालांकि, मैं इस चर्चा की आखिरी किस्त लिख चुका हूं। मुद्दे और भी हैं, बातें और भी हैं। अरविंद जी चर्चा को एकपक्षीय करार देने के दौरान शायद उस प्रश्न को भूल गये, जिसके जवाब को तलाशने के लिए इतिहास को खंगाला जा रहा था। किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष पर यह टिप्पणी नहीं थी। फिलहाल मैं तो इतना ही कहना चाहूंगा कि राबड़ी सरकार का फिर से सत्ता में आना सिर्फ जातिवाद के समीकरण का प्रभावी हो जाना नहीं था, यह बड़ी और मतलबी राजनीतिक गठबंधन का प्रतिफल भी था। हालांकि, यह भी इतिहास को खंगालने जैसा ही है। अरविंद जी की बातों का जवाब शायद उस इतिहास को खंगालने में मिल जाये, जब उन्हें यह बताया जाय कि बिहार में राबड़ी सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन क्यों लगा और कैसे हटा? बहस शुरू हो चुकी है, थोड़ी मशक्कत आप भी क्यों नहीं कर लेते अरविंद जी?

मंगलवार, 3 मार्च 2009

जंगल राज के नियम भी ध्वस्त हो गये थे

बिहार से लालू-राबड़ी राज का खात्मा क्योंकर जरूरी हो गया था, यह तब पटना हाईकोर्ट द्वारा निरंतर दी जा रही टिप्पणियों के आकलन से साफ-साफ पता चलता है। गुजरते लम्हों ने भले उन टिप्पणियों की यादें धूमिल कर दी हों, पर उसके अर्थ आज भी इतिहास में सांसें ले रहे हैं। पटना उच्च न्यायालय की समय-समय पर दी गयी टिप्पणियों से साफ-साफ पता चलता था कि बिहार अनाथ हो चुका था और यहां उसकी देखरेख करने वाली सरकार की नितांत आवश्यकता थी। १४ जुलाई १९९७ को न्यायालय ने कहा कि राज्य में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। राज्य सरकार अपने कर्तव्य के निर्वहन की स्थिति में नहीं है। यहां की जनता जंगलराज में रहने को विवश है। इसके ठीक तीन रोज बाद १७ जुलाई १९९७ को कोर्ट की टिप्पणी आयी कि राज्य में पूरी तरह अराजकता है। चूंकि यहां न तो कोई काम करता है औऱ न ही कोई अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति रुचि रखता है। ५ अगस्त १९९७ को कोर्ट ने कहा कि जंगल राज में भी कुछ नियम होते हैं, लेकिन बिहार में तो इसका भी पालन नहीं हो रहा है। सड़कों की मरम्मत और सफाई कार्य भी न्यायालय के आदेश के बाद ही किये जाते हैं। ६ अगस्त १९९७ को उच्च न्यायालय ने फिर माना कि राज्य प्रशासन अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पा रहा है। १३ अगस्त १९९७ को न्यायालय ने टिप्पणी दी कि बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां सड़कें नहीं हैं। १३ जनवरी १९९८ को कोर्ट ने कहा कि बिहार पुलिस के चरित्र से सभी वाकिफ हैं। ९ फरवरी १९९८ को कोर्ट की टिप्पणी थी कि विधि व्यवस्था की खराब हालत की जानकारी के बावजूद प्रशासन लापरवाह है। ९ मार्च १९९८ को कोर्ट ने कहा कि राज्य के अधिकतर अधिकारी भ्रष्ट हैं। मुख्य सचिव के आश्वासन के बावजूद आदेशों का अनुपालन नहीं किया जा रहा है। राज्य में तदर्थवाद जारी है, स्थिति नियंत्रण से बाहर है। १० अप्रैल १९९८ को कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रशासन तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। १६ अक्टूबर १९९८ को टिप्पणी आयी कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गयी है। सांसद और विधायकों के अनुशंसा पत्र पर भी मुख्यमंत्री राबड़ी देवी अब सीधे आदेश नहीं देतीं। यह तो कुछ नमूने हैं। ऐसा कोई हफ्ता नहीं गुजरता था जब हाईकोर्ट की इस प्रकार की कोई टिप्पणी नहीं आती हो। उधर, प्रदेश में घोटालों की मानो बाढ़ आयी हुई थी। पशुपालन, मेधा, अलकतरा, अधिकाई व्यय, मस्टर रोल आदि घोटाले निश्चित रूप से पचा लिये गये थे। नौकरी से लेकर प्रोन्नति, वेतन, पेंशन व मुआवजा दिलाने तक और सड़क, पेयजल, सफाई, अतिक्रमण, नाला, ट्रैफिक जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी कोर्ट की ही भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी थी। दरअसल बिहार को कोर्ट ही चलाने लगा था। प्रभावित लोगों द्वारा कोर्ट के पास पहुंचने और उसके द्वारा दिये गये फैसलों की तादाद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि १२ फरवरी १९९९ तक ( इसी रोज राबड़ी सरकार को भंग करते हुए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था) राज्य के विभिन्न विभाग अवमानना के करीब तीन हजार मामले झेल रहे थे। कुल मिलाकर स्थिति नाजुक थी। मामला बस इतना ही था कि लालू या राबड़ी देवी को किसी ने बिहार की सत्ता से बेदखल नहीं किया, खासकर जनता ने तो बिल्कुल नहीं। यह लोकतंत्र है और इसमें जनता सर्वोपरि है। इस व्यवस्था में राज्य को अपनी जागीर समझने वाले को बदल देने का उसके पास अधिकार है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि जनता किसी को बेदखल नहीं करती, अपना नया प्रतिनिधि चुनती है। नया प्रतिनिधि, जो उसके लिए काम कर सके, उसकी बातों पर ध्यान दे सके, जो व्यवस्था को बहाल कर सके और जो भरोसे लायक हो। इसमें कोई बेदखल हो जाता हो तो हो जाता हो। जनता ने लालू-राबड़ी को बेदखल नहीं किया, बस नीतीश कुमार को चुन लिया। अब यदि नीतीश भ्रष्ट हैं तो मामले सामने आने दीजिए, जनता फिर कोई अपना नेता चुन ही लेगी। यह जनतंत्र है औऱ इसमें ऐसा होना स्वाभाविक है।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार

लालू प्रसाद यादव पशुपालन घोटाले में जेल चले गये और सींखचों के भीतर जाते-जाते वे जेल से शासन करने का ऐलान पूरा करते गये। जब वे यह दावा करते थे कि यदि जेल भी गये तो वहीं से बिहार पर शासन करेंगे तो लोग हैरान होते थे कि आखिर वे ऐसा किस कदर कर सकेंगे। लोकतंत्र की भले धज्जियां उड़ गयी हों, पर यह सच था कि घर में तब तक चूल्हा-चौकी संभालने वाली उनकी धर्मपत्नी राबड़ी देवी उनके जेल जाते ही मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हो गयीं। यह २५ जुलाई १९९७ का दिन था, जब उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इस सरकार का कार्यकाल डेढ़ वर्षों का रहा, क्योंकि तब की केन्द्र की भाजपा नीत सरकार की हिम्मत की बदौलत १२ फरवरी १९९९ को सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। क्यों? क्योंकि राबड़ी राज के महज डेढ़ वर्ष में बिहार ने डेढ़ दर्जन नरसंहार देखे, जिनमें कम से कम पांच सौ या इससे अधिक लोग मारे गये। नक्सली कहर का तो आलम यह था कि राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने के ४८ घंटों के भीतर १४ फरवरी १९९९ को माले ने जहानाबाद में सात लोगों को मार डाला। इतनी बदतर स्थिति तो कभी आतंकियों से अटे पड़े प्रदेश पंजाब की भी नहीं थी। जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उनसे यही साबित होता है कि लूट, अपहरण, बलात्कार, नरसंहार, भ्रष्टाचार व कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति ही लालू-राबड़ी राज की पहचान थी। विकास यहां कल्पना बन गया था और अपराधों के ग्राफ ने हर चेहरे को दहशतजदा बना डाला था। यहां विधायकों के खून होने लगे थे। हेमंत शाही, अशोक सिंह, देवेन्द्र दुबे, बृजबिहारी प्रसाद तथा अजीत सरकार जैसे विधायकों की नृशंसतापूर्वक हत्याओं ने साबित कर दिया था कि बिहार में कोई सुरक्षित नहीं है। १९९० से १९९९ तक के पुलिस रिकार्ड अनुसार यहां अपराध के साढ़े आठ लाख से भी अधिक मामले दर्ज किये गये थे, जिनमें हत्या के ३३६२८, बलात्कार के ७३१० तथा अपहरण के १५६१२ मामले थे (जबकि अपराध हुए इससे कहीं अधिक थे। पता चलता है कि इस दौरान साठ हजार से अधिक लोगों की जानें गयीं, जिनमें करीब पांच सौ राजनैतिक कार्यकर्ता थे।)। ५५ में तीस जिलों में नक्सलियों की समांतर सरकार चल रही थी। आर्थिक स्थिति को लेकर राज्य दिवालियेपन के कगार पर था। परिसंपत्तियों से ज्यादा राज्य सरकार पर कर्ज हो चुका था। नियंत्रक एवं महालेखाकार परीक्षक ने भी इस बात पर सरकार की बखिया उधेड़ी थी। राज्य सरकार का हर मंत्री सीबीआई तथा आयकर विभाग की चपेट में दिखने लगा था। यहां तक कि मुख्यमंत्री आवास तक पर छापा पड़ चुका था। राज्य सरकार की चौतरफी विफलता से बड़ी संख्या में लोग न्यायालय की शरण में जाने लगे थे। अतिक्रमण हटाने से लेकर वेतन भुगतान, नियुक्ति से लेकर प्रोन्नति तक के मामले अदालत में पहुंचने लगे। सफाई, अस्पताल, निर्माण, सड़क, पानी, बिजली एवं स्कूल उपलब्ध कराने सरीखे बुनियादी मुद्दों पर न्यायालय को निर्देश देने पड़ रहे थे। देश का सबसे पिछड़ा राज्य बनकर रह गया था बिहार। लालू खुद को शेरे बिहार कहलाना पसंद करने लगे थे। पूरे बिहार को उन्होंने जंगल घोषित कर रखा था और किसी दूसरे शेर को न घुसने देने की बार-बार ताकीद कर रहे थे। इसी बीच निरंतर आ रही थी पटना हाईकोर्ट की टिप्पणियां, जो सूबे की नक्कारी सरकार की पोल खोल रही थीं। बिहार की हालत ऐसी हो गयी थी कि अगर कोर्ट नहीं होता तो क्या होता, कहना मुश्किल था।

फिलहाल इतना ही। लालू के पटना में २२ फरवरी १९९० को रविदासों के समक्ष भोलेपन से पूछे गये सवाल ( सवाल था-आखिर क्यों उन्हें बिहार की सत्ता से बेदखल किया गया) के जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला जारी रहेगा। अगली और आखिरी किस्त में पढ़िए -जंगल राज के भी नियम ध्वस्त हो गये थे।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार

१० मार्च १९९० को लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। इसके पहले यहां कांग्रेस का शासन था। ऐसा नहीं था कि नरसंहारों का सिलसिला लालू के कार्यकाल से ही शुरू हुआ। नरसंहार की पहली वीभत्स घटना १९७७ में पटना जिले के बेलछी में घटी थी और इसके बाद तो जैसे यहां हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर चल पड़ा। कांग्रेस की सरकारों में नरसंहारों पर रोक लगाने की इच्छाशक्ति का घोर अभाव था, क्योंकि इस शासक शक्ति के सामाजिक आधार इन्हें दूर तक जाने की इजाजत नहीं देते थे। दस वर्षों में कांग्रेस यहां छह मुख्यमंत्री बदल चुकी थी। आपरेशन सिद्धार्थ समेत कई घोषणाएं की गयीं, पर सभी कागज पर ही रह गयीं। मुख्यमंत्री बनते ही लालू ने भी यही काम शुरू कर दिया। उन्होंने दलितों को हथियारबंद करने, भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने, मध्य बिहार में शांति बहाल करने के लिए पदयात्रा करने आदि की कई घोषणाएं कीं, पर इनमें से एक पर भी अमल नहीं हुआ। नतीजा, १९९० से ही शुरू हो गया सूबे में नरसंहारों का सिलसिला, जो गुजरते लम्हों के साथ बेकाबू होता चला गया।
१९९० की शुरुआत में ही रोहतास के केसारी में सामंतों में दस दलितों को मार डाला। २६ मार्च को जहानाबाद के लखावर में पांच दलित मारे गये। २० जुलाई को मधुबनी के हरलाखी में सामंतों ने पुलिस के साथ मिलकर मजदूर वर्ग के छह लोगों को मौत के घाट उतार डाला। २६ जुलाई को रांची (तब बिहार में ही था) के हेसार में पुलिस ने तीन लोगों को मार डाला। १७ दिसंबर को दरियापुर (पटना) में किसान संघ के कार्यकर्ताओं ने चार लोगों व १९ फरवरी १९९१ को पटना के तिखरखोरा के १४ लोगों की हत्या कर दी। ७ जनवरी १९९१ को वैशाली जिले के पहाड़पुर गांव में अपराधी तत्वों ने ७ लोगों को मार डाला। विष्णुपुर ढाबा (बेगूसराय) तथा हरपुर सैदाबाद (समस्तीपुर) में ३ फरवरी को पुलिस ने क्रमशः ७ और ३ तीन लोगों को भून डाला। सनलाइट सेना ने ४ जून १९९१ को पलामू के मलवरिया में नौ लोगों को मौत के घाट उतारा। १२ जुलाई १९९१ को अपराधी गिरोह की ओर से संग्रामपुर (सारण) में चार लाशें गिरायी गयीं। जद समर्थकों ने ११ अप्रैल १९९१ को गया के बेलागंज में तीन लोगों को मार डाला। भोजपुर के देवसहियारा में सामंतों ने २२ जून १९९१ को १४ लोगों को मार डाला। १३ जुलाई १९९१ को पुलिस ने मुठभेड़ में मधुबनी के बेनीपट्टी में चार मजदूरों को भून डाला। १९ अक्टूबर को मुजफ्फऱपुर के बेनीबाद में पुलिस की गोली से सात लोग मारे गये। २५ अगस्त १९९१ को पुलिस ने सहरसा के गोदरामा में तीन लोगों को भून डाला, वहीं, सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने जहानाबाद के बावन बिगहा में २१ सितंबर १९९१ को सात लोगों को मौत के घाट उतार डाला। इसी साल जहानाबाद के मेन बरसिम्हा में नौ लोग, करकट बिगहा (पटना) में चार लोग, तिनडीहा (गया) में ७ लोग मार डाले गये।
नये साल १९९२ की शुरूआत बारा नरसंहार से हुई। बारा में १२ फरवरी को एमसीसी समर्थकों ने ३९ लोगों को मार डाला। ३० जून को गोपालगंज के चैनपुर में सामंतों ने पांच तथा एकवारी (भोजपुर) में सामंतों ने १२ सितंबर को ४ लोगों की हत्या कर दी। १९९२ का अंत शहाबुद्दीन समर्थकों के तांडव से हुआ। २२ दिसंबर को शहाबुद्दीन समर्थकों ने जीरादेई (सीवान) में ४ लोगों की हत्या कर दी। यह सिलसिला थमा नहीं। पुलिसकर्मियों ने १७ मार्च १९९४ को नाढ़ी (भोजपुर) में नौ लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया। ४ अप्रैल १९९५ को रणवीर सेना की ओर से भोजपुर के खोपिरा में चार लोगों की लाशें गिरायी गयीं। सामंतों ने ६ जुलाई १९९५ को करमौल बमनौली (सीवान) के छह लोगों को मार डाला। रणवीर सेना ने २५ जुलाई १९९५ को सरथुआ (भोजपुर) में ६ लोगों की हत्या की। ५ अगस्त १९९५ को गंगा सेना की ओर से नोनउर (भोजपुर) के छह लोग मारे गये। वर्ष १९९६ तो नरसंहारों का ही वर्ष रहा। रणवीर सेना ने ७ फरवरी १९९६ को चांदी (भोजपुर) में ४, ९ मार्च को पतलपुरा (भोजपुर) में ३, १२ मार्च को नोनउर में ५, ५ मई को नाढ़ी में ३, ९ मई को इसी गांव में फिर ३, ११ जुलाई को बम्पानी टोला (भोजपुर) में २१, २६ नवंबर पुरहारा (भोजपुर) में ५ तथा २४ दिसंबर को एकबारी (भोजपुर) में ६ लोगों की सामूहिक हत्या की। इसी वर्ष शहाबुद्दीन समर्थकों द्वारा १४ सितंबर को भवराजपुर (सीवान) के ३ तथा ११ दिसंबर को मनिया (सीवान) के ५ लोगों की हत्या कर दी गयीं।
अगले साल राबड़ी देवी के कार्यकाल में पहली दिसंबर १९९७ को रणवीर सेना द्वारा बाथे नरसंहार में ६४ लोगों तथा रामपुर अहियारा चौरम में एमसीसी समर्थकों द्वारा ९ सवर्णों को जीप से खींचकर खत्म कर देने जैसी जघन्यतम घटनाओं को छोड़ भी दिया जाय तो क्या नहीं लगता कि खुद को भगवान कृष्ण का अवतार कहलाने में खुशी महसूस करने वाले लालू प्रसाद यादव के राज में बुद्ध, महावीर की धरती इंसानी लाशों से पटती जा रही थी? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित १ दिसंबर के बाथे नरसंहार के जिम्मेवार रणवीर सेना के राजनैतिक रिश्तों की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग के गठन की बात की गयी। आयोग का कार्यकाल जून १९९८ में समाप्त हो गया तो छह महीने ३१ दिसंबर तक के लिए उसे बढ़ाया गया। जांच आयोग का काम शुरू ही नहीं हो पाया। क्यों? क्योंकि आयोग को इस काम के लिए कर्मचारी ही नहीं मिले। कार्यालय के लिए मकान का आवंटन नवंबर में किया गया। इस नरसंहार के बाद मध्य बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाये रखने के लिए विशेष टास्क फोर्स के गठन की बात कही गयी। यह टास्क फोर्स संचिका में ही कैद रह गयी। उग्रवाद प्रभावित मध्य बिहार में विकास कार्यक्रम चलाने के लिए सौ करोड़ रुपये की योजना तैयार की गयी। योजना कहां चली गयी, किसी को पता नहीं है। बिहार सरकार ने अपने एक दस्तावेज में स्वयं स्वीकार किया था कि सड़क निर्माण से संबंधित दो दर्जन से अधिक घोषित परियोजनाओं में निविदाएं नहीं आयीं, क्योंकि उग्रवादी संगठनों ने निविदा देने वालों से निपट लेने की धमकी दी थी।

फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार।

लालू ने सम्मान से जीना सिखाया

मनोज कुमार हमारे तब के मित्र हैं, जब हमलोग नवादा, बिहार में पढ़ते थे। इन दिनों अध्यापन कर रहे हैं। लालू के सवाल के बहाने यहां जो बातें कही जा रही हैं, उनपर उन्हें आपत्ति हैं। कुछ बातें उन्होंने लिख भेजी है। हम उसे जस का तस पोस्ट कर रहे हैं।

इन सारी बातों के बीच किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वो लालू यादव ही हैं, जिनकी वजह से बिहार की दलित और पिछड़ी आबादी सर उठाकर जीना सीख रही है। कोई भी सामाजिक क्रांति जब होती है तो उसके कुछ न कुछ साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। सब कुछ अच्छा ही अच्छा नहीं होता। साइड इफेक्ट्स को लालू की गलतियों के रूप में प्रचारित कर आप किसका भला करना चाह रहे हैं। क्या बिहार के दलितों और पिछड़ों को सर उठाकर जीने का हक नहीं था? लालू यादव ने सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया तो वह सामाजिक समरसता के कातिल हो गए? सामंती ताकतों का अत्याचार बहुत अच्छा था? सच बात तो यह है कि जिन ताकतों को राज करने की आदत पड़ गई थी, वही लोग पिछड़ों और दलितों का उभार देख नहीं पा रहे हैं।

लालू यादव ने बिहार का विकास रोक दिया, ऐसा कहने वाले पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखते। जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वरी दुबे के कायॆकाल में क्या कम भ्रष्टाचार था। तब विकास की गंगा बह रही थी, तो भी बिहार लालू काल से पहले पिछड़े और बीमारू राज्यों की श्रेणी में क्यों शुमार था?

अब कहा जा रहा है कि एक खास वगॆ के लोग पूरे बिहार में अराजकता मचा रहे थे। लालू यादव से पहले स्वणॆ जातियों के लोग पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के खिलाफ जो मनमानी कर रहे थे, उसे अराजकता क्यों नहीं कहा जाता? क्या सिफॆ इसलिए नहीं कि तब उस अराजकता को ही सिस्टम मान लिया गया था? क्या उस सिस्टम को तोड़ा नहीं जाना चाहिए था? सच बात तो यह है कि सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया गया तो हल्ला इस बात का किया गया कि बिहार में तो स्थिति अराजक हो गई है!

मेरा सिफॆ इतना कहना है कि लालू यादव के कायॆकाल से पहले के कायॆकाल को भी याद किया जाए। भ्रष्टाचार, अपराध और भाई-भतीजावाद की त्रिवेणी तब भी बह रही थी। बिहार तब भी पीछे ही जा रहा था। लेकिन तब आत्मसम्मान के साथ जीने वाले लोग कुछ फीसदी थे। अब स्थिति बदली तो यही कुछ फीसदी लोग बेचैन हो गए। अराजकता-अराजकता का नारा बुलंद करने लगे।

ऐसे में अनुरोध सिफॆ यह है कि स्थितियों को सिफॆ अपने चश्मे से न देखें। दूसरी बात यह कि हमेशा गुण-अवगुण दोनों बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वरना तो आप कोई भी बात कहने के लिए स्वतंत्र हैं हीं। मेरी बात यदि आप यहीं प्रकाशित कर सकें तो मुझे खुशी होगी।
मनोज कुमार, रुनीपुर, नवादा, बिहार

लालू यादव ने जो सवाल पूछा है, उसके जवाब में और भी लोगों के दिमाग में ढेर सारी बातें घुमड़ रही होंगी। इस चरचा में अगर आप भी शामिल होना चाहते हैं तो स्वागत है। आप अपनी बातें हमें लिख भेजें इस पते पर-imtihan08@gmail.com। हम आपकी बातों को आलेख के रूप में प्रकाशित करेंगे।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

भ्रष्टाचार से ही लालू बने थे सीएम

पटना में २२ फरवरी को लालू प्रसाद यादव ने रविदासों के समक्ष भले भोलेपन से यह सवाल किया हो कि आखिर उनसे क्या गलती हो गयी जो बिहार की सत्ता से उन्हें बेदखल कर दिया गया, पर उनका यह सवाल है उत्तर तलाशने के लायक। यह अलग मसला है कि वे आज केन्द्र में उसी कांग्रेस की छत्रछाया में रेलमंत्री बनने का गौरव हासिल कर रहे हैं, जिसे कोस-कोस कर वे राजनीति में जवान हुए, पर कभी जेपी का अनुनायी कहलाकर गर्व से सीना तानने वाले इस शख्स की बिहार के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी भी भ्रष्ट आचरण के तहत ही हुई थी।
बात १९९० की है। वीपी सिंह का जमाना था। देश में गैर कांग्रेसवाद की लहर चल रही थी। तब न तो मंडल कमीशन आया था और न ही लालू की मुरलीधरन छवि ही लोगों के नूरेनजर थी। विधान सभा चुनाव में जनता दल बड़ी पार्टी के रूप में सामने आया था। मात्र गैर कांग्रेसवाद को लेकर कांग्रेस का तख्ता पलट दिया गया था, उसे जनता बहुमत से अल्पमत में ले आयी थी। बिहार में ही नहीं, केन्द्र में भी। गैर कांग्रेसवाद के गर्भ से निकला था जनता दल और उस वक्त भी उसके पास स्पष्ट बहुमत नहीं था कि अकेले वह सत्ता चला सके। तालमेल हुआ। झामुमो, भाजपा, माकपा, भाकपा और जद ने समझौता किया और कांग्रेस को सत्ता में आने रोका गया। बिहार में तो नेतृत्व संकट की भीषण स्थिति पैदा हो गयी थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए जनता दल में उठापटक शुरू हो गयी थी। उस वक्त राम सुंदर दास मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। रमई राम, रघुनाथ झा को भी इस दौड़ में शामिल किया जा रहा था। यहां तक कि गैर कांग्रेसवाद का झंडा थामे अगली पांत के नेता युवा तुर्क चंद्रशेखर भी यही चाह रहे थे कि रघुनाथ झा या राम सुंदर दास को ही मुख्यमंत्री बना दिया जाय। मगर, उस वक्त की राजनीति और जनता दल में मजबूत स्थिति रखने वाले देवीलाल ने लालू यादव के नाम का प्रस्ताव कर दिया। और जैसे कालांतर में एचडी देवगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल रातोरात प्रधानमंत्री बने, वैसे ही लालू यादव मुख्यमंत्री बन गये। जनता ने उन्हें नहीं चुना था और जिन्होंने उन्हें चुना था, ऐसा करने का उनके पास कोई अधिकार नहीं था। लालू प्रसाद यादव तो उस वक्त विधायक भी नहीं थे। मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद उन्होंने चुनाव लड़ा और संवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री पद के लायक बने। तो यह था लालू के बिहार की गद्दी पर काबिज होने का सच। सामाजिक समरसता कायम करने वाली पार्टी का पहला मुख्यमंत्री ही अलोकतांत्रिक तौर-तरीके और गैर जनमत से चुना गया। इस प्रक्रिया को भ्रष्टाचार की श्रृंखला में रखा जाय तो लालू के मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित किया जाना भी एक भ्रष्ट प्रक्रिया ही थी, जो खुलेआम लोकतांत्रिक प्रणाली की धज्जियां उड़ा रही थी। फिर भ्रष्टाचार के माध्यम से स्थापित मुख्यमंत्री न्याय औऱ नैतिकता की बात किस मुंह से करता? और इसी का परिणाम हुआ कि पूरे सूबे में अराजकता की स्थिति पैदा होती चली गयी। जनता दल के कार्यकर्ता खुलेआम आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने लगे। हत्या की राजनीति मुखर हो गयी। संतरी से मंत्री तक जातीय समीकरण के तहत बहाल किये जाने लगे। गुण और गुणवत्ता को नजरअंदाज किया जाने लगा। लालू रोज भड़काऊ भाषण देने लगे। जनता के नाम पर जनतंत्र का जितना मजाक लालू ने उड़ाया, इसका आकलन करना या उसे विश्लेषित करना आने वाली पीढ़ी को गलत रास्ते का पाठ पढ़ाने जैसा ही है, पर यह सच है कि एशिया के मानचित्र पर सिंधू घाटी के बाद सबसे पहले सभ्यता का विकास करने, अपनी भौतिक संपदा के साथ-साथ वैचारिक अमृत से मानवता को सींचने और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला बिहार क्रूरतम हिंसा, जघन्यतम अपराध और महाघोटालों की विषबेलियों से इस कदर जकड़ता गया कि उसकी चिरपरिचित अस्मिता पर ही संकट के बादल मंडराने लगे। जिस बिहार के बुद्ध, महावीर, चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, शेरशाह, सूफी-संतों व भक्त कवियों, सामाजिक क्रांतिकारियों और राजनैतिक हस्तियों ने समय-समय पर देश की संस्कृति में नये अध्याय जोड़े, वही बिहार लालू के राज में जंगल राज का पर्याय बन गया था।

फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार।

लालू यादव के सवाल के बहाने

लालू प्रसाद यादव ने पिछले दिनों पटना में एक समारोह में जनता से बड़े ही भावुक अंदाज में पूछा-मेरा कुसूर क्या था कि मुझे सत्ता से बेदखल कर दिया गया। लालू यादव ने उन वजहों का भी जिक्र किया, जिनके चलते उन्हें सत्ता से बेदखल नहीं किया जाना चाहिए था। क्या लालू यादव वाकई अपने सवाल का जवाब चाहते हैं? अगर हां तो उन्हें कुछ और लोगों के सामने अपने सवाल को रखना चाहिए।

उन आम लोगों से भी पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने लालू और राबड़ी देवी के कायॆकाल में मान लिया था कि अगर बिहार में रहना है तो अपने दम पर, अपने बाहुबल पर भरोसा करके ही रहा जा सकता है। आगे बढ़ना है तो सरकारी मशीनरी से किसी मदद की उम्मीद न करें। अपने संसाधनों से विकास कर सकते हों तो करें।

उनसे भी लालू मुखातिब हों, जो उन परिस्थितियों में वहां रहने की हिम्मत नहीं जुटा सके और पलायन को मजबूर हुए। हालत यह हो गई कि महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल से लेकर देश के लगभग सभी हिस्सों में बिहार के लोगों की भीड़ सी हो गई। मजबूरी में बिहार छोड़ने वाले लोग कहीं दुरदुराए जाते हैं तो कहीं पीटे जाते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वही हैं, जिनके उत्थान और आत्मसम्मान को बहाल करने की बात कहते लालू यादव अघाते नहीं। उत्थान होता आत्मसम्मान बढ़ता या बहाल होता तो क्या वे अपना देस छोड़ने को मजबूर होते। इनके, इनके परिवार वालों के पास भी तो वोट का अधिकार है, लालू यादव इनसे भी क्यों नहीं पूछते कि किन वजहों से उनका वह सिंहासन छीन लिया गया, जिस पर वे बीस साल तक बैठने का दावा करते थे।

सवाल तो उन उद्योगपतियों से भी पूछा जाना चाहिए जो रंगदारी, अपहरण की वारदातों और गुंडागरदी से त्रस्त होकर बिहार छोड़कर भाग जाने को मजबूर हुए। सत्ता में बने रहने के लिए केवल भावुक सवाल और नौटंकी की जरूरत नहीं होती। नागरिकों की बेहतरी और उनकी हिफाजत के उपायों की भी जरूरत होती है। जनता की हिफाजत की स्थिति यह थी कि लोग सवाल पूछने लगे थे कि अगला नरसंहार कब और कहां होगा? ऐसे सवाल पूछने वालों को जवाब देने का हक नहीं था क्या? नरसंहार को छोड़ भी दें तो कानून-व्यवस्था की हालत यह थी कि लोग शाम होते ही अपने घरों में दुबक जाने को मजबूर होते थे। राजधानी पटना तक में शाम होते असामाजिक तत्व ही सड़कों पर बचे रह जाते थे। महिलाएं इज्जत का जोखिम उठाकर ही दिन में भी घर से निकलती थीं। क्या-क्या गिनवाया जाए? लालू यादव को याद हो या न हो, जनता को तो अब भी याद होगा ही। आखिर भुगता तो उन्होंने ही है।

मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार में आग लगी तो उसे बुझाने की जरूरत थी। लेकिन लालू यादव ने यह कहकर उस आग में घी ही तो डाल दिया कि ..भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला-कायस्थ) साफ करो। लालू यादव बाद में भले ही इस पर लीपापोती करते रहे हों लेकिन उनके इस महान आह्वान का खामियाजा केवल भूराबाल ने ही नहीं, पूरे प्रदेश ने भुगता।

इनके साथ उनसे भी तो अपना सवाल पूछिए रेलमंत्री जी जिन्हें आपने चौदह-पंद्रह साल तक अपनी नौटंकी में उलझाए रखा। चरवाहा विद्यालय खोलकर अपने आपको विकास पुरुष कहने और कहलवाने से विकास नहीं होता। होता तो आज भी चरवाहा विद्यालय में पढ़ने वाले आते होते। छात्रों के लिए सिसक-सिसक कर मर नहीं जाते चरवाहा विद्यालय। सिंदुर-टिकुली बांटने से कौन सा विकास होता है? सिवाय अखबारों में बांटने वाले की तस्वीर छपने के और कौन सा भला हुआ उस कवायद का, कोई तो बताए। हप्प-हप्प करके सवालों को खा जाने की उनकी अदा पर मर मिटने वाले भी कब तक वोट देते?

लालू यादव के सवाल का जवाब तलाशती चरचा जारी रहेगी। अगली किस्तों में श्री कौशल शुक्ला कुछ तथ्यों के साथ आपके सामने होंगे।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

गलतियां करें आप, खामियाजा भुगते देश?

चुनाव के बहाने देश में चल रही राजनैतिक चोंचलेबाजियों, खासकर रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव और इस्पात-उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान की मतलबी गलबहियों पर सोच रहा था, पर चिंतन में आ गये पूज्य बापू गांधी जी और जेहन में आ गया उनकी ओर से कभी दिया गया हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा। तब गुलाम देश में ये दोनों कौमें आपस में एक-दूसरे के खून की प्यासी हो रही थीं। देखने की बात यह थी कि देश में तब सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम ही नहीं थे, सिख भी थे, ईसाई भी थे, बुद्ध-जैन सम्प्रदाय के साथ दर्जनों कौमें अलग-अलग वजूद में थीं, पर गांधी जी ने हिंसा की घटनाओं से आहत होकर नारा दे दिया-हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई। गांधी जी एक बड़ी शख्सीयत थे। उनसे बड़ा देश में कोई था ही नहीं। मगर, उनसे यह नारा देकर एक छोटी गलती जो हो गयी, उसका खामियाजा आज तक तक देश भुगत रहा है। इसके खत्म होने की कोई सूरत नहीं दिख रही है। उनके नारे का सीधा सा मतलब था, दोनों कौमों में भाईचारा कायम हो जाये, पर हुआ क्या? इन दोनों जातियों को बड़ा बल मिल गया। उन्हें लगा कि भले देश में दर्जनों जातियां हों, पर उनकी तो कोई बात नहीं। गांधी जी ने कह दिया तो इसका मतलब अब तो सिर्फ वे ही हैं, बाकी गौण। और लोगों ने देखा कि तबसे इन दौ कौमों में भेद मजबूत होता चला गया, एक दूसरे पर विजय पाने का संघर्ष तेज होता चला गया। बड़े लोगों की छोटी गलतियां भी बड़ा असर दिखाती हैं, क्योंकि उनका पटल व्यापक होता है, वे सुनी दूर तक जाती हैं, समझी देर तक जाती हैं।
अब आयें लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान के संदर्भों पर। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी लोक सभा चुनाव के इन दोनों मोहरों में सीट बंटवारे को लेकर आजकल रस्साकशी चल रही है। यूपीए के इन दो महत्वपूर्ण सिपहसालारों में मान-मनौअल के पैंतरे चल रहे हैं। बिहार में सोलह बनाम चालीस का पासवान ने जो पासा फेंका है, वह लालू को कबूल नहीं, मगर वे यह भी नहीं चाहते कि दो की लड़ाई का फायदा तीसरे को यानी जदयू-भाजपा नीत राजग को मिल जाये। यही कारण था कि पिछले दिनों लालू जा पहुंचे पासवान के घर। कुछ देर रुके औऱ फिर निकल पड़े अपनी राह। क्या बात हुई यह तो वे ही जानें, पर हवा उड़ी कि राजनैतिक बिसात पर दांव खेलने और जीतने की कला में माहिर तथा खुद को किंग मेकर कहने वाले मैनेजमेंट गुरु लालू ने पका ली अपनी खिचड़ी, मना लिया रुठ जाने वाले पासवान को। पर, तमाशा तो आखिर तमाशा है। दूसरे ही दिन पासवान के पलटवार से पता चला कि नहीं, बात जमी नहीं, बल्कि वहीं की वहीं अटकी हुई है। पासवान की बातों में इशारा साफ था कि गेंद लालू के पाले में ही है, उन्हें ही अभी मुद्दों को मोड़ देना है। संघर्ष तेज, मशक्कत जारी, निगाहों में बढ़ता इंतजार। फिर मैनेजमेंट गुरु का नारा आया-इस बार दलित प्रधानमंत्री चाहिए। सफलतम राजनीतिज्ञ का बेहतरीन दांव। दलितों को रिझाने के साथ उन्हें पासवान से भटकाने का बेजोड़ हथियार।
पर, लालू के दलित प्रेम का यही नारा देश के लिए हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई के नारे की तरह खतरनाक है। इक्कीसवीं सदी के इस दौर में और आर्थिक मंदी से जूझ रहे देश में जहां हर बड़ा-छोटा, अमीर-गरीब अपनी रोजी-रोटी की चिंता कर रहा है, वहां यह नारा खतरनाक है। खून-खराबे को आमंत्रित करने वाला, एक बड़ा वर्ग भेद कायम करने वाला नारा है यह। लोगों को याद होगा, जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो उनके दिल में भी पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के प्रति सहानुभूति उपजी थी। उन्होंने वर्षों तक पेंडिंग पड़े मंडल आयोग की सिफारिशें एक झटके में लागू कर दी थीं। तब वीपी सिंह के सामने देश के नौजवान धू-धू कर जलने लगे थे और जलने लगा था पूरा देश। जिन गांवों में लोग जात-पांत भूल कर एक दूसरे के दुख-सुख में बिना भेदभाव के शामिल हो रहे थे, वहां लकीरें खिंच गयीं और बिना वितंडा शुरू हो गयी खूनी भिड़ंत। बसें-ट्रेनें रोककर और जाति पूछ-पूछ कर लोगों को मारा-काटा जाने लगा। मंडल कमीशन से शुरू हुआ वर्ग संघर्ष आज तक कायम है, रोज-ब-रोज गहरा रहा है। जिस आरक्षण का प्रावधान देश में दस वर्षों के लिए ही किया गया था, उस पर अब राजनीति जड़े जमा चुकी हैं औऱ इसके खत्म होने के आसार खत्म हो गये हैं।
सवाल यह है कि अपनी जीत और अपनी पार्टी के वजूद को बचाने के लिए सब कुछ करने वाले लालू प्रसाद यादव को क्या हक है कि वे आम जनता को बरगलाते हुए समस्याओं से उलझे देश में एक नया वितंडा खड़ा करें? वह भी तब, जबकि अभी यही साबित होना है कि दलितों का मसीहा कौन है? और दलित प्रधानमंत्री की जिद ही क्यों? सवाल यह है कि दलितों के नाम पर पूरे देश की उपेक्षा क्या जायज है? यहां सवाल यह भी है कि साठ साला आजादी के बाद भी यदि देश में कोई है जो दलित कहे जाने के लायक है तो दोष किसका है? क्या लालू और पासवान जैसे नेताओं का कोई दोष नहीं, जो खुद तो वर्षों से सत्ता पर काबिज होकर मजा लूट रहे हैं और दलित के नाम पर भी खुद को ही आगे पेश कर दे रहे हैं? क्या वे भी दलित ही हैं? और खुद के फायदे के लिए दलित प्रधानमंत्री का नारा देकर क्या वे देश को फिर एक लंबे और अंतहीन खूनी संघर्ष में झोंकने की जुर्रत नहीं कर रहे? सवाल यह भी है कि वर्ग भेद को जिंदा करने वाले वाले और उसे मजबूती प्रदान करने वाले ऐसे नेता को आखिर देश कब तक झेलेगा? उनकी गलतियों का खामियाजा आखिर देश क्यों भुगते? फिलहाल इतना ही, ग्रेट इंडियन तमाशे को लेकर बहस लायक मुद्दों पर अभी चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

लो, आप तो पलटी मार गये दादा

दादा, आपके नाम यह दूसरी पाती नहीं लिखता, यदि आपने भूल सुधार कर जिन्हें श्रापा था, उनके विजयी भव की कामना नहीं की होती। मैं फिर कहना चाहूंगा दादा, आपने यह क्या कह दिया! कुछ कहूं, इससे पहले मेरा हलफनामा ले लीजिए कि इस बार भी मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं, आपको यही करना चाहिए। हमारी संस्कृति भी यही है कि मरने वाले के सभी गुनाह माफ कर दिये जाते हैं, फांसी पर लटकाने से पहले उसकी अंतिम इच्छा तक पूछने और उसे पूरा करने का रिवाज है यहां। दादा, आपने बिल्कुल ठीक किया। पर, कुछ सवाल फिर भी हैं, जो जेहन में चकरा रहे हैं, जवाब ढूंढ़ रहे हैं। और यह जवाब मैं आपसे ही चाहूंगा। कोई गुस्ताखी हुई तो माफ कीजिएगा। माफ तो आप कर देते हैं, इसका नमूना आपने दे ही दिया है। जिस पर आप इतने भड़के हुए थे कि उनके चुनाव हार जाने की कामना कर रहे थे, उन सभी को अभी आपने जीतने का आशीर्वाद दे तो दिया।
तो पहला सवाल - दादा, आप अपने आप को क्या समझते हैं? इंसान या भगवान? इंसान समझा होता तो आपको मालूम होता कि आपके कहने से कोई कैसे चुनाव हार सकता था और फिर आपके पलटने से कोई कैसे जीत सकता है? सवाल ठीक है न दादा? या आप खुद को भगवान समझते हैं? आपको लगा कि मेरी जुबान से श्राप निकल गया है तो सामने वाले को यह श्राप लग ही जायेगा, इसलिए तुरंत पलटी मार गये? तो क्या भगवानों को इतनी जल्दी पलटी मारना क्या ठीक है? मुझे मालूम है, आप खुद को भगवान मानने की भूल कतई नहीं कर सकते। तो क्या मैं आपसे यह पूछने की हिमाकत कर सकता हूं कि आप खुद को क्या समझते हैं? क्या यह सिर्फ एक बूढ़े का भीषण प्रलाप था? मैं यह नहीं कहना चाहता कि यह एक किस्म का पागलपन था। या पागलपन ही था? यह सवाल पूरी शिद्दत के साथ आपके सामने सुरसा के मुंह की तरह फैला और चौड़ा हुआ खड़ा है। जवाब आपको ही देना है, दादा।
दूसरा सवाल - दादा, इक्कीसवीं सदी में जहां मानव चांद से आगे निकलकर मंगल और शनि तक जा पहुंचा है, उस दौर में विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देश में क्या श्राप और आशीर्वाद से ही राजकाज चलाया जायेगा? कामरेडों की आत्मा को आपकी बातों से कितना सुकून मिलेगा, यह तो उनकी आत्मा ही बतायेगी, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में जहां राजनीति तक का कारपोरेटाइजेशन हो चला है, लालकृष्ण आडवाणी जैसे हिन्दुत्व विचारधारा वाली पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बुजुर्ग नेता युवाओं को रिझाने के लिए साइट औऱ एसएमएस का सहारा ले रहे हैं, उस दौर में कुछ लोगों को साक्षात विजयी भव का आशीर्वाद देकर आपने कितना ठीक किया? बताइए दादा, बताइए।
तीसरा सवाल - और दादा, यह आशीर्वाद यदि एक सामान्य बूढ़े का भीषण प्रलाप था तो हमें लगता है कि आप ही देश को बताएं कि इस प्रकार के एक सामान्य मानसिकता वाले किसी बुजुर्ग को क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी की शोभा बढ़ानी चाहिए? यदि नहीं तो क्या आपको तत्काल अपनी कुर्सी से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए? और यदि आप कुर्सी से इस्तीफा नहीं देते तो क्या यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि आप भी, बुरा मत मानियेगा दादा, आप भी कुर्सी पर चिपके रहने वाले एक वैसे सामान्य नेता से अलग नहीं हैं, जो कुर्सी पर बने रहने के लिए तमाम तरह की तिकड़म करते रहते हैं? मेरा मानना है कि पब्लिक तो सब जानती है, पर एक बार जवाब आपके मुंह से भी आ जाये।
दादा, चुनाव का मौसम चल रहा है। देश में जब से लोकतंत्र की स्थापना हुई है, चुनाव प्रणाली शुरू हुई है, तभी से एक महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित चल रहा है। आप तो विपक्ष की राजनीति में माहिर रहे हैं। चनावों में आपने देखा होगा कि 51 वोट पाने वाला जीत जाता है, विजयश्री का माला पहन कर आशीर्वाद लेता घूमता है, जबकि 48 वोट पाने वाला हार जाता है, सिर छुपा लेता है, भरे-पूरे लोकतंत्र में नकार दिया जाता है। उसके हारने के साथ ही खत्म हो जाती है 48 वोटों की अहमियत और खत्म हो जाते हैं इन वोटों के सपने। दादा, क्या आपको नहीं लगता कि इक्कीसवीं सदी के वैश्विक और मंदी से भरे इस दौर में देश को इन अड़तालीस वोटों के महत्व को समझने की बड़ी जरूरत है। इसके लिए आप जैसे पहुंचे हुए और महान लोगों के विचार किसी काम आ सकते थे। देश का नक्शा बदला जा सकता था। पर, आप तो श्राप और आशीर्वाद बांटते चल रहे हैं, देश आपसे कौन सी उम्मीद पाले? जिन सभी को आपने विजयी भव का आशीर्वाद दिया, आपको पता है कि उनमें से कितने चुनाव लड़ेंगे और कितने चुनाव नहीं लड़ेंगे? यदि नहीं पता तो पूरी गंभीरता से एक आम भारतीय के नाते मेरा सवाल अपनी जगह कायम है कि यह आपने क्या किया? बताइए दादा, यह आपने क्या किया? मैं आपका जवाब चाहता हूं।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

दादा, आपने ये क्या कह दिया!

दादा, आपने गुरुवार को संसद में शाप देने के अंदाज में जो कहा, उसमें मैं आपकी कोई गल्ती नहीं देखता। सच मानियेगा। हल्ला-हंगामा करने वाले सांसदों को आने वाले चुनाव में हार जाने का शाप देकर आपने बिल्कुल आम अवाम की आवाज को ही बुलंद किया है। लेकिन, मैं आप ही से पूछना चाहूंगा कि आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं, उस कुर्सी से इस प्रकार की आवाज का सुनना क्या आपको ही अच्छा लगा? कई सवाल मेरे मन में उठ रहे हैं, जो आपसे और सिर्फ आपसे ही पूछना चाहता हूं। निश्चित मानियेगा, ये सवाल आपके खिलाफ जाकर नहीं कर रहा हूं। ये सवाल आपकी आवाज और उसकी मुखरता के साथ रहकर कर रहा हूं।
सबसे पहला सवाल-क्या आपको नहीं लगता कि आप बूढ़े गये हैं? बूढ़ा का मतलब बलहीन, तेजहीन। बात-बात पर झल्लाने वाला, हमेशा अपने मतलब की धुन में मगन रहने वाला। आपने भी कुछ वैसा ही तो नहीं किया? वो विपक्षी सांसद थे। कहीं और नहीं, संसद में हल्ला कर रहे थे। दादा, चुनाव सर पर है और आप देख ही रहे हैं कि पब्लिक के पास जाने लायक और वोट मांगने लायक देश में मुद्दों का अभाव चल रहा है। बड़ी-बड़ी हस्तियां मुद्दे तलाश रही हैं। तो यह तो निश्चित ही है कि इस तरह के हल्ले होंगे। यह तो आम पब्लिक भी जान रही है। इसमें क्या इतना झल्लाने की जरूरत थी कि उन्हें अगले चुनाव में हार जाने का शाप देना आपके लिए जरूरी लगने लगा? और शाप भी लोकतंत्र के मसीहाओं की रखवाली करने वाले सरदार की ओर से? सरदार इतना बलहीन, तेजहीन! मगर नहीं, मुझे तो साफ लग रहा है कि यह संसद के मजबूत अध्यक्ष का नहीं, एक लाचार बूढ़े का भीषण प्रलाप था। आप बताएं कि क्या नहीं था? और इससे आगे की बात। दादा, 58 साल के बाद एक इंसान को आप किरानी बनने के लायक नहीं समझते, तो इसके पार का आदमी देश चलाने के लायक क्यों समझ लिया जाता है? यह ऐसा सवाल है, जिसका मौजूं मिजाज आपके संदर्भों में अब आपके ही सामने है। जवाब दे सकते हैं तो दीजिए।
दूसरा सवाल - दादा, क्या आपको नहीं लगता कि आपके शाप के बाद पूरे देश मे एक बड़ी बहस शुरू हो जानी चाहिए? बहस यह कि संसद में सांसदों को हल्ला करना चाहिए या नहीं? इस हल्ले का अर्थ मैं तो विरोध की आवाज से लेता हूं। आप बतायें क्या यह गलत है? मुझे लगता है, आप भी इसे विरोध की आवाज ही कहेंगे। तो सवाल यह है दादा, विपक्ष के लोग विरोध की आवाज उठाएं या नहीं? उठाएं तो उनका अंदाज क्या हो? दादा, क्या आपको नहीं लगता कि पूरे सिस्टम में नकारापन बज रहा है। इस नकारेपन में अपनी आवाज ऊपर उठाने के लिए उसे तेज ही तो करनी होगी। दादा, आतंकवादी विस्फोट पर विस्फोट कर रहे थे औऱ हमारे गृहमंत्री कपड़े बदलने में मशगूल थे। कुछ बोलने के लिए बोला गया तो कहने लगे कि क्या मैं चिल्लाऊं? आप तो इस बात के गवाह हैं कि कैसे उनकी हरकतों के खिलाफ पूरा देश चिल्ला रहा था। इसी चिल्लाहट का नतीजा तो था कि सरकार चेती और उन्हें उनके पद से हटाया गया।
और सबसे अहम सवाल - दादा, क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी भीष्म पितामह की तरह सत्ता के प्रति समर्पित होती है? क्या उसका हर काम, हर मुकाम सत्ता शीर्ष की रखवाली तक समाप्त हो जाता है? औऱ क्या आप इससे इनकार करेंगे कि ऐसा होने पर ही तो महाभारत हुआ? देश ने तो देखा है। गलत-सही की बात मैं नहीं कर रहा, लेकिन इतना तो आप भी मानेंगे दादा कि इसी रास्ते पर चलते हुए आप अपने उन साथियों और घर से बिल्कुल अलग हो गये, जो आपके हमकदम थे, हमसफर थे। सवाल यह कि आम आदमी क्या सबक ले? निष्ठाएं क्या इतनी ही तेजी से बदली जानी चाहिए?
दादा, मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि मुझे आपकी बातों से सरासर इत्तेफाक है। मगर सवाल हैं कि सर उठा रहे हैं। इस देश में एक सबसे बड़ी खराबी थी, वह यह थी कि सवाल उठाने वालों का मुंह बंद कर दिया जाता था। यह सामंती प्रथा का लक्षण था। लोकतंत्र का मतलब ही होता है आवाज की रवानगी। इस रवानगी पर रोक लग गयी, सवाल उठाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो जवाब कहां से आएंगे? दादा, आप बताएं, जवाब कहां से आएंगे? सांसद अगले चुनाव में हारें या जीतें पर सवाल यह है कि सवाल तो फिर भी उठाना होगा, जवाब फिर भी ढूंढ़ने होंगे। होंगे कि नहीं?

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

मदारी से बंदर को मतलब नहीं

जी हां, आम चुनाव को लेकर बिहार में जो ग्रेट इंडियन तमाशा चल रहा है, उसको देखते हुए अभी यही तय करना बाकी है कि इस खेल में मदारी कौन है और उसके इशारे पर नाचने वाला बंदर कौन? कभी मदारी बंदर की शक्ल में दिख रहा है तो कभी बंदर मदारी की शक्ल में। नजारे तो यह भी नजर आ रहे हैं कि मदारी का बंदर उसे ही घुड़की दे रहा है। बात राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दो मजबूत खंभों जदयू और भाजपा की हो या फिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के तीन तिलंगों राजद, कांग्रेस व लोजपा की, क्रिया बिल्कुल समान हैं, न्यूटन के थर्ड गति नियम के अनुसार प्रतिक्रिया भले बराबर और विपरीत हो। पर, यह बिहारी फंडा है, ग्रेट इंडियन तमाशे में घुसा बिहारी फंडा, नतीजे के लिए सब्र करना होगा।
अभी राबड़ी सरकार के दिनों की यादें कइयों के जेहन में ताजा होंगी। शैडो मुख्यमंत्री के खिलाफ भाजपा के सुशील मोदी लगभग हर रोज विधान सभा में अपनी ऊर्जा खपाते रहते थे। इसके लिए सदन में ही उन्हें क्या-क्या न सुनना पड़ता था। जीभ खींच लेंगे, झाड़ू से मारेंगे। अब जब पति लालू ही ठेठ गंवई स्टायल में ओपन कास्ट चैनल थे, जेल से शासन चलाने का दावा पूरा कर चुके थे तो पत्नी क्या करतीं। मोदी सब कुछ बर्दाश्त करते विपक्ष की भूमिका निभाते जा रहे थे। उभार लोगों के बीच भी कुछ कम कायम नहीं था। लोगों को याद होगा, तब सुशील मोदी नरेन्द्र मोदी की तरह दिख रहे थे। जोश से लबरेज, होश से लैस, दाढ़ी युवा तुर्क नेता की याद दिलाती थी। पर, ग्रेट इंडियन तमाशे ने जब बिहार का रुख लिया तो वे छतरी के नीचे आ गये। कहा तो गया जदयू की छतरी के नीचे, पर दिखा नीतीश कुमार की छतरी के नीचे। नीतीश यानी डेवलपमेंट मैन। नीतीश यानी अपराध और अपराधियों को खत्म करने का दावा करने वाला नेता। नीतीश यानी आनंद मोहन और मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों का समर्थन प्राप्त नेता भी। खैर, बात हो रही थी मोदी की। सरकार बनी तो मुख्यमंत्री पद के दावेदार मोदी बन गये उपमुख्यमंत्री। तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा की भांति बिहार की जनता ने देखा उन्हें हर जगह. हर सभा में नीतीश के साथ, हंसते, मुसकाते, माला पहनते। जो संकट पैदा हुआ, वह यह था कि पूरी कवायद में भाजपा गोल हो गयी। मोदी जी के कंधे पर भाजपा और मोदी जी कहां, यह सवाल आम भाजपाइयों के मन में आज भी सालता है। भाजपा का चेहरा बन गया जदयू का मुखौटा यानी पूरी पहचान का ही संकट। अब राधा मोहन सिंह, जो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं, भलें चिल्ला लें, गुहार लगा लें, होना वही है जो मोदी जी चाहेंगे। और जो सूरतेहाल है, उससे तो यही लगता है कि मोदी जी वही चाहेंगे जो नीतीश बाबू चाहेंगे। भाग-दौड़ शुरू है, गणित बिठाये जा रहे हैं, पर बिहारी फंडे से बिहार में ही अपना वजूद बचाने के लिए इस पार्टी को मशक्कत करनी पड़ रही है, आगे भी बहुत पसीने बहाने पड़ेंगे। सीटों की घोषणा अभी बाकी है, आने वाला समय सबकुछ साफ कर देगा। वैसे भाजपा के लोग अब खुलकर यह कहने लगे हैं कि मोदी बिहार में भाजपा को मटियामेट कर ही दम लेंगे। यदि भाजपा ने उनका निष्कासन तय किया तो वे जदयू के एलानिया मेंबर होंगे, मजबूत खंभे होंगे।
दूसरी धूरी संप्रग, जिसके दो धड़े राजद और लोजपा राष्ट्रीय स्तर पर भले कांग्रेस की छतरी के नीचे दिख रहे हों, पर इस तमाशे का बिहार एपीसोड बिल्कुल अलग परिदृश्य प्रस्तुत करता है। दिल्ली में उन्हें छाया देने वाली कांग्रेस का यहां तो साया तक गायब है। एक आम बिहारी से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का नाम पूछकर देखिए, मेरा दावा है, वह नहीं बता पायेगा। सत्येन्द्र नारायण सिंह ने जो लुटिया डुबोयी, वह आज तक डूबी हुई है। नतीजा, नारंगी की तरह जावों में बंटे राजद, लोजपा और कांग्रेस दिल्ली में एक दिख रही हों, पर यहां तो अलग-अलग रस बांटती ही चल रही हैं। पिछली बार लालू ने अपने करिश्मे से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार खड़े किये और ज्यादा सीटें ले गये। नतीजा, राम विलास पासवान को आज भी रेल मंत्रालय छिनने का गम साल रहा है। इस बार वे कोई चूक नहीं करना चाहते। चालीस सीटों वाले इस प्रदेश में अपने लिए उन्होंने सोलह सीटों का दावा ठोक दिया है और साफ कर दिया है कि यदि इसे नहीं माना गया तो वे चालीस की चालीस सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे। कांग्रेस की तो कोई बात नहीं, पर लालू सकते में हैं। लालू को याद होगा कि विधान सभा चुनाव में रामविलास की जिद से गठबंधन नहीं बन पाने की सूरत में बिहार की गद्दी उनके हाथों से जाती रही थी। बिहार विधान सभा को आज भी वे हसरत भरी निगाहों से देखते हैं। तो ग्रेट इंडियन तमाशे के इस बिहारी फंडे में मदारी का खेल तो चालू है, पर मदारी कौन और बंदर कौन है, यह अभी तय होना है। जो दिख रहा है, उसे देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि फिलहाल मदारी से बंदर को फिलहाल कोई मतलब नहीं है। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा अभी जारी रहेगी। धन्यवाद।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

बिहार में ग्रेट इंडियन तमाशा

ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव का अभी बिगुल ठीक से बजा भी नहीं है, पर पहलवान हैं कि ताल ठोकने लगे हैं। वैसे तो इस प्रकार का समां पूरे देश में बंधा हुआ है, पर बिहार में, भई, यह कुछ खास अंदाज में ही सरंजाम पाता दिख रहा है। अखाड़े आबाद हो गये हैं और मुकाबले की छटपटाहट गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले जुबानों की सुर्खियों पर चढ़ी दिखने लगी है। घात-प्रतिघात में बोले जा रहे शब्दों के नमूने अभी भले ऊपरी स्तर पर ही हों, पर उनका रंग आम मानस पर चढ़ता भी दिख रहा है। जीत जायेंगे हम का बोलबाला कुछ यूं फिजा में तैर रहा है, मानो मतदान कल ही होने वाला है, फैसला कल ही आने वाला है। और इसका श्रेय उन तीन दिग्गजों के नाम जाता है, जो धुरी के रूप में पब्लिक के सामने, ऊपर और अगल-बगल सुदर्शन चक्र की भांति घूम रहे हैं। पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले ये तीन दिग्गज हैं- एनडीए यानी जदयू और भाजपा के संयुक्त प्रयासों के क्षत्रप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद सुप्रीमो व केन्द्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा लोजपा किंग व केन्द्रीय रसायन-उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान। सरकारी अभियान की आड़ में अब ग्रेट इंडियन तमाशे की खासियत देखिए।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विकास यात्रा शुरू कर रखी है। सरकारी अभियान, सरकार गांवों की ओर, जरूरत अभी ही। क्यों? क्योंकि चुनाव जो सिर पर है। इसके तहत वे न केवल गली-गली घूम रहे हैं, बल्कि जिले के एक गांव में रात्रि विश्राम भी कर रहे हैं। शाम में लग रही है चौपाल और गांव में लग रहा है जनता दरबार। अगले रोज शहर में जनसभा। अब भई, मुख्यमंत्री घूमेगा तो सरकारी अमला-जमला भी घूमेगा। और जब काफिला होगा ऐसा तो समां बंधेगा कैसा? हां, कहना चाहता हूं कि समां तो खूब बंधेगा, पर काम कुछ नहीं होगा। जी हां, काम ऐसे होता ही नहीं है। ऐसे कहीं काम होता है क्या? यह तो सरकारी पैसे से चुनाव की तैयारी का फंडा है। बिहारी फंडा? हींग लगे न हल्दी, रंग भी चोखा आये। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, लागू हो जाये पूरे देश में भई।
उधर, रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव। ठेठ गंवई स्टायल। प्रतिद्वंद्वी पर पलटवार। प्रतिद्वंद्वी दो। नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। घूम रहे हैं जिला दर जिला। रेल का सहारा। कर रहे हैं घोषणा दर घोषणा। रेलवे के मुहाने को खोल दिया है बिहार की ओर। फायनल पारी। चुनाव में जीतना जो है। कहीं लाइनें बिछ रही हैं तो कहीं रेलमंडल खुल रहे हैं। गाड़ियों के फेरे से काम नहीं चल रहा तो गाड़ियां ही बढ़ायी जा रही हैं। अभी आपने देखा होगा कि भाई साहब ने बजट और अंतरिम बजट का अंतर ही खत्म कर डाला। चार महीने बनाम पांच साल की घोषणा तक रेल बजट में की गयी। यह चुनावी अखाड़े के पहलवान की ललकार थी, जिसे पूरे हिंदुस्तान ने सुनी और समझी, बिहार ने तो शिद्दत से महसूस भी किया। अब चौक-चौराहों पर लालू ही लालू हैं। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, बिहारी फंडा। लागू हो जाये पूरे देश में भई।
और अपने राम विलास पासवान। रेल नहीं मिली तो सेल ही सही। बेतिया जाकर खुलवा दिया स्टील प्लांट। टार्गेट फिक्स, सालोसाल की बात तो छोड़िये, कुछ ही महीनों में आने लगेंगे उत्पादन। अधिकारी बेचारे हलकान हैं, परेशान हैं, पर काम तो करना ही है। नेताजी की इज्जत का सवाल है। सेहत सुधारने की दिशा में बिहार सरकार बहुत कुछ कर रही है, कोई बात नहीं, केन्द्र से प्रोग्राम आ रहे हैं, कोई बात नहीं, नेताजी तो गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले शिविर खोलकर लोगों का इलाज करवाएंगे ही। अब कोई सोचता हो तो सोचे कि आखिर सेल को लोगों के इलाज से क्या मतलब, वह भी मुफ्त? मगर, नहीं। नेताजी को तो मतलब है। अब रेल नहीं, सेल ही सही, नीतीश-लालू को ललकारना जो है। जनता बिना सेवा क्या सुनेगी? ललकार खूंखार हो चुकी है। मंच पर हमेशा साथ दिख रहे हैं सूरजभान, जिनका कहना है कि लोग जब उन्हें बास कहता है, किंग कहता है तो अच्छा लगता है। और सबसे बड़ी खासियत। तीनों नेताओं का टार्गेट वोट एक ही है। दलित जाति, पिछड़े लोग। अब इसमें कांग्रेस ने अपना वजूद खो दिया, भाजपा की मिट्टी पलीद होने पर लगी है तो कोई क्या करे? फिलहाल इतना ही। ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

श्मशान की एक रात...

बस वाले से हमने कहा-हमें छोला श्मशान घाट के पास उतार देना। कंडक्टर समेत समूची बस ने हमें ऐसे देखा मानो हम उनकी जात से बाहर के हों। श्मशान घाट के पास पुलिया पर हमें उतारकर बस चलती बनी। एक अधखुली दुकान वाले से पूछा-श्मशान घाट किधर है? मरघट सामने है-उसने बताया। रात के दस बजे थे। आसपास के सूनेपन से लगा कि रात काफी गहरी हो चुकी है। बारिश हो रही थी। भींगते हुए हम श्मशान घाट की तरफ बढ़े। रास्ते में हमें शेड दिखा। बारिश से बचने के लिए वहां पहुंचे। फर्श पर दो चबूतरे बने हुए थे। शेड के बाहर पेशाब करते दिखे सज्जन (नशे में धुत) हमारे पास आए। गौर से देखा। हमने पूछा-ये चबूतरे क्यों बने हैं?॥जब आप मरेंगे, आपके ये दोस्त मरेंगे, मैं मरूंगा तो श्मशान घाट ले जाने से पहले अर्थी यहीं रखी जाएगी। वे नरेश चौहान थे। उनके इस जवाब से माहौल भुतहा लगने लगा।

यहां से चलकर हम विश्राम (श्मशान) घाट के गेट पर पहुंचे। वहां लिखा था-रात दस बजे के बाद अंतिम संस्कार नहीं होता। गेट बंद था। अंदर दोनों तरफ छोटे-छोटे घर बने हुए थे। इनमें से एक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का दफ्तर था। दूसरा विश्राम घाट के प्रबंधक नारायण सिंह कुशवाहा का निवास। दफ्तर के पास बैठे सज्जन को आवाज देकर हमने कहा, कुशवाहा जी से मिलना है। उन्होंने कहा-वे तो गए। सुबह मिलेंगे। कहा-तो आपसे ही कुछ बात करनी है। वे आए। हमने बताया-कुछ लिखना है, रात भर यहीं बैठना चाहते हैं। अखबार का नाम बताया तो उन्होंने दरवाजा खोल दिया। बातचीत के दौरान चाय पिलवायी और बताया कि मैं ही नारायण सिंह हूं। परिवार के साथ यहीं रहता हूं। हमारी इच्छा के मुताबिक कुशवाहा जी ग्यारह बजे हम दोनों को वहां छोड़ आए, जहां मुरदे जलाए जाते हैं। एक बड़े शेड के नीचे बने सोलह खानों में से दो पर अब चिता जल रही थी। उनके आसपास मंडरा रहे थे चार खूंखार कुत्ते। दो हमें देखकर झपटे। कुशवाहा जी ने रोका। वे हमें वहां से कुछ दूर एक शेड के नीचे बिठाकर चले गए। एक बेंच पर बैठ गए। जहां हम बैठे थे, उसके पीछे यानी दक्षिण में नाला था। उत्तर की ओर जीवित लोगों के लिए विश्राम स्थल बना था। पश्चिम की ओर झाड़-झंखाड़ और पूरब की ओर जीवन-मृत्यु का चक्र दिख रहा था। आबादी के नाम पर दक्षिण में कबाड़खाना नाम की बस्ती।

सामने जल रहे दो मुरदों में एक युवक का था, जिसने आत्महत्या कर ली थी। दूसरी चिता एक बुजुर्ग की थी। दोनों चिताओं के शोले अब भी दहक रहे थे। पास मंडरा रहे कुत्तों के अलावा कहीं दूर भी कुत्ते भौंक रहे थे। बूंदाबांदी अब भी हो रही थी। पास में प्लास्टिक पर पानी गिर रहा था। खड़-खड़ की आवाज हो रही थी। कुत्तों के चुप होते ही माहौल अजीब सा हो गया। डर हमें आगोश में लेने की कोशिश कर रहा था। एक अनजाने रोमांच का इंतजार, जो साढ़े दस बजे तक था, वह अब उतना नहीं था। इतने में किसी फैक्ट्री से सायरन की आवाज गूंजी। हमें लगा, जैसे पास में ही शंख बजा हो। हम जीवन-मौत को छोड़कर फ्रायड की बात करने लगे। फिर स्टेशन से रेलगाड़ी की आवाज आई। लगा, आबादी पास ही है और हम आश्वस्त हुए।

सवा बारह बजे अचानक दो कुत्ते उछलकर खडे़ हो गए। लगा, दो मुरदे उठकर खड़े हुए। बोलते हुए हमारे मित्र चुप हो गए। ...आसपास पसरे भय को झटककर हम फिर बातचीत करने लगे। बूंदाबांदी बंद हो चुकी थी। प्लास्टिक पर पानी नहीं गिर रहा था। कुत्ते नहीं भौंक रहे थे। लगा, जैसे हवाएं भी बंद हो चुकी हों। पास में रेलगाड़ी गुजरने की आवाज न आती तो कहीं कुछ नहीं। पता चला, लोग मरघट सा सन्नाटा क्यों कहते हैं।

बातचीत धीमी हो रही थी। हमारा सारा ध्यान इस बात पर था कि यह वक्त गुजरता क्यों नहीं। डर को दूर करने के लिए हमने तय किया-डर तो दिमाग में होता है। असर भी हुआ। हमें लगा, भारी दबाव हमारे ऊपर से हट गया। बातचीत की गाड़ी फिर बढ़ी।
सवा एक हो चुका था। मरघट में होने का भय फिर दबोचने लगा। इस भय के बावजूद, मुझसे कहीं ज्यादा हमारे मित्र को किसी रोमांचकारी घटना का इंतजार था। क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं था। जाने कैसे॥बात फिर भूतों की होने लगी। बातचीत एकतरफा हो गई। मुझे लगा, अब मैं सोच नहीं सकता तो बोलूं कैसे? लगा, मेरे दिमाग पर किसी और शक्ति का नियंत्रण हो और वह सोचने पर मजबूर कर हो कि एक झक सफेद कपड़ा पहने कोई आदमकद आकृति अभी निकल पड़ेगी। अपने आप से पूछा, क्या घिग्घी बंधना इसे ही कहते हैं? रात डेढ़ बजे हमने मृत्यु से जुड़े सारे तथ्यों को याद किया। कुछ मुक्त हुआ।

बातचीत अब भी एकतरफा थी। मैं सिर्फ सुन पा रहा था। पौने दो बजे मैंने अपने मित्र से कहा-कुछ देर मैनेजर के पास चलकर बैठें। मेरे इतना बोलते ही दहकती चिताओं के पास बैठे चारों कुत्ते उठकर भौंकने लगे। इन खूंखार कुत्तों को देखकर उपजा डर भी मुझे मरघट के पास बैठने का साहस नहीं दे पा रहा था। लेकिन मेरे मित्र कुत्तों को देखकर कुशवाहा जी के पास जाने की हिम्मत छोड़ बैठे। पर मैं उन्हें जबरन उठाकर ले गया। चिता की बगल से गुजरते वक्त कुत्ते तेजी से झपटे। लगा चीर-फाड़ दिए गए। हम दोनों चुपचाप खड़े हो गए। कुत्तों ने जगह-जगह से सूंघा और छोड़ दिया। हम मृत्यु प्रमाणपत्र दफ्तर के पास जाकर बैठ गए। भय भाग गया। दफ्तर और चिता की दूरी सत्तर-अस्सी मीटर थी। कुशवाहा जी सपरिवार आराम की नींद सोए हुए थे। मच्छरों ने परेशान करना शुरू कर दिया तो हम टहलने लगे। ढाई बजे फिर दफ्तर के पास ही बैठ गए। बैठते ही पेट्रोलिंग (पुलिस) वाले आ गए। गेट पर जीप रोकी। हमने कुशवाहा जी के परिवार के एक सदस्य को जगाया। पुलिसवालों ने उससे पूछा-ये लोग कौन हैं? वह बता नहीं पाया। हमने बताया, अखबार से हैं। अच्छा-अच्छा कहकर आठ-दस मिनट गेट पर ही खड़े रहे। भाव भंगिमा कह रही थी, पगला गए हो?

पौने तीन बजे लगा, जैसे हम कुछ छोड़ रहे हैं। फिर एक अनचाहे रोमांच को पाने की इच्छा जोर मारने लगी। भय दूर हो चुका था। जयंत जी बैठे-बैठे सो रहे थे। जबरन उठाया। वहां ले गए, जहां चिता जल रही थी। कुत्तों के डर से यहां वे आना नहीं चाह रहे थे। पर अब कुत्ते जा चुके थे। दोनों ने राहत की सांस ली। वहीं जाकर बैठ गए, जहां शुरुआत में आकर बैठे थे। बैठते ही बिजली चली गई। घुप्प अंधेरा। लगा मरघट के सारे भूत अब हम पर हमला कर देंगे। मैं सस्वर हनुमान चालीसा पढ़ने लगा। मेरे घोर वामपंथी मित्र भी मेरे सुर में सुर मिला रहे थे। मिनट दर मिनट एक दूसरे को टटोलकर देख रहे थे, हैं भी या नहीं? मेरे मित्र का पता नहीं, पर भय की अधिकता की वजह से मुझे भय का अहसास भी नहीं हो पा रहा था।

अंततः रातभर का सबसे कठिन दौर गुजरा। सवा तीन बजे बिजली आ गई। धड़कनों पर काबू पाया। एक मन हुआ वापस कुशवाहा जी के पास भाग जाएं। पर मन मारकर बैठे रहे। अब तक हमें लगने लगा था कि अंधेरे में कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा। हम भयमुक्त हो रहे थे। इस कदर कि बस्ती में किसी बच्चे की जोर-जोर से रोने की आवाज भी हमें नहीं डरा पा रही थी। अब हमें मुरदों के जलने से फैली चिरांध का भी अहसास हो रहा था। हम उस गंध से परेशान होने लगे। चिताएं बुझ चुकी थीं। हल्की बारिश के साथ जोर-जोर से हवा चलने लगी। सांय-सांय की आवाज के चलते हमें फिर लगा कि हम मरघट में बैठे हैं। ठंडी हवा सिहरन पैदा कर रही थी। वक्त तीन पैंतीस का था। कौए अब कांव-कांव करने लगे। दूर कहीं से कोयल की आवाज भी आ रही थी। हमें रातभर में कुछ भी अलग न देख पाने की निराशा घेरने लगी थी। अब हमारी बातचीत बिल्कुल सामान्य थी।

सवा चार बजे मसजिद में अजान हुई। पीछे बस्ती के घर अब साफ-साफ दिखने लगे। हमारे मित्र ने कहा, अब कुछ नहीं होगा, चलिए। गेट खुलवाकर हम श्मशान घाट से निकल पडे़। बस पकड़ी। घर आकर खूब सोए।

यह रात हमने कुछ साल पहले श्मशान घाट में गुजारी थी। साथ में मेरे मित्र जयंत सिंह तोमर भी थे। तोमर साहब मुरैना के हैं। फिलहाल बच्चों को पत्रकारिता पढ़ाते हैं। दिन, साल महीने नहीं दे रहे। वह रात मुझे आज भी कल की ही लगती है। श्मशान घाट भोपाल का है।

बुधवार, 7 जनवरी 2009

मुखिया जी से शिकायत कब तक?

याद करें, मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकियों के हमले के तुरंत बाद क्या प्रतिक्रिया थी? पूरे देश के साथ-साथ सरकार के स्वर में भी यह बात शामिल थी कि पाक को सबक सिखाया जाएगा। यह स्वर गायब हो चुका है? जनता के स्वर में निराशा का पुट है तो सरकार की चेतावनी भी अब घिघियाहट सी लगती है। इतना तो तय हो ही चुका है कि हम अपने दम पर कुछ नहीं कर सकते। पाक के खिलाफ कारॆवाई की बात तो छोड़ दें, उन आतंकियों के खिलाफ कारॆवाई के लिए भी हम बाकी देशों की चिरौरी कर रहे हैं, जिन्होंने हमारी नाक में दम कर रखा है। न जाने कितने सालों से पाक भारत के खिलाफ आतंकियों को शह दे रहा है, उनकी मदद कर रहा है। बावजूद इसके हमें हर हमले के बाद नए सिरे से हमले में पाकिस्तानी आतंकियों की संलिप्तता के सुबूत देना देने पड़ते हैं। इस बार भी हम वही कर रहे हैं। आपत्ति इस बात पर नहीं है। पाक की करतूतों की जानकारी पूरी दुनिया को होनी चाहिए। कूटनीतिक प्रयास जारी रहें। संभव है, इसके नतीजे बाद में आएं।

दिल नहीं दिमाग की बात करें तो कोई नहीं कहता कि हमें पाक पर हमला कर देना चाहिए। लेकिन इन दिनों भारत और पाकिस्तान के सुर पर विचार करें तो बात चोरी और सीनाजोरी वाली लगती है। पाकिस्तानी आतंकियों ने हमें इतनी बड़ी चोट दी, इसके बावजूद पाकिस्तान धौंस भरे स्वर में बात कर रहा है। और इक्का-दुक्का बेमतलब के बयानों को छोड़ दें तो हमारी सारी सक्रियता इस बात को लेकर है कि अमेरिका और बाकी देश मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाएं। इतना तो हमने भी मान ही लिया है कि हमारे किए कुछ नहीं होने वाला।

एक बात और। दुनिया भर में अमेरिकी दादागीरी की बात को लेकर कभी-कभी अपने यहां भी बहस होती है। सरकार भी कहती है कि हमारी नीतियां या हम अमेरिका से नहीं प्रभावित होते। ये बातें कितनी निरथॆक हैं, यह एक बार फिर साबित हुई है। भारत पर आतंकियों के हमले के बाद हम फिर अमेरिका पर ही टकटकी लगाए बैठे हैं। सारी उम्मीदें वहीं हैं। अमेरिका दबाव बनाए तो पाक आतंकियों के खिलाफ कोई कारॆवाई करे। वरना वह तो यह भी मानने को तैयार नहीं कि हमला पाकिस्तानियों ने किया।

मानेगा भी क्यों? आपने ऐसा किया ही क्या है? और अमेरिका आपके लिए किस हद तक दबाव बनाएगा, यह तो उसे ही तय करना है। विश्व ग्राम के अघोषित मुखिया जी गांव के इस दुस्साहसी घर के साथ अपने रिश्ते भी देखेंगे। और यह किसे पता नहीं होगा, गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत आज भी पूरी दमदारी के साथ मौजूद है। मार खाने के बाद मुखिया जी से शिकायत करके अपने कतॆव्य की इतिश्री मान लेने वाले लोग आगे भी पिटते रहते हैं। गांव में भी लोग उसीसे भिड़ने से बचते हैं, जो मारपीट भले न करता हो, मारपीट का जवाब देने की हैसियत रखता हो। फिलहाल हमारी स्थिति तो जवाब देने वाली नहीं, मुखिया जी से शिकायत करने वाली ही लगती है। आखिर क्यों नहीं पाकिस्तान को भी उसी की भाषा में जवाब दिया जाए। ऐसे भी पाकिस्तान कहता तो यही है। आप आईएसआई पर हमले की बात करते हैं तो वह रॉ पर आरोप लगाता है। आप जैश, लश्कर प्रमुख और दाऊद को मांगते हैं तो वह बाल ठाकरे, छोटा राजन की सूची सौंपता है। आपके सुबूतों के जवाब में दुनिया को आपके खिलाफ तैयार सीडी सौंपता है।

अब हम भी देते रहें दुनिया को सफाई। आखिर पाकिस्तान के खिलाफ सुबूतों के दम पर हम विश्व समुदाय से अपने साथ खड़े होने की उम्मीद करेंगे तो उन्हें यह भी तो बताना होगा कि नहीं, पाकिस्तान जो कह रहा है, हम वैसा कुछ नहीं करते। इसका मतलब हमें अकारण ही बचाव की मुद्रा में आना होगा। जो हम करते नहीं, उसकी सफाई देनी होगी।

इसे लेकर बहुत किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन आखिर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति क्यों नहीं बननी चाहिए? कब तक हम हर हमले के बाद दुनिया के सामने घिघियाते रहेंगे कि पाक को रोको। यह तो तय है कि पाक के खिलाफ क्या किसी के भी खिलाफ युद्ध की स्थिति में हम नहीं है। युद्ध तो केवल दुनिया का दादा अमेरिका ही छेड़ सकता है। भले ही वह एकतरफा क्यों न हो?
युद्ध के अधिकार और स्थिति से वंचित भारत को भी तो आखिर अपने बचाव के लिए कुछ न कुछ करना होगा। क्या यह जैसे को तैसा की रणनीति के अलावा वतॆमान परिस्थितियों में कुछ और हो सकता है?

कई बार तो यह भी लगता है कि मुंबई पर हमले के बाद से लेकर अब तक हमारी सरकार तय ही नहीं कर पाई है कि उसे करना क्या है। यह मानने में सचमुच हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारे पास वैसे नेतृत्व का अभाव है जो ऐसे मौकों पर उचित निणॆय ले सके। बात सिफॆ प्रधानमंत्री की नहीं है, पूरी सरकार ही इस मामले में लचर दिखाई दे रही है। हमारे नेता गाहे-बगाहे यह दोहराकर देश को संतुष्ट करने की कोशिश भर कर रहे हैं कि हमारे सारे विकल्प खुले हैं। विकल्प बताने को कोई नहीं कहता लेकिन देशवासी न जाने यह बात कितने सालों से सुन रहे हैं। हर बड़े हमले के बाद यह बात बार-बार दोहराई जाती है। होता कुछ नहीं है।

देश की जनता भी हर बार इस तरह की बातें सुन-सुनकर उसी रंग में रंग गई लगती है। वरना कहां हमले के बाद का शोर और कहां अब की उदासीनता। हमले के बाद जितना शोर हमारे नेता मचा रहे थे, जनता भी कुछ उसी अंदाज में उतना ही शोर मचा रही थी और अब वह भी शांत हो गई। आखिर भारत के खिलाफ पाक की इतनी बड़ी-बड़ी साजिशों के बावजूद क्यों नहीं कोई जनांदोलन इस बात के लिए उपजता कि पाक को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए? आखिर जनतंत्र में सबकुछ होता भी तो जनता की इच्छा से ही है।