शनिवार, 15 सितंबर 2012

दूरदर्शी कदम, तैयारी 2019 की

पिछले कई महीनों से भ्रष्टाचार व घपलों-घोटालों में घिरी, विरोधियों का विरोध झेल रही और विदेशी मीडिया तक में किरकिरी करा रही मनमोहन सरकार ने चुप्पी तोड़ी, गुस्सा निकाला और बड़ा संदेश दिया कि सरकार चाहे तो क्या नहीं कर सकती। हां, कुछ भी। पहले दिन डीजल पर दाम बढ़ाए और रसोई गैस का सालाना छह का लिमिट फिक्स किया। अभी देश सकते में ही डूबा था कि दूसरे दिन खुदरा में विदेशी दुकानों के लिए भी रास्ता खोल दिया। बवाल मचना ही था। मचा कहां, अभी मचना शुरू ही हुआ कि तीसरे दिन सरकार का जिद्दी बयान था, नहीं झुकेंगे। तो तीन दिन की ये खबरें हैं। आइए, अब इसके निहितार्थ पर थोड़ी चर्चा करें।

इन तीन दिनों में इस मसले पर कई लोगों से कई दौर में कई तरह की बातें हुईं। किसी को गुस्सा था तो किसी को दुख पर किसी का नजरिया तो कुछ और ही था, जो था बड़ा मार्केबल, जो था शेयर करने के लायक। गुस्सा कि ऐसी सरकार को तत्काल हट जाना चाहिए, हटा देना चाहिए और दुख कि ये क्या हो रहा है, महंगाई में अब कैसे दिन कटेंगे, साल में छह सिलेंडरों के बाद सातवां सिलेंडर साढ़े सात सौ रुपये में कैसे खरीदेंगे....। पर, दो लोगों की बातें मुझे बड़े मार्के की लगीं। यह आलेख उन्हीं के विचारों को शेयर करता है। उम्मीद है, इन विचारों से सोचों को कुछ गति मिलेगी। 

पहला है मेरा तीसरे नंबर का भाई। कल मैं बिहार में था और उसके साथ मोटर साइकिल पर मुजफ्फरपुर से लालगंज जा रहा था। मुजफ्फरपुर में ही एक पेट्रोल पंप पर तेल डलवाने के लिए रुका। कई मोटर साइकिल वालों की लाइन थी। भाई बाइक ड्राइव कर रहा था। मैं उतर कर बगल में खड़ा हो गया। पीछे-आगे कई लोग लाइन में लगे थे। आदतन मैंने यों ही बातचीत शुरू कर दी। सरकार को क्या हो गया है भई? डीजल की कीमत बढ़ा दी, रसोई गैस पर अंकुश लगा दी, अब विदेशी दुकानों के लिए रास्ता खोल दिया...। अभी मेरा वाक्य खत्म भी नहीं हुआ था कि आगे-पीछे लाइन में लगे कई लोग एक साथ बोलने लगे, ये हद है...., लगता ही नहीं कि लोकतंत्र है..., विदेशियों के हाथों सरकार बिक गई है.... मनमोहन पगला गया है...., सोनिया को देश से क्या मतलब...., लोग ही चूति... हैं जो इस पार्टी को वोट देते हैं, इस पार्टी को गद्दी पर बिठाते हैं....।

आखिर में भाई का कमेंट आया। मार्केबल कमेंट। भैया, लगता है मनमोहन सिंह ने कसम खा ली है कि 2014 के चुनाव में वोट नहीं लेना है। सरकार मानो साफ-साफ कह रही है कि देशवासियो, मत देना अगले चुनाव में मुझे एक भी वोट, सरकार कह रही है कि मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा वोट...। उफ... लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देश में सत्तारूढ़ सरकार के प्रति ऐसे-ऐसे कमेंट और सरकार फिर भी सत्तारूढ़, सोचकर रोएं खड़े हो गए। दिमाग के विचारों को झटका। भाई का नंबर आ गया था, बाइक में पेट्रोल डल चुका था और हम आगे बढ़ चुके थे। अब बात का टापिक बदल चुका था। बारिश हो रही थी और सड़क खराब थी। बातचीत खुद और गोड़ी दोनों को बचाने की होने लगी।

कल ही रात ट्रेन पकड़ी और बनारस आ गया। यहां दफ्तर में मिले वरिष्ठ पत्रकार सुरेश पांडेय जी। आज की खबरों की प्रायरिटी पर चर्चा के साथ हालचाल और कुछ अनौपचारिक बातें भी होने लगीं। अनौपचारिक बातों का मुद्दा भी वही था - मनमोहन के फैसले। सुरेश पांडेय जी का जो विचार सामने आया, वह भी मुझे कम मार्के का नहीं लगा। मुलाहिजा फरमाइए।

सुरेश पांडेय जी ने कहा, मनमोहन सरकार बड़ा दूरदर्शी कदम उठा रही है। पैसे बना रही है। मेरा स्वाभाविक सवाल था - पैसे बना रही है, दूरदर्शी कदम उठा रही है? उन्होंने कहा, हां। इस सरकार के अब सिर्फ दो ही मिशन हैं। पहला, जब तक सरकार है, तब तक खूब-खूब पैसा बनाओ और दूसरा, टार्गेट 2014 नहीं, टार्गेट है 2019। मैंने कहा, जरा डिटेल में समझाइए।

सुरेश जी ने कहा, कांग्रेस को मालूम है कि जितने आरोपों में उसकी सरकार घिर चुकी है, उस हिसाब से 2014 के चुनाव में तो वह जीतने से रही। उसे अच्छी तरह मालूम है कि 2014 के चुनाव के बाद उसे विपक्ष में बै ठना है और लड़ना है 2019 में। 2019 तक लोग भूल चुके होंगे। लोगों के सामने होगी उस सरकार की नाकामियां, जो सत्तारूढ़ होगी और विकल्प होगी सिर्फ कांग्रेस। तब तक नेता के रूप में राहुल गांधी भी बेहतर ढ़ंग से प्रोजेक्ट किए जा चुके होंगे। नए वादे और नए इरादों के साथ। इस हिसाब से मनमोहन ने बड़ा दूरदर्शी कदम उठाया है। वह फैसले ले रहे हैं। जनता से पैसा उगाही के फैसले। यह उगाही कहां से शुरू होकर कहां पहुंचेगी, क्या यह कहने की बात है? जिस देश में प्रखंडों से जाति प्रमाण पत्र बनवाने में पांच सौ, हजार का वारा-न्यारा हो जाता है, वहां डीजल के दाम पांच रुपये, रसोई गैस की कीमतें डबल और विदेशी कंपनियों को कारोबार का रास्ता देने में कितने का वारा-न्यारा होगा, क्या यह कहने की बात है। यह पांच साल तक विपक्ष में बैठने और पांच साल बाद चुनाव लड़ने की तैयारी है।

सुरेश जी को मैं क्या जवाब देता? हां, उनकी बातों ने सोचों की शृंखला को एक विस्तार जरूर दिया। आप भी सोचिए, अभी समय है....। फिर मिलूंगा।
 

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

हालिया चोटें - फिजा और गीतिका

चांद की फिजा की रहस्यमय मौत और एयर होस्टेस गीतिका की खुदकुशी की खबरें पढ़ी आपने? इन दोनों वारदातों से कुछ सबक लिया आपने? जरूर लिया होगा। लेकिन क्या, यह सबसे बड़ा सवाल है। आप दोष भी दे रहे होंगे, धिक्कार भी रहे होंगे, पर सवाल है किसे? चांद को? जिसकी मोहब्बत में एक लड़की ने न केवल अपना परिवार छोड़ दिया, धर्म बदल लिया, बल्कि सारे जमाने के सामने खुद को रुसवा करने से भी बाज नहीं आई और उसके मरने के बाद जो उसके साथ किसी रिश्ते से भी पल्ले झाड़ता चल रहा है? उस ऊंचे राजनैतिक रसूख वाले हांडा को जिसकी एयरलाइंस कंपनी में गीतिका नौकरी करती थी और वहां से नौकरी छोड़ देने के बाद उस पर न जाने क्यों जो फिर से नौकरी ज्वायन कर लेने का दबाव बना रहा था?

माफ कीजिएगा, लेकिन कहना चाहूंगा कि इन मौतों के लिए सिर्फ चांद या हांडा को ही जिम्मेवार ठहरा देना काफी नहीं होगा। न, कतई नहीं। जरा आगे की लाइनों पर गौर फरमाइए। हम क्या कर रहे हैं? थोथी दलीलें, बकवास बातें, ऊंची उड़ानों की नई नई जिहादें, नारी की आजादी की पूरी तरह नंगी शिक्षाएं। हकीकत से आंखें मूंदें इक्कीसवीं सदी का अफसाना लिख रहे हैं, तराना गा रहे हैं। और क्या चाहिए इंडिया, बस हो गया बेड़ा पार। आजादी के नाम पर लड़कियों को सड़कों पर निकाल दिया, नंगा कर दिया। बाहर क्या हाल है? कदम-कदम पर लुटेरे, चोर, बदमाश, शोहदे, लफंगे बेलगाम घूम रहे हैं। और बेलगाम क्यों, सुरक्षा में, अत्याधुनिक हथियारों से लैस, ताकतवर बनकर। अब लड़कियों के साथ छेड़खानी हो रही है, बलात्कार हो रहा है, हत्या हो रही है, लाश में कीड़े पड़ रहे हैं। और हम गीत गा रहे हैं, इक्कीसवीं सदी में यह क्या हो रहा है? यह क्या हो रहा है?

समाज को विचार करना होगा। विचार करना ही होगा कि किसकी कितनी आजादी जरूरी है। यह समझना होगा कि विपरीत लिंगों के प्रति आकर्षण सहज और स्वाभाविक है। हमारे पूर्वजों ने महिला और पुरुष के लिए कुछ अवधारणाएं यूं ही स्थापित नहीं कर रखी थीं, कुछ नियम-कानून-शर्तें यूं ही नहीं बना रखे थे। हम क्या कर रहे हैं? अंधानुकरण। यह जिन दोषों को अपने साथ लेकर आ रहा है, ला चुका है, उसे क्या कहने की जरूरत है? बसों में, रेलों में, मेट्रो में, सड़कों पर, दफ्तरों में यानी  सरेआम क्या नहीं दिख रहा? एक पार्क में चले जाइए, बैठ नहीं पाएंगे। जोड़ों का राज है। किसी सी-बीच पर घूम आइए, सब कुछ खुल्लम-खुल्ला है। राम, कृष्ण, परमहंस और गांधी, नेहरू, सुभाष की धरती पर प्यार का खेल अब सरेआम है। कहीं रेव पार्टी है तो कहीं असली पार्टी..... एक मर्यादा, एक परंपरा, महिला-पुरुषों के बीच का एक अनुशासन टूट गया है, क्या ऐसा नहीं लगता? मान्यताएं टूटती हैं तो चोट सीधे दिलों पर या दिमागों पर ही लगती है। और यह लग रही है। हालिया इन चोटों का नाम है फिजा की सड़ी गली लाश और गीतिका की खुदकुशी।

और यह इस सीरीज की न तो पहली चोट है और निश्चित मानिए, न आखिरी है। जब आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगे तो निश्चित रूप से देश के किसी कोने में कोई गीतिका खुदकुशी कर रही होगी या किसी फिजा की लाश को कीड़े चाट रहे होंगे। सवाल है कि हम कब तक वर्जनाओं के तोड़ने का, परंपराओं के ध्वस्त करने का, मर्यादाओं के नेस्तनाबूत कर देने का, आचरण और चरित्र के भेद को पाट देने का, रीति-रिवाजों से दूर चले जाने का, संस्कृति को अंधानुकरण की काली चादर से ढंक देने का  अपना दोष छुपाते रहेंगे? कब तक? कब तक इक्कीसवीं सदी में पहुंच जाने का गीत गाते रहेंगे और कब तक व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत से आंखें बंद किए रहेंगे? आखिर कब तक? और आखिरी बात। बिजलियां गिरी हैं, घर जले हैं, मगर सब कुछ अभी राख नहीं हुआ। बस, हमें थोड़ा सा संभलना होगा और संभालना होगा अपने नौनिहालों को। सवाल है कि कौन यह जिम्मेवारी निभाएगा, कौन?

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

अन्ना तुम्हें नमन


अन्ना ने भी इस सपने के इतनी जल्दी सच होने की उम्मीद नहीं की थी, जिस पीढ़ी के बारे में माना जा रहा था कि आगे निकलने की होड़ में वो कुछ भी पीछे छोड़ सकती है। अपना देश संस्कृति यहाँ तक कि अपना परिवार भी वही आज अन्ना के साथ खड़ी है। अन्ना के अनशन के आगे सरकार घुटने टेकेगी या नहीं, मजबूत लोकपाल बिल क्या कभी बन पाएगा? ये सवाल अब उतना मायने नहीं रखता जो अन्ना करना चाहते थे वो तो उन्होंने कर दिखाया। अनशन से बड़ा काम गिरफ्तारी ने कर दिया । जनता इस तरह सड़कों पर आ गई कि कांग्रेस की जान साँसत में आ गई ।
अन्ना के बारे में कहा गया था कि न तो महाराष्ट्र के बाहर उनकी कोई पहचान है नही पीछे कोई संगठन. फिर भी आज दिल्ली से लेकर पटना तक जनसैलाब उमड़ पड़ा है। ये कहने वाले भूल गए कि अन्ना की अदम्य इच्छाशक्ति के साथ देश का मीडिया भी खड़ा है। इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो कि अन्ना की आवाज को जनता की आवाज मीडिया ने बनाया। निगमानंद के अनशन व अन्ना के अनशन में फर्क मीडिया ने ही पैदा किया। आज जो लोग जुटे हैं वो सिर्फ अन्ना का साथ देने क लिये ही नहीं खड़े वे खड़े हैं भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुके अपने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए। सक्षम विपक्ष के अभाव में जनता को तलाश थी एक ऐसे चेहरे की जो निस्वार्थ हो,जिसके पीछे वो आँखे मूंदकर चल सकें। जनमानस के भीतर सुलग रही आग को अन्ना ने तो सिर्फ हवा दी है, उसे प्रचंड अग्नि का रूप तो केंद्र सरकार के दमन ने दिया। रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के साथ शांतिपूर्वक विरोध कर रहे लोगों पर जिस तरह से लाठियाँ बरसाई गई वो सबने देखा, जनता अब ये सब नहीं भूलती, मीडिया भूलने ही नहीं देता ।
टीवी पर २४ घंटे के लाइव कवरेज ने कपिल सिब्बल को खलनायक बना दिया। यहाँ तक कि दिल्ली की काँग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी इस मामले मे सिब्बल से पल्ला झाड़ लिया। शायद इसलिए इस बार सरकार ने अचानक ही मघ्यम मार्ग अपना लिया, पहले अन्ना पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए,उन्हें गिरफ्तार किया फिर अचानक यू टर्न ले लिया। राहुल गाँधी समझ गए थे कि रामदेव व अन्ना में फर्क है। अन्ना भागेंगे नहीं,न ही वो किसी तरह भी डिगाए जा सकेंगे। सबसे बड़ी बात ये कि उनके पास इस फौजी की कोई कमजोर कड़ी नहीं है ।
हम नमन करते हैं तुम्हे अन्ना। तुमने हमारे राष्ट्रीय बोध को जगाया। विश्वकप जीतने पर जीतने पर तिरंगा लेकर जश्न मनाने को ही देशभक्ति का पर्याय मानने वाले युवाओं को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना सिखाया। आज सड़कों पर ढोल बजाते, कैंडल मार्च करते, तो कभी माथा मुंडवाकर उसपर अन्ना लिखवाने वाले लोगों में पटना के डाक्टरों से लेकर मुंबई के डिब्बे वाले तक शामिल हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों से लेकर आँटों वाले तक है। यदि अन्ना सफल हो गए तो अब तक भीड़तंत्र कहा जाने वाला भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता के पहले सोपान को पार कर लेगा।
विजयलक्ष्मी सिंह


मंगलवार, 4 जनवरी 2011

अतुलनीय अतुल

अमर उजाला के एमडी अतुल माहेश्वरी का निधन निश्चित रूप से पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसे बहुत दिनों तक महसूस किया जाएगा। मैं यहां कुछ उन लम्हों को आप सभी से शेयर करना चाहूंगा, जब अमर उजाला, जालंधर में नौकरी के दौरान मैंने अतुल माहेश्वरी जी के साथ गुजारे। यह २००० से २००४ के वक्फे का वह यादगार पल है, जो मेरी जगह कोई भी होता तो भुला नहीं पाता। निश्चित रूप से उस दौरान और भी जो साथी रहे होंगे, उन्हें भी वे पल याद होंगे। आप इन लम्हों के साथ महसूस कर सकते हैं कि अतुलजी में अखबार और पत्रकारिता के प्रति कितना समर्पण भाव था, वे अखबार के पन्नों पर सुंदर सोचों को किस कदर ढालने का सपना देखा करते थे और खबरों का दबाव दूर करने की उनकी परिभाषा क्या थी।

पहला लम्हा – जालंधर के एक होटल में संपादकीय टीम के साथ अतुलजी की बैठक में एक मसला उठा कि अखबार में पन्ने बढ़ाने होंगे क्योंकि खबरों का फ्लो बढ़ रहा है। इंडिया किंग सिगरेट पीते थे अतुलजी। इस सवाल के साथ ही उन्होंने डिब्बी से एक सिगरेट निकाला, सुलगाया और बड़े ही गंभीरता से बोलने लगे। अमेरिका और ब्रिटेन में प्रकाशित होने वाले अखबारों का पूरा पैनल यहां इंडिया में बैठा है और उनकी तनख्वाह भी इतनी है जितनी हम अपने संपादकों तक को नहीं दे पाते, लेकिन उन अखबारों को देखिए, इंडिया की कितनी खबरें रहती हैं। प्रखंडों तक हमने संवाददाता रख दिए, इसका मतलब यह नहीं कि वहां के रोजाना झगड़ों व किस्सागोई को हम खबरों का हिस्सा समझें। सिकुड़ते विश्व में कब कौन सा स्पाट डेटलाइन बन जाए, इसका पता नहीं। ये नियुक्तियां इसलिए की गई हैं कि जिस दिन वह प्रखंड डेटलाइन बने, उस दिन हम अपने संवाददाता की खबर प्रकाशित करें।

दूसरा लम्हा – जालंधर स्थित अमर उजाला मुख्यालय में अतुलजी के साथ संपादकीय टीम की बैठक थी। पंजाब में अखबार बढ़ नहीं रहा था और संपादकीय के साथ अतुलजी की बैठक इन्हीं चिंताओं पर आधारित थी। मोबाइल बंद थे, रिसेप्शन को आदेश था कि कोई भी उनकी कॉल अगले आदेश तक ड्राप रखी जाए। बैठक में बातें बहुत हुईं, पर एक बात शेयर किए जाने के योग्य है। उनके निशाने पर था पहला पन्ना और उस पर छपने वाले वीभत्स फोटो। अपनी बातें उन्होंने बड़े ही भावुक अंदाज में रखीं।

कहने लगे, मैं जब भी सुबह जगता हूं तो दिन अच्छा गुजरे इसके लिए सबसे पहले ईश्वर की प्रार्थना को हाथ जोड़ता हूं। मेरा मानना है कि सुबह यदि मां को देख लूं तो दिन अच्छा रहता है। इसलिए मुझे मां ही सुबह जगाती हैं और अपने हाथों चाय देती हैं। मैं दिन की शुरूआत मां को देखकर और उनके हाथों बेड टी लेकर करना चाहता हूं। इरादा वही कि दिन की शुरूआत शुभ-शुभ हो। और आप हैरत करेंगे कि यदि अखबार सिरहाने आ गया तो फिर इन सब से पहले मैं अखबार खोल लेता हूं। न तो मुझे ईश्वर की प्रार्थना को हाथ जोड़ना याद रहता है और न ही मां के हाथों की चाय। अब बताइए पहले पन्ने पर कोई वीभत्स फोटो छापा गया हो, खूनखराबा-लाशें दिखाई गई हों तो क्या मैं उस वक्त वह सब कुछ देखने की मानसिकता में हो सकता हूं, होता हूं? नहीं। कम से कम मैं तो नहीं होता। मुझे लगता है, पाठकों के हाथों में अलस्सुबह पहुंचने वाले अखबारों के पहले पन्ने पर वीभत्स फोटो नहीं छापे जाने चाहिए। उसे देखकर पूरा दिन खराब हो जाता है। किसी का पूरा दिन खराब करना हमारा काम नहीं, अखबार का काम नहीं।

तीसरा लम्हा – जालंधर के ही अपने केबिन में बैठकर अखबार पलटने के दौरान अमृतसर संस्करण में छपी एक हेडिंग पर उनकी नजर टिक गई थी। शीर्षक था – अमृतसर भ्रूण हत्या में अव्वल। अतुलजी का कहना था कि अव्वल सकारात्मक प्रयासों को दर्शाने वाला शब्द है और भ्रूण हत्या आपराधिक कृत्य है। अमृतसर के लिए यह कृत्य प्रशंसनीय नहीं हो सकता और इसलिए इस शब्द का प्रयोग यहां गलत है। इसकी जगह कुछ और शब्द ढूंढ़े जाने चाहिए थे।

इसी दौरे में एक-दो दफे संपादकीय कक्ष से उनका गुजरना हुआ। वे संपादकीय प्रभारी जी के कक्ष में आ-जा रहे थे। हो यह रहा था कि जब वे संपादकीय प्रभारी जी के कक्ष में जा रहे थे तो काम करने वाले साथी आदर में खड़े हो गए। संभवतः अतुलजी ने इसे नहीं देखा। जब वे लौट रहे थे तो फिर संपादकीय की उस कतार के साथी कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए। बस, अतुलजी भी रुक गए। उन्होंने जो कहा, वह बहुत दिनों तक याद रखने वाला है। उन्होंने कहा कि न तो आप प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी हैं और न ही मैं हंटर लेकर कक्षा में घूमने वाला टीचर। रिगार्ड में एक बार खड़े हो गए, चल गया पर बार-बार खड़ा होना ठीक नहीं। आप सम्मानजनक तरीके से रहें, यही मेरी इच्छा है।

अतुल जी शार्प ब्रेन के मालिक थे। किसी भी चीज को परखने और उसके विश्लेषण की उनमें विलक्षण प्रतिभा थी, यह एक बार नहीं, कई बार साबित हुआ। उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा जरूर था, जिसे देखकर एक भरोसा जगता था कि चाहे कितनी भी बड़ी समस्या हो, उनके पास वह पहुंच गई तो उसका निदान मिल ही जाएगा। उनका निधन अमर उजाला के लिए ही नहीं, पूरे पत्रकारिता जगत और जागरूक पत्रकारों के लिए एक झटका है, एक सदमा है। ईश्वर इस सदमे को सहने की शक्ति दे।

बुधवार, 24 नवंबर 2010

इतनी बड़ी जीत का मतलब

बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने स्पष्ट बहुमत लेकर जो इतिहास कायम किया है, उससे कई मतलब निकलते हैं।

मतलब एक - यह सूबे में विकास की जीत है। लोग अब जातिगत समीकरणों से ऊपर उठ चुके हैं।

मतलब दो - नीतीश का नेतृत्व, उनकी शैली तथा बीजेपी के भगवा चेहरे नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी को बिहार में प्रचार के लिए आने से रोकना लोगों को पसंद आया है।

मतलब तीन - अभी यहां लोगों को कांग्रेस कबूल नहीं है। राहुल और सोनिया का ताबड़तोड़ दौरा भी काम नहीं आया।

मतलब चार - राजद और लोजपा सुप्रीमो क्रमश: लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान बिहार के लिए इतिहास हो गए हैं।

मतलब पांच - बीजेपी के लिए सबक। सिर्फ सांप्रदायिकता का नारा बुलंद करने से काम नहीं चलता। विकास के साथ रहने से कंधे मजबूत होते हैं।

आखिरी मतलब - बिहार में विकास की यह जीत सिर्फ बिहार में ही नहीं, देश भर में असर दिखाने वाली है। इस जीत के अगुआ नीतीश कुमार ने भी कुछ ऐसा ही कहा है।

सबक - काठ की हांड़ी बार-बार चूल्हा नहीं चढ़ती।

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

शुभकामनाएं

दीपावली पर सभी मित्रों को ढेर सारी शुभकामनाएं।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

...और बदल गई दुनिया

खलियारी बस्ती में घुसते ही नाक पर हाथ रखना पड़ता था। मन तो करता था कि आंखें भी बंद कर लें। उफ, इतनी गंदगी। घरों में ही सुअर के बाड़े, गंदी बदबूदार नालियां, उसमें लोट-पोट होते सुअर। चारों ओर भिनभिनाते मच्छर। क्या नरक इसी को कहते हैं? बस्ती के लोगों पर सवालनुमा यह जुमला भी बेअसर था। पीढ़ियों से सुअर पालने, उसका मांस खाने वाले ये परिवार गंदगी और बीमारियों के अभ्यस्त हो चले थे। कितने ही बच्चे अकाल मृत्यु का ग्रास बन चुके थे। फिर भी बस्ती के लोग खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं थे।

पक्की सड़क से दो सौ मीटर अंदर बसे इस गांव में मुसहरों के अलावा खरबार, बैंगा व चैरो जनजाति के लोग रहते हैं। पास का पूरा गांव बस्ती के लोगों घृणा करता था। अधिकांश तो इनसे कोई वास्ता ही नहीं रखते थे। परंतु कुमकुम इस बस्ती को लेकर चिंतित रहती थीं। उन्होंने आरोग्य सेविका बनते समय ही अपने गांव को स्वच्छ एवं रोगमुक्त करने का संकल्प लिया था। कुमकुम ने गांव में तो घर-घर कचरा फेंकने वाले सोखते गड्ढे बनवाए। कुओं में ब्लीचिंग पाउडर डलवाया। लेकिन, इस बस्ती पर अब तक उनका बस नहीं चला था। बातें तो वे लोग भी गौर से सुनते थे। साफ-सुथरा रहने की बात मान लेते थे। पर परिणाम हर बार वही ढाक के तीन पांत।

कुमकुम हर वक्त इसी उधेड़बुन में रहतीं कि ऐसा क्या किया जाए कि बस्ती वालों का जीवन स्तर सुधरे। नरक सा यह माहौल बदले। उन्होंने अपनी समस्या आरोग्य संच प्रशिछिका सिंधु दीदी को बताई। सिंधु दीदी ने जो रास्ता उन्हें बताया, उस पर चलना आसन नहीं था। ब्राह्मण परिवार की लड़की मुसहर बस्ती में जाकर नाली साफ करे, यह बात कोई कैसे बरदाश्त करेगा। लेकिन धुन की पक्की कुमकुम ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जुट गई सफाई अभियान में। साथ में थीं सिंधु दीदी, आचायॆ लोकपति और कुछ साथी। तीन दिनों तक तो यह टोली नालियों और घरों की सफाई करती रही। चौथे दिन से बस्ती के लोग भी उनके साथ हो लिए। पांच दिन ये सिलसिला चला। छठे दिन तक तो आमूल-चूल परिवतॆन हो चुका था। रामपति ने कुमकुम दीदी के हाथ से झाड़ू छीनी। ...अब बस करिए दीदी, हमें अहसास होगया है। अब हम अपने घरों और बच्चों को साफ ऱखेंगे। बस्ती के शेष लोग सर झुकाए मौन समथॆन कर रहे थे। कुमकुम, सिंधु दीदी का उद्देश्य पूरा हो चुका था।

पांच दिनों की मेहनत रंग लाई। लोगों को प्रेरणा मिल चुकी थी। अगले ही दिन से बस्ती में घरों के आगे बने सुअर के बाड़े हट गए। बरसों बाद बस्ती के लोगों ने परचून की दुकान से साबुन-सफॆ खरीदा। महिलाओं नेबच्चों को रगड़-रगड़कर नहलाया। साफ-सुथरे कपड़े पहनाकर उन्हें एकलविद्यालय में पढ़ने भेजा। आचायॆ लोकपति की आंखें भी उन्हें देखकर खुशी से चमक उठी। पहली बार बस्ती के बच्चों ने विद्यालय में प्रवेश किया था। अबतक जैसे-तैसे जीवन बिता रहे इन मासूम बच्चों के जीवन में पढ़ाई और संस्कार का नया प्रभात आया था। अब वे भी अन्य बच्चों के साथ गायत्रीमंत्र का सस्वर जाप दुहरा रहे थे।

बदलाव की इस बयार से गांव के सामाजिक समीकरण भी बदल गए। मुसहर जाति के लोगों सेदूरी बनाए रखने वाले लोग अब उनके घर के ओसारे में बैठकर गप करते नजर आते। जवाहर और रामपति ग्राम समिति के सक्रिय सदस्य हैं। अब वो दिन भूलना चाहते हैं जब गांव के लोग इन्हें देखकर नाक-भौं सिकोड़ते थे। इतना ही ग्राम समिति के प्रयासों से नरेगा के तहत पूरे गांव (बस्ती समेत) में खरंजा बिछ गया है।
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में खलियारी गांव है।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 4

ध्यान रखिए, सार्वजनिक होते लागू हो जाता है कोड

कुछ साथियों ने हमें कठघरे में रखा है और कहा है कि कोई तो मानक हो ब्लाक लेखन का सीरीज के तहत आप टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं। उनकी टिप्पणी इसी सीरीज की पोस्ट के साथ प्रकाशित हैं। एक डाक्टर साहब ने टिप्पणी में लगाकर रखे गये माडरेशन पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा है कि जब उन्होंने देखा कि माडरेशन लगा है तो वे अपनी टिप्पणी लिखना भूल गये। खैर।

जहां तक टीआरपी बढ़ाने का सवाल है, हम इसका जवाब एक कथा से देना चाहेंगे। शायद उस कथा से यह पता चले कि टीआरपी बढ़ायी नहीं जाती, जिसकी टीआरपी बढऩी होती है, खुद-ब-खुद बढ़ ही जाती है, उसे कोई नहीं रोक सकता। जी हां, उसे कोई नहीं रोक सकता। मेरा आपसे सवाल है कि क्या उसे कोई रोक सकता है? तो कथा सुनिए।

बोधिसत्व के अंदर जब ज्ञान का प्रस्फुटन हो रहा था तो उनके संगी-साथी उनसे बिछुड़ चुके थे। ऐसा कहिए कि उनका साथ छोड़ चुके थे। अब उनके अंदर जो ज्ञान प्रस्फुटित हो रहा था, वह बाहर निकलने और वायुमंडल में व्याप्त हो जाने को बेताब था। बुद्ध क्या करते? जंगल में ही एक बड़े पत्थर पर बैठ गए और लगे प्रवचन करने। सुनने वाला कोई नहीं, मगर वे करने लगे प्रवचन। मगर, नहीं। सुनने वाले थे। पूरा जंगल उन्हें सुनने लगा। जब वे प्रवचन करते, चिडिय़ां चहचहाना भूल जाती, जानवर शोर मचाना भूल जाते, यहां तक कि हवाएं तक शांत हो जाती थीं। बाद में उस शांति ने उनके साथियों को भी चौंकाया और जब उन्हें जंगल की इस शांति का पता चला तो वे भी बुद्ध की शरण में पहुंच गये।

क्या मतलब है इस कथा का? इस कथा का मतलब है, आप जब अपना काम सही तरीके से और पूरी निष्ठा से करेंगे तो उसका उचित और सही फलाफल मिलेगा ही। टीआरपी बढऩे के पीछे भी कुछ ऐसा ही मामला होता है। हमारा लेखन कुछ और सिलसिले में चल रहा है। हम ये नहीं कहना चाहते कि हम बुद्ध की भांति किसी नीरव जंगल में अपना प्रवचन कर रहे हैं। हम एक मानक, एक मर्यादा की बात कर रहे हैं। दुनिया का शायद कोई ऐसा इंसान न हो, जिसकी अपनी कोई मर्यादा नहीं हो। हां, यह और बात है कि इस मर्यादा के मूल्यांकन का पैमाना वक्त और परिस्थितियों के मुताबिक अलग-अलग हो सकता है।

एक दफ्तर में एक चपरासी के लिए मानक और उसी दफ्तर में उसके बास के लिए मानक में थोड़ा अंतर तो हो सकता है, पर दफ्तर एक होने के नाते एक समान मर्यादा तो कायम करनी ही पड़ती है, समान मानक पर काम करना ही पड़ता है। हां, दो दफ्तरों के बीच समान मानक होना जरूरी नहीं है। बात ब्लाग लेखन में मानक की हो रही है, जो व्यक्ति अपने दायरे के लिए लिखता होता है, पर उसका आवेग और परिणाम सब सार्वजनिक होता है। और जब कभी आप सार्वजनिक होते हैं, आपके ऊपर एक मानक, एक कोड लागू हो जाता है। भले ही वह अदृश्य क्यों न हो। हो जाता है कि नहीं? और यदि हो जाता है तो इसकी बात करना, इसके लिए बहस छेडऩा क्या टीआरपी बढ़ाने के लिए है? इस सवाल को हम बकवास मानते हैं।

हम डाक्टर साहब से कहना चाहेंगे कि माडरेशन से आपको बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए था। माडरेशन सिर्फ इसलिए रखा गया है कि कोई भी कभी भी उल-जुलूल न डाल दे। कभी ऐसा हुआ तो उस आलेख को ही नष्ट करना पड़ेगा। अभी यह कला हम नहीं सीख पाए हैं कि एक बार कमेंट पब्लिश करने के बाद उसे कैसे हटाया जा सकता है। वैसी स्थिति में पूरी पोस्ट को ही किल करना पड़ जाएगा। आप भी मानेंगे डाक्टर साहब कि यह ठीक नहीं होगा। हम वादा करते हैं कि हमारे ऊपर आप तीखी से तीखी टिप्पणी करें, उसे आप प्रकाशित पाएंगे। हम फिर से आश्वस्त करते हैं कि इम्तिहान की टिप्पणियों पर जो माडरेशन लगा है, वह सिर्फ अश्लील जुबां वाली टिप्पणियों को प्रकाशित होने से रोकने के लिए ही लगा है। डाक्टर साहब, आप जैसा व्यस्त व्यक्ति हमारे ब्लाग पर आया, आलेख पढ़ा और टिप्पणी के लिए तैयार हुआ, इसके हम आभारी हैं। फिलहाल ब्लाग लेखन के मानक को लेकर अभी बहस जारी रहेगी। आपके सुझावों, टिप्पणियों का स्वागत है। इस खुली बहस में भाग लेने के लिए आप आमंत्रित हैं।

कौशल, पुरुषोत्तम।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का-तीन

सुविधा है तो कुछ भी लिखेंगे?

लगता है बात गलत दिशा में मुड़ गई है। ऐसे में सीधी बात करें तो बेहतर। पिछले दो पोस्ट पर जो टिप्पणियां आईं, उनमें से कुछ का मतलब यह है कि ब्लागजगत में मानक की बात करना बेमानी है। ऐसा क्यों?क्या सिफॆ इसलिए कि हमारे पास यह सुविधा है कि हम कुछ भी लिखें प्रकाशित होगी।
हम अक्सर इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि राजनीति में आने के लिए कोई मानक तय नहीं है। हालत यह है कि हम भ्रष्टाचार, अनाचार और सियासी गुंडा तत्वों को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। हमारे नीति निमाॆताओं ने सियासत में सबके लिए समान अवसर देने के लिए कोई मानक नहीं तय किया था। जाहिर है, कोई मानक न होने को तब विशेषता ही माना गया होगा।

मतलब रोक-टोक न होने का दुरुपयोग हर जगह धड़ल्ले से होता है। ऐसे में कुछ नैतिक जिम्मेदारियां ब्लाग लेखकों के लिए भी तय की जाए तो बेहतर हो।

आखिर क्यों हम सेक्स और हिंसा से भरपूर, दोहरे अथॆ वाले फूहड़ संवादों वाली फिल्मों की आलोचना करते हैं। कई बार इसके लिए तकॆ दिया जाता है कि फिल्में समाज का आईना है। समाज में जो कुछ हो रहा है, वही दिखाया जा रहा है। हम इस तकॆ को नहीं मानते। कहते हैं, यह बहानेबाजी है। न ही हम इस तकॆ को मानते हैं कि दशॆक जो देखना चाहता है, हम वही तो दिखाते हैं।

हमें लगता है, ठीक वैसे ही हमें यह तकॆ भी नहीं मानना चाहिए कि कुछ भी लिखा जाए, ब्लाग पढने वाले उसे पढ़ते हैं, इसलिए सबकुछ जायज है। फिल्मों से ही समझें, पैसा लगाने वाला जैसी फिल्म चाहे दिखा सकता है क्या। उससे लिए कुछ बंदिशें हैं। नैतिकता का तकाजा है। सेंसर बोडॆ है। फिल्म बनाने वालों का यह तकॆ भी नहीं माना जाता कि जिसे फिल्म देखना है देखे, जिसे नहीं देखना नहीं देखे। ब्लागों पर पढ़ाने, दिखाने का पैसा नहीं लगता, इसका मतलब यह तो नहीं कि कुछ भी लिखा जाए। हमें लगता है कि जैसी नैतिकता हम फिल्म बनाने वालों के पास देखना चाहते हैं, जैसी नैतिकता की हम सड़क पर चलने वाले एक आदमी से उम्मीद करते हैं, ठीक वैसी ही नैतिकता की उम्मीद ब्लाग लेखन करने वालों से क्यों नहीं होनी चाहिए।

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि....
-ब्लाग पर लिखने की पहली शतॆ भाषा की शुद्धता हो।
-अश्लीलता और हिंसा से परहेज किया जाए।
-हम एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले वाले लेख न लिखे जाएं।
-एक दूसरे की छीछालेदार की कोशिश में न लगे रहें।
(आखिर इससे कौन सा भला और किसका मनोरंजन होता है, सिवाय लिखने वालों के)
-तू मुझे मुल्ला कहे, मैं तुझे काजी कहूं की परंपरा बंद हो।
-बच्चा पैदा होने से लेकर श्राद्ध तक वाह-वाह बंद हो।
-एक दूसरे को ईमानदारी से पढ़ने और राय देने की कोशिश हो।
(एक बार फिर से, ब्लागों पर बात भय, भूख और भ्रष्टाचार से लड़ने की भी होनी चाहिए)
बातें अभी और हैं। बहस जारी रहेगी। आपके विचार आमंत्रित हैं।
पुरुषोत्तम, कौशल

कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 2

ब्लाग पर बकवास, पैसा खर्च होता है भई !
ब्लाग पर बकवास लिखने से पहले ब्लाग लिखने वालों को यह जरूर सोचना चाहिए कि जो कोई भी उन्हें पढ़ रहा है, वह अपने पाकेट का पैसा खर्च कर पढ़ रहा है। नेट का लिंक मुफ्त में तो नहीं मिलता? और आज के उपभोक्ता युग में क्या किसी को यह राइट बनता है कि अपने उपभोक्ता को झांसा दे, उसे फ्लर्ट करे या निरर्थक बातों में उसका समय जाया करे? मैंने पिछली पोस्ट में ही कहा था कि अभी लिखे जा रहे सत्तर फीसदी ब्लाग को पढ़ने से यह पता ही नहीं चलता कि आखिर वे क्या लिख रहे हैं और किसके लिए लिख रहे हैं। कई ब्लाग तो ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर बच्चा भी कह देगा कि लेखक अपने लिए भी नहीं लिख रहा है। मुझे तो ऐसे ब्लागों को देखने से यही लगा कि लेखक आखिर कैसे किसी को यह बता पाएगा कि वैसा वकवास उसी ने लिखा है। मगर, एक कहावत पढ़ी थी। एक दारूबाज पति अपनी पत्नी से गाहेबगाहे पीने के लिए पैसे झटके करता था और इसके लिए वह रोज नये-नये बहाने किया करता था। एक दिन वह घर गया और लगा पैसे मांगने। पत्नी के पूछने पर उसने बताया कि आज एक सट्टा लगा है। लोग कहते हैं बकरी की चार टांगें होती हैं। मैंने कहा है कि पांच होती हैं। मैं जीतूंगा। पैसे लाओ, डबल मुनाफे की बात है। पत्नी बोली, बेवकूफ आदमी, बकरी की चार टांगें ही होती हैं। पति बोला - मैं मानूंगा ही नहीं। पत्नी बोली - लोग बकरी को सामने लाकर टांगें गिनवा देंगे। पति बोला - गिनवाते रहें, मैं मानूंगा ही नहीं। पत्नी ने माथा पीट लिया। अब ब्लागों पर बकवास पढ़ने वाले क्या ऐसे ही अपना माथा पीटें? या कोई है इसका निदान?
(फिलहाल इतना ही। बहस जारी रहेगी। इस ब्लाग को पढ़ने वाला हर व्यक्ति इस बहस में भाग लेने के लिए आमंत्रित है।)
कौशल, पुरुषोत्तम।

रविवार, 30 अगस्त 2009

कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 1

हिन्दी ब्लागिंग पर तमाम बहसें होती हैं। कभी इस पर लिखे गए को साहित्य और असाहित्य मानने को लेकर तो कभी शुद्धियों और अशुद्धियों को लेकर। ये तो फिर भी अच्छी बहस है। बहस तो इस पर भी चलती है कि कौन किसका चमचा है। कौन किसके खेमे का है। कौन लड़कियों को अधिक टिप्पणी करता है और कौन पुरुषों को। नारी और पुरुष के बीच का विवाद तो ब्लागजगत में जगजाहिर है। हिंदू-मुसलिम सदभाव को बिगाड़ने का खेल भी ब्लागजगत में धूमधाम से जारी है। मौलिकता की तमाम मिसालें ब्लागजगत में मिल जाएंगी। ब्लागजगत के सिद्धहस्त लोगों ने एक दायरा बनाया है। उसे वे तोड़ना नहीं चाहते। कई जगह तो लगता है कि कुछ भी लिखकर लोग सिर्फ टिप्पणियां पाना चाहते हैं।

ब्लागजगत और ब्लागरों पर लिखने का चलन तो कुछ ऐसा है कि इस चलन में शामिल होने से हम भी खुद को रोक नहीं पाए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सत्तर फीसदी ब्लाग लेखन में सिर्फ लेखक की कुंठाएं झलकती हैं। आप कहीं अपनी वजह से पिट गए और आपको बचाने कोई वहां नहीं आया तो आप सारी दुनिया को कोस रहे हैं कि दुनिया में कोई मददगार नहीं रहा। आप कोई संस्था चलाते हैं, कर्मचारियों का शोषण करते हैं और कोई कर्मचारी आपके खिलाफ आवाज उठा गया तो आप सभी कर्मचारियों को मालिक का पिट्ठू बने रहने की नसीहत देते चल रहे हैं। आपको एमबीबीएस का फुल फामॆ मालूम नहीं है और आप सारी बीमारियों का इलाज बताते चल रहे हैं। आपने कभी कोर्ट नहीं देखा, कचहरी नहीं देखी और आप सारी दुनिया को कानून पढ़ाते चल रहे हैं। जी हां, अधिकतर ब्लागों पर कुछ इसी तरह का तमाशा दिख रहा है।

ब्लाग पर कुछ हम भी लिखते हैं और इसी सिलिसले में अन्य ब्लागों को पढ़ते भी हैं। सबसे ज्यादा दुख तो तब होता है जब लोगों को अपने घर के किस्से भी ब्लाग पर सार्वजनिक करते देखा जाता है। उफ, कोई मर्यादा नहीं, कोई सीमा नहीं। जिस तरह से ब्लागचर्चा प्रसिद्धि पा रही है, अखबारों के संपादकीय पन्नों का हिस्सा बन रही है, वैसे समय में अब ब्लाग पर क्या लिखा जाए, क्या नहीं लिखा जाए, यह तय किया जाना चाहिए। यह जरूरी लगता है। पर, यह सीमा तय करेगा कौन? बेहतर तो यह होता कि अनर्गल प्रलाप की जगह ब्लाग को भय, भूख और भ्रष्टाचार से समाज को बचाने का माध्यम बनाया जाता। ब्लागों पर समाज में व्याप्त कुरुतियों से लड़ने का कोई नया तरीका सामने आता। फिलहाल इतना ही। बहस जारी रहेगी। इस बहस में शामिल होने का खुला आमंत्रण है।
पुरुषोत्तम, कौशल

शनिवार, 22 अगस्त 2009

गुलामी का था अहसास न आजादी का मतलब जाना

आजादी के सिलसिले में एक बात बहुत गौर करने वाली है। वह यह कि चाहे मुगलों का शासन चल रहा था, चाहे अंग्रेजों का, हिन्दुस्तान में आबादी का एक बड़ा हिस्सा न तो गुलामी का दंश झेल रहा था, न ही वह खुद को गुलाम मानता था। उल्टे उनकी तो मौज थी। मुगलों-अंग्रेजों द्वारा दिये गये अधिकारों पर ऐंठ रहा वह तबका तहसीलदार, नवाब , जमींदार, रायसाहब, रायबहादुर आदि का तमगा लेकर अपने ही भाई-बंधुओं पर अत्याचार का कोड़ा भांजा करता था, उनसे लगान वसूलता था और नहीं देने पर उनके लहू बहाताथा। हर कौम, हर कस्बा इसमें शामिल था। उन्हें आज हम भले गद्दार कह लें, मगर आजादी के बाद भी स्थिति उससे इतर नहीं है। हुआ क्या? गुलाम भारत में जिस तरह एक बड़ा तबका खुद को गुलाम नहीं समझता था, उसी तरह आजाद भारत में भी बड़ा तबका खुद को आजाद नहीं समझता है।आजादी के ६२ वर्षों के बाद भी उस तबके के पास कुछ भी नहीं है। जमीन- जायदाद की तो बात छोड़िए दो जून का अनाज भी उसके पास नहीं है। उनकी सांसें चलती रहें, इसके लिए देश के बड़े हिस्से में सिर्फ उनके लिए राहत बांटकर हमारे तख्तोताज उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा करते हैं। हक की बात उठाने की तो वह तबका सोचा भी नहीं करता। हां, जमींदारों, नेताओं, अफसरों की खातिरदारी करना वह आज भी अपनी शान समझता है। ऐसा इसलिए कि उससे ताबीदारी करने वाला तबका मौजूद है, उसकी हैसियत दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है।
एक और बात यह है कि गुलामी के दिनों में आजादी के लिए संघर्ष करने वालों की संख्या भी यहां गिनी-चुनी ही थी। आपको यहां गांव के गांव मिल जायेंगे, जहां से शहादत की एक भी दास्तां आप जुबां पर नहीं चढ़ा पायेंगे। वियतनाम का इतिहास पढ़ रहा था। अमेरिका से आजादी के लिए जब वहां के लोग संघर्ष कर रहे थे तो उन्हें एक बड़ी शक्ति से छापामार लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। हर घर का युवक स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा ले रहा था। मोर्चे पर ठंडक से बचने के लिए हर घर से खिड़की - दरवाजे तक उखाड़कर लकड़ियां भेजी जा रही थीं। आज वियतनाम अपनी आजादी का मतलब समझता है और अमेरिका की हिम्मत नहीं है कि उसकी ओर टेढ़ी नजर से भी देख सके। उल्टे वहां का राष्ट्राध्यक्ष जब-तब महाशक्ति को खुलेआम चैलेंज ठोकता है। हमारे यहां थोड़ी उल्टी स्थिति है। जब आपके देश का बड़ा हिस्सा जानता ही नहीं कि आजादी किन मूल्यों पर पायी गयी, गुलामी का मतलब क्या था तो वह उन मूल्यों को बचाने के लिए संघर्ष क्यों करे?
क्या त्रासदी थी, जब देश आजाद हो रहा था तो गद्दी पर काबिज होने के लिए स्वार्थ की बड़ी लड़ाई में भाई-भाई देश के कलेजे का टुकड़ा कर चुके थे। वह भी कौमी जज्बातों को सामने रखकर। जब नये और आजाद भारत का सपना देखा जाना था, तभी धरती पर सीमा रेखा खींच दी गयी और अदावत के अंतहीन सिलसिले का बीजारोपण कर दिया गया। और आज हम जिन नेताओं की पूजा कर रहे हैं, जिनके नाम पर सीना चौड़ा कर दुनिया को आजादी का मतलब समझा रहे हैं, यह सब उनकी मौजूदगी और उनकी निगहबानी में हुआ। वे नहीं रोक पाये यह सब कुछ। क्या मतलब था आजादी का? क्या इसका मतलब भाइयों द्वारा भाइयों का रक्तपातनहीं था? क्या इसका मतलब बंटवारा नहीं था? क्या इसका मतलब कौमी अदावत नहीं थी? क्या इसका मतलब गद्दी पर येन-केन-प्रकारेण काबिज होने की परिघटनाओं का सूत्रपात नहीं था? गांधी जी ने तो कहा था कि भारत के आजाद होते कांग्रेस का उद्देश्य पूरा हो गया, अब इस पार्टी को भंग कर देना चाहिए। क्यों नहीं मानी गयी उनकी बात? आज कांग्रेस वजूद में क्यों है? और है भी तो वह किस कांग्रेस के उद्देश्यों का पालन कर रही है? फिलहाल इतना ही। आजादी के सच्चे अर्थों की तलाश करती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

केवल आम होने से आप सारे दोषों से बरी नहीं हैं

हम में से ज्यादातर यह कहानी सुन चुके होंगे। फिर भी अपनी बात शुरू करने से पहले, यहां इस कहानी का उल्लेख उचित होगा। कहानी कुछ इस तरह है। ..एक बच्चा बहुत ज्यादा गुड़ खाता था। मां उसे एक महात्मा जी के पास ले गई। समस्या जानकर महात्मा जी ने कहा, इस बच्चे को को पंद्रह दिन बाद लेकर आना। पंद्रह दिनों बाद मां उसे फिर वहां ले गई। महात्मा जी ने बच्चे से कहा, बेटे ज्यादा गुड़ खाना अच्छी बात नहीं है। इसे कम कर दो, बंद कर दो। मां को लगा इतनी सी बात कहने के लिए महात्मा जी ने पंद्रह दिन बाद क्यों बुलाया? उसने पूछा। महात्मा जी ने कहा, दरअसल पंद्रह दिनों पहले तक मैं खुद ज्यादा गुड़ खाता था। बच्चे वाली गलती जब मैं खुद कर रहा था, तो इसे कैसे और क्यूं समझाता। पहले तो मैंने माना कि हां ज्यादा गुड़ खाना गलत बात है। इससे बीमारी हो सकती है। और फिर इस गलत आदत को छोड़ा। इसके बाद मैंने बच्चे को समझाया। वरना, इस पर मेरी कही बात का असर नहीं होता। मेरे समझाने में भी अब जैसा दम नहीं होता। ऐसी स्थिति में मेरे समझाने का बच्चे पर कोई फकॆ भी नहीं पड़ता।
वाकई हम समाज से बुराइयों समूल नाश की इच्छा रखते हैं। तमाम बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं। तो वैसी बुराइयों से हमें मुक्त होना होगा। भले ही वे बुराइयों छोटी क्यों न हो। एक कलकॆ अपने दफ्तर में रोज रिश्वत लेता हो और वह बोफोसॆ घोटाला, चारा घोटाला करने वालों को कोसे तो कोसते रहे किसे क्या फकॆ पड़ता है। हम कहते हैं, हमारे नेता, अधिकारी पाक-साफ हों, संसद, विधानसभाओं में जनता के काम की बातें हो, सरकारी दफ्तरों में काम हो। यह चाहना गलत नहीं है। लेकिन यह कायॆसंस्कृति विकसित करने में, जिसे आम आदमी कहते हैं, उसकी भी सक्रिय भूमिका है। वह केवल कहने और चाहने का अधिकारी नहीं है। व्यक्तिगत काम तो आम से लेकर खास सभी पूरी तनदेही से करते हैं। लेकिन जैसे ही काम व्यक्तिगत से सावॆजनिक होता है, काम के प्रति दिलचस्पी और गायब हो जाती है। इस रोग से केवल खास ही ग्रसित नहीं है। तो फिर ऊपर से क्यों सावॆजनिक कायॆ के प्रति काहिली के खिलाफ नीचे से ही मुहिम क्यों न शुरू हो?
अब देखिए न। गांव का एक आम आदमी वाडॆ पाषॆद बनता है। पाषॆद बनने से पहले वह बिल्कुल आम था। अपने घर, खेत में वह पूरी निष्ठा से काम करता रहा है। पाषॆद बनते ही सावॆजनिक कामों के प्रति उसकी अरूचि किसी भी गांव में दिख जाएगी। ..यह अरूचि एक आम आदमी पाषॆद बनते ही तो सीख नहीं जाता। यह गुर तो उस आम आदमी के अंदर पहले से ही होगा। ..तो सावॆजनिक कामों के प्रति अरूचि को दूर करने की मुहिम वहीं से क्यों न शुरू हो। वहीं से मतलब हर आम आदमी को अपने अंदर की इस अरूचि को बाहर निकलना होगा।
अक्सर हम दुखी होते हैं। संसद में हंगामे को लेकर। राजनीतिक दलों के धरना-प्रदशॆनों से होने वाली दिक्कतों को लेकर। हड़ताल को लेकर। आम आदमी के अलावा दुखी होने वालों में खास लोग भी शामिल होते हैं। लेकिन हम बात आम आदमी की ही करें। मुझे भी लगता है कि किसी भी ऐसे हंगामे, धरना, प्रदशॆन की निंदा की जानी चाहिए, जिससे ढेर सारे लोगों को परेशानी होती हो। एक समस्या के समाधान के लिए, ढेर सारे लोगों के लिए समस्या पैदा कर देना कहां की समझदारी है। लेकिन साहब यह समस्या पैदा करने में आम आदमी भी पीछे नहीं हैं। कहीं भी कोई दुघॆटना हो, सड़क जाम आम बात हैं। वे आम लोग ही होते हैं, जो किसी दुघॆटना के बाद तमाम वाहनों में तोड़फोड़ करते हैं। आग लगा देते हैं। हड़ताल करके काम ठप कर देने वाले कमॆचारी और बाकी लोग भी खुद को आम आदमी ही कहते हैं।
कहा जा सकता है कि बिना हंगामे के अधिकारी, नेता बात ही नहीं सुनते। दुघॆटना में मृतक के परिजन, घायल को बिना हंगामा किए मुआवजा ही नहीं मिलता। बिना हड़ताल किए वेतन ही नहीं बढ़ता। हो सकता है यह बात सही हो, फिर भी एक बार यह विचार करना होगा कि पहले नेताओं अधिकारियों को आम आदमी की बातें अनसुनी करने की आदत पड़ी, या फिर पहले आम जनता को हंगामा करने की। वैसे भी अपने फायदे के लिए काम बंद कर बाकी आम जनता से अन्याय करने वाला आम कमॆचारी ऐसी उम्मीद क्यों करता है कि सरकार उसकी बेहतरी के लिए चौबीस घंटे, बारह महीने ईमानदारी से काम करती रहे। उसके अधिकारी उसके प्रति न्यायपूणॆ बने रहें। ध्यान रखें, आप किसी से उम्मीदें लगाए बैठे हैं तो आपसे भी किसी को उम्मीद है। पहले आप तय करें कि हम किसी की उम्मीदों पर तुषारापात नहीं करेंगे।
कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी। उसमें कथित रूप से पाप करने वाली एक महिला को कुछ लोग पत्थर मार रहे होते हैं। हीरो आता है और कुछ बातों के बाद कहता है कि इस महिला को अब पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो। किसी ने पत्थर नहीं मारा।
तो आप भी देख लीजिए, जो पत्थर आपके हाथ में है आप उसे चलाने लायक हैं भी या नहीं?

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

हाथ जोड़े खड़ा है हिन्दुस्तान

हिन्दुस्तान का मतलब गांव, वहां की गलियां, भोले-भाले लोग। हिन्दुस्तान का मतलब दिल्ली, वहां की गद्दी, गद्दी पर बैठे लोग। जी हां, आप देख सकें तो देख सकते हैं कि भोले- भाले ग्रामीण से लेकर दिल्ली की तख्त पर बैठा हमारे देश का सिरमौर तक सभी हाथ जोड़े खड़ा है। भिखारी की तरह। वाह - वाह - वाह। यह कैसी आजादी है, कैसी आजादी? भिखारियों की फौज। वाह। गरीब को राहत चाहिए दिल्ली से और दिल्ली को कहीं और से। न वह गरीब ग्रामीण अपने मन का एक फैसला कर सकता है, न दिल्ली की तख्त पर बैठा हमारा सिरमौर आजाद मुल्क को एक आजाद भाषा ही दे सकता है। परजीवी लोगों की बढ़ती तादाद ने फिलहाल जो नक्शा खींचा है, शायद उसी का नतीजा है कि देश का चप्पा - चप्पा मल्टीनेशनल कंपनियों के दफ्तरों से गुलजार हो चुका है, किसान बीजों से महरुम होते जा रहे हैं और कोने-कोने में दलाली - चमचागीरी करने वालों की चौबीसो घंटों खूब छन रही है। एक भी ऐसी जगह आप नहीं ढूंढ़ सकते, जहां आप फख्र से सीना तानकर खड़े हो सकें और कह सकें कि हां, हम आजाद मुल्क में एक आजाद नागरिक की हैसियत से खड़े हैं।
मेरी बातों पर यकीन नहीं हो तो एक जाति प्रमाण पत्र या एक आवासीय प्रमाण पत्र बनाने प्रखंड कार्यालय पहुंचिए। वहां का चपरासी भी आपसे बात करने की जहमत उठाना नहीं चाहेगा। अधिकारी से बात कर आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी जनतांत्रिक प्रणाली वाले देश के किसी लोकसेवक से बात कर रहे हैं। कोई आपकी सुनने को तैयार नहीं होगा। और यह स्थिति बिहार के नेपाल बार्डर से पंजाब के पाकिस्तान बार्डर तक एकरस में आप महसूस कर सकते हैं। मैंने महसूस किया है। जिला परिवहन का कार्यालय वह उत्तर प्रदेश के किसी जिले का हो या महाराष्ट्र के किसी जिले का, दलालों और बिचौलियों की फौज हर जगह समान रूप से आपका स्वागत करती मिलेगी। और शिकायत किससे करेंगे। जरा शिकायत करने वाले बड़े अधिकारियों तक पहुंचिए। भई क्या मिजाज है बादशाहों के? नवाबों के दौर के बड़े से बड़ा एय्याश तानाशाह भी शरमा जायें। बात कितनी सुनी जायेगी, यह तो जाने पर ही पता चलेगा। यह है न हैरत की बात कि एक सिस्टम का पूरा इंफ्रास्ट्रक्टर खड़ा होने के बावजूद आप दौड़ते रहते हैं, तड़पते रहते हैं, आपका काम नहीं होता। जिन्हें आपका नौकर कहा जाता है, उनके सामने पहुंचते ही आप क्या भिखारी नहीं बन जाते? और उस नौकर को इसी सिस्टम के बड़े नौकर के सामने कभी देख लीजिए, वह भी वहां आपको हाथ जोड़े कृपा की भीख मांगता ही दिख जायेगा। वह बड़ा नौकर कहीं अपने से ऊपर वाले के दरबार में खड़ा दिखा तो हाथ जोड़े ही खड़ा दिखेगा। माफी मांगता, भीख मांगता, दया की भीख।
जिस तरह से आर्थिक विकास की दर को तेज और तेज करने की प्रक्रिया चल रही है, उसके तहत देखने को यह मिल रहा है कि इस देश का अच्छा खासा ग्रेजुएट गले में टाई लगाकर व पैरों में काले जूते डालकर डोर-टू-डोर कंपेन करता चल रहा है। हम रोजगार के अवसर सृजित नहीं कर पाये, इसका खामियाजा वह चौबीसों घंटे कभी सड़क पर तो कभी दफ्तर में आपको हाथ जोड़े ही मिल जायेगा। इस पर भी तुर्रा यह कि वह भूल से भी अपने अधिकारों की बात नहीं कर सकता। किसी गुलाम मुल्क के गुलाम नागरिक जैसी हालत ही है उसकी। सरकारी हो या निजी, आप बस अड्डे पर चले जाइए। जहां सुरक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां आपको पुलिस का एक भी नुमाइंदा नहीं दिखेगा। भूल से दिख भी गया तो वह आपकी किसी हेल्प के लिए नहीं, अपनी जेब गरम करने की मशक्कत में ही जुटा दिखेगा। आप उससे तनकर कुछ भी नहीं कह सकते। वह आप पर गुर्राता है और आपकी स्थिति होती है हाथ जोड़कर खड़े भिखारियों वाली।
कहां जायेंगे आप? अस्पताल? दावे तो बहुत हैं, पर आसानी से करा लीजिए इलाज तो वीर कहे जायेंगे। सरकार के लाख प्रयास के बावजूद सरकारी अस्पतालों में नियुक्त डाक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक नहीं लगायी जा सकी। जो डाक्टर निजी प्रैक्टिस चलाते हैं, उनसे आप सरकारी अस्पताल में इलाज कराकर देखिए, आपको पुर्जा तक फेंककर दिया जायेगा, इसकी मैं गारंटी देता हूं। आपकी दशा उस डाक्टर के सामने अपने अधिकारों से लैस किसी मजबूत नागरिक की तरह नहीं होगी। आप हाथ जोड़े कलपते नजर आयेंगे, डाक्टर साहब, डाक्टर साहब करते नजर आयेंगे। इसी डाक्टर के निजी क्लिनिक पहुंचिए। आजकल तो डाक्टरों ने ब्लड प्रेशर तक की जांच तक करना छोड़ दिया है। इस काम को वे अपनी शान में गुस्ताखी समझते हैं। वहां की कोई दाई तो थर्ड ग्रे़ड का कंपाउंडर यह काम निपटा देगा। पैसा देकर भी आप कलपते नजर आयेंगे और इस रुख से आपको निजात दिलाने वाला कोई सिस्टम आपको कहीं नजर नहीं आयेगा। यह गारंटी है, नजर नहीं आयेगा। और तब आपके श्रीमुख से यदि यह निकल आये कि यह कैसी आजादी, तो मुझे धन्यवाद जरूर कीजिएगा। फिलहाल इतना ही। आजादी के सच्चे अर्थों की तलाश करती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

सिफॆ भाषण देने से काम नहीं चलेगा

मेरी पिछली बातों (खुद को भी तो बदलिए) का संदभॆ लेते हुए ब्रजेश, चंद्रा एक बात स्पष्ट कर लें कि नेता, अधिकारी या व्यापारी कोई आसमान से नहीं आते। आम लोगों यानी पब्लिक के बीच से ही आते हैं। पिछली बातों से अगर यह भी साफ नहीं हो पाया कि देश, समाज और व्यवस्था सुधरे, इसके लिए क्या करें तो मैं कोशिश करता हूं कि और सहज शब्दों में बात करूं। आपके जैसा, मेरे जैसा, उनके जैसा हर आदमी सुधर जाए। भ्रष्टाचार, अनाचार और विध्वंस से तौबा कर ले तो पूरा समाज सुधरेगा, व्यवस्था सुधरेगी। बुराइयों और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सिफॆ कोसने की जगह बुराइयों को खत्म करने का प्रयास हम खुद करें, तो ही स्थिति सुधरेगी।
यह बात बहुत बार कही गई है। फिर भी कहता हूं। गली में कुछ ईंटें पड़ी हैं। एक ईंट से आपको ठोकर लगती है। आप गिर जाते हैं। आप गाली देते हैं। पता नहीं किसने ईंटें रास्ते पर फेंक दी। इतना भी शऊर नहीं है। यह कहकर आगे बढ़ जाते हैं। आपके पीछे आने वाले और भी लोग ईंट से टकराते हैं। आपका ही अनुसरण करते हैं। आगे बढ़ जाते हैं। समस्या जस की तस है। कोसने, गाली देने के बावजूद।...तो इतना तय है कि कोसने, गलियाने से समस्या दूर नहीं होती। अब कोई और व्यक्ति आता है। वह ईंटें उठाकर तरतीब से किनारे रख देता है। उसके ऐसा करते ही यह तय हो गया कि अब और आने वाले लोग उन ईंटों से नहीं टकराएंगे। मतलब समस्या दूर करने के लिए थोड़ा वक्त देना होगा। थोड़ी मेहनत करनी होगी। भाषण देने से अलग। साथ ही ..हमें क्या मतलब का भाव त्यागना होगा।
मान लें आपको किसी सरकारी दफ्तर में काम है। वक्त लग रहा है। आप समथॆ हैं। दफ्तर के कलकॆ को कुछ पैसे देते हैं। आपका काम हो जाता है। इसके बाद भी देश, समाज में फैले भ्रष्टाचार पर आप लंबा-चौड़ा व्याख्यान देंगे। अधिकारियों, नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएंगे। मन नहीं भरा तो देश की आजादी को बेमानी ठहराएंगे। ...क्या कहने की जरूरत है कि सवॆत्र व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए आप या कोई और घूस देकर काम करवाने वाला भी जिम्मेदार है? सोचें जरा, हर आदमी रिश्वत देना बंद कर दे तो भी क्या रिश्वतखोरी जारी रहेगी? क्या सरकारी बाबू, अधिकारी काम करना ही बंद कर देंगे? रिश्वत देना बंद कर दिया जाए तो भी काम होंगे। कुछ दिनों तक का संक्रमण काल हो सकता है। निश्चित रूप से यहां ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा कि केवल मेरे घूस नहीं देने से क्या होगा। वो गाना याद है..मिले जो कड़ी-कड़ी, एक-एक जंजीर बने...। (शायद ऐसा ही कुछ)
मिलावटखोरी बड़ी समस्या है। सब इससे त्रस्त हैं। मसाले में भी मिलावत होती है। मसाले में मिलावट करने वालों को वह भी गाली देता है, जो रोज दूध में पानी मिलाकर बेचता है। और मसाले में मिलावट करने वाला पतला दूध देखकर, पीकर पानी मिलाने वालों को गलियाता होगा। ...यह सिफॆ यह बताने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार की जड़ें यही हैं। हमारे आपके आसपास। हमें मिलावटी मसाला नहीं खाना है तो दूध में पानी मिलाना भी बंद करें। केवल मसाले में मिलावट करने वालों को गलियाने से काम नहीं चलेगा।....जरा यह भी तय करें कि इस मामले में सरकार कितनी गैरजरूरी है।

बात खत्म नहीं हुई है। संभव हुआ तो इस चरचा को जारी रखना चाहूंगा।

संबोधन से उलझा आजादी का अर्थ

इसके पहले कि मैं आजादी का अर्थ तलाशती रपट का सिलसिला आगे बढ़ाऊं, पुरुषोत्तम जी को धन्यवाद दे लूं कि उन्होंने इस सिलसिले में अपने आलेख से चार चांद लगा दिये हैं। पिछली पोस्ट में मैंने आजादी के सच्चे अर्थ की तलाश में कुछ सरकारी संस्थानों की सैर पर अपने साथ चलने वालों को चलने का आग्रह किया था। हमने आजाद भारत के थानों और पुलिस व्यवस्था की हालत देखी। आगे चलें, इसके पहले हम जिक्र करना चाहेंगे पंद्रह अगस्त के दिन लाल किले के प्राचीर से अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक और नीरस भरे संबोधन का। आजादी का अर्थ तलाशते देशवासियों के समक्ष उम्मीद के मुताबिक इस बार भी प्रधानमंत्री ने उबाऊ और नीरस भाषण ही परोसा। पिछले पांच वर्षों से वे ऐसा ही भाषण करते आ रहे हैं। यह उनका छठा मौका था। प्रधानमंत्री ने सूखे से उत्पन्न संकट की चर्चा की और खौफ का पर्याय बने स्वाइन फ्लू के खतरे को कमतर करके बताया। देश जानता है कि कृषि क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए आज तक बुनियादी कदम नहीं उठाये गये हैं और यही हालत सेहत में सुधार को लेकर भी है। देश के स्वास्थ्य ढांचे में सुधार के कोई लक्षण नहीं दिख रहे हैं। लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्रियों के संबोधन में जो एकरसता और रस्म अदायगी का भाव समावेशित हो चुका है, इस बार भी प्रधानमंत्री ने उसी का प्रदर्शन किया। देश की समस्याओं के समाधान की जो प्रतिबद्धता इस बार मनमोहन सिंह ने व्यक्त की है, वह वे पिछले पांच वर्षों से करते आ रहे हैं। सरकार हमेशा कहती है कि आतंकवाद और नक्सलवाद को जड़ से उखाडऩे के लिए हर कदम उठाये जायेंगे। पर, इस पर कैसा अंकुश लग पाया है, यह क्या किसी से छिपा है? मुंबई हमले के षड्यंत्रकारी खुलेआम घूम रहे हैं और पाकिस्तान से वार्ता के संदर्भ में आतंकवाद पर रोक लगाने की शर्त हटा दी गयी है। मनमोहन सिंह लच्छेदार भाषण देने के लिए वैसे भी नहीं जाने जाते और न ही उनकी ओर से ऐसा भाषण दिया जाना आवश्यक ही समझा जाता है। पर, एक कुशल प्रशासक के नाते उनसे देश को जो उम्मीदें हैं, कम से कम उस पर खरा उतरने की उन्हें कोशिश तो करनी ही चाहिए। इस कोशिश से भी उनका भाषण दूर ही दिखा। अपने भाषण में उन्होंने कुछ आश्वासन दिये। अब इस तरह के आश्वासन का क्या महत्व रह गया है कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने को प्रतिबद्ध है? राष्ट्रपति के बाद प्रधानमंत्री ने भी कहा कि जब तक हमारा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं होता, योजनाओं का फायदा जनता तक नहीं पहुंच पायेगा। पर, जब प्रशासनिक सुधार आयोग की रपट पर अमल की बात आयी तो इस मामले में भी आश्वासन ही मिला। अब इसका क्या मतलब है कि कोई प्रधानमंत्री यह कहे कि ऐसा-ऐसा करने की जरूरत है या यह-यह किया जाना चाहिए? जो करने की जरूरत है या जो किया जाना चाहिए, उसे लागू क्यों नहीं कराया जाता? किसके भरोसे सारा कुछ छोड़कर खुद की मुक्ति का किनारा खोजा जा रहा है? और नौ फीसदी विकास दर पाने का लालीपॉप, हासिल कर दिखाइए प्रधानमंत्री जी, रोका किसने है? लोग तो नब्बे रुपये प्रति किलो दाल और चालीस रुपये प्रति किलो चीनी खरीद रहे हैं, खरीदते रहेंगे। जनता से तो पूछते नहीं, आप जब मर्जी पेट्रोल-डीजल का दाम घटाइए-बढ़ाइए, जिसे जरूरत होगी, खरीदेगा ही। यह ठीक है कि इस बार के चुनाव में जनता ने आप पर भरोसा दिखाया और कांग्रेस फिर से गद्दी पाने में सफल रही, पर आजादी का मतलब आपके भाषणों तक जाकर भी कुछ ठीक से सही अर्थों में परिभाषित नहीं हो रही प्रधानमंत्री जी। लगातार छठी बार जनता को निराशा ही मिली। आजाद भारत के लोगों को एक आजाद रास्ता और एक आजाद मंजिल चाहिए। वह कब मिलेगी और कौन उपलब्ध करायेगा, इसका जवाब इस बार के स्वतंत्रता दिवस पर भी आपके भाषण से नहीं मिल रहा। आजादी का अर्थ तलाशती रपट का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।

रविवार, 16 अगस्त 2009

खुद को भी तो बदलिए

यह कैसी आजादी? यह जुमला हमें अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल जाता है। समाज, देश और व्यवस्था की दुरावस्था से त्रस्त लोग ऐसा कहते हैं। लेकिन देश, समाज की दुरावस्था से आजादी का क्या लेना-देना। भ्रष्टाचार, नाकामी और काहिली के लिए आजादी कहां से जिम्मेदार हो गई। भई, आजादी हमें बड़ी मुश्किल से मिली थी। यह आजादी अनमोल है। आपकी व्यवस्था गड़बड़ है तो व्यवस्था सुधारने की बात करिए। आजादी को क्यों कोसते हैं।

मुझे लगता है कि हमारे देश की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। हम हर परेशानी, समस्या आफत के लिए किसी को कोस कर मुक्त हो जाते हैं। समस्या दूर हो, खत्म हो, इसके लिए प्रयास नहीं करते। गांव-देहात से लेकर शहर तक जहां देखिए लोग व्यवस्था और शासन-प्रशासन को गरियाते नजर आएंगे। बिजली-पानी नहीं है तो नेता दोषी। हत्या हुई, लूट हुई तो सरकार दोषी। हर समस्या, हर गलत बात के लिए किसी को कोसो और चुपचाप सो जाओ। ऐसा करके हम तो अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लिए। देश, समाज के लिए अब हमें कुछ नहीं करना। यह समस्या का सरलीकरण है। शासन-प्रशासन के किए हर गलत-सही का असर पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए इनके प्रति आशंकित रहना, इन पर नजर रखना और अच्छे-बुरे पर हंगामा करना, इनमें से कुछ भी गलत नहीं है। लोकतंत्र का मतलब भी यही है।

शासन-प्रशासन से अलग हटकर देखें हमारे-आपके स्तर पर ही न जाने कितनी गड़बड़ियां हैं। खुद को टटोलकर इन्हें दूर करने की हम कितनी कोशिश करते हैं। आखिर जिन नेताओं की करतूतों पर हम उन्हें गाली देते हैं, वे भी तो हमारे ही समाज से आते हैं। घूस देकर बच्चों को नौकरी दिलवाकर योग्य का हक मारने, खाद्य पदार्थों में मिलावट कर समाज को जहर खिलाने-पिलाने वाले लोग क्या केवल नेता ही हैं? दूध में पानी मिलाने, जैसे भी हो, एन-केन-प्रकारेण बच्चों का स्कूल और कालेज में एडमिशन करवाने को जब हम मान्यता देंगे तो भविष्य में इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे, हम यह मानकर क्यों न चलें? जिसे जहां मौका मिलता है, अनुशासन और नियम तोड़ता है। और फिर हम ...इतना तो चलता है, मानकर आंख मूंद लेते हैं। भ्रष्टाचार छोटा चलेगा, बड़ा नहीं, ऐसा हो सकता है क्या?

नेताओं के अवसरवाद को कोसने वाले पूरे समाज में पैठ बना चुके अवसरवाद को कोसें, तभी बात बनेगी। चंद हजार रुपयों के लिए देश छोडऩे वाले, संस्थान छोडऩे वालों को तो हम तरक्कीपसंद मानते हैं, लेकिन कोई नेता अपनी बेहतरी के लिए दल छोड़ता है, साथी छोड़ता है तो उसे गाली देते हैं। दोनों तरह के अवसरवाद के नतीजे छोटे-बड़े हो सकते हैं, अर्थ तो नहीं बदलते! समाज में अंतिम पायदान तक जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार और अवसरवाद को हम भ्रष्टाचार और अवसरवाद मानना ही नहीं चाहते। जब मानते ही नहीं तो उस पर भला कोई हंगामा क्यों करेगा, उसे रोकने के उपाय क्यों करेगा? रोकने के उपाय नहीं होंगे तो ये फले-फूलेंगे। फल-फूलकर ये जब बड़े नतीजे देते हैं तो हमें दिक्कत होती है। इतना तो चलता है...न जाने कब ..सब चलता है, में बदल जाए!

सीधी सी बात है, नेताओं के अवसरवाद और भ्रष्टाचार पर रोकर कर्तव्य को पूरा हुआ मान लेने से काम नहीं चलेगा। कमर इस बात के लिए भी कसें कि जहां इसके बीज डाले जाते हैं, वहां भी पहरेदारी हो। अन्यथा दूसरा सहज रास्ता यह है कि जिस तरह हमने समाज में फैले कथित छोटे- छोटे भ्रष्टाचार को सहज मान लिया है, उसी तरह बड़े पैमाने पर होने वाले बड़े भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लें। जाहिर है, दूसरा रास्ता खतरनाक है। बताने की जरूरत नहीं कि बेहतर लोकतंत्र के लिए बेहतर नागरिक भी चाहिए। लेकिन एक नागरिक के रूप में हर कोई...हम नहीं बदलेंगे, का झंडा बुलंद किए हुए है और उम्मीद करते हैं कि हमारे नेता साफ-सुथरे और हमारी चिंता करने वाले हों। हम खुद पान खाकर आफिस और घर की दीवारों पर थूकेंगे लेकिन कल्पना करेंगे सजे-संवरे देश और शहर की। अपना कूड़ा सड़क और पार्क के किनारे फेंकेंगे और गंदगी की समस्या के लिए अधिकारियों को कोसेंगे।

आपका नेतृत्व करने वाले ये लोग उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां सरकारी दफ्तरों में एक फाइल को कर्मचारी और अधिकारी महीनों लटकाते हैं। वे लोग आप जैसे लोगों के बीच से ही हैं, जो इन दफ्तरों में जाकर घूस देकर अपना काम करवा आते हैं और उसे गलत भी नहीं मानते। ज्यादा हुआ तो घर आकर कर्मचारियों-अधिकारियों को बुरा-भला कहकर गुस्सा निकाल लिया। बात फिर वहीं है। सिर्फ इतने से काम नहीं चलेगा। बेहतर नेतृत्व और बेहतर देश चाहते हैं तो बदलना खुद को भी होगा। इसके लिए अपने आप को तैयार करें।

कभी जंग-ए-आजादी, आज जश्न-ए-आजादी

कोई गफलत नहीं, कोई शिकायत नहीं, पर यह सच है। यह सच है कि आज जो जश्न-ए-आजादी चल रहा है, वह कभी हुई जंग-ए-आजादी के दम पर ही टिका है। कहीं पढ़ा था। भगत सिंह जेल में बंद थे। उनकी माता उनसे मिलने आयीं। भगत सिंह को सूचना दी गयी कि उनकी माता उनसे मिलने आयी हैं। भगत सिंह सोच रहे थे कि उन्हें तो फांसी होगी, माता आयी है, कैसे कर सकेंगे उनका सामना, क्या बता पायेंगे। दिल कड़ा कर हंसते चेहरे के साथ माता के सामने आये। कहने लगे- मुझे कुछ नहीं होगा मां, बड़े रहमदिल लोग हैं वे, मुझे छोड़ देंगे, आप घबराना मत। और जो मां ने कहा, वह किसी भारतवासी का कलेजा चीर कर रख देने के लिए काफी है, हां देश के प्रति सम्मान का थोड़ा सा भी जज्बा हो तो उनकी बातों से सीना चौड़ा भी होता है। मां ने कहा- बेटे, मुझे झांसा न दो, मैं जानती हूं कि तुम्हें ये लोग नहीं छोड़ेंगे, यदि मेरे और बेटे होते और वे भारत माता को आजाद कराने के लिए अपनी कुर्बानी देते तो मुझे गर्व होता। यह जंग-ए-आजादी का जज्बा था। देश पर जान निसार कर देने का हिलोरा था। हर दिल में, उन दिलों से निकलने वाली हर सांस में। एक से बढ़करएक थे सभी। बेटा से बढ़कर मां, मां से बढ़कर बेटा। अब जश्न-ए-आजादी है। आजादी के नाम पर, मैं किसी का नाम नहीं लेता मगर यकीन मानिए मैं उन्हें पहचानता हूं, जश्न-ए-आजादी के नाम पर पवित्र दिन को भी संयम नहीं रख पाते। टेबलें सजती हैं, बोतलें खुलती हैं, प्लेटों में मांसाहारउफ, उफ क्या यही है आजादी?? और उन महफिलों में कमसिनों के नथ कैसे और कहां उतारे जायेंइसका प्लान बनता है, सरकारी योजनाओं का कितना पैसा अपनी जेब तक पहुंचाये जायें, इस पर मशक्कत चलती है, इस साल किस जाति कोकिस जाति से लड़ा दिया जाय, इसका ब्लू प्रिंट तैयार होता है, हिन्दु-मुस्लिम कैसे लड़ें, इस पर ग्रैंड ओपिनियन का सिलसिला चलाया जाता है। एक को दोष न दीजिए। हम्माम में सब नंगे हैं, सब। हम, आप, वे सभी। क्या नेता, क्या अधिकारी, क्या पत्रकार, क्या कारोबारी, क्या गुंडे, क्या अपराधी, सभी। जी हां, सभी। इस बात में कोई लोचा दिखता हो तो मैं आपको एक-एक कर आपको कुछ स्थलों की सैर कराता हूं। जिगर थामकर मेरे साथ चलिए।
आप खुद को शरीफ शहरी मान लीजिए। अब आप निकले हैं बाजार। आप नसीब वाले भी हैं। मान लेते हैं कि आपका साबका किसी गुंडे-बदमाश से नहीं पड़ा। एक छोटी सी घटना पेश आयी। बाजार की भीड़ में आपका मोबाइल फोन कहीं गिर गया। आपके लिए सबसे पहला काम इसकी रपट थाने में लिखवाना होगा। जाइए थाने, मेरे आग्रह पर ही सही जाइए थाने। मेरी गारंटी है कि आप रपट नहीं लिखवा सकते। पहले तो कोई बात नहीं सुनेगा। सुनेगा भी तो पचीस फच्चर। कोर्ट जाइए, एफेडेबिट कराइए, फिर आइए, फिर आइए, बड़ा बाबू (थानेदार) नहीं हैं, वही फैसला लेंगे। और आपने जरा सा सूंघाया (हरा पत्ता) कि काम दनादन, दामाद जैसी आवभवत। पूरे तामझाम और एकाध दो दिन खराब करने के बीच आपको लग जायेगा कि आप किसी आजाद मुल्क के जनकल्याणकारी व्यवस्था के बीच सांसें नहीं ले रहे हैं। यदि किसी ने बाजार में आपको तमाचा खींच दिया और उसकी शिकायत करने, इंसाफ मांगने आप थाने पहुंच गये तो फिर माफ कीजिए, वहां आपके साथ जो सलूक होगा, उसका अनुभव आप ही कर सकते हैं। मेरा तो अनुभव है कि कोई तमाचा मार दे तो उसे पूज्य बापू को याद करते बर्दाश्त कर जाइए, पर थाने न जाइए। तमाचा तो आप खा ही चुके हैं, फजीहत और जेब की लूट भी वहां जज्ब करने होंगे , इसकी गारंटी देता हूं।और तब मेरी गारंटी है कि आपके जेहन में सिर्फ एक ही सवाल तूफान बनकर गुजरेगा- क्या यही है आजादी?? आजादी के अर्थ, सच्चे अर्थ को समझने की कोशिश का १४ अगस्त से शुरू सिलसिला अभी जारी रहेगा। फिलहाल इतना ही। इस बीच आपके सुझावों का स्वागत होगा। धन्यवाद।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

कहां है आजादी??

एक ऐसे बोर सब्जेक्ट पर लिखने को जी मचला है , जिसे मुद्दा बनाकर आज हर ओर हर कोई लिख रहा है। लिख रहा है और पूछता चल रहा है कि क्या लिखा है, वाह। मेरा यह लेख आपकी किसी वाह सुनने का मोहताज नहीं। यह पत्थर है, जो तबीयत से उछाला जा रहा है, शायद कहीं कोई सुराख पैदा हो जाय।
आजादी। बड़ा प्यारा नाम। दीवाना बना देने वाला, दिमाग को घूमाकर रख देने वाला भी। मगर यह कहां है? सवाल यह है। आइए, उन दो-चार सवालों से हम-आप इस पंद्रह अगस्त के बहाने रूबरू हो लें। आजादी-आजादी का माला तो हम फेर रहे हैं, पर कहां है आजादी, जरा इस पर गौर कर लें।
आजादी कहां है? उन गरीब की झोपड़ियों में जहां भूख-बीमारी-भय से दिन-रात, सुबह-शाम मशक्कत चल रही है? उन मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा लोगों के घरों में जहां अपराधियों की तो छोड़िये कानून-व्यवस्था के रखवालों तक का भय चल रहा है? उन किसान परिवारों में जो कर्ज तले दबकर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं या सुखाड़ व बाढ़ की चक्की में पिसकर राहत को भी मोहताज हो गये हैं? या उन अमीर घरानों में जहां पैसा पानी की तरह बह रहा है और आजाद मुल्क का हर कुनबा जहां हाथ जोड़े खड़ा है? उन पार्कों में जहां घुसते ही हिदायतें मिलनी शुरू हो जाती है, सिगरेट न पीयें, पान न खायें, फूल न छूएं-न तोड़ें? उन बस अड्डों पर जहां बस के आने-जाने के बारे में पूछना भी गुनाह समझा जाता है? उन रेलवे स्टेशनों पर जहां थूकना भी मना हो चुका है, यहां न थूकें-वहां न थूकें, लेकिन कहां थूकें, यह नहीं बताया जाता? उन स्कूलों में जहां पढ़ने के लिए नाम लिखाना भी एक जहमत भरा काम हो चुका है? उन प्राइवेट संस्थानों में जहां आठ घंटे काम करने या कराने की बात दम तोड़ चुकी है और चौबीस घंटों का शोषण चल रहा है? उन सरकारी संस्थानों में जहां रिश्वत सूंघाये बिना कोई फाइल आगे नहीं बढ़ रही, चहेते लगातार प्रोन्नति पाते जा रहे हों और काम करने वालों का वेतन तक रोक दिया जा रहा हो? उन सरकारी अस्पतालों में जहां मरीज कुत्ते समझे जाते हों? उन निजी नर्सिंग होमों में जहां के डाक्टर फीस के दस-पांच रुपये कम होने से इलाज से ही इनकार कर देते हों?
उफ् कहां है आजादी? बोलने की आजादी है? क्या कहीं भी कुछ भी बोला जा सकता है? अपने मन से काम करने की आजादी है? क्या आप अपनी योग्यता के अनुसार इस देश में काम ढूंढने और उस काम के लिए खुद को मुकर्रर करने को आजाद हैं? बच्चा जन्म लेता है, उसका नाम तक उसकी इच्छा के बगैर रखा जाता है। वह क्या करना चाहता है, यह कभी उससे नहीं पूछा जाता। स्कूल-कालेजों से सफर करता वह दफ्तरों-दुकानों तक पहुंच जाता है और हर जगह उस पर शासन करने वाले, उस पर नियंत्रण करने वालों की कतार खड़ी दिखती है, क्या यही है आजादी? नेतागीरी करने वाले तक क्या आजाद हैं? कोई मनमोहन, कोई जार्ज तक कठपुतलियों की तरह किसी सोनिया तो किसी नीतीश-शरद के इशारों पर नाचते दिखते हैं तो नेताओं के लिए भी क्या आजादी है? देश आज स्वतंत्रता की ६२वीं सालगिरह मना रहा है। ऐसे मौके पर आजादी के अर्थ, सच्चे अर्थ को समझने की कोशिश का यह सिलसिला जो शुरू किया गया है, वह अभी जारी रहेगा। फिलहाल इतना ही। इस बीच सुझावों का स्वागत होगा। धन्यवाद।

रविवार, 26 जुलाई 2009

कारगिल शहीदों, हमें माफ करना

1999 में जब कारगिल की लड़ाई छिड़ी थी और द्रास-कारगिल में बर्फ की सफेद पट्टियां वीर जांबाजों के खून से लाल हो रही थीं, उस दौरान हमारे नेताओं के आम चुनाव के नफा-नुकसान के आकलन में मशगूल रहने को लेकर झारखंड के एक इंजीनियर कवि ओमप्रकाश वरनवाल ने जो मुक्तक लिखा था, वह आज भी मौजूं है। 'चूडिय़ां, सिंदूर, आंचल, शव, उदासी और कफन, ढो रहे हैं शहर कब से बाअदब और बेसिकन, वह चुनावी लाभ-नुकसानों में ही मशगूल हैं, बर्फ के कागज पे जबकि फौज लिखती है वतन।’ सिलसिला आज भी वही है। कारगिल फतह के दस वर्ष बीत गये। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटाते हुए पूरे कारगिल क्षेत्र पर तिरंगा लहराया था। इसके लिए देश ने कई शहीद खोये, कुछ उत्तर बिहार के भी थे। फतह के बाद शहीदों की स्मृति को बनाये रखने के लिए जो घोषणाएं की गयीं, उस पर ईमानदारी से आज तक अमल नहीं किया गया। शहीदों के गांव से गुजरने पर आपको एक भी ऐसा चिह्न नहीं मिलेगा, जिससे आप यह कह सकें कि यह शहीद का गांव है।

सपना ही है शहीद प्रमोद हाईस्कूल

मुजफ्फरपुर जिले में कुढऩी प्रखंड की माधोपुर-सुस्ता पंचायत के माधोपुर निवासी शहीद प्रमोद कुमार की शहादत के बाद श्रद्धा के फूल चढ़ाने आयीं तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने जो घोषणाएं कीं, उनमें से कई अभी पूरी नहीं हुई हैं। माधोपुर मध्य विद्यालय को उच्च विद्यालय में उत्क्रमित करने के साथ उसका नाम शहीद प्रमोद के नाम पर करने की घोषणा आज तक अमल में नहीं आ पायी। माधोपुर चौक तक जाने वाली सड़क का नाम शहीद प्रमोद पथ नहीं हो पाया। शहीद के परिजन खेती योग्य पांच एकड़ व शहरी क्षेत्र में साढ़े 12 डिसमिल जमीन से भी वंचित है। माधोपुर चौक पर शहीद की प्रतिमा भी नहीं लग सकी।

शहीद अरविंद के नाम स्मारक तक नहीं बना

पू.चंपारण के रामगढ़वा प्रखंड क्षेत्र का भटिया गांव अब कारगिल शहीद अरविंद पांडेय के गांव के नाम से जाना जाता है। कारगिल में तैनात चंपारण का यह वीर सपूत कांस्टेबल अरविंद 29 मई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुआ। यहां लोगों को अरविंद के शहीद होने पर फक्र है, पर इस बात का मलाल भी है कि गांव के प्रवेश द्वार पर उसके नाम से स्मारक बनाने की घोषणा आज तक पूरी नहीं हुई।

भुला दिये गये शहीद ले.अमित

कारगिल में शहीद समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड के महमद्दा पंचायत के ले. अमित सिंह को सरकारी स्तर से भुला-सा दिया गया। इलाके में न तो सरकार द्वारा उनकी स्मृति में अब तक कोई सड़क का नामकरण किया गया है, न ही कोई उद्यान-विहार का निर्माण ही हो सका है।

प्रतिमा के लिए जगह तक नहीं

दरभंगा में बेनीपुर अनुमंडल का हरिपुर गांव। यहां के दो सपूतों ने देश की रक्षा में अपनी कुर्बानी दी है। स्व. भोला झा के पुत्र सीआरपीएफ जवान महाकांत झा कारगिल युद्ध में तैनात हुए तो उनका पार्थिव शरीर ही लौटा। सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि तो की गयी, पर उनकी स्मृति को संजोने के लिए कुछ खास नहीं हो सका। गांव वालों को मलाल है कि उनके गांव के दो-दो सपूत देश के काम आये पर प्रशासन गांव की ओर रुख नहीं करता। परिजनों को मलाल है कि अन्य सुविधाएं तो दूर, प्रतिमा लगाने के लिए सरकार जमीन भी मुहैया नहीं करा सकी।

मिट रहीं शहीद की यादें

शिवहर में पुरनहिया प्रखंड का बखार चंडिहा इतिहास के पन्नों में भले कारगिल के अमर शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी के गांव के रूप में दर्ज हो चुका है, पर यहां ऐसा कोई निशान नहीं दिखता, जिससे आने वाली पीढ़ी अमर शहीद के गांव के रूप में इसकी पहचान कर सके। पत्नी वंदना द्विवेदी को मलाल है कि उनके पति को लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नति के बावजूद मेजर पद का ही लाभ मिला। शहीद का स्मारक कराह रहा है। तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने शहीद के गांव, सड़क, स्कूल, सामुदायिक भवन आदि का नाम शहीद के नाम पर किये जाने की घोषणा की थी, जो एक दशक बाद भी पूरा नहीं हो सकी है।
इस हाल पर हम तो यही कह सकते हैं कि कारगिल शहीदों, हमें माफ करना।