<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919</id><updated>2011-10-02T06:38:06.494-07:00</updated><category term='पत्रकार'/><category term='पत्रकारिता'/><category term='बातें.'/><category term='बिहार चुनाव परिणाम'/><category term='चरचा'/><category term='अतुल माहेश्वरी'/><category term='bihar'/><category term='आपत्ति'/><category term='आजादी का मतलब'/><category term='रेल बजट'/><category term='लालू'/><category term='लालू का सूपड़ा साफ'/><category term='बिहार'/><category term='लालू यादव'/><category term='अमर उजाला'/><title type='text'>इम्तिहान</title><subtitle type='html'>हर पल, हर कदम पर</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>55</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7612512388103039633</id><published>2011-08-19T12:45:00.000-07:00</published><updated>2011-08-19T12:59:51.674-07:00</updated><title type='text'>अन्ना तुम्हें नमन</title><content type='html'>          &lt;br /&gt;अन्ना ने भी इस सपने के इतनी जल्दी सच होने की उम्मीद नहीं की थी, जिस पीढ़ी के बारे में माना जा रहा था कि आगे निकलने की होड़ में वो कुछ भी पीछे छोड़ सकती है। अपना देश संस्कृति यहाँ तक कि अपना परिवार भी वही आज अन्ना के साथ खड़ी है। अन्ना के अनशन के आगे सरकार घुटने टेकेगी या नहीं, मजबूत लोकपाल बिल क्या कभी बन पाएगा? ये सवाल अब उतना मायने नहीं रखता जो अन्ना करना चाहते थे वो तो उन्होंने कर दिखाया। अनशन से बड़ा काम गिरफ्तारी ने कर दिया । जनता इस तरह सड़कों पर आ गई कि कांग्रेस की जान साँसत में आ गई । &lt;br /&gt;अन्ना के बारे में कहा गया था कि न तो महाराष्ट्र के बाहर उनकी कोई पहचान है नही पीछे कोई संगठन. फिर भी आज दिल्ली से लेकर पटना तक जनसैलाब उमड़ पड़ा है। ये कहने वाले भूल गए कि अन्ना की अदम्य इच्छाशक्ति के साथ देश का मीडिया भी खड़ा है। इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो कि अन्ना की आवाज को जनता की आवाज मीडिया ने बनाया। निगमानंद के अनशन व अन्ना के अनशन में फर्क मीडिया ने ही पैदा किया। आज जो लोग जुटे हैं वो सिर्फ अन्ना का साथ देने क लिये ही नहीं खड़े वे खड़े हैं भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुके अपने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए। सक्षम विपक्ष के अभाव में जनता को तलाश थी एक ऐसे चेहरे की जो निस्वार्थ हो,जिसके पीछे वो आँखे मूंदकर चल सकें। जनमानस के भीतर सुलग रही आग को अन्ना ने तो सिर्फ हवा दी है, उसे प्रचंड अग्नि का रूप तो केंद्र सरकार के दमन ने दिया। रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के साथ शांतिपूर्वक विरोध कर रहे लोगों पर जिस तरह से लाठियाँ बरसाई  गई वो सबने देखा, जनता अब ये सब नहीं भूलती, मीडिया भूलने ही नहीं देता । &lt;br /&gt;टीवी पर २४ घंटे के लाइव कवरेज ने कपिल सिब्बल को खलनायक बना दिया। यहाँ तक कि दिल्ली की काँग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी इस मामले मे सिब्बल से पल्ला झाड़ लिया। शायद इसलिए इस बार सरकार ने अचानक ही मघ्यम मार्ग अपना लिया, पहले अन्ना पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए,उन्हें गिरफ्तार किया फिर अचानक यू टर्न ले लिया। राहुल गाँधी समझ गए थे कि रामदेव व अन्ना में फर्क है। अन्ना भागेंगे नहीं,न ही वो किसी तरह भी डिगाए जा सकेंगे। सबसे बड़ी बात ये कि उनके पास इस फौजी की कोई कमजोर कड़ी नहीं है । &lt;br /&gt;हम नमन करते हैं तुम्हे अन्ना। तुमने हमारे राष्ट्रीय बोध को जगाया। विश्वकप जीतने पर जीतने पर तिरंगा लेकर जश्न मनाने को ही देशभक्ति का पर्याय मानने वाले युवाओं को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना सिखाया। आज सड़कों पर ढोल बजाते, कैंडल मार्च करते, तो कभी माथा मुंडवाकर उसपर अन्ना लिखवाने वाले लोगों में पटना के डाक्टरों से लेकर मुंबई के डिब्बे वाले तक शामिल हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों से लेकर आँटों वाले तक है। यदि अन्ना सफल हो गए तो अब तक भीड़तंत्र कहा जाने वाला भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता के पहले सोपान को पार कर लेगा। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विजयलक्ष्मी सिंह &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7612512388103039633?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7612512388103039633/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7612512388103039633&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7612512388103039633'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7612512388103039633'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='अन्ना तुम्हें नमन'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-216499454203134772</id><published>2011-01-04T06:46:00.000-08:00</published><updated>2011-01-04T06:48:21.211-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमर उजाला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अतुल माहेश्वरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पत्रकारिता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पत्रकार'/><title type='text'>अतुलनीय अतुल</title><content type='html'>&lt;p&gt;अमर उजाला के एमडी अतुल माहेश्वरी का निधन निश्चित रूप से पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसे बहुत दिनों तक महसूस किया जाएगा। मैं यहां कुछ उन लम्हों को आप सभी से शेयर करना चाहूंगा, जब अमर उजाला, जालंधर में नौकरी के दौरान मैंने अतुल माहेश्वरी जी के साथ गुजारे। यह २००० से २००४ के वक्फे का वह यादगार पल है, जो मेरी जगह कोई भी होता तो भुला नहीं पाता। निश्चित रूप से उस दौरान और भी जो साथी रहे होंगे, उन्हें भी वे पल याद होंगे। आप इन लम्हों के साथ महसूस कर सकते हैं कि अतुलजी में अखबार और पत्रकारिता के प्रति कितना समर्पण भाव था, वे अखबार के पन्नों पर सुंदर सोचों को किस कदर ढालने का सपना देखा करते थे और खबरों का दबाव दूर करने की उनकी परिभाषा क्या थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला लम्हा – जालंधर के एक होटल में संपादकीय टीम के साथ अतुलजी की बैठक में एक मसला उठा कि अखबार में पन्ने बढ़ाने होंगे क्योंकि खबरों का फ्लो बढ़ रहा है। इंडिया किंग सिगरेट पीते थे अतुलजी। इस सवाल के साथ ही उन्होंने डिब्बी से एक सिगरेट निकाला, सुलगाया और बड़े ही गंभीरता से बोलने लगे। अमेरिका और ब्रिटेन में प्रकाशित होने वाले अखबारों का पूरा पैनल यहां इंडिया में बैठा है और उनकी तनख्वाह भी इतनी है जितनी हम अपने संपादकों तक को नहीं दे पाते, लेकिन उन अखबारों को देखिए, इंडिया की कितनी खबरें रहती हैं। प्रखंडों तक हमने संवाददाता रख दिए, इसका मतलब यह नहीं कि वहां के रोजाना झगड़ों व किस्सागोई को हम खबरों का हिस्सा समझें। सिकुड़ते विश्व में कब कौन सा स्पाट डेटलाइन बन जाए, इसका पता नहीं। ये नियुक्तियां इसलिए की गई हैं कि जिस दिन वह प्रखंड डेटलाइन बने, उस दिन हम अपने संवाददाता की खबर प्रकाशित करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा लम्हा – जालंधर स्थित अमर उजाला मुख्यालय में अतुलजी के साथ संपादकीय टीम की बैठक थी। पंजाब में अखबार बढ़ नहीं रहा था और संपादकीय के साथ अतुलजी की बैठक इन्हीं चिंताओं पर आधारित थी। मोबाइल बंद थे, रिसेप्शन को आदेश था कि कोई भी उनकी कॉल अगले आदेश तक ड्राप रखी जाए। बैठक में बातें बहुत हुईं, पर एक बात शेयर किए जाने के योग्य है। उनके निशाने पर था पहला पन्ना और उस पर छपने वाले वीभत्स फोटो। अपनी बातें उन्होंने बड़े ही भावुक अंदाज में रखीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने लगे, मैं जब भी सुबह जगता हूं तो दिन अच्छा गुजरे इसके लिए सबसे पहले ईश्वर की प्रार्थना को हाथ जोड़ता हूं। मेरा मानना है कि सुबह यदि मां को देख लूं तो दिन अच्छा रहता है। इसलिए मुझे मां ही सुबह जगाती हैं और अपने हाथों चाय देती हैं। मैं दिन की शुरूआत मां को देखकर और उनके हाथों बेड टी लेकर करना चाहता हूं। इरादा वही कि दिन की शुरूआत शुभ-शुभ हो। और आप हैरत करेंगे कि यदि अखबार सिरहाने आ गया तो फिर इन सब से पहले मैं अखबार खोल लेता हूं। न तो मुझे ईश्वर की प्रार्थना को हाथ जोड़ना याद रहता है और न ही मां के हाथों की चाय। अब बताइए पहले पन्ने पर कोई वीभत्स फोटो छापा गया हो, खूनखराबा-लाशें दिखाई गई हों तो क्या मैं उस वक्त वह सब कुछ देखने की मानसिकता में हो सकता हूं, होता हूं? नहीं। कम से कम मैं तो नहीं होता। मुझे लगता है, पाठकों के हाथों में अलस्सुबह पहुंचने वाले अखबारों के पहले पन्ने पर वीभत्स फोटो नहीं छापे जाने चाहिए। उसे देखकर पूरा दिन खराब हो जाता है। किसी का पूरा दिन खराब करना हमारा काम नहीं, अखबार का काम नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरा लम्हा – जालंधर के ही अपने केबिन में बैठकर अखबार पलटने के दौरान अमृतसर संस्करण में छपी एक हेडिंग पर उनकी नजर टिक गई थी। शीर्षक था – अमृतसर भ्रूण हत्या में अव्वल। अतुलजी का कहना था कि अव्वल सकारात्मक प्रयासों को दर्शाने वाला शब्द है और भ्रूण हत्या आपराधिक कृत्य है। अमृतसर के लिए यह कृत्य प्रशंसनीय नहीं हो सकता और इसलिए इस शब्द का प्रयोग यहां गलत है। इसकी जगह कुछ और शब्द ढूंढ़े जाने चाहिए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दौरे में एक-दो दफे संपादकीय कक्ष से उनका गुजरना हुआ। वे संपादकीय प्रभारी जी के कक्ष में आ-जा रहे थे। हो यह रहा था कि जब वे संपादकीय प्रभारी जी के कक्ष में जा रहे थे तो काम करने वाले साथी आदर में खड़े हो गए। संभवतः अतुलजी ने इसे नहीं देखा। जब वे लौट रहे थे तो फिर संपादकीय की उस कतार के साथी कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए। बस, अतुलजी भी रुक गए। उन्होंने जो कहा, वह बहुत दिनों तक याद रखने वाला है। उन्होंने कहा कि न तो आप प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी हैं और न ही मैं हंटर लेकर कक्षा में घूमने वाला टीचर। रिगार्ड में एक बार खड़े हो गए, चल गया पर बार-बार खड़ा होना ठीक नहीं। आप सम्मानजनक तरीके से रहें, यही मेरी इच्छा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतुल जी शार्प ब्रेन के मालिक थे। किसी भी चीज को परखने और उसके विश्लेषण की उनमें विलक्षण प्रतिभा थी, यह एक बार नहीं, कई बार साबित हुआ। उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा जरूर था, जिसे देखकर एक भरोसा जगता था कि चाहे कितनी भी बड़ी समस्या हो, उनके पास वह पहुंच गई तो उसका निदान मिल ही जाएगा। उनका निधन अमर उजाला के लिए ही नहीं, पूरे पत्रकारिता जगत और जागरूक पत्रकारों के लिए एक झटका है, एक सदमा है। ईश्वर इस सदमे को सहने की शक्ति दे। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-216499454203134772?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/216499454203134772/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=216499454203134772&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार चुनाव परिणाम'/><title type='text'>इतनी बड़ी जीत का मतलब</title><content type='html'>&lt;p&gt;बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने स्पष्ट बहुमत लेकर जो इतिहास कायम किया है, उससे कई मतलब निकलते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मतलब एक&lt;/strong&gt; - यह सूबे में विकास की जीत है। लोग अब जातिगत समीकरणों से ऊपर उठ चुके हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मतलब दो&lt;/strong&gt; - नीतीश का नेतृत्व, उनकी शैली तथा बीजेपी के भगवा चेहरे नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी को बिहार में प्रचार के लिए आने से रोकना लोगों को पसंद आया है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मतलब तीन&lt;/strong&gt; - अभी यहां लोगों को कांग्रेस कबूल नहीं है। राहुल और सोनिया का ताबड़तोड़ दौरा भी काम नहीं आया। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मतलब चार&lt;/strong&gt; - राजद और लोजपा सुप्रीमो क्रमश: लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान बिहार के लिए इतिहास हो गए हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मतलब पांच&lt;/strong&gt; - बीजेपी के लिए सबक। सिर्फ सांप्रदायिकता का नारा बुलंद करने से काम नहीं चलता। विकास के साथ रहने से कंधे मजबूत होते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आखिरी मतलब&lt;/strong&gt; - बिहार में विकास की यह जीत सिर्फ बिहार में ही नहीं, देश भर में असर दिखाने वाली है। इस जीत के अगुआ नीतीश कुमार ने भी कुछ ऐसा ही कहा है। &lt;/p&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;सबक - काठ की हांड़ी बार-बार चूल्हा नहीं चढ़ती।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-1212831837113746084?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/1212831837113746084/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=1212831837113746084&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1212831837113746084'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1212831837113746084'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2010/11/blog-post_24.html' title='इतनी बड़ी जीत का मतलब'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8211054520679421129'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8211054520679421129'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='शुभकामनाएं'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-6821046098893664232</id><published>2009-09-07T11:22:00.000-07:00</published><updated>2009-09-07T11:39:03.510-07:00</updated><title type='text'>...और बदल गई दुनिया</title><content type='html'>खलियारी बस्ती में घुसते ही नाक पर हाथ रखना पड़ता था। मन तो करता था कि आंखें भी बंद कर लें। उफ,  इतनी गंदगी। घरों में ही सुअर के बाड़े, गंदी बदबूदार नालियां,  उसमें लोट-पोट होते सुअर। चारों ओर भिनभिनाते मच्छर। क्या नरक इसी को कहते हैं? बस्ती के लोगों पर सवालनुमा यह जुमला भी बेअसर था। पीढ़ियों से सुअर पालने, उसका मांस खाने वाले ये परिवार गंदगी और बीमारियों के अभ्यस्त हो चले थे। कितने ही बच्चे अकाल मृत्यु का ग्रास बन चुके थे। फिर भी बस्ती के लोग खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पक्की सड़क से दो सौ मीटर अंदर बसे इस गांव में मुसहरों के अलावा खरबार, बैंगा व चैरो जनजाति के लोग रहते हैं। पास का पूरा गांव बस्ती के लोगों घृणा करता था। अधिकांश तो इनसे कोई वास्ता ही नहीं रखते थे। परंतु कुमकुम इस बस्ती को लेकर चिंतित रहती थीं। उन्होंने आरोग्य सेविका बनते समय ही अपने गांव को स्वच्छ एवं रोगमुक्त करने का संकल्प लिया था। कुमकुम ने गांव में तो घर-घर कचरा फेंकने वाले सोखते गड्ढे बनवाए। कुओं में ब्लीचिंग पाउडर डलवाया। लेकिन, इस बस्ती पर अब तक उनका बस नहीं चला था। बातें तो वे लोग भी गौर से सुनते थे। साफ-सुथरा रहने की बात मान लेते थे। पर परिणाम हर बार वही ढाक के तीन पांत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुमकुम हर वक्त इसी उधेड़बुन में रहतीं कि ऐसा क्या किया जाए कि बस्ती वालों का जीवन स्तर सुधरे। नरक सा यह माहौल बदले। उन्होंने अपनी समस्या आरोग्य संच प्रशिछिका सिंधु दीदी को बताई। सिंधु दीदी ने जो रास्ता उन्हें बताया, उस पर चलना आसन नहीं था। ब्राह्मण परिवार की लड़की मुसहर बस्ती में जाकर नाली साफ करे, यह बात कोई कैसे बरदाश्त करेगा। लेकिन धुन की पक्की कुमकुम ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जुट गई सफाई अभियान में। साथ में थीं सिंधु दीदी, आचायॆ लोकपति और कुछ साथी। तीन दिनों तक तो यह टोली नालियों और घरों की सफाई करती रही। चौथे दिन से बस्ती के लोग भी उनके साथ हो लिए। पांच दिन ये सिलसिला चला। छठे दिन तक तो आमूल-चूल परिवतॆन हो चुका था। रामपति ने कुमकुम दीदी के हाथ से झाड़ू छीनी। ...अब बस करिए दीदी,  हमें अहसास होगया है। अब हम अपने घरों और बच्चों को साफ ऱखेंगे। बस्ती के शेष लोग सर झुकाए मौन समथॆन कर रहे थे। कुमकुम, सिंधु दीदी का उद्देश्य पूरा हो चुका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांच दिनों की मेहनत रंग लाई। लोगों को प्रेरणा मिल चुकी थी। अगले ही दिन से बस्ती में घरों के आगे बने सुअर के बाड़े हट गए। बरसों बाद बस्ती के लोगों ने परचून की दुकान से साबुन-सफॆ खरीदा। महिलाओं नेबच्चों को रगड़-रगड़कर नहलाया। साफ-सुथरे कपड़े पहनाकर उन्हें एकलविद्यालय में पढ़ने भेजा। आचायॆ लोकपति की आंखें भी उन्हें देखकर खुशी से चमक उठी। पहली बार बस्ती के बच्चों ने विद्यालय में प्रवेश किया था। अबतक जैसे-तैसे जीवन बिता रहे इन मासूम बच्चों के जीवन में पढ़ाई और संस्कार का नया प्रभात आया था। अब वे भी अन्य बच्चों के साथ गायत्रीमंत्र का सस्वर जाप दुहरा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदलाव की इस बयार से गांव के सामाजिक समीकरण भी बदल गए। मुसहर जाति के लोगों सेदूरी बनाए रखने वाले लोग अब उनके घर के ओसारे में बैठकर गप करते नजर आते। जवाहर और रामपति ग्राम समिति के सक्रिय सदस्य हैं। अब वो दिन भूलना चाहते हैं जब गांव के लोग इन्हें देखकर नाक-भौं सिकोड़ते थे। इतना ही ग्राम समिति के प्रयासों से नरेगा के तहत पूरे गांव (बस्ती समेत) में खरंजा बिछ गया है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में खलियारी गांव है। &lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-6821046098893664232?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/6821046098893664232/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=6821046098893664232&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6821046098893664232'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6821046098893664232'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='...और बदल गई दुनिया'/><author><name>विजयलक्ष्मी सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11471232638132773239</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-8881207673974280829</id><published>2009-09-04T06:13:00.001-07:00</published><updated>2009-09-04T06:24:48.842-07:00</updated><title type='text'>कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 4</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ध्यान रखिए, सार्वजनिक होते लागू हो जाता है &lt;em&gt;कोड&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ साथियों ने हमें कठघरे में रखा है और कहा है कि कोई तो मानक हो ब्लाक लेखन का सीरीज के तहत आप टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं। उनकी टिप्पणी इसी सीरीज की पोस्ट के साथ प्रकाशित हैं। एक डाक्टर साहब ने टिप्पणी में लगाकर रखे गये माडरेशन पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा है कि जब उन्होंने देखा कि माडरेशन लगा है तो वे अपनी टिप्पणी लिखना भूल गये। खैर। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहां तक टीआरपी बढ़ाने का सवाल है, हम इसका जवाब एक कथा से देना चाहेंगे। शायद उस कथा से यह पता चले कि टीआरपी बढ़ायी नहीं जाती, जिसकी टीआरपी बढऩी होती है, खुद-ब-खुद बढ़ ही जाती है, उसे कोई नहीं रोक सकता। जी हां, उसे कोई नहीं रोक सकता। मेरा आपसे सवाल है कि क्या उसे कोई रोक सकता है? तो कथा सुनिए। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बोधिसत्व के अंदर जब ज्ञान का प्रस्फुटन हो रहा था तो उनके संगी-साथी उनसे बिछुड़ चुके थे। ऐसा कहिए कि उनका साथ छोड़ चुके थे। अब उनके अंदर जो ज्ञान प्रस्फुटित हो रहा था, वह बाहर निकलने और वायुमंडल में व्याप्त हो जाने को बेताब था। बुद्ध क्या करते? जंगल में ही एक बड़े पत्थर पर बैठ गए और लगे प्रवचन करने। सुनने वाला कोई नहीं, मगर वे करने लगे प्रवचन। मगर, नहीं। सुनने वाले थे। पूरा जंगल उन्हें सुनने लगा। जब वे प्रवचन करते, चिडिय़ां चहचहाना भूल जाती, जानवर शोर मचाना भूल जाते, यहां तक कि हवाएं तक शांत हो जाती थीं। बाद में उस शांति ने उनके साथियों को भी चौंकाया और जब उन्हें जंगल की इस शांति का पता चला तो वे भी बुद्ध की शरण में पहुंच गये। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्या मतलब है इस कथा का? इस कथा का मतलब है, आप जब अपना काम सही तरीके से और पूरी निष्ठा से करेंगे तो उसका उचित और सही फलाफल मिलेगा ही। टीआरपी बढऩे के पीछे भी कुछ ऐसा ही मामला होता है। हमारा लेखन कुछ और सिलसिले में चल रहा है। हम ये नहीं कहना चाहते कि हम बुद्ध की भांति किसी नीरव जंगल में अपना प्रवचन कर रहे हैं। हम एक मानक, एक मर्यादा की बात कर रहे हैं। दुनिया का शायद कोई ऐसा इंसान न हो, जिसकी अपनी कोई मर्यादा नहीं हो। हां, यह और बात है कि इस मर्यादा के मूल्यांकन का पैमाना वक्त और परिस्थितियों के मुताबिक अलग-अलग हो सकता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दफ्तर में एक चपरासी के लिए मानक और उसी दफ्तर में उसके बास के लिए मानक में थोड़ा अंतर तो हो सकता है, पर दफ्तर एक होने के नाते एक समान मर्यादा तो कायम करनी ही पड़ती है, समान मानक पर काम करना ही पड़ता है। हां, दो दफ्तरों के बीच समान मानक होना जरूरी नहीं है। बात ब्लाग लेखन में मानक की हो रही है, जो व्यक्ति अपने दायरे के लिए लिखता होता है, पर उसका आवेग और परिणाम सब सार्वजनिक होता है। और जब कभी आप सार्वजनिक होते हैं, आपके ऊपर एक मानक, एक कोड लागू हो जाता है। भले ही वह अदृश्य क्यों न हो। हो जाता है कि नहीं? और यदि हो जाता है तो इसकी बात करना, इसके लिए बहस छेडऩा क्या टीआरपी बढ़ाने के लिए है? इस सवाल को हम बकवास मानते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम डाक्टर साहब से कहना चाहेंगे कि माडरेशन से आपको बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए था। माडरेशन सिर्फ इसलिए रखा गया है कि कोई भी कभी भी उल-जुलूल न डाल दे। कभी ऐसा हुआ तो उस आलेख को ही नष्ट करना पड़ेगा। अभी यह कला हम नहीं सीख पाए हैं कि एक बार कमेंट पब्लिश करने के बाद उसे कैसे हटाया जा सकता है। वैसी स्थिति में पूरी पोस्ट को ही किल करना पड़ जाएगा। आप भी मानेंगे डाक्टर साहब कि यह ठीक नहीं होगा। हम वादा करते हैं कि हमारे ऊपर आप तीखी से तीखी टिप्पणी करें, उसे आप प्रकाशित पाएंगे। हम फिर से आश्वस्त करते हैं कि इम्तिहान की टिप्पणियों पर जो माडरेशन लगा है, वह सिर्फ अश्लील जुबां वाली टिप्पणियों को प्रकाशित होने से रोकने के लिए ही लगा है। डाक्टर साहब, आप जैसा व्यस्त व्यक्ति हमारे ब्लाग पर आया, आलेख पढ़ा और टिप्पणी के लिए तैयार हुआ, इसके हम आभारी हैं। फिलहाल ब्लाग लेखन के मानक को लेकर अभी बहस जारी रहेगी। आपके सुझावों, टिप्पणियों का स्वागत है। इस खुली बहस में भाग लेने के लिए आप आमंत्रित हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कौशल, पुरुषोत्तम।&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-8881207673974280829?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/8881207673974280829/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=8881207673974280829&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8881207673974280829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8881207673974280829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/09/4.html' title='कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 4'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-3299196084926878900</id><published>2009-08-31T12:50:00.001-07:00</published><updated>2009-08-31T12:53:58.131-07:00</updated><title type='text'>कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का-तीन</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सुविधा है तो कुछ भी लिखेंगे?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लगता है बात गलत दिशा में मुड़ गई है। ऐसे में सीधी बात करें तो बेहतर। पिछले दो पोस्ट पर जो टिप्पणियां आईं,  उनमें से कुछ का मतलब यह है कि ब्लागजगत में मानक की बात करना बेमानी है। ऐसा क्यों?क्या सिफॆ इसलिए कि हमारे पास यह सुविधा है कि हम कुछ भी लिखें प्रकाशित होगी।&lt;br /&gt;हम अक्सर इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि राजनीति में आने के लिए कोई मानक तय नहीं है। हालत यह है कि हम भ्रष्टाचार, अनाचार और सियासी गुंडा तत्वों को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। हमारे नीति निमाॆताओं ने सियासत में सबके लिए समान अवसर देने के लिए कोई मानक नहीं तय किया था। जाहिर है,  कोई मानक न होने को तब विशेषता ही माना गया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब रोक-टोक न होने का दुरुपयोग हर जगह धड़ल्ले से होता है। ऐसे में कुछ नैतिक जिम्मेदारियां ब्लाग लेखकों के लिए भी तय की जाए तो बेहतर हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर क्यों हम सेक्स और हिंसा से भरपूर, दोहरे अथॆ वाले फूहड़ संवादों वाली फिल्मों की आलोचना करते हैं। कई बार इसके लिए तकॆ दिया जाता है कि फिल्में समाज का आईना है। समाज में जो कुछ हो रहा है, वही दिखाया जा रहा है। हम इस तकॆ को नहीं मानते। कहते हैं, यह बहानेबाजी है। न ही हम इस तकॆ को मानते हैं कि दशॆक जो देखना चाहता है, हम वही तो दिखाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें लगता है, ठीक वैसे ही हमें यह तकॆ भी नहीं मानना चाहिए कि कुछ भी लिखा जाए, ब्लाग पढने वाले उसे पढ़ते हैं, इसलिए सबकुछ जायज है। फिल्मों से ही समझें, पैसा लगाने वाला जैसी फिल्म चाहे दिखा सकता है क्या। उससे लिए कुछ बंदिशें हैं। नैतिकता का तकाजा है। सेंसर बोडॆ है। फिल्म बनाने वालों का यह तकॆ भी नहीं माना जाता कि जिसे फिल्म देखना है देखे, जिसे नहीं देखना नहीं देखे। ब्लागों पर पढ़ाने, दिखाने का पैसा नहीं लगता, इसका मतलब यह तो नहीं कि कुछ भी लिखा जाए। हमें लगता है कि जैसी नैतिकता हम फिल्म बनाने वालों के पास देखना चाहते हैं, जैसी नैतिकता की हम सड़क पर चलने वाले एक आदमी से उम्मीद करते हैं, ठीक वैसी ही नैतिकता की उम्मीद ब्लाग लेखन करने वालों से क्यों नहीं होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या ऐसा नहीं हो सकता कि....&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;-ब्लाग पर लिखने की पहली शतॆ भाषा की शुद्धता हो।&lt;br /&gt;-अश्लीलता और हिंसा से परहेज किया जाए।&lt;br /&gt;-हम एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले वाले लेख न लिखे जाएं।&lt;br /&gt;-एक दूसरे की छीछालेदार की कोशिश में न लगे रहें।&lt;br /&gt;(आखिर इससे कौन सा भला और किसका मनोरंजन होता है, सिवाय लिखने वालों के)&lt;br /&gt;-तू मुझे मुल्ला कहे, मैं तुझे काजी कहूं की परंपरा बंद हो।&lt;br /&gt;-बच्चा पैदा होने से लेकर श्राद्ध तक वाह-वाह बंद हो।&lt;br /&gt;-एक दूसरे को ईमानदारी से पढ़ने और राय देने की कोशिश हो।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;(एक बार फिर से, ब्लागों पर बात भय, भूख और भ्रष्टाचार से लड़ने की भी होनी चाहिए)&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;बातें अभी और हैं। बहस जारी रहेगी। आपके विचार आमंत्रित हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुरुषोत्तम, कौशल&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-3299196084926878900?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/3299196084926878900/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=3299196084926878900&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/3299196084926878900'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/3299196084926878900'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html' title='कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का-तीन'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4099783784973718447</id><published>2009-08-31T07:50:00.000-07:00</published><updated>2009-08-31T08:26:06.859-07:00</updated><title type='text'>कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 2</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ब्लाग पर बकवास, पैसा खर्च होता है भई !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ब्लाग पर बकवास लिखने से पहले ब्लाग लिखने वालों को यह जरूर सोचना चाहिए कि जो कोई भी उन्हें पढ़ रहा है, वह अपने पाकेट का पैसा खर्च कर पढ़ रहा है। नेट का लिंक मुफ्त में तो नहीं मिलता? और आज के उपभोक्ता युग में क्या किसी को यह राइट बनता है कि अपने उपभोक्ता को झांसा दे, उसे फ्लर्ट करे या निरर्थक बातों में उसका समय जाया करे? मैंने पिछली पोस्ट में ही कहा था कि अभी लिखे जा रहे सत्तर फीसदी ब्लाग को पढ़ने से यह पता ही नहीं चलता कि आखिर वे क्या लिख रहे हैं और किसके लिए लिख रहे हैं। कई ब्लाग तो ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर बच्चा भी कह देगा कि लेखक अपने लिए भी नहीं लिख रहा है। मुझे तो ऐसे ब्लागों को देखने से यही लगा कि लेखक आखिर कैसे किसी को यह बता पाएगा कि वैसा वकवास उसी ने लिखा है। मगर, एक कहावत पढ़ी थी। एक दारूबाज पति अपनी पत्नी से गाहेबगाहे पीने के लिए पैसे झटके करता था और इसके लिए वह रोज नये-नये बहाने किया करता था। एक दिन वह घर गया और लगा पैसे मांगने। पत्नी के पूछने पर उसने बताया कि आज एक सट्टा लगा है। लोग कहते हैं बकरी की चार टांगें होती हैं। मैंने कहा है कि पांच होती हैं। मैं जीतूंगा। पैसे लाओ, डबल मुनाफे की बात है। पत्नी बोली, बेवकूफ आदमी, बकरी की चार टांगें ही होती हैं। पति बोला - मैं मानूंगा ही नहीं। पत्नी बोली - लोग बकरी को सामने लाकर टांगें गिनवा देंगे। पति बोला - गिनवाते रहें, मैं मानूंगा ही नहीं। पत्नी ने माथा पीट लिया। अब ब्लागों पर बकवास पढ़ने वाले क्या ऐसे ही अपना माथा पीटें? या कोई है इसका निदान?&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(फिलहाल इतना ही। बहस जारी रहेगी। इस ब्लाग को पढ़ने वाला हर व्यक्ति इस बहस में भाग लेने के लिए आमंत्रित है।)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कौशल, पुरुषोत्तम। &lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4099783784973718447?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4099783784973718447/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4099783784973718447&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4099783784973718447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4099783784973718447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/2.html' title='कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 2'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-2005232747160476180</id><published>2009-08-30T12:00:00.000-07:00</published><updated>2009-08-31T08:27:22.499-07:00</updated><title type='text'>कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 1</title><content type='html'>हिन्दी ब्लागिंग पर तमाम बहसें होती हैं। कभी इस पर लिखे गए को साहित्य और असाहित्य मानने को लेकर तो कभी शुद्धियों और अशुद्धियों को लेकर। ये तो फिर भी अच्छी बहस है। बहस तो इस पर भी चलती है कि कौन किसका चमचा है। कौन किसके खेमे का है। कौन लड़कियों को अधिक टिप्पणी करता है और कौन पुरुषों को। नारी और पुरुष के बीच का विवाद तो ब्लागजगत में जगजाहिर है। हिंदू-मुसलिम सदभाव को बिगाड़ने का खेल भी ब्लागजगत में धूमधाम से जारी है। मौलिकता की तमाम मिसालें ब्लागजगत में मिल जाएंगी। ब्लागजगत के सिद्धहस्त लोगों ने एक दायरा बनाया है। उसे वे तोड़ना नहीं चाहते। कई जगह तो लगता है कि कुछ भी लिखकर लोग सिर्फ टिप्पणियां पाना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लागजगत और ब्लागरों पर लिखने का चलन तो कुछ ऐसा है कि इस चलन में शामिल होने से हम भी खुद को रोक नहीं पाए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सत्तर फीसदी ब्लाग लेखन में सिर्फ लेखक की कुंठाएं झलकती हैं। आप कहीं अपनी वजह से पिट गए और आपको बचाने कोई वहां नहीं आया तो आप सारी दुनिया को कोस रहे हैं कि दुनिया में कोई मददगार नहीं रहा। आप कोई संस्था चलाते हैं, कर्मचारियों का शोषण करते हैं और कोई कर्मचारी आपके खिलाफ आवाज उठा गया तो आप सभी कर्मचारियों को मालिक का पिट्ठू बने रहने की नसीहत देते चल रहे हैं। आपको एमबीबीएस का फुल फामॆ मालूम नहीं है और आप सारी बीमारियों का इलाज बताते चल रहे हैं। आपने कभी कोर्ट नहीं देखा, कचहरी नहीं देखी और आप सारी दुनिया को कानून पढ़ाते चल रहे हैं। जी हां, अधिकतर ब्लागों पर कुछ इसी तरह का तमाशा दिख रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लाग पर कुछ हम भी लिखते हैं और इसी सिलिसले में अन्य ब्लागों को पढ़ते भी हैं। सबसे ज्यादा दुख तो तब होता है जब लोगों को अपने घर के किस्से भी ब्लाग पर सार्वजनिक करते देखा जाता है। उफ, कोई मर्यादा नहीं, कोई सीमा नहीं। जिस तरह से ब्लागचर्चा प्रसिद्धि पा रही है, अखबारों के संपादकीय पन्नों का हिस्सा बन रही है, वैसे समय में अब ब्लाग पर क्या लिखा जाए, क्या नहीं लिखा जाए, यह तय किया जाना चाहिए। यह जरूरी लगता है। पर, यह सीमा तय करेगा कौन? बेहतर तो यह होता कि अनर्गल प्रलाप की जगह ब्लाग को भय, भूख और भ्रष्टाचार से समाज को बचाने का माध्यम बनाया जाता। ब्लागों पर समाज में व्याप्त कुरुतियों से लड़ने का कोई नया तरीका सामने आता। फिलहाल इतना ही। बहस जारी रहेगी। &lt;strong&gt;इस बहस में शामिल होने का खुला आमंत्रण है।&lt;br /&gt;पुरुषोत्तम, कौशल&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-2005232747160476180?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/2005232747160476180/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=2005232747160476180&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2005232747160476180'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2005232747160476180'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/1.html' title='कोई तो मानक हो ब्लाग लेखन का - 1'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7922131890702375089</id><published>2009-08-22T01:06:00.000-07:00</published><updated>2009-08-22T01:09:42.559-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आजादी का मतलब'/><title type='text'>गुलामी का था अहसास न आजादी का मतलब जाना</title><content type='html'>आजादी के सिलसिले में एक बात बहुत गौर करने वाली है। वह यह कि चाहे मुगलों का शासन चल रहा था, चाहे अंग्रेजों का, हिन्दुस्तान में आबादी का एक बड़ा हिस्सा न तो गुलामी का दंश झेल रहा था, न ही वह खुद को गुलाम मानता था। उल्टे उनकी तो मौज थी। मुगलों-अंग्रेजों द्वारा दिये गये अधिकारों पर ऐंठ रहा वह तबका तहसीलदार, नवाब , जमींदार, रायसाहब, रायबहादुर आदि का तमगा लेकर अपने ही भाई-बंधुओं पर अत्याचार का कोड़ा भांजा करता था, उनसे लगान वसूलता था और नहीं देने पर उनके लहू बहाताथा। हर कौम, हर कस्बा इसमें शामिल था। उन्हें आज हम भले गद्दार कह लें, मगर आजादी के बाद भी स्थिति उससे इतर नहीं है। हुआ क्या? गुलाम भारत में जिस तरह एक बड़ा तबका खुद को गुलाम नहीं समझता था, उसी तरह आजाद भारत में भी बड़ा तबका खुद को आजाद नहीं समझता है।आजादी के ६२ वर्षों के बाद भी उस तबके के पास कुछ भी नहीं है। जमीन- जायदाद की तो बात छोड़िए दो जून का अनाज भी उसके पास नहीं है। उनकी सांसें चलती रहें, इसके लिए देश के बड़े हिस्से में सिर्फ उनके लिए राहत बांटकर हमारे तख्तोताज उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा करते हैं। हक की बात उठाने की तो वह तबका सोचा भी नहीं करता। हां, जमींदारों, नेताओं, अफसरों की खातिरदारी करना वह आज भी अपनी शान समझता है। ऐसा इसलिए कि उससे ताबीदारी करने वाला तबका मौजूद है, उसकी हैसियत दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है।&lt;br /&gt;एक और बात यह है कि गुलामी के दिनों में आजादी के लिए संघर्ष करने वालों की संख्या भी यहां गिनी-चुनी ही थी। आपको यहां गांव के गांव मिल जायेंगे, जहां से शहादत की एक भी दास्तां आप जुबां पर नहीं चढ़ा पायेंगे। वियतनाम का इतिहास पढ़ रहा था। अमेरिका से आजादी के लिए जब वहां के लोग संघर्ष कर रहे थे तो उन्हें एक बड़ी शक्ति से छापामार लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। हर घर का युवक स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा ले रहा था। मोर्चे पर ठंडक से बचने के लिए हर घर से खिड़की - दरवाजे तक उखाड़कर लकड़ियां भेजी जा रही थीं। आज वियतनाम अपनी आजादी का मतलब समझता है और अमेरिका की हिम्मत नहीं है कि उसकी ओर टेढ़ी नजर से भी देख सके। उल्टे वहां का राष्ट्राध्यक्ष जब-तब महाशक्ति को खुलेआम चैलेंज ठोकता है। हमारे यहां थोड़ी उल्टी स्थिति है। जब आपके देश का बड़ा हिस्सा जानता ही नहीं कि आजादी किन मूल्यों पर पायी गयी, गुलामी का मतलब क्या था तो वह उन मूल्यों को बचाने के लिए संघर्ष क्यों करे?&lt;br /&gt;क्या त्रासदी थी, जब देश आजाद हो रहा था तो गद्दी पर काबिज होने के लिए स्वार्थ की बड़ी लड़ाई में भाई-भाई देश के कलेजे का टुकड़ा कर चुके थे। वह भी कौमी जज्बातों को सामने रखकर। जब नये और आजाद भारत का सपना देखा जाना था, तभी धरती पर सीमा रेखा खींच दी गयी और अदावत के अंतहीन सिलसिले का बीजारोपण कर दिया गया। और आज हम जिन नेताओं की पूजा कर रहे हैं, जिनके नाम पर सीना चौड़ा कर दुनिया को आजादी का मतलब समझा रहे हैं, यह सब उनकी मौजूदगी और उनकी निगहबानी में हुआ। वे नहीं रोक पाये यह सब कुछ। क्या मतलब था आजादी का? क्या इसका मतलब भाइयों द्वारा भाइयों का रक्तपातनहीं था? क्या इसका मतलब बंटवारा नहीं था? क्या इसका मतलब कौमी अदावत नहीं थी? क्या इसका मतलब गद्दी पर येन-केन-प्रकारेण काबिज होने की परिघटनाओं का सूत्रपात नहीं था? गांधी जी ने तो कहा था कि भारत के आजाद होते कांग्रेस का उद्देश्य पूरा हो गया, अब इस पार्टी को भंग कर देना चाहिए। क्यों नहीं मानी गयी उनकी बात? आज कांग्रेस वजूद में क्यों है? और है भी तो वह किस कांग्रेस के उद्देश्यों का पालन कर रही है? फिलहाल इतना ही। आजादी के सच्चे अर्थों की तलाश करती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7922131890702375089?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7922131890702375089/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7922131890702375089&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7922131890702375089'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7922131890702375089'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_22.html' title='गुलामी का था अहसास न आजादी का मतलब जाना'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-9094249833425283590</id><published>2009-08-19T00:59:00.000-07:00</published><updated>2009-08-19T01:01:52.378-07:00</updated><title type='text'>केवल आम होने से आप सारे दोषों से बरी नहीं हैं</title><content type='html'>हम में से ज्यादातर यह कहानी सुन चुके होंगे। फिर भी अपनी बात शुरू करने से पहले, यहां इस कहानी का उल्लेख उचित होगा। कहानी कुछ इस तरह है। ..एक बच्चा बहुत ज्यादा गुड़ खाता था। मां उसे एक महात्मा जी के पास ले गई। समस्या जानकर महात्मा जी ने कहा, इस बच्चे को को पंद्रह दिन बाद लेकर आना। पंद्रह दिनों बाद मां उसे फिर वहां ले गई। महात्मा जी ने बच्चे से कहा, बेटे ज्यादा गुड़ खाना अच्छी बात नहीं है। इसे कम कर दो, बंद कर दो। मां को लगा इतनी सी बात कहने के लिए महात्मा जी ने पंद्रह दिन बाद क्यों बुलाया? उसने पूछा। महात्मा जी ने कहा, दरअसल पंद्रह दिनों पहले तक मैं खुद ज्यादा गुड़ खाता था। बच्चे वाली गलती जब मैं खुद कर रहा था, तो इसे कैसे और क्यूं समझाता। पहले तो मैंने माना कि हां ज्यादा गुड़ खाना गलत बात है। इससे बीमारी हो सकती है। और फिर इस गलत आदत को छोड़ा। इसके बाद मैंने बच्चे को समझाया। वरना, इस पर मेरी कही बात का असर नहीं होता। मेरे समझाने में भी अब जैसा दम नहीं होता। ऐसी स्थिति में मेरे समझाने का बच्चे पर कोई फकॆ भी नहीं पड़ता।&lt;br /&gt;वाकई हम समाज से बुराइयों समूल नाश की इच्छा रखते हैं। तमाम बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं। तो वैसी बुराइयों से हमें मुक्त होना होगा। भले ही वे बुराइयों छोटी क्यों न हो। एक कलकॆ अपने दफ्तर में रोज रिश्वत लेता हो और वह बोफोसॆ घोटाला, चारा घोटाला करने वालों को कोसे तो कोसते रहे किसे क्या फकॆ पड़ता है। हम कहते हैं, हमारे नेता, अधिकारी पाक-साफ हों, संसद, विधानसभाओं में जनता के काम की बातें हो, सरकारी दफ्तरों में काम हो। यह चाहना गलत नहीं है। लेकिन यह कायॆसंस्कृति विकसित करने में, जिसे आम आदमी कहते हैं,  उसकी भी सक्रिय भूमिका है। वह केवल कहने और चाहने का अधिकारी नहीं है। व्यक्तिगत काम तो आम से लेकर खास सभी पूरी तनदेही से करते हैं। लेकिन जैसे ही काम व्यक्तिगत से सावॆजनिक होता है, काम के प्रति दिलचस्पी और गायब हो जाती है। इस रोग से केवल खास ही ग्रसित नहीं है। तो फिर ऊपर से क्यों सावॆजनिक कायॆ के प्रति काहिली के खिलाफ नीचे से ही मुहिम क्यों न शुरू हो?&lt;br /&gt;अब देखिए न। गांव का एक आम आदमी वाडॆ पाषॆद बनता है। पाषॆद बनने से पहले वह बिल्कुल आम था। अपने घर, खेत में वह पूरी निष्ठा से काम करता रहा है। पाषॆद बनते ही सावॆजनिक कामों के प्रति उसकी अरूचि किसी भी गांव में दिख जाएगी। ..यह अरूचि एक आम आदमी पाषॆद बनते ही तो सीख नहीं जाता। यह गुर तो उस आम आदमी के अंदर पहले से ही होगा। ..तो सावॆजनिक कामों के प्रति अरूचि को दूर करने की मुहिम वहीं से क्यों न शुरू हो। वहीं से मतलब हर आम आदमी को अपने अंदर की इस अरूचि को बाहर निकलना होगा।&lt;br /&gt;अक्सर हम दुखी होते हैं। संसद में हंगामे को लेकर। राजनीतिक दलों के धरना-प्रदशॆनों से होने वाली दिक्कतों को लेकर। हड़ताल को लेकर। आम आदमी के अलावा दुखी होने वालों में खास लोग भी शामिल होते हैं। लेकिन हम बात आम आदमी की ही करें। मुझे भी लगता है कि किसी भी ऐसे हंगामे, धरना, प्रदशॆन की निंदा की जानी चाहिए, जिससे ढेर सारे लोगों को परेशानी होती हो। एक समस्या के समाधान के लिए, ढेर सारे लोगों के लिए समस्या पैदा कर देना कहां की समझदारी है। लेकिन साहब यह समस्या पैदा करने में आम आदमी भी पीछे नहीं हैं। कहीं भी कोई दुघॆटना हो, सड़क जाम आम बात हैं। वे आम लोग ही होते हैं, जो किसी दुघॆटना के बाद तमाम वाहनों में तोड़फोड़ करते हैं। आग लगा देते हैं। हड़ताल करके काम ठप कर देने वाले कमॆचारी और बाकी लोग भी खुद को आम आदमी ही कहते हैं।&lt;br /&gt;कहा जा सकता है कि बिना हंगामे के अधिकारी, नेता बात ही नहीं सुनते। दुघॆटना में मृतक के परिजन, घायल को बिना हंगामा किए मुआवजा ही नहीं मिलता। बिना हड़ताल किए वेतन ही नहीं बढ़ता। हो सकता है यह बात सही हो, फिर भी एक बार यह विचार करना होगा कि पहले नेताओं अधिकारियों को आम आदमी की बातें अनसुनी करने की आदत पड़ी, या फिर पहले आम जनता को हंगामा करने की। वैसे भी अपने फायदे के लिए काम बंद कर बाकी आम जनता से अन्याय करने वाला आम कमॆचारी ऐसी उम्मीद क्यों करता है कि सरकार उसकी बेहतरी के लिए चौबीस घंटे, बारह महीने ईमानदारी से काम करती रहे। उसके अधिकारी उसके प्रति न्यायपूणॆ बने रहें। ध्यान रखें, आप किसी से उम्मीदें लगाए बैठे हैं तो आपसे भी किसी को उम्मीद है। पहले आप तय करें कि हम किसी की उम्मीदों पर तुषारापात नहीं करेंगे।&lt;br /&gt;कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी। उसमें कथित रूप से पाप करने वाली एक महिला को कुछ लोग पत्थर मार रहे होते हैं। हीरो आता है और कुछ बातों के बाद कहता है कि इस महिला को अब पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो। किसी ने पत्थर नहीं मारा।&lt;br /&gt;तो आप भी देख लीजिए, जो पत्थर आपके हाथ में है आप उसे चलाने लायक हैं भी या नहीं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-9094249833425283590?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/9094249833425283590/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=9094249833425283590&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/9094249833425283590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/9094249833425283590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_19.html' title='केवल आम होने से आप सारे दोषों से बरी नहीं हैं'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-8748275465245442246</id><published>2009-08-18T01:17:00.000-07:00</published><updated>2009-08-18T06:46:28.907-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आजादी का मतलब'/><title type='text'>हाथ जोड़े खड़ा है हिन्दुस्तान</title><content type='html'>हिन्दुस्तान का मतलब गांव, वहां की गलियां, भोले-भाले लोग। हिन्दुस्तान का मतलब दिल्ली, वहां की गद्दी, गद्दी पर बैठे लोग। जी हां, आप देख सकें तो देख सकते हैं कि भोले- भाले ग्रामीण से लेकर दिल्ली की तख्त पर बैठा हमारे देश का सिरमौर तक सभी हाथ जोड़े खड़ा है। भिखारी की तरह। वाह - वाह - वाह। यह कैसी आजादी है, कैसी आजादी? भिखारियों की फौज। वाह। गरीब को राहत चाहिए दिल्ली से और दिल्ली को कहीं और से। न वह गरीब ग्रामीण अपने मन का एक फैसला कर सकता है, न दिल्ली की तख्त पर बैठा हमारा सिरमौर आजाद मुल्क को एक आजाद भाषा ही दे सकता है। परजीवी लोगों की बढ़ती तादाद ने फिलहाल जो नक्शा खींचा है, शायद उसी का नतीजा है कि देश का चप्पा - चप्पा मल्टीनेशनल कंपनियों के दफ्तरों से गुलजार हो चुका है, किसान बीजों से महरुम होते जा रहे हैं और कोने-कोने में दलाली - चमचागीरी करने वालों की चौबीसो घंटों खूब छन रही है। एक भी ऐसी जगह आप नहीं ढूंढ़ सकते, जहां आप फख्र से सीना तानकर खड़े हो सकें और कह सकें कि हां, हम आजाद मुल्क में एक आजाद नागरिक की हैसियत से खड़े हैं।&lt;br /&gt;मेरी बातों पर यकीन नहीं हो तो एक जाति प्रमाण पत्र या एक आवासीय प्रमाण पत्र बनाने प्रखंड कार्यालय पहुंचिए। वहां का चपरासी भी आपसे बात करने की जहमत उठाना नहीं चाहेगा। अधिकारी से बात कर आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी जनतांत्रिक प्रणाली वाले देश के किसी लोकसेवक से बात कर रहे हैं। कोई आपकी सुनने को तैयार नहीं होगा। और यह स्थिति बिहार के नेपाल बार्डर से पंजाब के पाकिस्तान बार्डर तक एकरस में आप महसूस कर सकते हैं। मैंने महसूस किया है। जिला परिवहन का कार्यालय वह उत्तर प्रदेश के किसी जिले का हो या महाराष्ट्र के किसी जिले का, दलालों और बिचौलियों की फौज हर जगह समान रूप से आपका स्वागत करती मिलेगी। और शिकायत किससे करेंगे। जरा शिकायत करने वाले बड़े अधिकारियों तक पहुंचिए। भई क्या मिजाज है बादशाहों के? नवाबों के दौर के बड़े से बड़ा एय्याश तानाशाह भी शरमा जायें। बात कितनी सुनी जायेगी, यह तो जाने पर ही पता चलेगा। यह है न हैरत की बात कि एक सिस्टम का पूरा इंफ्रास्ट्रक्टर खड़ा होने के बावजूद आप दौड़ते रहते हैं, तड़पते रहते हैं, आपका काम नहीं होता। जिन्हें आपका नौकर कहा जाता है, उनके सामने पहुंचते ही आप क्या भिखारी नहीं बन जाते? और उस नौकर को इसी सिस्टम के बड़े नौकर के सामने कभी देख लीजिए, वह भी वहां आपको हाथ जोड़े कृपा की भीख मांगता ही दिख जायेगा। वह बड़ा नौकर कहीं अपने से ऊपर वाले के दरबार में खड़ा दिखा तो हाथ जोड़े ही खड़ा दिखेगा। माफी मांगता, भीख मांगता, दया की भीख।&lt;br /&gt;जिस तरह से आर्थिक विकास की दर को तेज और तेज करने की प्रक्रिया चल रही है, उसके तहत देखने को यह मिल रहा है कि इस देश का अच्छा खासा ग्रेजुएट गले में टाई लगाकर व पैरों में काले जूते डालकर डोर-टू-डोर कंपेन करता चल रहा है। हम रोजगार के अवसर सृजित नहीं कर पाये, इसका खामियाजा वह चौबीसों घंटे कभी सड़क पर तो कभी दफ्तर में आपको हाथ जोड़े ही मिल जायेगा। इस पर भी तुर्रा यह कि वह भूल से भी अपने अधिकारों की बात नहीं कर सकता। किसी गुलाम मुल्क के गुलाम नागरिक जैसी हालत ही है उसकी। सरकारी हो या निजी, आप बस अड्डे पर चले जाइए। जहां सुरक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां आपको पुलिस का एक भी नुमाइंदा नहीं दिखेगा। भूल से दिख भी गया तो वह आपकी किसी हेल्प के लिए नहीं, अपनी जेब गरम करने की मशक्कत में ही जुटा दिखेगा। आप उससे तनकर कुछ भी नहीं कह सकते। वह आप पर गुर्राता है और आपकी स्थिति होती है हाथ जोड़कर खड़े भिखारियों वाली।&lt;br /&gt;कहां जायेंगे आप? अस्पताल? दावे तो बहुत हैं, पर आसानी से करा लीजिए इलाज तो वीर कहे जायेंगे। सरकार के लाख प्रयास के बावजूद सरकारी अस्पतालों में नियुक्त डाक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक नहीं लगायी जा सकी। जो डाक्टर निजी प्रैक्टिस चलाते हैं, उनसे आप सरकारी अस्पताल में इलाज कराकर देखिए, आपको पुर्जा तक फेंककर दिया जायेगा, इसकी मैं गारंटी देता हूं। आपकी दशा उस डाक्टर के सामने अपने अधिकारों से लैस किसी मजबूत नागरिक की तरह नहीं होगी। आप हाथ जोड़े कलपते नजर आयेंगे, डाक्टर साहब, डाक्टर साहब करते नजर आयेंगे। इसी डाक्टर के निजी क्लिनिक पहुंचिए। आजकल तो डाक्टरों ने ब्लड प्रेशर तक की जांच तक करना छोड़ दिया है। इस काम को वे अपनी शान में गुस्ताखी समझते हैं। वहां की कोई दाई तो थर्ड ग्रे़ड का कंपाउंडर यह काम निपटा देगा। पैसा देकर भी आप कलपते नजर आयेंगे और इस रुख से आपको निजात दिलाने वाला कोई सिस्टम आपको कहीं नजर नहीं आयेगा। यह गारंटी है, नजर नहीं आयेगा। और तब आपके श्रीमुख से यदि यह निकल आये कि यह कैसी आजादी, तो मुझे धन्यवाद जरूर कीजिएगा। फिलहाल इतना ही। आजादी के सच्चे अर्थों की तलाश करती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-8748275465245442246?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/8748275465245442246/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=8748275465245442246&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8748275465245442246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8748275465245442246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html' title='हाथ जोड़े खड़ा है हिन्दुस्तान'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4965697861577316919</id><published>2009-08-17T11:58:00.000-07:00</published><updated>2009-08-17T12:00:07.858-07:00</updated><title type='text'>सिफॆ भाषण देने से काम नहीं चलेगा</title><content type='html'>&lt;p&gt;मेरी पिछली बातों (खुद को भी तो बदलिए) का संदभॆ लेते हुए ब्रजेश, चंद्रा एक बात स्पष्ट कर लें कि नेता, अधिकारी या व्यापारी कोई आसमान से नहीं आते। आम लोगों यानी पब्लिक के बीच से ही आते हैं। पिछली बातों से अगर यह भी साफ नहीं हो पाया कि देश, समाज और व्यवस्था सुधरे,  इसके लिए क्या करें तो मैं कोशिश करता हूं कि और सहज शब्दों में बात करूं। आपके जैसा,  मेरे जैसा,  उनके जैसा हर आदमी सुधर जाए। भ्रष्टाचार, अनाचार और विध्वंस से तौबा कर ले तो पूरा समाज सुधरेगा, व्यवस्था सुधरेगी। बुराइयों और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सिफॆ कोसने की जगह बुराइयों को खत्म करने का प्रयास हम खुद करें, तो ही स्थिति सुधरेगी।&lt;br /&gt;यह बात बहुत बार कही गई है। फिर भी कहता हूं। गली में कुछ ईंटें पड़ी हैं। एक ईंट से आपको ठोकर लगती है। आप गिर जाते हैं। आप गाली देते हैं। पता नहीं किसने ईंटें रास्ते पर फेंक दी। इतना भी शऊर नहीं है। यह कहकर आगे बढ़ जाते हैं। आपके पीछे आने वाले और भी लोग ईंट से टकराते हैं। आपका ही अनुसरण करते हैं। आगे बढ़ जाते हैं। समस्या जस की तस है। कोसने, गाली देने के बावजूद।...तो इतना तय है कि कोसने, गलियाने से समस्या दूर नहीं होती। अब कोई और व्यक्ति आता है। वह ईंटें उठाकर तरतीब से किनारे रख देता है। उसके ऐसा करते ही यह तय हो गया कि अब और आने वाले लोग उन ईंटों से नहीं टकराएंगे। मतलब समस्या दूर करने के लिए थोड़ा वक्त देना होगा। थोड़ी मेहनत करनी होगी। भाषण देने से अलग। साथ ही ..हमें क्या मतलब का भाव त्यागना होगा।&lt;br /&gt;मान लें आपको किसी सरकारी दफ्तर में काम है। वक्त लग रहा है। आप समथॆ हैं। दफ्तर के कलकॆ को कुछ पैसे देते हैं। आपका काम हो जाता है। इसके बाद भी देश, समाज में फैले भ्रष्टाचार पर आप लंबा-चौड़ा व्याख्यान देंगे। अधिकारियों,  नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएंगे। मन नहीं भरा तो देश की आजादी को बेमानी ठहराएंगे। ...क्या कहने की जरूरत है कि सवॆत्र व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए आप या कोई और घूस देकर काम करवाने वाला भी जिम्मेदार है? सोचें जरा, हर आदमी रिश्वत देना बंद कर दे तो भी क्या रिश्वतखोरी जारी रहेगी? क्या सरकारी बाबू, अधिकारी काम करना ही बंद कर देंगे?  रिश्वत देना बंद कर दिया जाए तो भी काम होंगे। कुछ दिनों तक का संक्रमण काल हो सकता है। निश्चित रूप से यहां ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा कि केवल मेरे घूस नहीं देने से क्या होगा। वो गाना याद है..मिले जो कड़ी-कड़ी, एक-एक जंजीर बने...। (शायद ऐसा ही कुछ)&lt;br /&gt;मिलावटखोरी बड़ी समस्या है। सब इससे त्रस्त हैं। मसाले में भी मिलावत होती है। मसाले में मिलावट करने वालों को वह भी गाली देता है, जो रोज दूध में पानी मिलाकर बेचता है। और मसाले में मिलावट करने वाला पतला दूध देखकर, पीकर पानी मिलाने वालों को गलियाता होगा। ...यह सिफॆ यह बताने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार की जड़ें यही हैं। हमारे आपके आसपास। हमें मिलावटी मसाला नहीं खाना है तो दूध में पानी मिलाना भी बंद करें। केवल मसाले में मिलावट करने वालों को गलियाने से काम नहीं चलेगा।....जरा यह भी तय करें कि इस मामले में सरकार कितनी गैरजरूरी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बात खत्म नहीं हुई है। संभव हुआ तो इस चरचा को जारी रखना चाहूंगा। &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4965697861577316919?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4965697861577316919/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4965697861577316919&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4965697861577316919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4965697861577316919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_285.html' title='सिफॆ भाषण देने से काम नहीं चलेगा'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-835247371902207407</id><published>2009-08-17T00:59:00.001-07:00</published><updated>2009-08-17T01:03:57.532-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आजादी का मतलब'/><title type='text'>संबोधन से उलझा आजादी का अर्थ</title><content type='html'>इसके पहले कि मैं आजादी का अर्थ तलाशती रपट का सिलसिला आगे बढ़ाऊं, पुरुषोत्तम जी को धन्यवाद दे लूं कि उन्होंने इस सिलसिले में अपने आलेख से चार चांद लगा दिये हैं। पिछली पोस्ट में मैंने आजादी के सच्चे अर्थ की तलाश में कुछ सरकारी संस्थानों की सैर पर अपने साथ चलने वालों को चलने का आग्रह किया था। हमने आजाद भारत के थानों और पुलिस व्यवस्था की हालत देखी। आगे चलें, इसके पहले हम जिक्र करना चाहेंगे पंद्रह अगस्त के दिन लाल किले के प्राचीर से अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक और नीरस भरे संबोधन का। आजादी का अर्थ तलाशते देशवासियों के समक्ष उम्मीद के मुताबिक इस बार भी प्रधानमंत्री ने उबाऊ और नीरस भाषण ही परोसा। पिछले पांच वर्षों से वे ऐसा ही भाषण करते आ रहे हैं। यह उनका छठा मौका था।  प्रधानमंत्री ने सूखे से उत्पन्न संकट की चर्चा की और खौफ का पर्याय बने स्वाइन फ्लू के खतरे को कमतर करके बताया। देश जानता है कि कृषि क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए आज तक बुनियादी कदम नहीं उठाये गये हैं और यही हालत सेहत में सुधार को लेकर भी है। देश के स्वास्थ्य ढांचे में सुधार के कोई लक्षण नहीं दिख रहे हैं।  लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्रियों के संबोधन में जो एकरसता और रस्म अदायगी का भाव समावेशित हो चुका है, इस बार भी प्रधानमंत्री ने उसी का प्रदर्शन किया। देश की समस्याओं के समाधान की जो प्रतिबद्धता इस बार मनमोहन सिंह ने व्यक्त की है, वह वे पिछले पांच वर्षों से करते आ रहे हैं। सरकार हमेशा कहती है कि आतंकवाद और नक्सलवाद को जड़ से उखाडऩे के लिए हर कदम उठाये जायेंगे। पर, इस पर कैसा अंकुश लग पाया है, यह क्या किसी से छिपा है? मुंबई हमले के षड्यंत्रकारी खुलेआम घूम रहे हैं और पाकिस्तान से वार्ता के संदर्भ में आतंकवाद पर रोक लगाने की शर्त हटा दी गयी है। मनमोहन सिंह लच्छेदार भाषण देने के लिए वैसे भी नहीं जाने जाते और न ही उनकी ओर से ऐसा भाषण दिया जाना आवश्यक ही समझा जाता है। पर, एक कुशल प्रशासक के नाते उनसे देश को जो उम्मीदें हैं,  कम से कम उस पर खरा उतरने की उन्हें कोशिश तो करनी ही चाहिए। इस कोशिश से भी उनका भाषण दूर ही दिखा। अपने भाषण में उन्होंने कुछ आश्वासन दिये। अब इस तरह के आश्वासन का क्या महत्व रह गया है कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने को प्रतिबद्ध है? राष्ट्रपति के बाद प्रधानमंत्री ने भी कहा कि जब तक हमारा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं होता, योजनाओं का फायदा जनता तक नहीं पहुंच पायेगा। पर, जब प्रशासनिक सुधार आयोग की रपट पर अमल की बात आयी तो इस मामले में भी आश्वासन ही मिला। अब इसका क्या मतलब है कि कोई प्रधानमंत्री यह कहे कि ऐसा-ऐसा करने की जरूरत है या यह-यह किया जाना चाहिए? जो करने की जरूरत है या जो किया जाना चाहिए, उसे लागू क्यों नहीं कराया जाता? किसके भरोसे सारा कुछ छोड़कर खुद की मुक्ति का किनारा खोजा जा रहा है? और नौ फीसदी विकास दर पाने का लालीपॉप, हासिल कर दिखाइए प्रधानमंत्री जी, रोका किसने है? लोग तो नब्बे रुपये प्रति किलो दाल और चालीस रुपये प्रति किलो चीनी खरीद रहे हैं, खरीदते रहेंगे। जनता से तो पूछते नहीं, आप जब मर्जी पेट्रोल-डीजल का दाम घटाइए-बढ़ाइए, जिसे जरूरत होगी, खरीदेगा ही।  यह ठीक है कि इस बार के चुनाव में जनता ने आप पर भरोसा दिखाया और कांग्रेस फिर से गद्दी पाने में सफल रही, पर आजादी का मतलब आपके भाषणों तक जाकर भी कुछ ठीक से सही अर्थों में परिभाषित नहीं हो रही प्रधानमंत्री जी। लगातार छठी बार जनता को निराशा ही मिली। आजाद भारत के लोगों को एक आजाद रास्ता और एक आजाद मंजिल  चाहिए। वह कब मिलेगी और कौन उपलब्ध करायेगा, इसका जवाब इस बार के स्वतंत्रता दिवस पर भी आपके भाषण से नहीं मिल रहा। आजादी का अर्थ तलाशती रपट का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-835247371902207407?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/835247371902207407/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=835247371902207407&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/835247371902207407'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/835247371902207407'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_17.html' title='संबोधन से उलझा आजादी का अर्थ'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-943305790915544760</id><published>2009-08-16T10:19:00.000-07:00</published><updated>2009-08-16T10:35:19.482-07:00</updated><title type='text'>खुद को भी तो बदलिए</title><content type='html'>यह कैसी आजादी? यह जुमला हमें अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल जाता है। समाज, देश और व्यवस्था की दुरावस्था से त्रस्त लोग ऐसा कहते हैं। लेकिन देश, समाज की दुरावस्था से आजादी का क्या लेना-देना। भ्रष्टाचार, नाकामी और काहिली के लिए आजादी कहां से जिम्मेदार हो गई। भई, आजादी हमें बड़ी मुश्किल से मिली थी। यह आजादी अनमोल है। आपकी व्यवस्था गड़बड़ है तो व्यवस्था सुधारने की बात करिए। आजादी को क्यों कोसते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि हमारे देश की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। हम हर परेशानी, समस्या आफत के लिए किसी को कोस कर मुक्त हो जाते हैं। समस्या दूर हो, खत्म हो, इसके लिए प्रयास नहीं करते। गांव-देहात से लेकर शहर तक जहां देखिए लोग व्यवस्था और शासन-प्रशासन को गरियाते नजर आएंगे। बिजली-पानी नहीं है तो नेता दोषी। हत्या हुई, लूट हुई तो सरकार दोषी। हर समस्या, हर गलत बात के लिए किसी को कोसो और चुपचाप सो जाओ। ऐसा करके हम तो अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लिए। देश, समाज के लिए अब हमें कुछ नहीं करना। यह समस्या का सरलीकरण है। शासन-प्रशासन के किए हर गलत-सही का असर पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए इनके प्रति आशंकित रहना, इन पर नजर रखना और अच्छे-बुरे पर हंगामा करना, इनमें से कुछ भी गलत नहीं है। लोकतंत्र का मतलब भी यही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शासन-प्रशासन से अलग हटकर देखें हमारे-आपके स्तर पर ही न जाने कितनी गड़बड़ियां हैं। खुद को टटोलकर इन्हें दूर करने की हम कितनी कोशिश करते हैं। आखिर जिन नेताओं की करतूतों पर हम उन्हें गाली देते हैं, वे भी तो हमारे ही समाज से आते हैं। घूस देकर बच्चों को नौकरी दिलवाकर योग्य का हक मारने, खाद्य पदार्थों में मिलावट कर समाज को जहर खिलाने-पिलाने वाले लोग क्या केवल नेता ही हैं? दूध में पानी मिलाने, जैसे भी हो, एन-केन-प्रकारेण बच्चों का स्कूल और कालेज में एडमिशन करवाने को जब हम मान्यता देंगे तो भविष्य में इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे, हम यह मानकर क्यों न चलें? जिसे जहां मौका मिलता है, अनुशासन और नियम तोड़ता है। और फिर हम ...इतना तो चलता है, मानकर आंख मूंद लेते हैं। भ्रष्टाचार छोटा चलेगा, बड़ा नहीं, ऐसा हो सकता है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेताओं के अवसरवाद को कोसने वाले पूरे समाज में पैठ बना चुके अवसरवाद को कोसें, तभी बात बनेगी। चंद हजार रुपयों के लिए देश छोडऩे वाले, संस्थान छोडऩे वालों को तो हम तरक्कीपसंद मानते हैं, लेकिन कोई नेता अपनी बेहतरी के लिए दल छोड़ता है, साथी छोड़ता है तो उसे गाली देते हैं। दोनों तरह के अवसरवाद के नतीजे छोटे-बड़े हो सकते हैं, अर्थ तो नहीं बदलते! समाज में अंतिम पायदान तक जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार और अवसरवाद को हम भ्रष्टाचार और अवसरवाद मानना ही नहीं चाहते। जब मानते ही नहीं तो उस पर भला कोई हंगामा क्यों करेगा, उसे रोकने के उपाय क्यों करेगा? रोकने के उपाय नहीं होंगे तो ये फले-फूलेंगे। फल-फूलकर ये जब बड़े नतीजे देते हैं तो हमें दिक्कत होती है। इतना तो चलता है...न जाने कब ..सब चलता है, में बदल जाए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधी सी बात है, नेताओं के अवसरवाद और भ्रष्टाचार पर रोकर कर्तव्य को पूरा हुआ मान लेने से काम नहीं चलेगा। कमर इस बात के लिए भी कसें कि जहां इसके बीज डाले जाते हैं, वहां भी पहरेदारी हो। अन्यथा दूसरा सहज रास्ता यह है कि जिस तरह हमने समाज में फैले कथित छोटे- छोटे भ्रष्टाचार को सहज मान लिया है, उसी तरह बड़े पैमाने पर होने वाले बड़े भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लें। जाहिर है, दूसरा रास्ता खतरनाक है। बताने की जरूरत नहीं कि बेहतर लोकतंत्र के लिए बेहतर नागरिक भी चाहिए। लेकिन एक नागरिक के रूप में हर कोई...हम नहीं बदलेंगे, का झंडा बुलंद किए हुए है और उम्मीद करते हैं कि हमारे नेता साफ-सुथरे और हमारी चिंता करने वाले हों। हम खुद पान खाकर आफिस और घर की दीवारों पर थूकेंगे लेकिन कल्पना करेंगे सजे-संवरे देश और शहर की। अपना कूड़ा सड़क और पार्क के किनारे फेंकेंगे और गंदगी की समस्या के लिए अधिकारियों को कोसेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपका नेतृत्व करने वाले ये लोग उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां सरकारी दफ्तरों में एक फाइल को कर्मचारी और अधिकारी महीनों लटकाते हैं। वे लोग आप जैसे लोगों के बीच से ही हैं, जो इन दफ्तरों में जाकर घूस देकर अपना काम करवा आते हैं और उसे गलत भी नहीं मानते। ज्यादा हुआ तो घर आकर कर्मचारियों-अधिकारियों को बुरा-भला कहकर गुस्सा निकाल लिया। बात फिर वहीं है। सिर्फ इतने से काम नहीं चलेगा। बेहतर नेतृत्व और बेहतर देश चाहते हैं तो बदलना खुद को भी होगा। इसके लिए अपने आप को तैयार करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-943305790915544760?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/943305790915544760/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=943305790915544760&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/943305790915544760'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/943305790915544760'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_9083.html' title='खुद को भी तो बदलिए'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7313716282095642307</id><published>2009-08-16T00:23:00.000-07:00</published><updated>2009-08-16T01:07:10.027-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आजादी का मतलब'/><title type='text'>कभी जंग-ए-आजादी, आज जश्न-ए-आजादी</title><content type='html'>कोई गफलत नहीं, कोई शिकायत नहीं, पर यह सच है। यह सच है कि आज जो जश्न-ए-आजादी चल रहा है, वह कभी हुई जंग-ए-आजादी के दम पर ही टिका है। कहीं पढ़ा था। भगत सिंह जेल में बंद थे। उनकी माता उनसे मिलने आयीं। भगत सिंह को सूचना दी गयी कि उनकी माता उनसे मिलने आयी हैं। भगत सिंह सोच रहे थे कि उन्हें तो फांसी होगी, माता आयी है, कैसे कर सकेंगे उनका सामना, क्या बता पायेंगे। दिल कड़ा कर हंसते चेहरे के साथ माता के सामने आये। कहने लगे- मुझे कुछ नहीं होगा मां, बड़े रहमदिल लोग हैं वे, मुझे छोड़ देंगे, आप घबराना मत। और जो मां ने कहा, वह किसी भारतवासी का कलेजा चीर कर रख देने के लिए काफी है, हां देश के प्रति सम्मान का थोड़ा सा भी जज्बा हो तो उनकी बातों से सीना चौड़ा भी होता है। मां ने कहा- बेटे, मुझे झांसा न दो, मैं जानती हूं कि तुम्हें ये लोग नहीं छोड़ेंगे, यदि मेरे और बेटे होते और वे भारत माता को आजाद कराने के लिए अपनी कुर्बानी देते तो मुझे गर्व होता। यह जंग-ए-आजादी का जज्बा था। देश पर जान निसार कर देने का हिलोरा था। हर दिल में, उन दिलों से निकलने वाली हर सांस में। एक से बढ़करएक थे सभी। बेटा से बढ़कर मां, मां से बढ़कर बेटा। अब जश्न-ए-आजादी है। आजादी के नाम पर, मैं किसी का नाम नहीं लेता मगर यकीन मानिए मैं उन्हें पहचानता हूं, जश्न-ए-आजादी के नाम पर पवित्र दिन को भी संयम नहीं रख पाते। टेबलें सजती हैं, बोतलें खुलती हैं, प्लेटों में मांसाहारउफ, उफ क्या यही है आजादी?? और उन महफिलों में कमसिनों के नथ कैसे और कहां उतारे जायेंइसका प्लान बनता है, सरकारी योजनाओं का कितना पैसा अपनी जेब तक पहुंचाये जायें, इस पर मशक्कत चलती है, इस साल किस जाति कोकिस जाति से लड़ा दिया जाय, इसका ब्लू प्रिंट तैयार होता है, हिन्दु-मुस्लिम कैसे लड़ें, इस पर ग्रैंड ओपिनियन का सिलसिला चलाया जाता है। एक को दोष न दीजिए। हम्माम में सब नंगे हैं, सब। हम, आप, वे सभी। क्या नेता, क्या अधिकारी, क्या पत्रकार, क्या कारोबारी, क्या गुंडे, क्या अपराधी, सभी। जी हां, सभी। इस बात में कोई लोचा दिखता हो तो मैं आपको एक-एक कर आपको कुछ स्थलों की सैर कराता हूं। जिगर थामकर मेरे साथ चलिए।&lt;br /&gt;आप खुद को शरीफ शहरी मान लीजिए। अब आप निकले हैं बाजार। आप नसीब वाले भी हैं। मान लेते हैं कि आपका साबका किसी गुंडे-बदमाश से नहीं पड़ा। एक छोटी सी घटना पेश आयी। बाजार की भीड़ में आपका मोबाइल फोन कहीं गिर गया। आपके लिए सबसे पहला काम इसकी रपट थाने में लिखवाना होगा। जाइए थाने, मेरे आग्रह पर ही सही जाइए थाने। मेरी गारंटी है कि आप रपट नहीं लिखवा सकते। पहले तो कोई बात नहीं सुनेगा। सुनेगा भी तो पचीस फच्चर। कोर्ट जाइए, एफेडेबिट कराइए, फिर आइए, फिर आइए, बड़ा बाबू (थानेदार) नहीं हैं, वही फैसला लेंगे। और आपने जरा सा सूंघाया (हरा पत्ता) कि काम दनादन, दामाद जैसी आवभवत। पूरे तामझाम और एकाध दो दिन खराब करने के बीच आपको लग जायेगा कि आप किसी आजाद मुल्क के जनकल्याणकारी व्यवस्था के बीच सांसें नहीं ले रहे हैं। यदि किसी ने बाजार में आपको तमाचा खींच दिया और उसकी शिकायत करने, इंसाफ मांगने आप थाने पहुंच गये तो फिर माफ कीजिए, वहां आपके साथ जो सलूक होगा, उसका अनुभव आप ही कर सकते हैं। मेरा तो अनुभव है कि कोई तमाचा मार दे तो उसे पूज्य बापू को याद करते बर्दाश्त कर जाइए, पर थाने न जाइए। तमाचा तो आप खा ही चुके हैं, फजीहत और जेब की लूट भी वहां जज्ब करने होंगे , इसकी गारंटी देता हूं।और तब मेरी गारंटी है कि आपके जेहन में सिर्फ एक ही सवाल तूफान बनकर गुजरेगा- क्या यही है आजादी??  आजादी के अर्थ, सच्चे अर्थ को समझने की कोशिश का १४ अगस्त से शुरू सिलसिला अभी जारी रहेगा। फिलहाल इतना ही। इस बीच आपके सुझावों का स्वागत होगा। धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7313716282095642307?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7313716282095642307/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7313716282095642307&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7313716282095642307'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7313716282095642307'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post_16.html' title='कभी जंग-ए-आजादी, आज जश्न-ए-आजादी'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-1376831020675593466</id><published>2009-08-14T11:23:00.000-07:00</published><updated>2009-08-14T11:28:57.129-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आजादी का मतलब'/><title type='text'>कहां है आजादी??</title><content type='html'>&lt;p&gt;एक ऐसे बोर सब्जेक्ट पर लिखने को जी मचला है , जिसे मुद्दा बनाकर आज हर ओर हर कोई लिख रहा है। लिख रहा है और पूछता चल रहा है कि क्या लिखा है, वाह। मेरा यह लेख आपकी किसी वाह सुनने का मोहताज नहीं। यह पत्थर है, जो तबीयत से उछाला जा रहा है, शायद कहीं कोई सुराख पैदा हो जाय।&lt;br /&gt;आजादी। बड़ा प्यारा नाम। दीवाना बना देने वाला, दिमाग को घूमाकर रख देने वाला भी। मगर यह कहां है? सवाल यह है। आइए, उन दो-चार सवालों से हम-आप इस पंद्रह अगस्त के बहाने रूबरू हो लें। आजादी-आजादी का माला तो हम फेर रहे हैं, पर कहां है आजादी, जरा इस पर गौर कर लें।&lt;br /&gt;आजादी कहां है? उन गरीब की झोपड़ियों में जहां भूख-बीमारी-भय से दिन-रात, सुबह-शाम मशक्कत चल रही है? उन मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा लोगों के घरों में जहां अपराधियों की तो छोड़िये कानून-व्यवस्था के रखवालों तक का भय चल रहा है? उन किसान परिवारों में  जो कर्ज तले दबकर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं या सुखाड़ व बाढ़ की चक्की में पिसकर राहत को भी मोहताज हो गये हैं? या उन अमीर घरानों में जहां पैसा पानी की तरह बह रहा है और आजाद मुल्क का हर कुनबा जहां हाथ जोड़े खड़ा है? उन पार्कों में जहां घुसते ही हिदायतें मिलनी शुरू हो जाती है, सिगरेट न पीयें, पान न खायें, फूल न छूएं-न तोड़ें? उन बस अड्डों पर जहां बस के आने-जाने के बारे में पूछना भी गुनाह समझा जाता है? उन रेलवे स्टेशनों पर जहां थूकना भी मना हो चुका है, यहां न थूकें-वहां न थूकें, लेकिन कहां थूकें, यह नहीं बताया जाता? उन स्कूलों में जहां पढ़ने के लिए नाम लिखाना भी एक जहमत भरा काम हो चुका है? उन प्राइवेट संस्थानों में जहां आठ घंटे काम करने या कराने की बात दम तोड़ चुकी है और चौबीस घंटों का शोषण चल रहा है? उन सरकारी संस्थानों में जहां रिश्वत सूंघाये बिना कोई फाइल आगे नहीं बढ़ रही, चहेते लगातार प्रोन्नति पाते जा रहे हों और काम करने वालों का वेतन तक रोक दिया जा रहा हो? उन सरकारी अस्पतालों में जहां मरीज कुत्ते समझे जाते हों? उन निजी नर्सिंग होमों में जहां के डाक्टर फीस के दस-पांच रुपये कम होने से इलाज से ही इनकार कर देते हों?&lt;br /&gt;उफ् कहां है आजादी? बोलने की आजादी है? क्या कहीं भी कुछ भी बोला जा सकता है? अपने मन से काम करने की आजादी है? क्या आप अपनी योग्यता के अनुसार इस देश में काम ढूंढने और उस काम के लिए खुद को मुकर्रर करने को आजाद हैं? बच्चा जन्म लेता है, उसका नाम तक उसकी इच्छा के बगैर रखा जाता है। वह क्या करना चाहता है, यह कभी उससे नहीं पूछा जाता। स्कूल-कालेजों से सफर करता वह दफ्तरों-दुकानों तक पहुंच जाता है और हर जगह उस पर शासन करने वाले, उस पर नियंत्रण करने वालों की कतार खड़ी दिखती है, क्या यही है आजादी? नेतागीरी करने वाले तक क्या आजाद हैं? कोई मनमोहन, कोई जार्ज तक कठपुतलियों की तरह किसी सोनिया तो किसी नीतीश-शरद के इशारों पर नाचते दिखते हैं तो नेताओं के लिए भी क्या आजादी है?  देश आज स्वतंत्रता की ६२वीं सालगिरह मना रहा है। ऐसे मौके पर आजादी के अर्थ, सच्चे अर्थ को समझने की कोशिश का यह सिलसिला जो शुरू किया गया है, वह अभी जारी रहेगा। फिलहाल इतना ही। इस बीच सुझावों का स्वागत होगा। धन्यवाद।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-1376831020675593466?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/1376831020675593466/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=1376831020675593466&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1376831020675593466'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1376831020675593466'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='कहां है आजादी??'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-8723279275228839698</id><published>2009-07-26T04:54:00.000-07:00</published><updated>2009-07-26T05:02:18.095-07:00</updated><title type='text'>कारगिल शहीदों, हमें माफ करना</title><content type='html'>1999 में जब कारगिल की लड़ाई छिड़ी थी और द्रास-कारगिल में बर्फ की सफेद पट्टियां वीर जांबाजों के खून से लाल हो रही थीं, उस दौरान हमारे नेताओं के आम चुनाव के नफा-नुकसान के आकलन में मशगूल रहने को लेकर झारखंड के एक इंजीनियर कवि ओमप्रकाश वरनवाल ने जो मुक्तक लिखा था, वह आज भी मौजूं है। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;'चूडिय़ां, सिंदूर, आंचल, शव, उदासी और कफन, ढो रहे हैं शहर कब से बाअदब और बेसिकन, वह चुनावी लाभ-नुकसानों में ही मशगूल हैं, बर्फ के कागज पे जबकि फौज लिखती है वतन।’ &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;सिलसिला आज भी वही है। कारगिल फतह के दस वर्ष बीत गये। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटाते हुए पूरे कारगिल क्षेत्र पर तिरंगा लहराया था। इसके लिए देश ने कई शहीद खोये, कुछ उत्तर बिहार के भी थे। फतह के बाद शहीदों की स्मृति को बनाये रखने के लिए जो घोषणाएं की गयीं, उस पर ईमानदारी से आज तक अमल नहीं किया गया। शहीदों के गांव से गुजरने पर आपको एक भी ऐसा चिह्न नहीं मिलेगा, जिससे आप यह कह सकें कि यह शहीद का गांव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सपना ही है शहीद प्रमोद हाईस्कूल&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुजफ्फरपुर जिले में कुढऩी प्रखंड की माधोपुर-सुस्ता पंचायत के माधोपुर निवासी शहीद प्रमोद कुमार की शहादत के बाद श्रद्धा के फूल चढ़ाने आयीं तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने जो घोषणाएं कीं, उनमें से कई अभी पूरी नहीं हुई हैं। माधोपुर मध्य विद्यालय को उच्च विद्यालय में उत्क्रमित करने के साथ उसका नाम शहीद प्रमोद के नाम पर करने की घोषणा आज तक अमल में नहीं आ पायी। माधोपुर चौक तक जाने वाली सड़क का नाम शहीद प्रमोद पथ नहीं हो पाया। शहीद के परिजन खेती योग्य पांच एकड़ व शहरी क्षेत्र में साढ़े 12 डिसमिल जमीन से भी वंचित है। माधोपुर चौक पर शहीद की प्रतिमा भी नहीं लग सकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शहीद अरविंद के नाम स्मारक तक नहीं बना&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पू.चंपारण के रामगढ़वा प्रखंड क्षेत्र का भटिया गांव अब कारगिल शहीद अरविंद पांडेय के गांव के नाम से जाना जाता है। कारगिल में तैनात चंपारण का यह वीर सपूत कांस्टेबल अरविंद 29 मई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुआ। यहां लोगों को अरविंद के शहीद होने पर फक्र है, पर इस बात का मलाल भी है कि गांव के प्रवेश द्वार पर उसके नाम से स्मारक बनाने की घोषणा आज तक पूरी नहीं हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भुला दिये गये शहीद ले.अमित&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कारगिल में शहीद समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड के महमद्दा पंचायत के ले. अमित सिंह को सरकारी स्तर से भुला-सा दिया गया। इलाके में न तो सरकार द्वारा उनकी स्मृति में अब तक कोई सड़क का नामकरण किया गया है, न ही कोई उद्यान-विहार का निर्माण ही हो सका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रतिमा के लिए जगह तक नहीं&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दरभंगा में बेनीपुर अनुमंडल का हरिपुर गांव। यहां के दो सपूतों ने देश की रक्षा में अपनी कुर्बानी दी है। स्व. भोला झा के पुत्र सीआरपीएफ जवान महाकांत झा कारगिल युद्ध में तैनात हुए तो उनका पार्थिव शरीर ही लौटा। सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि तो की गयी, पर उनकी स्मृति को संजोने के लिए कुछ खास नहीं हो सका। गांव वालों को मलाल है कि उनके गांव के दो-दो सपूत देश के काम आये पर प्रशासन गांव की ओर रुख नहीं करता। परिजनों को मलाल है कि अन्य सुविधाएं तो दूर, प्रतिमा लगाने के लिए सरकार जमीन भी मुहैया नहीं करा सकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मिट रहीं शहीद की यादें&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;शिवहर में पुरनहिया प्रखंड का बखार चंडिहा इतिहास के पन्नों में भले कारगिल के अमर शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी के गांव के रूप में दर्ज हो चुका है, पर यहां ऐसा कोई निशान नहीं दिखता, जिससे आने वाली पीढ़ी अमर शहीद के गांव के रूप में इसकी पहचान कर सके। पत्नी वंदना द्विवेदी को मलाल है कि उनके पति को लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नति के बावजूद मेजर पद का ही लाभ मिला। शहीद का स्मारक कराह रहा है। तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने शहीद के गांव, सड़क, स्कूल, सामुदायिक भवन आदि का नाम शहीद के नाम पर किये जाने की घोषणा की थी, जो एक दशक बाद भी पूरा नहीं हो सकी है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इस हाल पर हम तो यही कह सकते हैं कि कारगिल शहीदों, हमें माफ करना। &lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-8723279275228839698?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/8723279275228839698/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=8723279275228839698&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8723279275228839698'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8723279275228839698'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/07/blog-post_26.html' title='कारगिल शहीदों, हमें माफ करना'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4453575552114965270</id><published>2009-07-23T09:47:00.000-07:00</published><updated>2009-07-23T09:52:51.613-07:00</updated><title type='text'>क्या इस बार फंसेंगे लालू?</title><content type='html'>लोकसभा चुनाव में हार के बाद से तो वैसे ही लालू प्रसाद की बोलती बंद थी और चुनाव के दौरान कांग्रेस पर फुंफकारने वाले शेर-ए-बिहार उस पार्टी के आगे म्याऊं-म्याऊं करते चल रहे थे। बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी ने रेल बजट के दौरान और उसके बाद भी कई दफे संसद से सड़क तक पर यह कहकर कि रेल मंत्रालय में लालू के कार्यकाल पर श्वेत पत्र लाया जायेगा, उनकी जुबान पर मानो दोहरा ताला जड़ दिया था। अब गुरुवार को यह खबर आयी कि बिहार की सत्ताधारी गठबंधन पार्टी के प्रमुख घटक जनता दल (यू) ने भी लालू को चौतरफा घेरने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी सांसद व बिहार जद (यू) के अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ललन ने रेलमंत्री ममता बनर्जी से मिलकर यह आरोप मजबूत की कि लालू के कार्यकाल में न सिर्फ भाई-भतीजावाद चरम पर था, बल्कि आर्थिक लाभ के लिए रेल मंत्रालय का दुरुपयोग किया गया। दरअसल, रेल बजट पर चर्चा के दौरान ममता ने यह भी अपील की थी कि भ्रष्टाचार के मामले उनके पास लाए जाएं। ललन ने इसी के तहत गर्म लोहे पर पहली चोट की है। ललन के मुताबिक सिर्फ गोरखपुर में गलत तरीके से 216 लोगों को नौकरी दी गयी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हाजीपुर, वाराणसी, मुंबई समेत अन्य स्थानों पर भी उन्हें नौकरी दी गई, जिनसे लालू प्रसाद या उनके संबंधियों ने लाभ उठाया। बिहार जद (यू) अध्यक्ष ने कथित तौर पर गलत ढंग से नौकरी पाने वालों की सूची भी ममता को सौंपी है। ललन के आरोपों को सही माना जाय तो लालू प्रसाद और उनके सहयोगी व पूर्व मंत्री प्रेमचंद गुप्ता ने जमीन अर्जित करने के लिए भी रेल मंत्रालय की संपत्ति का इस्तेमाल किया था। पटना के सुजाता होटल्स के मालिक से दो एकड़ जमीन उस कंपनी के नाम लिखायी गयी, जो प्रेमचंद गुप्ता की पत्नी की है। बदले में सुजाता होटल्स को रेलवे की दो महत्वपूर्ण संपत्तियां- बीएनआर होटल, रांची व पुरी लीज पर दे दी गयीं। ललन ने इसके साक्ष्य भी रेलमंत्री को सौंपे हैं। हालांिक, जद (यू) पहले प्रधानमंत्री से भी मिलकर यह शिकायत कर चुका है। प्रधानमंत्री ने शिकायतों को रेलवे के निगरानी विभाग के पास भेज दिया था।&lt;br /&gt;सवाल यह उठता है कि चारा घोटाले में बुरी तरह फंसे लालू तभी बचे चल रहे थे, जब दिल्ली पहुंचकर उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा था। कहने वाले तो कहते हैं कि उनकी मति मारी गयी थी, जो चुनाव के दौरान वे कांग्रेस के खिलाफ हो गये। उनके समर्थकों को भी उनकी चाल समझ में नहीं आयी थी। नतीजा सामने है। अब ऐसा लगता है कि लालू के खिलाफ कांग्रेस ने अपने सारे घोड़े खुले छोड़ दिये हैं। ममता का श्वेत पत्र लाना इसी कार्रवाई का अगला कदम माना जाता है। हालांकि, लालू पर कोई आंच आयी तो उसकी लपटों से कांग्रेस भी अछूती नहीं रह पायेगी, क्योंकि लालू कांग्रेस गठबंधन के ही मंत्री थे। पर, उनके खिलाफ अब फिर से जिस तरह मजबूत आरोपों का सिलसिला चल पड़ा है, उसे देखकर क्या यह कहा जा सकता है कि लालू इस बार फंस जायेंगे? राजनीति के इस माहिर खिलाड़ी की अगली चाल अब कौन सी होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4453575552114965270?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4453575552114965270/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4453575552114965270&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4453575552114965270'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4453575552114965270'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html' title='क्या इस बार फंसेंगे लालू?'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-6829646936679090428</id><published>2009-07-22T06:52:00.000-07:00</published><updated>2009-07-22T06:56:43.292-07:00</updated><title type='text'>ट्यूबवेल पानी न उगले, दोष किसका नीतीश जी?</title><content type='html'>प्रदेश में ट्यूबवेल लगे हों और वे पानी न उगलें तो इसमें दोष किसका है? प्रदेश सूखे की चपेट में हो और उससे निपटने के लिए ट्यूबवेलों से पानी खोजा जाय और ऐन मौके पर पता चले कि हाय, दो तिहाई ट्यूबवेल तो पानी उगलने की स्थिति में हैं ही नहीं, तो  इसमें दोष किसका है? आप पिछली सरकार पर भ्रष्टाचार की तोहमत लगाते हैं, आप केन्द्र सरकार पर उपेक्षा की तोहमत लगाते  हैं और आपने क्या किया? आपकी सरकार के भी तो चार साल से ऊपर हो चुके  हैं। इसके बावजूद इन ट्यूबवेलों की ऐसी हालत क्यों है? बात बिहार की कर रहा हूं और मुखातिब वहां के विकास पुरुष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी से हूं।&lt;br /&gt;नीतीश जी, बुधवार को विधानसभा में लघु जल संसाधन मंत्री दिनेश प्रसाद कुशवाहा ने सूखे से निपटने में कारगर यंत्र ट्यूबवेलों की जो तस्वीर पेश की, उससे आपकी सरकार की भी क्या लापरवाही उजागर नहीं होती है? कुशवाहा द्वारा पेश आंकड़ों को फिर से यहां रखना चाहूंगा। उनके मुताबिक सूबे के 5147 ट्यूबवेलों में से सिर्फ 1719 ही कार्यरत हैं। यानी सूबे में खेतों की प्यास बुझाने के लिए लगाये गये दो-तिहाई नलकूप ठप हैं, इसे सरकार ने भी मान लिया। जब सूखा गहरा गया, बिचड़े सूख गये, तब ट्यूबवेलों का हिसाब-किताब लिया जा रहा है, यह भी क्या कम त्रासद है? नीतीश जी, इन ट्यूबवेलों की जर्जरता आपकी सरकार के चौथे साल पूरे हो जाने के बाद भी बरकरार है। ऐसा क्यों है, सवाल यह है। कुशवाहा जी की तरह आप भी कह सकते हैं कि अधिकतर ट्यूबवेल 1955-56, 1964-65 और 1973-74 के बीच के लगे हैं। पर, क्या जनता इस जवाब को मान ले?&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, अब सूखे से निपटने के लिए आकस्मिक योजना बनाने और रोजाना अनुश्रवण होने का दावा किया जा रहा है। मंत्री ने ही बताया कि मौसम के मिजाज को देखते हुए सरकार 1119 ट्यूबवेलों को चालू करने की योजना पर काम कर रही है। सौ को चालू बताया गया, जबकि सौ के पुनर्स्थापन का काम प्रगति पर होने का दावा किया गया। 919 के लिए सरकार ने नाबार्ड से मदद मांगी है। विद्युत दोष से बंद ट्यूबवेलों को चालू करने के लिए प्रत्येक दिन मुख्य सचिव, विभागीय सचिव और विद्युत बोर्ड के चेयरमैन की बैठक होने का दावा किया गया। मोटर जलने पर उसे तत्काल बदल दिया जाय, इसके लिए हर जिले में पांच-पांच अतिरिक्त मोटर का इंतजाम किया गया है। जहां नाली खराब हो गयी है, उसे दुरुस्त करने के लिए हर ट्यूबवेल को 20-20 हजार रुपये दिये जाने की बात कही गयी है।&lt;br /&gt;सवाल यह उठता है मुख्यमंत्री जी कि ट्यूबवेलों की खोजबीन और प्रयास को लेकर यह सरकारी मशक्कत जुलाई के तीसरे हफ्ते (खत्म होते श्रावण महीने) में क्यों हो रही है? किसानों के अस्सी फीसदी बिचड़े जल चुके हैं। धान की आच्छादन दर सिमट चुकी है। एक तो रोपनी के लिए बिचड़े नहीं दिखते, दूसरे जिन्होंने लेट बिचड़े गिराये, वे भी निराशा की स्थिति में पहुंच चुके हैं। ऐसे में यह सरकारी प्रयास किसानों को कितना लाभ पहुंचा पायेगा, सवाल यह है? कुल मिलाकर इस बार की खरीफ फसल तो मारी ही गयी न? आसमान छूती महंगाई और बढ़ती गरीबी के बीच खरीफ फसलों का मारा जाना प्रदेश में कितनी बड़ी वाही-तबाही का कारण बनेगा, सवाल यह भी है? इस पर भी अभी से ही विचार करने की जरूरत है। सवाल यह है कि आने वाली तबाही पर कब विचार होगा? क्या तब, जब तबाही आकर गुजर जायेगी? ट्यूबवेलों की जर्जरता पर हो रहे विचार की तरह? ध्यान देने की बात यह भी है नीतीश जी कि तब तक प्रदेश में विधान सभा चुनाव भी आ जायेगा और लोग भी हिसाब-किताब में जुट जायेंगे। आपके चिर प्रतिद्वंद्वी लालू जी और रामविलास जी भी गलबहिया कर अब बिहार में ही मटरगश्ती कर रहे हैं, ख्याल इसका भी कीजिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-6829646936679090428?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/6829646936679090428/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=6829646936679090428&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6829646936679090428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6829646936679090428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/07/blog-post_22.html' title='ट्यूबवेल पानी न उगले, दोष किसका नीतीश जी?'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-1578249090045300394</id><published>2009-07-03T08:34:00.000-07:00</published><updated>2009-07-03T08:37:55.286-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रेल बजट'/><title type='text'>ममता दी, आतंकी मामलों पर बजट चुप क्यों?</title><content type='html'>शुक्रवार को संसद में रेल बजट पेश करते रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे में एकीकृत सुरक्षा प्रणाली और महिला कमांडों की संख्या बढ़ाने पर बल तो दिया, पर मुंबई जैसे आतंकी हमलों से रेल यात्रियों को बचाने का तंत्र कैसा होगा, इस पर उन्होंने कुछ नहीं कहा, जबकि रेल यात्रियों को आतंकियों से बचाना भारत में आज एक बड़ी चुनौती बन गयी है। तीन साल पहले मुंबई ट्रेन में हुए धमाके और समझौता एक्सप्रेस कांड के बाद रेलवे स्टेशनों व ट्रेनों की सुरक्षा की कवायद शुरू हुई थी। पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई हमले के दौरान उस पूरी कवायद की पोल खुल चुकी है। तब से लेकर अब तक बातें तो बहुत हुईं, लेकिन रेलवे ठोस कुछ नहीं कर सका। इस बार ममता दीदी से बड़ी उम्मीद थी, पर वे तो इस ओर से कन्नी ही काट गयीं।&lt;br /&gt;ममता दीदी को याद दिलाना चाहूंगा कि देश के छोटे-छोटे जंक्शनों की तो बात दूर, मेट्रोपोलिटन शहरों नयी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता तक के रेलवे स्टेशनों पर बिना टिकट घुसना आम है और इस पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सका है। यहां तक कि बड़े रेलवे स्टेशनों की चारों तरफ पुख्ता चहारदीवारी तक नहीं बनायी जा सकी है। इतना ही नहीं, सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम के तहत बड़े रेलवे स्टेशनों के सभी प्रवेश द्वारों पर स्कैनर लगाने थे, जो नहीं लगाये जा सके हैं। उम्मीद थी कि सुरक्षा के इन छोटे-छोटे बिंदुओं पर ग्रास रूट से राजनीति के शिखर पर पहुंचने वाली ममता दीदी का ध्यान जाता और इसके लिए रेल बजट में प्रावधान किया जाता, पर ऐसा नहीं हो सका। सुरक्षा के इन छोटे-छोटे, पर महत्वपूर्ण कदमों के बारे में रेलवे बजट पूरी तरह चुप है। इन सभी खामियों के बावजूद ममता दीदी ने बजट भाषण में यात्रियों को रेल से लेकर स्टेशन और उसके बाहर तक की सुरक्षा का दावा किया है। यह सुरक्षा कैसे होगी और इसके लिए धन कहां से आयेंगे, इसका शुक्रवार को संसद में पेश बजट कोई जवाब नहीं दे पाता। फिलहाल, इस मुद्दे को एक सवाल के रूप में ममता दीदी के समक्ष तो रखा ही जा सकता है कि आखिर आतंकी मामलों पर रेल बजट चुप क्यों है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-1578249090045300394?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/1578249090045300394/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=1578249090045300394&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1578249090045300394'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1578249090045300394'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='ममता दी, आतंकी मामलों पर बजट चुप क्यों?'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-2211553124053113842</id><published>2009-05-19T07:06:00.001-07:00</published><updated>2009-05-19T07:15:15.049-07:00</updated><title type='text'>सब कुछ गंवा के होश में आये तो क्या हुआ</title><content type='html'>बदली परिस्थितियों में लालू-रामविलास के जो सुर बदले हैं और जिस तरह से बिना मांगे केन्द्र में कांग्रेस को समर्थन देने का उन्होंने जो राग अलापना शुरू कर दिया है, उसको देखकर तो यही कहा जा सकता है- सबकुछ गंवाकर होश में आये तो क्या हुआ। वैसे बिहार के आम नागरिक की भी यही आवाज है। वह सोलह मई का दिन था। शाम होने से काफी पहले लालू-रामविलास को पता चल गया था कि उनकी बहुचर्चित गलबहियां व मतलबी कंपनी को बिहार के लोगों ने खारिज कर दिया और एक तरह से सूपड़ा साफ कर दिया है तो पलक झपकते उनकी जुबां पर सदा चढ़ी रहने वाली तुर्शी गायब हो गयी। सन्नाटा मच गया। अब क्या का गहराता सवाल उन्हें न तो कुछ सोचने दे रहा है, न बोलने दे रहा है? निगाहें लाचार और जुबां बेबस हो चुकी है। आव देखा न ताव, लगे बोलने- कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ना भूल थी।&lt;br /&gt;सवाल यह नहीं है कि उन्होंने क्या किया और उनके किये का उन्हें जो फल मिला वह अच्छा हुआ या खराब?  बल्कि, सवाल दूसरा पैदा हो गया है। यह उनके बदले सुर से भी प्रतिध्वनित हो रहा है। लालू कहा करते थे कि हम मूंज के झूर (ऐसी झाड़ी, जिसके पत्ते धारदार होते हैं) हैं, जो हमें उखाड़ने आयेगा उसका गत्तर-गत्तर (अंग-अंग) कटा (कट) जायेगा। उसी दौरान बाद में नीतीश बोलते नजर आये थे कि हम इस मूंज को काटने या उखाड़ने नहीं जायेंगे, बल्कि इसकी जड़ में मट्ठा झोंक देंगे और पूरे झूर को जला देंगे। गुजरते समय के साथ जब राजनीति बदली और सूबे की सत्ता बदली तो जिस तरह से नीतीश ने विकास और दलित-महादलित कार्ड पर काम करना शुरू किया और अबकी जो चुनाव परिणाम आये, उससे तो यही लगता है कि मूंज के झूर में मट्ठा झोंका जा चुका है।&lt;br /&gt;जब मतलबी गलबहियां ने कांग्रेस को दुलत्ती मारी तो कांग्रेस ने भी हौसला बुलंद करते लड़ाई के लिए ताल ठोंक दी। वोटरों को विकल्प मिला और इसी दौरान मुस्लिम जनाधार पाला बदलता दिखा। गलबहियां गठबंधन के सिरमौर  लालू ने आनन-फानन में बयान का मटका फोड़ा कि बाबरी मस्जिद के ढहाने में कांग्रेस का ही हाथ था। मगर, यह भी काम न आया। जो जनाधार दरक चुका था, वह दोबारा पाले में नहीं आया। काका हाथरसी की कविता याद आती है- जो उड़ गयी जवानी, उसको बुलायें कैसे, जो जुड़ गया बुढ़ापा उसको छुड़ायें कैसे ....? सवाल यह हो गया है कि २००५ के विधानसभा चुनाव से जनाधार टूटने का जो सिलसिला शुरू हुआ और जो इस बार २००९ के आम चुनाव में परवान पकड़ गया, उसे आने वाले दिनों में कैसे काबू किया जा सकेगा? क्या यह संभव हो पायेगा, वह भी तब, जब देश में मजबूत इरादे करवट ले चुके हों, अपराधी तत्व सिरे से खारिज किये जा चुके हों और नये तेवर में सरकार बनाने का कांग्रेसी मिजाज जगजाहिर हो चुका हो? &lt;br /&gt;रामविलास २००५ के विधानसभा चुनाव में पूरे सूबे में लालू विरोध में मोर्चा खोले हुए थे। कहते चल रहे थे कि जहर खा लूंगा, मगर लालू का साथ नहीं दूंगा। मगर, वे आम चुनाव में लालू के कसीदे काढ़ने लगे, उनकी मोहब्बत के तराने गाने लगे। यानी जो भीतर था, वह खुलकर दिखाने लगे। समझा था, भोले-भाले लोगों का क्या है, जो बोलूंगा, मानेंगे। अब लोगों को क्या कीजिएगा? जो कभी रिकार्ड वोटों से जीता कर भेजते थे, उसी ने मुंह की पलटी खिला दी। सूपड़ा साफ। सूबे में लोजपा को एक भी सीट नहीं। अब कांग्रेस को क्या बार्गेन कर पाइएगा, चार के कुनबे में सिमटे लालू ही बात सुन लें तो बड़ी बात होगी। उस पर से हद यह कि रामविलास जी कांग्रेस, यूपीए के साथ-साथ लालू चालीसा का भी अब तक पाठ दोहरा रहे हैं। अभी उनके इस बयान पर कि अगला चुनाव भी राजद के साथ ही लड़ेंगे, चारों ओर हास्य का ही माहौल बना हुआ है। कई लोगों ने मजाक में ही यह कहना शुरू कर दिया है कि यह बयान देने से पहले लालू से पूछा था क्या? लालू आपके साथ लड़ेंगे तब न?&lt;br /&gt;दरअसल, केन्द्र में सरकार बनाने का दावा करने वालों की कलई खुल चुकी है, रंग उतर चुका है। कैबिनेट की बैठक में भी जाने की हिम्मत गंवा बैठे ये बड़बोले और हमेशा मतलब साधने वाले राजनेता अब बोलते चल रहे हैं कि बेइज्जती हो रही है। आखिर आपने किसकी इज्जत की, जिससे प्रत्युत्तर में उससे इज्जत पाने की बात कर रहे हैं। अपने अंजाम तक तो देखने की आप हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं और कर रहे हैं इज्जत की बात। अंजाम क्या है? बिहार के एक आम नागरिक की बात सुनिये, वह कहता है- बस, हो गया। सूबे से लालू-रामविलास की राजनीति अब खत्म। पूछा-क्यों, कैसे? नागरिक का कहना था - युवा वोटरों वाले देश में, विकास की लहर वाले प्रदेश में क्या है इनके पास बोलने लायक जो आगे बोलेंगे, क्या है इनके पास करने लायक, जो आगे करेंगे? जिस भूल की वे बात कर रहे हैं, वह भूल बुरा अंजाम  प्राप्त करने के बाद समझ में आ रही है? नागरिक का साफ-साफ कहना था- सब कुछ गंवा कर होश में आये तो क्या हुआ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-2211553124053113842?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/2211553124053113842/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=2211553124053113842&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2211553124053113842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2211553124053113842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/05/blog-post_19.html' title='सब कुछ गंवा के होश में आये तो क्या हुआ'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7788084085298010231</id><published>2009-05-07T07:16:00.000-07:00</published><updated>2009-05-07T07:23:56.391-07:00</updated><title type='text'>राहुल का बयान, सन्नाटे में लालू</title><content type='html'>सच मानिये, राहुल गांधी ने पांच मई को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशंसा कर अपने बोलक्कड़ और मजाकिया लालू प्रसाद तक को भी सन्नाटे में डाल दिया। जब पत्रकारों ने उनसे इस मसले पर बात करनी चाही तो इसका वे स्वाभाविक रूप से जवाब भी नहीं दे पाये। रामविलास पासवान का भी कुछ ऐसा ही हाल था। दोनों ने बच-बचाकर बयान दिया और निकल गये। इस बयान पर कुछ भी बोलना राहुल के खिलाफ बोलना होता और यह कांग्रेस पर सीधा हमला होता। सूबे में गलबहिया कर राजद और लोजपा जिस तरह कांग्रेस को बेटिकट कर उसके खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं,  वैसी हालत में अपने प्रतिद्वंद्वी का प्रहार इतने चुपके से झेल जाना लोगों को आश्चर्य में डाल रहा है। जिस प्रकार ये दोनों नेता राहुल के बयान के बाद सिटपिटाये दिखे, उससे तो यही लगता है कि वे लोगों को लाख झांसा दे लें, पर अभी कांग्रेस को वे अपनी जरूरत समझते हैं और इस मामले पर कुछ भी संभल कर ही बोलना-करना चाहते हैं। हालांकि, दोनों के सिटपिटाने का अर्थ भी अलग-अलग लगाया जा रहा है। लालू चारों ओर से घिरे दिख रहे हैं। पार्टी के साथ खुद की प्रतिष्ठा तो दांव पर लगी हुई है ही, दुश्मन यानी नीतीश के मजबूत होने का खतरा भी उन्हें साफ-साफ दिख रहा है। उधर, रामविलास पासवान के बारे में जो तीर-तुक्के लग रहे हैं, उसकी अनुगूंज भी परेशान करने वाली ही है। ये तीर-तुक्के सच निकले तो वे सिर्फ और सिर्फ लालू के लिए ही झटके की बात होगी। तीर-तुक्का कहता है कि सरकार किसी की बने, रामविलास तो मंत्री बनते ही हैं। इस बार स्थिति थोड़ी बिगड़ी है, पर राहुल के इस बयान पर भी उनका कुछ न बोलना यही बताता है कि वे स्थिति सुधारने में लग गये हैं। तो है न यह लालू को सन्नाटे में डालने की बात?&lt;br /&gt;राहुल का बयान था ही कुछ ऐसा कि अच्छे-अच्छे के सामने सन्नाटा खिंच गया।  उनकी बातों में चुनाव बाद सरकार के गठन की रणनीति के साफ संकेत दिख रहे थे। दरअसल कांग्रेस में इस वक्त राहुल गांधी की हैसियत काफी दिलचस्प और मजबूत समझी जा सकती है।  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पार्टी और रणनीति के मसले पर कोई खास दिलचस्पी नहीं लेते, न ही कोई टिप्पणी देते हैं, जबकि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी इस प्रकार का खुला बयान देने से सदा परहेज करती हैं। ऐसे में कांग्रेस में पीएम इन  वेटिंग समझे जाने वाले राहुल गांधी जब कुछ बोलते हैं तो उस बात का बड़ा मायने हो जाता है। अपने क्रियाकलापों से उन्होंने अब तक गंभीर छवि का प्रदर्शन किया है और इसी के मद्देनजर कोई गंभीर व्यक्ति उनके बयान को व्यक्तिगत और बचकाना समझने की गलती नहीं कर सकता।&lt;br /&gt;तो क्या यह साफ हो गया है कि चुनाव के बाद सरकार बनाने की नौबत आयी तो कांग्रेस के साथ जदयू होगा? जदयू होगा तो यह तो साफ है कि लालू नहीं होंगे। तो क्या कांग्रेस को जदयू की ओर से चुनाव बाद सरकार बनाने के लिए मदद का मजबूत आश्वासन मिल चुका है? हालांकि, नीतीश कुमार ने मजबूती से इसका खंडन किया है और जदयू-भाजपा गठबंधन को मजबूत बताया है, पर जानकार जानते हैं कि यह राजनैतिक चोंचले हैं, जो वक्त-वेवक्त बदल जाते हैं। ऐसे भी विकास और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आज भी कांग्रेस एकमात्र आम ग्राह्य पार्टी की छवि में है। इस पार्टी ने यह भी दिखाया है कि गठबंधन सरकार कैसे अपना कार्यकाल पूरा करती है। ऐसे में नीतीश के बयान के बाद भी यदि जदयू से कांग्रेस का तालमेल हुआ तो शायद ही किसी को आपत्ति हो। व्यक्तिगत रूप से अब तक मेरी जितने लोगों से बात हुई है, उनका यही कहना था कि जदयू को  कांग्रेस से तालमेल करना ही चाहिए। यह पार्टी हित के साथ-साथ देश औऱ सूबे के  हित में ही होगा।&lt;br /&gt;ऐसा माना जाता है कि राहुल गांधी के बयान के बाद जिस संभावना की तस्वीर बनती है, उसका स्वरूप वास्तव में अगर आकार पा गया और सही मायने में कांग्रेस की जदयू से तालमेल कर सरकार बनी तो यह बिहार की राजनीति करने वाले कम से कम लालू प्रसाद यादव के लिए बेचैनी की बात होगी। वह भी उस हालत में जब रामविलास जी के बारे में तीर-तुक्के लग रहे हों। दरअसल, लालू के लिए आगे का वक्त अकेले सफर वाला ही बन रहा है, क्योंकि भाजपा जैसी दूसरे नंबर की राष्ट्रीय पार्टी से इनके गठबंधन की दूर-दूर तक संभावना जो नहीं दिखती। तो सूबे में आगे की राजनीति काफी भारी होगी, लालू के लिए खतरा इसका हो गया है। ईश्वर न करें, ये चुनाव हारें, पर जीत भी गये तो बदली परिस्थितियों में वह उनके लिए बेमानी ही हो जायेगी। बिल्कुल निर्दलीय जैसी ही तो हालत होगी उनकी? तो जब इतनी बातें वातावरण में तैर रही हों तो कैसे न हों लालू बेचैन? क्यों न बदल जाये उनका स्वाभाविक अंदाज? क्यों न मचे सन्नाटा। वैसे मतदान का  चौथा चरण गुरुवार को सूबे में शांति से गुजरा, इसके लिए जनता के साथ-साथ अपने नेतागण भी बधाई के पात्र हैं, वर्ना तो हारने पर प्रलय मचने और मचाने तक की धमकी की अवधि अभी खत्म नहीं हुई है। द ग्रेट इंडियन तमाशा ऊर्फ महासंग्राम ऊर्फ आम चुनावपर चर्चा अभी जारी रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7788084085298010231?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7788084085298010231/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7788084085298010231&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7788084085298010231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7788084085298010231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/05/blog-post_07.html' title='राहुल का बयान, सन्नाटे में लालू'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7045862796426124365</id><published>2009-05-03T04:50:00.000-07:00</published><updated>2009-05-03T04:55:43.162-07:00</updated><title type='text'>लालू मचायेंगे प्रलय, उन पर कार्रवाई कौन करेगा?</title><content type='html'>लालू को सुनना सदा से ही दिलचस्प रहा है। ग्रेट इंडियन तमाशा ऊर्फ महासंग्राम ऊर्फ आम चुनाव में उनकी जुबां पर कुछ ज्यादा ही तुर्शी छायी है, मिजाज कुछ ज्यादा ही तड़क दिख रहा है।  लालू यानी चारा घोटाला के आरोप में जेल जाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, वर्तमान में केन्द्रीय रेलमंत्री, तथाकथित मैनेजमेंट गुरु, हंसोड़-मजाकिया, पल भर में दुश्मन को दोस्त और दोस्त को दुश्मन बनाने-बताने में माहिर। लालू यानी कभी समाजवाद को जिंदा करने वाले जेपी का साथ देने वाला एक बेजोड़ अनुनायी भी। लालू को याद होगा कि इन्हीं समाजवादियों के प्रयास व एकजुटता से कभी देश की दुर्गा कही जाने वाली इंदिरा गांधी तक को चुनाव हार जाना पड़ा था।  तब तो इंदिरा जी ने प्रलय मचाने की घोषणा नहीं की थी। लोकतंत्र में प्रत्याशियों के वश में परचा दाखिल करना और चुनाव लड़ना ही तो होता है। परिणाम तो जनता देती है। पब्लिक ने फैसला किया और इंदिरा ने हार को स्वीकार किया। और इंदिरा जी ही क्यों, बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं, पर कभी प्रलय आ जाने या मचा देने का ऐलान नहीं करते। मगर, लालू कर सकते हैं। अभी शनिवार को ही उन्होंने ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि यदि वे सारण या पटना से चुनाव हार गये तो प्रलय आ जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू को सुनना जिन्हें दिलचस्प लगता होगा, उन्हें तो वाकई मजा आया होगा। हंसी फूटी होगी कि वाह, लालू ने क्या बोला है इस बार। मगर, लालू हंसी खेल में ही बड़ी-बड़ी बातें बोल जाते हैं, इसे सभी जानते हैं। चारा घोटाला के दौरान जब उन्होंने कहा था कि वे जेल गये तो वहीं से बिहार की सत्ता संभालेंगे तो लोगों ने हंसा था, मजाक उड़ाया था। मगर, उनके जेल जाते ही राबड़ी देवी जैसे ही गद्दी पर बैठीं, लोगों को लालू की बातों की गंभीरता समझ में आ गयी। अब लालू ने कहा है कि वे चुनाव हारे तो प्रलय आ जायेगा तो इसका भी बड़ा मतलब है। लोग भले हंस लें, पर इसका मतलब तो निकलेगा जरूर। क्या निकलेगा, यह उनके चुनाव हारने के बाद ही पता चल पायेगा। लोकतंत्र के मसीहा कहे जाने वाले लोग इससे पहले उनकी बातों का मतलब निकाल लें तो और बात होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली बात। अभी थोड़े दिनों पहले इसी ग्रेट इंडियन तमाशे के दौरान वरुण गांधी ने कुछ उल-जुलूल बक दिया था और वह न केवल जेल चले गये, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन पर रासुका तक लगा दिया। यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन था। अब लालू जो बोल रहे हैं, उसे आयोग किस तरह ले रहा है? क्या यह आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? वे इस बार के चुनाव में दो जगहों से मैदान में हैं। सारण में मतदान हो चुका है, जबकि पटना में चौथे चरण में मतदान होना है। सारण में मतदान समाप्त होने के बाद से ही यह चर्चा आम है कि लालू हारेंगे। चर्चा निश्चित रूप से लालू के पास भी पहुंची होगी। उन्होंने भी आकलन किया होगा। अब उनका घबराना यही बता रहा है कि उन्हें भी अपनी हार का अहसास हो रहा है। तो पटना सीट बचाने की मशक्कत अब उनके लिए वक्त की जरूरत बन गयी है। बताया जाता है कि पटना से भी लालू को तगड़ी टक्कर मिल रही है। ऐसे में ही उनका बयान आया है कि वे हारे तो प्रलय मच जायेगा। यह सरासर धमकी है। पर, वे धमकी किसे दे रहे हैं, यह समझने की जरूरत है। समझने की जरूरत यह भी है कि वे यह धमकी दे कैसे पा रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों को याद होगा, एक केजे राव ने ठान लिया तो बिहार के चुनावों में चूं-चटाक तक नहीं हुआ था। पत्ता तक नहीं खड़का था। लालू को याद होगा कि एक यूएन विश्वास ने ठान लिया था तो चारा घोटाला की सारी परतें अपने आप खुलती चली गयी थीं और यही लालू जेल पहुंच गये थे। एक भरे-पूरे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक लालू पूरे सिस्टम को चैलेंज नहीं कर सकते। समाज को धमकी नहीं दे सकते। लालू भले कहते रहें कि उनके हारने से प्रलय आ जायेगा, मगर वे मान लें कि कोई प्रलय नहीं आयेगा। समाज जब जागता है तो अच्छे-अच्छों को किनारे लगा देता है। लेकिन, यह तो बाद की बात है। ताजा मसला यह है कि जब देश के बड़े-बड़े दिग्गज आचार संहिता की मार से थर्राये चल रहे हैं, शब्दों और बातों तक से किनाराकशी किये घूम रहे हैं, वैसे में लालू की जुबां आग पर आग कैसे उगल पा रही है? उनके मन जो आ रहा है, बोले जा रहे हैं और खूब बोल रहे हैं। प्रलय की घोषणा के दौरान ही उन्होंने सुशील मोदी और नरेन्द्र मोदी को एक दूसरे का साढ़ू कहा। सवाल यह है कि उनकी इस जुबां पर कौन लगायेगा लगाम? कौन?? चुनाव आयोग उन्हें जेल पहुंचायेगा या प्रदेश सरकार उन पर रासुका लगायेगी?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7045862796426124365?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7045862796426124365/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7045862796426124365&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7045862796426124365'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7045862796426124365'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='लालू मचायेंगे प्रलय, उन पर कार्रवाई कौन करेगा?'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-2255982542310647457</id><published>2009-04-29T00:25:00.001-07:00</published><updated>2009-04-29T00:38:13.640-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bihar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार'/><title type='text'>जार्ज, शरद और मुजफ्फरपुर</title><content type='html'>यह राजनीति का वीभत्स चेहरा है जो इस बार के चुनाव में मुजफ्फरपुर संसदीय क्षेत्र में नजर आया है। उफ, इतना कुरूप, इतना कुत्सित! जदयू के गठन से लेकर हाल तक महान समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडीस पार्टी के गार्जियन समझे जाते थे। अभी कुछ महीनों पहले राजगीर में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में इस पार्टी के हालिया कर्ता-धर्ता व पुरोधा बने तथा  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरेआम कहा था कि जार्ज जहां से चाहेंगे, टिकट दिया जायेगा। उन्होंने उन्हें खास तौर से मुजफ्फरपुर से टिकट  देने का न केवल एलान किया था, बल्कि तब तक अभिभावक तुल्य रहे जार्ज से इसका वादा भी किया था। पर, देखते ही देखते राजनीति पलटी खा गयी। पार्टी पुराधाओं के लिए जार्ज बीमार हो गये। बीमार भी ऐसे कि लोकसभा के चुनाव के लिए तो नक्कारा बताये गये, पर राज्यसभा के लिए दरवाजा खोलकर रखा गया। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने उन्हें इस बाबत एक पत्र लिखा। मसौदा था- शरद यादव जार्ज के गिरते स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे और नहीं चाहते थे कि चुनाव लड़कर और प्रचार की जहमत में फंसकर उनकी सेहत और गिरे। हां, इसी पत्र में उन्होंने जार्ज को सीट खाली होने पर बिहार से राज्यसभा का सांसद बनाने का आश्वासन भी दे डाला था। मगर, वाह रे जार्ज।जिस दिन शरद ने उन्हें चिट्ठी लिखी, उसी रोज उन्होंने पलटकर जवाब भेज डाला। इरादा साफ था- समाजवादी हूं, राज्यसभा में बैठना कबूल नहीं और सेहत खराब तो फिर राज्य सभा से भी भेजे जाने का प्रस्ताव क्यों? जार्ज नहीं माने। नतीजा- मुजफ्फरपुर से वे निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। परिणाम अभी आना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह नहीं है कि जार्ज मुजफ्फरपुर से जीतेंगे या हारेंगे। जीते तो जीत उनके लिए कोई नई नहीं होगी। कोई क्रांति नहीं होगी, कोई नयी पार्टी नहीं बनेगी, बस वे फिर सांसद बन जायेंगे। हारे तो उनके लंबे जीवन सफर में बस एक लाइन जुड़ जायेगी कि जार्ज जिंदगी की आखिरी पारी में चुनाव हार गये। पर, इसी के साथ गाथा बन जायेगी शरद की चिट्ठी के जवाब में पलटकर उनका चिट्ठी लिखना, सारी आशंकाओं को दरकिनार कर हिम्मत और जोश के साथ आखिरी लड़ाई में भी उतरना, पर्चा भरना, रोड शो करना, लोगों से मिलना, अपनी बातों को मजबूती से रखना आदि...। सवाल यह भी नहीं है कि जदयू के अभिभावक को पार्टी अध्यक्ष ने क्यों नहीं समझा चुनाव लड़ने के काबिल? राजनीति है चलता है। पर, यह राजनीति की किसने है, मैं यहां उसकी चर्चा करना चाहता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो जो चर्चाएं हैं, उसके मुताबिक सारा खेल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दरो-दरवाजों और कांग्रेस के मुहानों से खेला जा रहा है, जिसके पीछे दांव पर है चुनाव के बाद सरकार के गठन की रणनीति और जिसकी बिसात से लालू-रामविलास को गायब करने के बदले जार्ज से पल्ला झाड़ने की है नीति। पर, राजनीति के इस खेल के परवाने पर जिस व्यक्ति ने हस्ताक्षर किये हैं, उनका नाम है शरद यादव। इतिहास उन्हें याद रखेगा। क्योंकि, इतिहास को यह याद है कि वही शरद यादव कभी इंजीनियरिंग का मेधावी छात्र हुआ करते थे और कभी इनके समाजवादी विचारधारा से खुश होकर ही जार्ज ने उन्हें टिकट दिया था। यह २७ वर्षीय शरद का पहला राजनैतिक सफर था, जिसे जार्ज के  आशीर्वाद से आगे चलने-बढ़ने और मुकाम पाने का रास्ता मिला था। उस एक आशीर्वाद से शरद की जो राजनैतिक यात्रा शुरू हुई , वह आज तक चल रही है, चलती जा रही है। तब जार्ज समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे। और यह वही शरद हैं, जो बाहैसियत जदयू अध्यक्ष जार्ज का आखिरी टिकट काट चुके हैं। दिनकर ने कुरुक्षेत्र में कहा था- पूजनीय को पूज्य समझने में जो बाधा क्रम है, यही मनुज का अहंकार है, यही मनुज का भ्रम है। मेरा मानना है, यही राजनीति का वीभत्स चेहरा भी है। है कि नहीं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-2255982542310647457?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/2255982542310647457/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=2255982542310647457&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2255982542310647457'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2255982542310647457'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/04/blog-post_29.html' title='जार्ज, शरद और मुजफ्फरपुर'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-409765552920547643</id><published>2009-04-07T07:07:00.000-07:00</published><updated>2009-04-07T07:10:33.353-07:00</updated><title type='text'>कार्ड पर ट्रंप तो बौखलाहट बढ़ी</title><content type='html'>यह ग्रेट इंडियन तमाशे का ऐसा परिस्कृत और संशोधित बिहारी रूप है , जिसमें दुश्मन को दुश्मन की चाल से ही मात देने की तैयारी पूरी हो गयी है और अपने-अपने फन में माहिर फनकारों के भी छक्के छूटे हुए हैं। बौखलाहट में गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप, यहां तक कि उलटबासी बयानबाजियों के साथ केस दर्ज होने, जेल जाने और जमानत लेने का दौर तक शुरू हो चुका है। बातों की शुरुआत बिहार से और गलबहियां डाले घूम रहे राजद सुप्रीमो लालूप्रसाद यादव व लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान बनाम कांग्रेस से की जाय। टिकट बंटवारे के वक्त ही लालू-रामविलास के मतलबी गठबंधन ने बिहार की चालीस सीटों में सैंतीस खुद रख ली और कांग्रेस के लिए तीन सीटें छोड़ दीं। इस पैंतरे के जवाब में अगले ही दिन कांगेस ने फुफकारते हुए सभी सीटों पर लड़ने की घोषणा करते हुए लालू-रामविलास गठबंधन के लिए तीन सीटें छोड़ीं तो इस दांव को गठबंधन ने मजाक समझा और मुस्कुराते हुए बातों को हंसी में उड़ा डाला। अब जबकि द्वितीय चरण के चुनाव के लिए नामांकन कंपलीट है और अन्य चरणों के लिए भी उम्मीदवारों के लिए तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है तो गठबंधन पूरी तरह सकते में है। क्यों?  दरअसल लालू-रामविलास को कांग्रेस ने उन्हीं की तर्ज पर जवाब देने की तैयारी में समर सजा दिया। तीन-सैतीस का मुकाबला वैसे तो अब चालीस-चालीस पर पहुंच चुका है पर मतलबी गठबंधन की जो सबसे बड़ी चिंता है, वह कांग्रेस का अपने पुराने चोले को उतार कर उसी रंग को अख्तियार कर लेने को लेकर है, जिस रंग में लालू-रामविलास खुद को रंगे बताते हैं। यानी कार्ड पर कार्ड और ट्रंप पर ट्रंप। लालू के साले साधु यादव ने जब परिवार से बगावत की तो कांग्रेस ने उन्हें शरण दे दी। अब उन्हें पश्चिमी चंपारण से टिकट देकर कांग्रेस ने सूबे के यादवों पर बड़े सलीके से डोरे डाल दिये हैं। इतना ही नहीं, यादव उम्मीदवारों को टिकट देने में कांग्रेस इस गठबंधन से आगे ही निकलती दिख रही है। उधर, राजद के माय (मुसलमान-यादव)  के दूसरे टार्गेट मुसलमान भी कांग्रेस में तरजीह पा चुके हैं और उनके बीच अब तो प्रधानमंत्री  कौन पर विचार चलने लगा है। मतलबी गठबंधन का अगला टार्गेट पिछड़ी जाति के लोग और सवर्ण दोनों हैं, जबकि शुरू से कांग्रेस का वोट बैंक रही इन दोनों जातियों में कांग्रेस के सूबे में खड़ा हो जाने से एक नयी आस जग गयी है। द्वितीय चरण में उत्तर बिहार की जिन बारह सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पूर्ण हुई है, उसका आकलन करने से इसी तस्वीर का पता चलता है। वफापरस्ती के बदले जफापरस्ती का तर्जुमा कुछ यूं है कि लालू-रामविलास-नीतीश के बागी जिन्होंने भी दरवाजा खटखटाया, उन्हें कांग्रेस में टिकट मिला। साधु यादव, रमई राम, गिरधारी यादव, हिंदकेशरी यादव, लवली आनंद ऐसे ही कुछ नाम हैं। अब बौखलाहट देखिए। लालू की धर्मपत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने सारण में एक सभा को संबोधित करते हुए विकास मैन नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह को एक-दूसरे का साला-बहनोई कह डाला। नीतीश बौखलाये और एलान किया कि ऐसी गुंडागर्दी नहीं चलेगी। केस दर्ज हुआ और इस मामले की सीडी चुनाव आयुक्त   दिल्ली ले गये। इस मामले का अभी एक ही दिन गुजरा कि पत्नी से एक कदम आगे बढ़ते हुए लालू जी ने पूर्णिया में एक सभा को संबोधित करते हुए यह कह डाला कि यदि वे गृह मंत्री होते तो वरुण गांधी को बुलडोजर से कुचलवा देते। यह भाषण कुछ वरुण गांधी के भड़काऊ भाषण जैसा ही तो था। अंजाम , लालू का गिरफ्तारी वारंट निकल चुका है। यानी ग्रेट इंडियन तमाशा बिहार में रवानी पकड़ चुका है। लोग आशंकित है। रवानी से नहीं, रवानी के रक्तरंजित हो जाने से, जिसके लिए बिहार कुख्यात रहा है औऱ जिस पर एक बड़े संकल्प और मशक्कत के साथ काबू पाने का सफलतम प्रयास चल रहा है। फिलहाल इतना ही। आम चुनाव को लेकर चर्चा जारी रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-409765552920547643?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/409765552920547643/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=409765552920547643&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/409765552920547643'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/409765552920547643'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/04/blog-post_07.html' title='कार्ड पर ट्रंप तो बौखलाहट बढ़ी'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4488476617135510988</id><published>2009-04-05T00:40:00.000-07:00</published><updated>2009-04-05T01:16:34.977-07:00</updated><title type='text'>मौका है तो मौके को समझना ही पड़ेगा</title><content type='html'>&lt;p&gt;लोकतंत्र जीवित रहे, सही और सच्चे रास्ते पर चलता रहे, एक सच्चा देशवासी यही तो चाहेगा। ऐसा नहीं होने पर, या इस बाबत कुछ नहीं कर पाने पर आदमी के अंदर जो होता है, उसकी तस्वीर यहां आदरणीय पुरुषोत्तम जी की टिप्पणियों से साफ होती है। लोकतंत्र के महापर्व को लेकर बजते बिगुल के बीच सीन गंभीर, समझने की जरूरत पर बल देते हुए जो इशारा किया गया था, उसे पढ़ने के बाद उन्होंने जो जिज्ञासा प्रकट की है, उसे हूबहू यहां पेश किया जा रहा है। उनकी बातों में जो सवाल छिपे हैं, वह गंभीर सीन को समझने की ओर ही मजबूत इशारा कर रहे हैं। पुरुषोत्तम जी ने जो लिखा - &lt;/p&gt;&lt;p&gt;"शुक्ला जी, सवाल यह भी है कि नेताओं की अवसरवादिता अब कोई मुद्दा है क्या? मुझे तो लगता है कि नेता होने की पहली शतॆ ही है अवसरवादी होना? ऐसे में अवसरवादिता की बात की जाए तो केवल लालू-पासवान ही क्यों? अवसरवादिता पूरे समाज में अपने दमखम के साथ मौजूद है। हम-आप अपने अगले कदम से पहले नफा-नुकसान का आकलन नहीं करते क्या? हां, इससे सहमत हुआ जा सकता है कि नेताओं की अवसरवादिता से नुकसान पूरे समाज और देश को होता है, इसलिए इनकी अवसरवादिता पर टिप्पणी और चरचा करने के अधिकारी आप हैं। बात फिर वहीं आती है कि लालू-पासवान ही क्यों? यह सवाल तो कांग्रेस-भाजपा से लेकर तमाम छोटे-बड़े दलों के लिए है। कभी माया की सरकार को समथॆन देने वाली भाजपा आज उसे जी भर कर कोस रही है तो आप उसे क्या कहेंगे। पासवान के समथॆन से चल रही सरकार की अगुवाई कर रही कांग्रेस रामविलास के खिलाफ उम्मीदवार खड़ाकर उन्हें कोसती है तो इसे अवसरवादिता की बजाय आज की राजनीति की जरूरत ही क्यों न मान लें। और फिर सब तो यही कर रहे हैं। ममता, जयललिता, फारूक, चंद्रबाबू, नवीन पटनायक कल तक भाजपा के साथ थे, अब नहीं है। नीति और सिद्धांतों का ढिंढोरा पीटने वाले वामपंथी अब कांग्रेस पर तमाम तोहमतें लगाते हैं तो क्या यह भरोसा होता है कि ये कभी सरकार के साथी थे? सीधे-सीधे यही कहा जाए तो भी क्या बुरा है कि वैसे राजनेता और दल तो खोजने पर ही मिलेंगे जो वक्त और जरूरत के मुताबिक साथी न बदल रहे हों। वरना, वाकई यह कौन सोचता था कि लालू-मुलायम-पासवान एक साथ खड़े नजर आएंगे।"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब सवाल यह है कि अर्थ तंत्र की आग में हर दिन भस्म होते जा रहे या भस्म किये जा रहे मूल्यों और अवधारणाओं के बीच देश की आम व भोली-भाली जनता क्या करे? चुनाव का मौका है, चुनना तो पड़ेगा। लेकिन, चुनाव समझदारी से किया जाय, जरूरत इसकी है। पांच साल के बाद मौका आया है तो इस मौके को समझना ही पड़ेगा। और मौके को समझने के लिए आपके पास होने चाहिए सिर्फ दस रुपये। कोई इतना तो कर सकता है कि उसके सामने जो पहलवान ताल ठोंक रहे हैं, उसे ठोंक बजा लिया जाय। उनमें से किसी का चयन करने से पहले उनके बारे में सबकुछ पता कर लिया जाय। सरकारी सुविधाओं के अनुसार अब आम जनता के पास सूचना का यह अधिकार है कि वह अपने जिले के चुनाव अधिकारी के पास दस रुपये का ड्राफ्ट जमा कर अपने प्रत्याशी के बारे में वह संपूर्ण जानकारी हासिल कर सकता है, जो हलफनामे में पेश किया गया है। इतना तो कोई भी मानेगा कि जान-समझ कर किये गये काम में गल्तियों की संभावना कम रहती है या फिर कम से कम यह मलाल तो नहीं होता कि जो मौका था, उसकी नजाकत को नहीं समझ पाये। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव को लेकर अभी चर्चा जारी रहेगी। फिलहाल इतना ही। पुरुषोत्तम जी को साधुवाद कि उन्होंने चर्चा आगे बढ़ायी। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4488476617135510988?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4488476617135510988/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4488476617135510988&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4488476617135510988'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4488476617135510988'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/04/blog-post_05.html' title='मौका है तो मौके को समझना ही पड़ेगा'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4353203833969537847</id><published>2009-04-04T07:27:00.000-07:00</published><updated>2009-04-04T07:28:26.169-07:00</updated><title type='text'>सीन गंभीर, समझने की जरूरत</title><content type='html'>विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देश में फिर लोकतंत्र की परीक्षा की घड़ी आ चुकी है। आजादी प्राप्ति के बाद पंद्रहवीं बार। बड़े-बड़े वादों, मजबूत लगने वाले इरादों , नये गानों और मदहोश कर देने वाले तरानों के साथ चुनावी पहलवान तो ताल ठोक ही रहे हैं, बरसाती मेढक की तरह कुछ वैसे लोग भी समाज के पैरोकार बने टर्राने लगे हैं,  जिनका किसी से कभी कोई न तो नाता रहा, न सरोकार दिखा। पूरा माहौल गफलत का ही बना दिख रहा है। हर कोई एक दूसरे को समझाने की समझदारी दिखा रहा है। अब तक नाच रहे थे, गा रहे थे, तमाशा बने सरेआम तमाशा दिखा रहे थे, पर अभी समझा रहे हैं। शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं। सीन गंभीर है। शिकारी शिकार को फंसने से बचने की सलाह देने लगा है। जाल गहरा, साजिश गहरी नहीं तो और क्या है? अभी चार साल पहले बिहार में विधानसभा चुनाव हुए थे। रामविलास पासवान पूरे सूबे में घूम-घूम कर लालू को उखाड़ फेंकने का आह्वान कर रहे थे और सरेआम सत्ता की चाबी नीतीश कुमार को थमायी थी। अब कोई भी रामविलास पासवान को लालू के साथ गलबिहयां करते हंसते-मुस्कुराते बड़े-बड़े फोटुओं में देख सकता है। कांग्रेस की सरकार बचाने के लिए सबकुछ कर चुकने वाले समाजवादी पार्टी के कर्ता-धर्ता मुलायम सिंह यादव स्वतंत्र हो गये हैं और लालू-रामविलास के साथ त्रिवेणी बना चुके हैं। कांग्रेस न होती तो लालू का क्या होता, यह तो वे ही बेहतर बता सकते हैं, पर चुनाव में सतह पर आ चुकी तथाकथित वजूद की लड़ाई के जेरेसाया यह तालमेल ध्वस्त हो चुका है और कांग्रेस त्रिवेणी के खिलाफ अपना पहलवान मैदान में उतार रही है। ऐसे में बरसाती मेढक अपनी टर्र-टर्र से लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं ...लोभ में उसमें फंसना नहीं। फंसें नहीं तो क्या करें? बगावत के सुरों के बीच आखिरकार पस्ती का आगाज भी बुलंद है और उसकी आवाज इस बगावत के साथ ही सुनी जा सकती है - हम अलग-अलग लड़ रहे हैं, पर चुनाव के बाद हम मिलजुलकर सरकार बनाएंगे। वाह भई वाह। पब्लिक क्या है? और जो नहीं है, आप तो उसे वही समझते हैं। मुश्किल घड़ी है, कम से कम बिहार - यूपी - झारखंड में सीन गंभीर ही है। सवाल चयन का नहीं, सब्र की परीक्षा का उठ खड़ा हुआ है। ऐसे में मुझे किसी को समझाने का कम, खुद समझने का मौका ज्यादा नजर आता है। जी हां, एक-एक पब्लिक को खुद को समझना होगा। समझदारी इस बात की कि आखिर पूरे परिदृश्य को वे किस रूप में देखते हैं और किस रूप में ढालना चाहते हैं। समझना यह होगा कि चूकने की कीमत है फिर पांच साल। परमाणु संधि वाले मुद्दे पर अभी आपने देखा ही है कि किस तरह से पब्लिक से उसके फैसले का अधिकार छीन लिया गया। संसद में नोट लहराते हैं तो लहरायें, अब किसे फिक्र है?? चुनाव आया है तो यह परीक्षा की घड़ी सिर्फ उनके लिए ही नहीं है , जो मैदान में लहरा रहे हैं और  भोंपू बजा रहे हैं, उनके लिए भी है, जो जज हैं, जिन्हें फैसला करना है। चुनाव को लेकर चर्चा अभी जारी रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4353203833969537847?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4353203833969537847/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4353203833969537847&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4353203833969537847'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4353203833969537847'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='सीन गंभीर, समझने की जरूरत'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4944249673086810677</id><published>2009-03-09T04:02:00.000-07:00</published><updated>2009-03-09T04:10:11.995-07:00</updated><title type='text'>नंगा न होइए हम्माम में</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;आप सभी को मेरी तरफ से रंगोत्‍सव की ढेर सारी शुभकामनाएं।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;strong&gt;खाइए,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;strong&gt;पीजिए,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;strong&gt;झूमिए,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;सब कुछ कीजिए,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;पर, परंपराओं को संभालते हुए,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कारों को सहेजते हुए।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;अपनों की याद में,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परायों के सम्मान में।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ईमान में, इनाम में,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महफिले खास में और आम में,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ख्याल रहे,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी नंगा न होइए,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;वहां . . .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहां ? ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;strong&gt;जी हां, वहीं . . .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम्माम में।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4944249673086810677?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4944249673086810677/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4944249673086810677&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4944249673086810677'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4944249673086810677'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/03/blog-post_09.html' title='नंगा न होइए हम्माम में'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-2623727028130206585</id><published>2009-03-04T23:09:00.000-08:00</published><updated>2009-03-04T23:11:41.886-08:00</updated><title type='text'>... तो राबड़ी आज भी सीएम होतीं</title><content type='html'>अरविंद जी ने पूर्व की पोस्ट 'जंगल राज के भी नियम ध्वस्त हो गये थे' पर अपनी कुछ टिप्पणियां दी हैं। उनकी बातें यहां हू-ब-हू पोस्ट कर रहा हूं। उन्होंने कहा है -&lt;br /&gt;"शुक्ला जी, जनता अब जाति के आधार पर वोट देने लगी है. कोर्ट की तमाम नकारात्मक टिप्पणियों के बावजूद लालू की पार्टी बिहार में दोबारा सत्ता में आई, यह इस बात का परिचायक है कि सामाजिक समीकरण (जनता) तब भी लालू के पक्ष में था. कोर्ट की टिप्पणियों के आपके जितने भी उदाहरण हैं, सभी सन २००० के पहले के हैं. बिहार में इसके बाद भी चुनाव हुए और लालू की पार्टी २००५ तक सत्ता में बनी रही. हाँ, इसके बाद नीतीश कुमार की बिरादरी और राम विलास पासवान के समर्थक लालू के तिलिस्म से बहार निकल गए, जिसकी वजह से लालू से खार खाए लोगों को मौका मिल गया. कुर्मी और दलितों का अगर लालू से मोह भंग नहीं होता तो राबडी आज भी बिहार की मुख्यमंत्री होतीं. आपने लालू-राबडी राज की समीक्षा बहुत एकपक्षीय होकर की है. लालू की देन पर भी कभी गौर कीजिएगा, तो असली तस्वीर नजर आएगी. मेरे गाँव के कन्हाई साव ८० साल की उम्र में १९८८ में मर गए, लेकिन उन्होंने ताउम्र कभी बैलेट पेपर नहीं देखा, सामन्तियों ने कभी वोट डालने नहीं दिया. आज उनका पुत्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहा है तो इसमें सौ फीसदी लालू का योगदान है. आपसे आग्रह है कि लालू राज की समीक्षा कभी आप कन्हाई साव के नजरिए से भी कीजिये, पत्रकारिता समग्र दृष्टि मांगती है. "&lt;br /&gt;अरविंद जी की किसी बात पर कोई मीन-मेख न निकालते हुए मेरा मानना है कि वे अभी इस चर्चा को जारी रखना चाहते हैं, फिर विधानसभा चुनाव के बाद राजद के नेतृत्व में सरकार कैसे बनी, कैसे चली, इसका राज फाश करवाना चाहते हैं। हालांकि, मैं इस चर्चा की आखिरी किस्त लिख चुका हूं। मुद्दे और भी हैं, बातें और भी हैं। अरविंद जी चर्चा को एकपक्षीय करार देने के दौरान शायद उस प्रश्न को भूल गये, जिसके जवाब को तलाशने के लिए इतिहास को खंगाला जा रहा था। किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष पर यह टिप्पणी नहीं थी। फिलहाल मैं तो इतना ही कहना चाहूंगा कि राबड़ी सरकार का फिर से सत्ता में आना सिर्फ जातिवाद के समीकरण का प्रभावी हो जाना नहीं था, यह बड़ी और मतलबी राजनीतिक गठबंधन का प्रतिफल भी था। हालांकि, यह भी इतिहास को खंगालने जैसा ही है। अरविंद जी की बातों का जवाब शायद उस इतिहास को खंगालने में मिल जाये, जब उन्हें यह बताया जाय कि बिहार में राबड़ी सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन क्यों लगा और कैसे हटा? बहस शुरू हो चुकी है, थोड़ी मशक्कत आप भी क्यों नहीं कर लेते अरविंद जी?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-2623727028130206585?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/2623727028130206585/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=2623727028130206585&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2623727028130206585'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2623727028130206585'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/03/blog-post_04.html' title='... तो राबड़ी आज भी सीएम होतीं'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-6896344011152596068</id><published>2009-03-03T23:50:00.000-08:00</published><updated>2009-03-03T23:53:21.698-08:00</updated><title type='text'>जंगल राज के नियम भी ध्वस्त हो गये थे</title><content type='html'>बिहार से लालू-राबड़ी राज का खात्मा क्योंकर जरूरी हो गया था, यह तब पटना हाईकोर्ट द्वारा निरंतर दी जा रही टिप्पणियों के आकलन से साफ-साफ पता चलता है। गुजरते लम्हों ने भले उन टिप्पणियों की यादें धूमिल कर दी हों, पर उसके अर्थ आज भी इतिहास में सांसें ले रहे हैं। पटना उच्च न्यायालय की समय-समय पर दी गयी टिप्पणियों से साफ-साफ पता चलता था कि बिहार अनाथ हो चुका था और यहां उसकी देखरेख करने वाली सरकार की नितांत आवश्यकता थी। १४ जुलाई १९९७ को न्यायालय ने कहा कि राज्य में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। राज्य सरकार अपने कर्तव्य के निर्वहन की स्थिति में नहीं है। यहां की जनता जंगलराज में रहने को विवश है। इसके ठीक तीन रोज बाद १७ जुलाई १९९७ को कोर्ट की टिप्पणी आयी कि राज्य में पूरी तरह अराजकता है। चूंकि यहां न तो कोई काम करता है औऱ न ही कोई अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति रुचि रखता है। ५ अगस्त १९९७ को कोर्ट ने कहा कि जंगल राज में भी कुछ नियम होते हैं, लेकिन बिहार में तो इसका भी पालन नहीं हो रहा है। सड़कों की मरम्मत और सफाई कार्य भी न्यायालय के आदेश के बाद ही किये जाते हैं। ६ अगस्त १९९७ को उच्च न्यायालय ने फिर माना कि राज्य प्रशासन अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पा रहा है। १३ अगस्त १९९७ को न्यायालय ने टिप्पणी दी कि बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां सड़कें नहीं हैं। १३ जनवरी १९९८ को कोर्ट ने कहा कि बिहार पुलिस के चरित्र से सभी वाकिफ हैं। ९ फरवरी १९९८ को कोर्ट की टिप्पणी थी कि विधि व्यवस्था की खराब हालत की जानकारी के बावजूद प्रशासन लापरवाह है। ९ मार्च १९९८ को कोर्ट ने कहा कि राज्य के अधिकतर अधिकारी भ्रष्ट हैं। मुख्य सचिव के आश्वासन के बावजूद आदेशों का अनुपालन नहीं किया जा रहा है। राज्य में तदर्थवाद जारी है, स्थिति नियंत्रण से बाहर है। १० अप्रैल १९९८ को कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रशासन तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। १६ अक्टूबर १९९८ को टिप्पणी आयी कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गयी है। सांसद और विधायकों के अनुशंसा पत्र पर भी मुख्यमंत्री राबड़ी देवी अब सीधे आदेश नहीं देतीं। यह तो कुछ नमूने हैं। ऐसा कोई हफ्ता नहीं गुजरता था जब हाईकोर्ट की इस प्रकार की कोई टिप्पणी नहीं आती हो। उधर, प्रदेश में घोटालों की मानो बाढ़ आयी हुई थी। पशुपालन, मेधा, अलकतरा, अधिकाई व्यय, मस्टर रोल आदि घोटाले निश्चित रूप से पचा लिये गये थे। नौकरी से लेकर प्रोन्नति, वेतन, पेंशन व मुआवजा दिलाने तक और सड़क, पेयजल, सफाई, अतिक्रमण, नाला, ट्रैफिक जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी कोर्ट की ही भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी थी। दरअसल बिहार को कोर्ट ही चलाने लगा था। प्रभावित लोगों द्वारा कोर्ट के पास पहुंचने और उसके द्वारा दिये गये फैसलों की तादाद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि १२ फरवरी १९९९ तक ( इसी रोज राबड़ी सरकार को भंग करते हुए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था) राज्य के विभिन्न विभाग अवमानना के करीब तीन हजार मामले झेल रहे थे। कुल मिलाकर स्थिति नाजुक थी। मामला बस इतना ही था कि लालू या राबड़ी देवी को किसी ने बिहार की सत्ता से बेदखल नहीं किया, खासकर जनता ने तो बिल्कुल नहीं। यह लोकतंत्र है और इसमें जनता सर्वोपरि है। इस व्यवस्था में राज्य को अपनी जागीर समझने वाले को बदल देने का उसके पास अधिकार है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि जनता किसी को बेदखल नहीं करती, अपना नया प्रतिनिधि चुनती है। नया प्रतिनिधि, जो उसके लिए काम कर सके, उसकी बातों पर ध्यान दे सके, जो व्यवस्था को बहाल कर सके और जो भरोसे लायक हो। इसमें कोई बेदखल हो जाता हो तो हो जाता हो। जनता ने लालू-राबड़ी को बेदखल नहीं किया, बस नीतीश कुमार को चुन लिया। अब यदि नीतीश भ्रष्ट हैं तो मामले सामने आने दीजिए, जनता फिर कोई अपना नेता चुन ही लेगी। यह जनतंत्र है औऱ इसमें ऐसा होना स्वाभाविक है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-6896344011152596068?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/6896344011152596068/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=6896344011152596068&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6896344011152596068'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6896344011152596068'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='जंगल राज के नियम भी ध्वस्त हो गये थे'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-5043968690466199905</id><published>2009-02-27T21:45:00.000-08:00</published><updated>2009-02-27T21:47:26.852-08:00</updated><title type='text'>राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार</title><content type='html'>लालू प्रसाद यादव पशुपालन घोटाले में जेल चले गये और सींखचों के भीतर जाते-जाते वे जेल से शासन करने का ऐलान पूरा करते गये। जब वे यह दावा करते थे कि यदि जेल भी गये तो वहीं से बिहार पर शासन करेंगे तो लोग हैरान होते थे कि आखिर वे ऐसा किस कदर कर सकेंगे। लोकतंत्र की भले धज्जियां उड़ गयी हों, पर यह सच था कि घर में तब तक चूल्हा-चौकी संभालने वाली उनकी धर्मपत्नी राबड़ी देवी उनके जेल जाते ही मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हो गयीं। यह २५ जुलाई १९९७ का दिन था, जब उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इस सरकार का कार्यकाल डेढ़ वर्षों का रहा, क्योंकि तब की केन्द्र की भाजपा नीत सरकार की हिम्मत की बदौलत १२ फरवरी १९९९ को सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। क्यों? क्योंकि राबड़ी राज के महज डेढ़ वर्ष में बिहार ने डेढ़ दर्जन नरसंहार देखे, जिनमें कम से कम पांच सौ या इससे अधिक लोग मारे गये। नक्सली कहर का तो आलम यह था कि राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने के ४८ घंटों के भीतर १४ फरवरी १९९९ को माले ने जहानाबाद में सात लोगों को मार डाला। इतनी बदतर स्थिति तो कभी आतंकियों से अटे पड़े प्रदेश पंजाब की भी नहीं थी। जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उनसे यही साबित होता है कि लूट, अपहरण, बलात्कार, नरसंहार, भ्रष्टाचार व कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति ही लालू-राबड़ी राज की पहचान थी। विकास यहां कल्पना बन गया था और अपराधों के ग्राफ ने हर चेहरे को दहशतजदा बना डाला था। यहां विधायकों के खून होने लगे थे। हेमंत शाही, अशोक सिंह, देवेन्द्र दुबे, बृजबिहारी प्रसाद तथा अजीत सरकार जैसे विधायकों की नृशंसतापूर्वक हत्याओं ने साबित कर दिया था कि बिहार में कोई सुरक्षित नहीं है। १९९० से १९९९ तक के पुलिस रिकार्ड अनुसार यहां अपराध के साढ़े आठ लाख से भी अधिक मामले दर्ज किये गये थे, जिनमें हत्या के ३३६२८, बलात्कार के ७३१० तथा अपहरण के १५६१२ मामले थे (जबकि अपराध हुए इससे कहीं अधिक थे। पता चलता है कि इस दौरान साठ हजार से अधिक लोगों की जानें गयीं, जिनमें करीब पांच सौ राजनैतिक कार्यकर्ता थे।)। ५५ में तीस जिलों में नक्सलियों की समांतर सरकार चल रही थी। आर्थिक स्थिति को लेकर राज्य दिवालियेपन के कगार पर था। परिसंपत्तियों से ज्यादा राज्य सरकार पर कर्ज हो चुका था। नियंत्रक एवं महालेखाकार परीक्षक ने भी इस बात पर सरकार की बखिया उधेड़ी थी। राज्य सरकार का हर मंत्री सीबीआई तथा आयकर विभाग की चपेट में दिखने लगा था। यहां तक कि मुख्यमंत्री आवास तक पर छापा पड़ चुका था। राज्य सरकार की चौतरफी विफलता से बड़ी संख्या में लोग न्यायालय की शरण में जाने लगे थे। अतिक्रमण हटाने से लेकर वेतन भुगतान, नियुक्ति से लेकर प्रोन्नति तक के मामले अदालत में पहुंचने लगे। सफाई, अस्पताल, निर्माण, सड़क, पानी, बिजली एवं स्कूल उपलब्ध कराने सरीखे बुनियादी मुद्दों पर न्यायालय को निर्देश देने पड़ रहे थे। देश का सबसे पिछड़ा राज्य बनकर रह गया था बिहार। लालू खुद को शेरे बिहार कहलाना पसंद करने लगे थे। पूरे बिहार को उन्होंने जंगल घोषित कर रखा था और किसी दूसरे शेर को न घुसने देने की बार-बार ताकीद कर रहे थे। इसी बीच निरंतर आ रही थी पटना हाईकोर्ट की टिप्पणियां, जो सूबे की नक्कारी सरकार की पोल खोल रही थीं। बिहार की हालत ऐसी हो गयी थी कि अगर कोर्ट नहीं होता तो क्या होता, कहना मुश्किल था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल इतना ही। लालू के पटना में २२ फरवरी १९९० को रविदासों के समक्ष भोलेपन से पूछे गये सवाल ( सवाल था-आखिर क्यों उन्हें बिहार की सत्ता से बेदखल किया गया) के जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला जारी रहेगा। अगली और आखिरी किस्त में पढ़िए -जंगल राज के भी नियम ध्वस्त हो गये थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-5043968690466199905?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/5043968690466199905/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=5043968690466199905&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/5043968690466199905'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/5043968690466199905'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_27.html' title='राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-1367961238174693401</id><published>2009-02-26T23:02:00.000-08:00</published><updated>2009-02-26T23:03:24.812-08:00</updated><title type='text'>इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार</title><content type='html'>१० मार्च १९९० को लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। इसके पहले यहां कांग्रेस का शासन था। ऐसा नहीं था कि नरसंहारों का सिलसिला लालू के कार्यकाल से ही शुरू हुआ। नरसंहार की पहली वीभत्स घटना १९७७ में पटना जिले के बेलछी में घटी थी और इसके बाद तो जैसे यहां हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर चल पड़ा। कांग्रेस की सरकारों में नरसंहारों पर रोक लगाने की इच्छाशक्ति का घोर अभाव था, क्योंकि इस शासक शक्ति के सामाजिक आधार इन्हें दूर तक जाने की इजाजत नहीं देते थे। दस वर्षों में कांग्रेस यहां छह मुख्यमंत्री बदल चुकी थी। आपरेशन सिद्धार्थ समेत कई घोषणाएं की गयीं, पर सभी कागज पर ही रह गयीं। मुख्यमंत्री बनते ही लालू ने भी यही काम शुरू कर दिया। उन्होंने दलितों को हथियारबंद करने, भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने, मध्य बिहार में शांति बहाल करने के लिए पदयात्रा करने आदि की कई घोषणाएं कीं, पर इनमें से एक पर भी अमल नहीं हुआ। नतीजा, १९९० से ही शुरू हो गया सूबे में नरसंहारों का सिलसिला, जो गुजरते लम्हों के साथ बेकाबू होता चला गया।&lt;br /&gt;१९९० की शुरुआत में ही रोहतास के केसारी में सामंतों में दस दलितों को मार डाला। २६ मार्च को जहानाबाद के लखावर में पांच दलित मारे गये। २० जुलाई को मधुबनी के हरलाखी में सामंतों ने पुलिस के साथ मिलकर मजदूर वर्ग के छह लोगों को मौत के घाट उतार डाला।  २६ जुलाई को रांची (तब बिहार में ही था) के हेसार में पुलिस ने तीन लोगों को मार डाला। १७ दिसंबर को दरियापुर (पटना) में किसान संघ के कार्यकर्ताओं ने चार लोगों व १९ फरवरी १९९१ को पटना के तिखरखोरा के १४ लोगों की हत्या कर दी। ७ जनवरी १९९१ को वैशाली जिले के पहाड़पुर गांव में अपराधी तत्वों ने ७ लोगों को मार डाला। विष्णुपुर ढाबा (बेगूसराय) तथा हरपुर सैदाबाद (समस्तीपुर) में ३ फरवरी को पुलिस ने क्रमशः ७ और ३ तीन लोगों को भून डाला। सनलाइट सेना ने ४ जून १९९१ को पलामू के मलवरिया में नौ लोगों को मौत के घाट उतारा। १२ जुलाई १९९१ को अपराधी गिरोह की ओर से संग्रामपुर (सारण) में चार लाशें गिरायी गयीं। जद समर्थकों ने ११ अप्रैल १९९१ को गया के बेलागंज में तीन लोगों को मार डाला। भोजपुर के देवसहियारा में सामंतों ने २२ जून १९९१ को १४ लोगों को मार डाला। १३ जुलाई १९९१ को पुलिस ने मुठभेड़ में मधुबनी के बेनीपट्टी में चार मजदूरों को भून डाला। १९ अक्टूबर को मुजफ्फऱपुर के बेनीबाद में पुलिस की गोली से सात लोग मारे गये। २५ अगस्त १९९१ को पुलिस ने सहरसा के गोदरामा में तीन लोगों को भून डाला, वहीं, सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने जहानाबाद के बावन बिगहा में २१ सितंबर १९९१ को सात लोगों को मौत के घाट उतार डाला। इसी साल जहानाबाद के मेन बरसिम्हा में नौ लोग, करकट बिगहा (पटना) में चार लोग, तिनडीहा (गया) में ७ लोग मार डाले गये।&lt;br /&gt;नये साल १९९२ की शुरूआत बारा नरसंहार से हुई। बारा में १२ फरवरी को एमसीसी समर्थकों ने ३९ लोगों को मार डाला। ३० जून को गोपालगंज के चैनपुर में सामंतों ने पांच तथा एकवारी (भोजपुर) में सामंतों ने १२ सितंबर को ४ लोगों की हत्या कर दी। १९९२ का अंत शहाबुद्दीन समर्थकों के तांडव से हुआ। २२ दिसंबर को शहाबुद्दीन समर्थकों ने जीरादेई (सीवान) में ४ लोगों की हत्या कर दी। यह सिलसिला थमा नहीं। पुलिसकर्मियों ने १७ मार्च १९९४ को नाढ़ी (भोजपुर) में नौ लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया। ४ अप्रैल १९९५ को रणवीर सेना की ओर से भोजपुर के खोपिरा में चार लोगों की लाशें गिरायी गयीं। सामंतों ने ६ जुलाई १९९५ को करमौल बमनौली (सीवान) के छह लोगों को मार डाला। रणवीर सेना ने २५ जुलाई १९९५ को सरथुआ (भोजपुर) में ६ लोगों की हत्या की। ५ अगस्त १९९५ को गंगा सेना की ओर से नोनउर (भोजपुर) के छह लोग मारे गये। वर्ष १९९६ तो नरसंहारों का ही वर्ष रहा। रणवीर सेना ने ७ फरवरी १९९६ को चांदी (भोजपुर) में ४, ९ मार्च को पतलपुरा (भोजपुर) में ३, १२ मार्च को नोनउर में ५, ५ मई को नाढ़ी में ३, ९ मई को इसी गांव में फिर ३, ११ जुलाई को बम्पानी टोला (भोजपुर) में २१, २६ नवंबर पुरहारा (भोजपुर) में ५ तथा २४ दिसंबर को एकबारी (भोजपुर) में ६ लोगों की सामूहिक हत्या की। इसी वर्ष शहाबुद्दीन समर्थकों द्वारा १४ सितंबर को भवराजपुर (सीवान) के ३ तथा ११ दिसंबर को मनिया (सीवान) के ५ लोगों की हत्या कर दी गयीं।&lt;br /&gt;अगले साल राबड़ी देवी के कार्यकाल में पहली दिसंबर १९९७ को रणवीर सेना द्वारा बाथे नरसंहार में ६४ लोगों तथा रामपुर अहियारा चौरम में एमसीसी समर्थकों द्वारा ९ सवर्णों को जीप से खींचकर खत्म कर देने जैसी जघन्यतम घटनाओं को छोड़ भी दिया जाय तो क्या नहीं लगता कि खुद को भगवान कृष्ण का अवतार कहलाने में खुशी महसूस करने वाले लालू प्रसाद यादव के राज में बुद्ध, महावीर की धरती इंसानी लाशों से पटती जा रही थी? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित १ दिसंबर के बाथे नरसंहार के जिम्मेवार रणवीर सेना के राजनैतिक रिश्तों की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग के गठन की बात की गयी। आयोग का कार्यकाल जून १९९८ में समाप्त हो गया तो छह महीने ३१ दिसंबर तक के लिए उसे बढ़ाया गया। जांच आयोग का काम शुरू ही नहीं हो पाया। क्यों? क्योंकि आयोग को इस काम के लिए कर्मचारी ही नहीं मिले। कार्यालय के लिए मकान का आवंटन नवंबर में किया गया। इस नरसंहार के बाद मध्य बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाये रखने के लिए विशेष टास्क फोर्स के गठन की बात कही गयी। यह टास्क फोर्स संचिका में ही कैद रह गयी। उग्रवाद प्रभावित मध्य बिहार में विकास कार्यक्रम चलाने के लिए सौ करोड़ रुपये की योजना तैयार की गयी। योजना कहां चली गयी, किसी को पता नहीं है। बिहार सरकार ने अपने एक दस्तावेज में स्वयं स्वीकार किया था कि सड़क निर्माण से संबंधित दो दर्जन से अधिक घोषित परियोजनाओं में निविदाएं नहीं आयीं, क्योंकि उग्रवादी संगठनों ने निविदा देने वालों से निपट लेने की धमकी दी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-राबड़ी राज - डेढ़ वर्षों में डेढ़ दर्जन नरसंहार।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-1367961238174693401?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/1367961238174693401/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=1367961238174693401&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1367961238174693401'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1367961238174693401'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_5207.html' title='इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-2398814088832232447</id><published>2009-02-26T09:39:00.000-08:00</published><updated>2009-02-26T09:46:21.993-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लालू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चरचा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आपत्ति'/><title type='text'>लालू ने सम्मान से जीना सिखाया</title><content type='html'>&lt;strong&gt;मनोज कुमार हमारे तब के मित्र हैं, जब हमलोग नवादा, बिहार में पढ़ते थे। इन दिनों अध्यापन कर रहे हैं। लालू के सवाल के बहाने यहां जो बातें कही जा रही हैं, उनपर उन्हें आपत्ति हैं। कुछ बातें उन्होंने लिख भेजी है। हम उसे जस का तस पोस्ट कर रहे हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सारी बातों के बीच किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वो लालू यादव ही हैं, जिनकी वजह से बिहार की दलित और पिछड़ी आबादी सर उठाकर जीना सीख रही है। कोई भी सामाजिक क्रांति जब होती है तो उसके कुछ न कुछ साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। सब कुछ अच्छा ही अच्छा नहीं होता। साइड इफेक्ट्स को लालू की गलतियों के रूप में प्रचारित कर आप किसका भला करना चाह रहे हैं। क्या बिहार के दलितों और पिछड़ों को सर उठाकर जीने का हक नहीं था? लालू यादव ने सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया तो वह सामाजिक समरसता के कातिल हो गए? सामंती ताकतों का अत्याचार बहुत अच्छा था? सच बात तो यह है कि जिन ताकतों को राज करने की आदत पड़ गई थी, वही लोग पिछड़ों और दलितों का उभार देख नहीं पा रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू यादव ने बिहार का विकास रोक दिया, ऐसा कहने वाले पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखते। जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वरी दुबे के कायॆकाल में क्या कम भ्रष्टाचार था। तब विकास की गंगा बह रही थी, तो भी बिहार लालू काल से पहले पिछड़े और बीमारू राज्यों की श्रेणी में क्यों शुमार था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कहा जा रहा है कि एक खास वगॆ के लोग पूरे बिहार में अराजकता मचा रहे थे। लालू यादव से पहले स्वणॆ जातियों के लोग पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के खिलाफ जो मनमानी कर रहे थे, उसे अराजकता क्यों नहीं कहा जाता? क्या सिफॆ इसलिए नहीं कि तब उस अराजकता को ही सिस्टम मान लिया गया था? क्या उस सिस्टम को तोड़ा नहीं जाना चाहिए था? सच बात तो यह है कि सामंतों के अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार किया गया तो हल्ला इस बात का किया गया कि बिहार में तो स्थिति अराजक हो गई है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा सिफॆ इतना कहना है कि लालू यादव के कायॆकाल से पहले के कायॆकाल को भी याद किया जाए। भ्रष्टाचार, अपराध और भाई-भतीजावाद की त्रिवेणी तब भी बह रही थी। बिहार तब भी पीछे ही जा रहा था। लेकिन तब आत्मसम्मान के साथ जीने वाले लोग कुछ फीसदी थे। अब स्थिति बदली तो यही कुछ फीसदी लोग बेचैन हो गए। अराजकता-अराजकता का नारा बुलंद करने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में अनुरोध सिफॆ यह है कि स्थितियों को सिफॆ अपने चश्मे से न देखें। दूसरी बात यह कि हमेशा गुण-अवगुण दोनों बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वरना तो आप कोई भी बात कहने के लिए स्वतंत्र हैं हीं। मेरी बात यदि आप यहीं प्रकाशित कर सकें तो मुझे खुशी होगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार, रुनीपुर, नवादा, बिहार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू यादव ने जो सवाल पूछा है, उसके जवाब में और भी लोगों के दिमाग में ढेर सारी बातें घुमड़ रही होंगी। इस चरचा में अगर आप भी शामिल होना चाहते हैं तो स्वागत है। आप अपनी बातें हमें लिख भेजें इस पते पर-&lt;a href="mailto:पर-imtihan08@gmail.com"&gt;imtihan08@gmail.com&lt;/a&gt;। हम आपकी बातों को आलेख के रूप में प्रकाशित करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-2398814088832232447?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/2398814088832232447/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=2398814088832232447&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2398814088832232447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2398814088832232447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html' title='लालू ने सम्मान से जीना सिखाया'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-2338933116503566907</id><published>2009-02-25T22:29:00.000-08:00</published><updated>2009-02-25T22:30:44.848-08:00</updated><title type='text'>भ्रष्टाचार से ही लालू बने थे सीएम</title><content type='html'>पटना में २२ फरवरी को लालू प्रसाद यादव ने रविदासों के समक्ष भले भोलेपन से यह सवाल किया हो कि आखिर उनसे क्या गलती हो गयी जो बिहार की सत्ता से उन्हें बेदखल कर दिया गया, पर उनका यह सवाल है उत्तर तलाशने के लायक। यह अलग मसला है कि वे आज केन्द्र में उसी कांग्रेस की छत्रछाया में रेलमंत्री बनने का गौरव हासिल कर रहे हैं, जिसे कोस-कोस कर वे राजनीति में जवान हुए, पर कभी जेपी का अनुनायी कहलाकर गर्व से सीना तानने वाले इस शख्स की बिहार के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी भी भ्रष्ट आचरण के तहत ही हुई थी।&lt;br /&gt;बात १९९० की है। वीपी सिंह का जमाना था। देश में गैर कांग्रेसवाद की लहर चल रही थी। तब न तो मंडल कमीशन आया था और न ही लालू की मुरलीधरन छवि ही लोगों के नूरेनजर थी। विधान सभा चुनाव में जनता दल बड़ी पार्टी के रूप में सामने आया था। मात्र गैर कांग्रेसवाद को लेकर कांग्रेस का तख्ता पलट दिया गया था, उसे जनता बहुमत से अल्पमत में ले आयी थी। बिहार में ही नहीं, केन्द्र में भी। गैर कांग्रेसवाद के गर्भ से निकला था जनता दल और उस वक्त भी उसके पास स्पष्ट बहुमत नहीं था कि अकेले वह सत्ता चला सके। तालमेल हुआ। झामुमो, भाजपा, माकपा, भाकपा और जद ने समझौता किया और कांग्रेस को सत्ता में आने रोका गया। बिहार में तो नेतृत्व संकट की भीषण स्थिति पैदा हो गयी थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए जनता दल में उठापटक शुरू हो गयी थी। उस वक्त राम सुंदर दास मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। रमई राम, रघुनाथ झा को भी इस दौड़ में शामिल किया जा रहा था। यहां तक कि गैर कांग्रेसवाद का झंडा थामे अगली पांत के नेता युवा तुर्क चंद्रशेखर भी यही चाह रहे थे कि रघुनाथ झा या राम सुंदर दास को ही मुख्यमंत्री बना दिया जाय।  मगर, उस वक्त की राजनीति और जनता दल में मजबूत स्थिति रखने वाले देवीलाल ने लालू यादव के नाम का प्रस्ताव कर दिया। और जैसे कालांतर में एचडी देवगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल रातोरात प्रधानमंत्री बने, वैसे ही लालू यादव मुख्यमंत्री बन गये। जनता ने उन्हें नहीं चुना था और जिन्होंने उन्हें चुना था, ऐसा करने का उनके पास कोई अधिकार नहीं था। लालू प्रसाद यादव तो उस वक्त विधायक भी नहीं थे। मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद उन्होंने चुनाव लड़ा और संवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री पद के लायक बने। तो यह था लालू के बिहार की गद्दी पर काबिज होने का सच। सामाजिक समरसता कायम करने वाली पार्टी का पहला मुख्यमंत्री ही अलोकतांत्रिक तौर-तरीके और गैर जनमत से चुना गया। इस प्रक्रिया को भ्रष्टाचार की श्रृंखला में रखा जाय तो लालू के मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित किया जाना भी एक भ्रष्ट प्रक्रिया ही थी, जो खुलेआम लोकतांत्रिक प्रणाली की धज्जियां उड़ा रही थी। फिर भ्रष्टाचार के माध्यम से स्थापित मुख्यमंत्री न्याय औऱ नैतिकता की बात किस मुंह से करता? और इसी का परिणाम हुआ कि पूरे सूबे में अराजकता की स्थिति पैदा होती चली गयी। जनता दल के कार्यकर्ता खुलेआम आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने लगे। हत्या की राजनीति मुखर हो गयी। संतरी से मंत्री तक जातीय समीकरण के तहत बहाल किये जाने लगे। गुण और गुणवत्ता को नजरअंदाज किया जाने लगा। लालू रोज भड़काऊ भाषण देने लगे। जनता के नाम पर जनतंत्र का जितना मजाक लालू ने उड़ाया, इसका आकलन करना या उसे विश्लेषित करना आने वाली पीढ़ी को गलत रास्ते का पाठ पढ़ाने जैसा ही है, पर यह सच है कि एशिया के मानचित्र पर सिंधू घाटी के बाद सबसे पहले सभ्यता का विकास करने, अपनी भौतिक संपदा के साथ-साथ वैचारिक अमृत से मानवता को सींचने और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला बिहार क्रूरतम हिंसा, जघन्यतम अपराध और महाघोटालों की विषबेलियों से इस कदर जकड़ता गया कि उसकी चिरपरिचित अस्मिता पर ही संकट के बादल मंडराने लगे। जिस बिहार के बुद्ध, महावीर, चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, शेरशाह, सूफी-संतों व भक्त कवियों, सामाजिक क्रांतिकारियों और राजनैतिक हस्तियों ने समय-समय पर देश की संस्कृति में नये अध्याय जोड़े, वही बिहार लालू के राज में जंगल राज का पर्याय बन गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल इतना ही। लालू प्रसाद यादव के सवाल के बहाने जवाबों की तलाश में इतिहास को खंगालने का सिलसिला अभी जारी रहेगा। अगली पोस्ट में पढ़िए-इंसानी लाशों से पटता जा रहा था बिहार।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-2338933116503566907?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/2338933116503566907/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=2338933116503566907&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2338933116503566907'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2338933116503566907'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_3538.html' title='भ्रष्टाचार से ही लालू बने थे सीएम'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-5620974360396335171</id><published>2009-02-25T10:39:00.000-08:00</published><updated>2009-02-25T10:41:50.518-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लालू यादव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार'/><title type='text'>लालू यादव के सवाल के बहाने</title><content type='html'>लालू प्रसाद यादव ने पिछले दिनों पटना में एक समारोह में जनता से बड़े ही भावुक अंदाज में पूछा-मेरा कुसूर क्या था कि मुझे सत्ता से बेदखल कर दिया गया। लालू यादव ने उन वजहों का भी जिक्र किया, जिनके चलते उन्हें सत्ता से बेदखल नहीं किया जाना चाहिए था। क्या लालू यादव वाकई अपने सवाल का जवाब चाहते हैं? अगर हां तो उन्हें कुछ और लोगों के सामने अपने सवाल को रखना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन आम लोगों से भी पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने लालू और राबड़ी देवी के कायॆकाल में मान लिया था कि अगर बिहार में रहना है तो अपने दम पर, अपने बाहुबल पर भरोसा करके ही रहा जा सकता है। आगे बढ़ना है तो सरकारी मशीनरी से किसी मदद की उम्मीद न करें। अपने संसाधनों से विकास कर सकते हों तो करें।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे भी लालू मुखातिब हों, जो उन परिस्थितियों में वहां रहने की हिम्मत नहीं जुटा सके और पलायन को मजबूर हुए। हालत यह हो गई कि महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल से लेकर देश के लगभग सभी हिस्सों में बिहार के लोगों की भीड़ सी हो गई। मजबूरी में बिहार छोड़ने वाले लोग कहीं दुरदुराए जाते हैं तो कहीं पीटे जाते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वही हैं, जिनके उत्थान और आत्मसम्मान को बहाल करने की बात कहते लालू यादव अघाते नहीं। उत्थान होता आत्मसम्मान बढ़ता या बहाल होता तो क्या वे अपना देस छोड़ने को मजबूर होते। इनके, इनके परिवार वालों के पास भी तो वोट का अधिकार है, लालू यादव इनसे भी क्यों नहीं पूछते कि किन वजहों से उनका वह सिंहासन छीन लिया गया, जिस पर वे बीस साल तक बैठने का दावा करते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल तो उन उद्योगपतियों से भी पूछा जाना चाहिए जो रंगदारी, अपहरण की वारदातों और गुंडागरदी से त्रस्त होकर बिहार छोड़कर भाग जाने को मजबूर हुए। सत्ता में बने रहने के लिए केवल भावुक सवाल और नौटंकी की जरूरत नहीं होती। नागरिकों की बेहतरी और उनकी हिफाजत के उपायों की भी जरूरत होती है। जनता की हिफाजत की स्थिति यह थी कि लोग सवाल पूछने लगे थे कि अगला नरसंहार कब और कहां होगा? ऐसे सवाल पूछने वालों को जवाब देने का हक नहीं था क्या? नरसंहार को छोड़ भी दें तो कानून-व्यवस्था की हालत यह थी कि लोग शाम होते ही अपने घरों में दुबक जाने को मजबूर होते थे। राजधानी पटना तक में शाम होते असामाजिक तत्व ही सड़कों पर बचे रह जाते थे। महिलाएं इज्जत का जोखिम उठाकर ही दिन में भी घर से निकलती थीं। क्या-क्या गिनवाया जाए? लालू यादव को याद हो या न हो, जनता को तो अब भी याद होगा ही। आखिर भुगता तो उन्होंने ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार में आग लगी तो उसे बुझाने की जरूरत थी। लेकिन लालू यादव ने यह कहकर उस आग में घी ही तो डाल दिया कि ..भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला-कायस्थ) साफ करो। लालू यादव बाद में भले ही इस पर लीपापोती करते रहे हों लेकिन उनके इस महान आह्वान का खामियाजा केवल भूराबाल ने ही नहीं, पूरे प्रदेश ने भुगता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनके साथ उनसे भी तो अपना सवाल पूछिए रेलमंत्री जी जिन्हें आपने चौदह-पंद्रह साल तक अपनी नौटंकी में उलझाए रखा। चरवाहा विद्यालय खोलकर अपने आपको विकास पुरुष कहने और कहलवाने से विकास नहीं होता। होता तो आज भी चरवाहा विद्यालय में पढ़ने वाले आते होते। छात्रों के लिए सिसक-सिसक कर मर नहीं जाते चरवाहा विद्यालय। सिंदुर-टिकुली बांटने से कौन सा विकास होता है? सिवाय अखबारों में बांटने वाले की तस्वीर छपने के और कौन सा भला हुआ उस कवायद का, कोई तो बताए। हप्प-हप्प करके सवालों को खा जाने की उनकी अदा पर मर मिटने वाले भी कब तक वोट देते? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू यादव के सवाल का जवाब तलाशती चरचा जारी रहेगी। अगली किस्तों में श्री कौशल शुक्ला कुछ तथ्यों के साथ आपके सामने होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-5620974360396335171?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/5620974360396335171/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=5620974360396335171&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/5620974360396335171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/5620974360396335171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_25.html' title='लालू यादव के सवाल के बहाने'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-5108260192188359697</id><published>2009-02-24T07:39:00.000-08:00</published><updated>2009-02-24T07:40:17.433-08:00</updated><title type='text'>गलतियां करें आप, खामियाजा भुगते देश?</title><content type='html'>चुनाव के बहाने देश में चल रही राजनैतिक चोंचलेबाजियों, खासकर रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव और इस्पात-उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान की मतलबी गलबहियों पर सोच रहा था, पर चिंतन में आ गये पूज्य बापू गांधी जी और जेहन में आ गया उनकी ओर से कभी दिया गया हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा। तब गुलाम देश में ये दोनों कौमें आपस में एक-दूसरे के खून की प्यासी हो रही थीं। देखने की बात यह थी कि देश में तब सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम ही नहीं थे, सिख भी थे, ईसाई भी थे, बुद्ध-जैन सम्प्रदाय के साथ दर्जनों कौमें अलग-अलग वजूद में थीं, पर गांधी जी ने हिंसा की घटनाओं से आहत होकर नारा दे दिया-हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई। गांधी जी एक बड़ी शख्सीयत थे। उनसे बड़ा देश में कोई था ही नहीं। मगर, उनसे यह नारा देकर एक छोटी गलती जो हो गयी, उसका खामियाजा आज तक तक देश भुगत रहा है। इसके खत्म होने की कोई सूरत नहीं दिख रही है। उनके नारे का सीधा सा मतलब था, दोनों कौमों में भाईचारा कायम हो जाये, पर हुआ क्या? इन दोनों जातियों को बड़ा बल मिल गया। उन्हें लगा कि भले देश में दर्जनों जातियां हों, पर उनकी तो कोई बात नहीं। गांधी जी ने कह दिया तो इसका मतलब अब तो सिर्फ वे ही हैं, बाकी गौण। और लोगों ने देखा कि तबसे इन दौ कौमों में भेद मजबूत होता चला गया, एक दूसरे पर विजय पाने का संघर्ष तेज होता चला गया। बड़े लोगों की छोटी गलतियां भी बड़ा असर दिखाती हैं, क्योंकि उनका पटल व्यापक होता है, वे सुनी दूर तक जाती हैं, समझी देर तक जाती हैं। &lt;br /&gt;अब आयें लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान के संदर्भों पर। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी लोक सभा चुनाव के इन दोनों मोहरों में सीट बंटवारे को लेकर आजकल रस्साकशी चल रही है। यूपीए के इन दो महत्वपूर्ण सिपहसालारों में मान-मनौअल के पैंतरे चल रहे हैं। बिहार में सोलह बनाम चालीस का पासवान ने जो पासा फेंका है, वह लालू को कबूल नहीं, मगर वे यह भी नहीं चाहते कि दो की लड़ाई का फायदा तीसरे को यानी जदयू-भाजपा नीत राजग को मिल जाये। यही कारण था कि पिछले दिनों लालू जा पहुंचे पासवान के घर। कुछ देर रुके औऱ फिर निकल पड़े अपनी राह। क्या बात हुई यह तो वे ही जानें, पर हवा उड़ी कि राजनैतिक बिसात पर दांव खेलने और जीतने की कला में माहिर तथा खुद को किंग मेकर कहने वाले मैनेजमेंट गुरु लालू ने पका ली अपनी खिचड़ी, मना लिया रुठ जाने वाले पासवान को। पर, तमाशा तो आखिर तमाशा है। दूसरे ही दिन पासवान के पलटवार से पता चला कि नहीं, बात जमी नहीं, बल्कि वहीं की वहीं अटकी हुई है। पासवान की बातों में इशारा साफ था कि गेंद लालू के पाले में ही है, उन्हें ही अभी मुद्दों को मोड़ देना है। संघर्ष तेज, मशक्कत जारी, निगाहों में बढ़ता इंतजार। फिर मैनेजमेंट गुरु का नारा आया-इस बार दलित प्रधानमंत्री चाहिए। सफलतम राजनीतिज्ञ का बेहतरीन दांव।  दलितों को रिझाने के साथ उन्हें पासवान से भटकाने का बेजोड़ हथियार।&lt;br /&gt;पर, लालू के दलित प्रेम का यही नारा देश के लिए हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई के नारे की तरह खतरनाक है। इक्कीसवीं सदी के इस दौर में और आर्थिक मंदी से जूझ रहे देश में जहां हर बड़ा-छोटा, अमीर-गरीब अपनी रोजी-रोटी की चिंता कर रहा है, वहां यह नारा खतरनाक है। खून-खराबे को आमंत्रित करने वाला, एक बड़ा वर्ग भेद कायम करने वाला नारा है यह। लोगों को याद होगा, जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो उनके दिल में भी पिछड़ी और दलित जाति के लोगों के प्रति सहानुभूति उपजी थी। उन्होंने वर्षों तक पेंडिंग पड़े मंडल आयोग की सिफारिशें एक झटके में लागू कर दी थीं। तब वीपी सिंह के सामने देश के नौजवान धू-धू कर जलने लगे थे और जलने लगा था पूरा देश। जिन गांवों में लोग जात-पांत भूल कर एक दूसरे के दुख-सुख में बिना भेदभाव के शामिल हो रहे थे, वहां लकीरें खिंच गयीं और बिना वितंडा शुरू हो गयी खूनी भिड़ंत। बसें-ट्रेनें रोककर और जाति पूछ-पूछ कर लोगों को मारा-काटा जाने लगा। मंडल कमीशन से शुरू हुआ वर्ग संघर्ष आज तक कायम है, रोज-ब-रोज गहरा रहा है। जिस आरक्षण का प्रावधान देश में दस वर्षों के लिए ही किया गया था, उस पर अब राजनीति जड़े जमा चुकी हैं औऱ इसके खत्म होने के आसार खत्म हो गये हैं।&lt;br /&gt;सवाल यह है कि अपनी जीत और अपनी पार्टी के वजूद को बचाने के लिए सब कुछ करने वाले लालू प्रसाद यादव को क्या हक है कि वे आम जनता को बरगलाते हुए समस्याओं से उलझे देश में एक नया वितंडा खड़ा करें? वह भी तब,  जबकि अभी यही साबित होना है कि दलितों का मसीहा कौन है? और दलित प्रधानमंत्री की जिद ही क्यों? सवाल यह है कि दलितों के नाम पर पूरे देश की उपेक्षा क्या जायज है? यहां सवाल यह भी है कि साठ साला आजादी के बाद भी यदि देश में कोई है जो दलित कहे जाने के लायक है तो दोष किसका है? क्या लालू और पासवान जैसे नेताओं का कोई दोष नहीं, जो खुद तो वर्षों से सत्ता पर काबिज होकर मजा लूट रहे हैं और दलित के नाम पर भी खुद को ही आगे पेश कर दे रहे हैं? क्या वे भी दलित ही हैं? और खुद के फायदे के लिए दलित प्रधानमंत्री का नारा देकर क्या वे देश को फिर एक लंबे और अंतहीन खूनी संघर्ष  में झोंकने की जुर्रत नहीं कर रहे? सवाल यह भी है कि वर्ग भेद को जिंदा करने वाले वाले और उसे मजबूती प्रदान करने वाले ऐसे नेता को आखिर देश कब तक झेलेगा? उनकी गलतियों का खामियाजा आखिर देश क्यों भुगते?  फिलहाल इतना ही, ग्रेट इंडियन तमाशे को लेकर बहस लायक मुद्दों पर अभी चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-5108260192188359697?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/5108260192188359697/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=5108260192188359697&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/5108260192188359697'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/5108260192188359697'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_24.html' title='गलतियां करें आप, खामियाजा भुगते देश?'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4775666618332875944</id><published>2009-02-21T08:17:00.000-08:00</published><updated>2009-02-21T08:18:12.097-08:00</updated><title type='text'>लो, आप तो पलटी मार गये दादा</title><content type='html'>दादा, आपके नाम यह दूसरी पाती नहीं लिखता, यदि आपने भूल सुधार कर जिन्हें श्रापा था, उनके विजयी भव की कामना नहीं की होती। मैं फिर कहना चाहूंगा दादा, आपने यह क्या कह दिया! कुछ कहूं, इससे पहले मेरा हलफनामा ले लीजिए कि इस बार भी मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं, आपको यही करना चाहिए। हमारी संस्कृति भी यही है कि मरने वाले के सभी गुनाह माफ कर दिये जाते हैं, फांसी पर लटकाने से पहले उसकी अंतिम इच्छा तक पूछने और उसे पूरा करने का रिवाज है यहां। दादा, आपने बिल्कुल ठीक किया। पर, कुछ सवाल फिर भी हैं, जो जेहन में चकरा रहे हैं, जवाब ढूंढ़ रहे हैं। और यह जवाब मैं आपसे ही चाहूंगा। कोई गुस्ताखी हुई तो माफ कीजिएगा। माफ तो आप कर देते हैं, इसका नमूना आपने दे ही दिया है। जिस पर आप इतने भड़के हुए थे कि उनके चुनाव हार जाने की कामना कर रहे थे, उन सभी को अभी आपने जीतने का आशीर्वाद दे तो दिया।&lt;br /&gt;तो पहला सवाल - दादा, आप अपने आप को क्या समझते हैं? इंसान या भगवान? इंसान समझा होता तो आपको मालूम होता कि आपके कहने से कोई कैसे चुनाव हार सकता था और फिर आपके पलटने से कोई कैसे जीत सकता है? सवाल ठीक है न दादा? या आप खुद को भगवान समझते हैं? आपको लगा कि मेरी जुबान से श्राप निकल गया है तो सामने वाले को यह श्राप लग ही जायेगा, इसलिए तुरंत पलटी मार गये? तो क्या भगवानों को इतनी जल्दी पलटी मारना क्या ठीक है? मुझे मालूम है, आप खुद को भगवान मानने की भूल कतई नहीं कर सकते। तो क्या मैं आपसे यह पूछने की हिमाकत कर सकता हूं कि आप खुद को क्या समझते हैं? क्या यह सिर्फ एक बूढ़े का भीषण प्रलाप था? मैं यह नहीं कहना चाहता कि यह एक किस्म का पागलपन था। या पागलपन ही था? यह सवाल पूरी शिद्दत के साथ आपके सामने सुरसा के मुंह की तरह फैला और चौड़ा हुआ खड़ा है। जवाब आपको ही देना है, दादा।&lt;br /&gt;दूसरा सवाल - दादा, इक्कीसवीं सदी में जहां मानव चांद से आगे निकलकर मंगल और शनि तक जा पहुंचा है, उस दौर में विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देश में क्या श्राप और आशीर्वाद से ही राजकाज चलाया जायेगा? कामरेडों की आत्मा को आपकी बातों से कितना सुकून मिलेगा, यह तो उनकी आत्मा ही बतायेगी, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में जहां राजनीति तक का कारपोरेटाइजेशन हो चला है, लालकृष्ण आडवाणी जैसे हिन्दुत्व विचारधारा वाली पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बुजुर्ग नेता युवाओं को रिझाने के लिए साइट औऱ एसएमएस का सहारा ले रहे हैं, उस दौर में कुछ लोगों को साक्षात विजयी भव का आशीर्वाद देकर आपने कितना ठीक किया? बताइए दादा, बताइए।&lt;br /&gt;तीसरा सवाल - और दादा, यह आशीर्वाद यदि एक सामान्य बूढ़े का भीषण प्रलाप था तो हमें लगता है कि आप ही देश को बताएं कि इस प्रकार के एक सामान्य मानसिकता वाले किसी बुजुर्ग को क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी की शोभा बढ़ानी चाहिए? यदि नहीं तो क्या आपको तत्काल अपनी कुर्सी से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए? और यदि आप कुर्सी से इस्तीफा नहीं देते तो क्या यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि आप भी, बुरा मत मानियेगा दादा, आप भी कुर्सी पर चिपके रहने वाले एक वैसे सामान्य नेता से अलग नहीं हैं, जो कुर्सी पर बने रहने के लिए तमाम तरह की तिकड़म करते रहते हैं? मेरा मानना है कि पब्लिक तो सब जानती है, पर एक बार जवाब आपके मुंह से भी आ जाये।&lt;br /&gt;दादा, चुनाव का मौसम चल रहा है। देश में जब से लोकतंत्र की स्थापना हुई है, चुनाव प्रणाली शुरू हुई है, तभी से एक महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित चल रहा है। आप तो विपक्ष की राजनीति में माहिर रहे हैं। चनावों में आपने देखा होगा कि 51 वोट पाने वाला जीत जाता है, विजयश्री का माला पहन कर आशीर्वाद लेता घूमता है, जबकि 48 वोट पाने वाला हार जाता है, सिर छुपा लेता है, भरे-पूरे लोकतंत्र में नकार दिया जाता है। उसके हारने के साथ ही खत्म हो जाती है 48 वोटों की अहमियत और खत्म हो जाते हैं इन वोटों के सपने। दादा, क्या आपको नहीं लगता कि इक्कीसवीं सदी के वैश्विक और मंदी से भरे इस दौर में देश को इन अड़तालीस वोटों के महत्व को समझने की बड़ी जरूरत है। इसके लिए आप जैसे पहुंचे हुए और महान लोगों के विचार किसी काम आ सकते थे। देश का नक्शा बदला जा सकता था। पर, आप तो श्राप और आशीर्वाद बांटते चल रहे हैं, देश आपसे कौन सी उम्मीद पाले? जिन सभी को आपने विजयी भव का आशीर्वाद दिया, आपको पता है कि उनमें से कितने चुनाव लड़ेंगे और कितने चुनाव नहीं लड़ेंगे? यदि नहीं पता तो पूरी गंभीरता से एक आम भारतीय के नाते मेरा सवाल अपनी जगह कायम है कि यह आपने क्या किया? बताइए दादा, यह आपने क्या किया? मैं आपका जवाब चाहता हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4775666618332875944?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4775666618332875944/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4775666618332875944&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4775666618332875944'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4775666618332875944'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_21.html' title='लो, आप तो पलटी मार गये दादा'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-6891686110046495621</id><published>2009-02-20T07:15:00.000-08:00</published><updated>2009-02-20T07:29:18.705-08:00</updated><title type='text'>दादा, आपने ये क्या कह दिया!</title><content type='html'>दादा, आपने गुरुवार को संसद में शाप देने के अंदाज में जो कहा, उसमें मैं आपकी कोई गल्ती नहीं देखता। सच मानियेगा। हल्ला-हंगामा करने वाले सांसदों को आने वाले चुनाव में हार जाने का शाप देकर आपने बिल्कुल आम अवाम की आवाज को ही बुलंद किया है। लेकिन, मैं आप ही से पूछना चाहूंगा कि आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं, उस कुर्सी से इस प्रकार की आवाज का सुनना क्या आपको ही अच्छा लगा? कई सवाल मेरे मन में उठ रहे हैं, जो आपसे और सिर्फ आपसे ही पूछना चाहता हूं। निश्चित मानियेगा, ये सवाल आपके खिलाफ जाकर नहीं कर रहा हूं। ये सवाल आपकी आवाज और उसकी मुखरता के साथ रहकर कर रहा हूं।&lt;br /&gt;सबसे पहला सवाल-क्या आपको नहीं लगता कि आप बूढ़े गये हैं? बूढ़ा का मतलब बलहीन, तेजहीन। बात-बात पर झल्लाने वाला, हमेशा अपने मतलब की धुन में मगन रहने वाला। आपने भी कुछ वैसा ही तो नहीं किया? वो विपक्षी सांसद थे। कहीं और नहीं, संसद में हल्ला कर रहे थे। दादा, चुनाव सर पर है और आप देख ही रहे हैं कि पब्लिक के पास जाने लायक और वोट मांगने लायक देश में मुद्दों का अभाव चल रहा है। बड़ी-बड़ी हस्तियां मुद्दे तलाश रही हैं। तो यह तो निश्चित ही है कि इस तरह के हल्ले होंगे। यह तो आम पब्लिक भी जान रही है। इसमें क्या इतना झल्लाने की जरूरत थी कि उन्हें अगले चुनाव में हार जाने का शाप देना आपके लिए जरूरी लगने लगा? और शाप भी लोकतंत्र के मसीहाओं की रखवाली करने वाले सरदार की ओर से? सरदार इतना बलहीन, तेजहीन! मगर नहीं, मुझे तो साफ लग रहा है कि यह संसद के मजबूत अध्यक्ष का नहीं, एक लाचार बूढ़े का भीषण प्रलाप था। आप बताएं कि क्या नहीं था? और इससे आगे की बात। दादा, 58 साल के बाद एक इंसान को आप किरानी बनने के लायक नहीं समझते, तो इसके पार का आदमी देश चलाने के लायक क्यों समझ लिया जाता है? यह ऐसा सवाल है, जिसका मौजूं मिजाज आपके संदर्भों में अब आपके ही सामने है। जवाब दे सकते हैं तो दीजिए।&lt;br /&gt;दूसरा सवाल - दादा, क्या आपको नहीं लगता कि आपके शाप के बाद पूरे देश मे एक बड़ी बहस शुरू हो जानी चाहिए? बहस यह कि संसद में सांसदों को हल्ला करना चाहिए या नहीं? इस हल्ले का अर्थ मैं तो विरोध की आवाज से लेता हूं। आप बतायें क्या यह गलत है? मुझे लगता है, आप भी इसे विरोध की आवाज ही कहेंगे। तो सवाल यह है दादा, विपक्ष के लोग विरोध की आवाज उठाएं या नहीं? उठाएं तो उनका अंदाज क्या हो? दादा, क्या आपको नहीं लगता कि पूरे सिस्टम में नकारापन बज रहा है। इस नकारेपन में अपनी आवाज ऊपर उठाने के लिए उसे तेज ही तो करनी होगी। दादा, आतंकवादी विस्फोट पर विस्फोट कर रहे थे औऱ हमारे गृहमंत्री कपड़े बदलने में मशगूल थे। कुछ बोलने के लिए बोला गया तो कहने लगे कि क्या मैं चिल्लाऊं? आप तो इस बात के गवाह हैं कि कैसे उनकी हरकतों के खिलाफ पूरा देश चिल्ला रहा था। इसी चिल्लाहट का नतीजा तो था कि सरकार चेती और उन्हें उनके पद से हटाया गया।&lt;br /&gt;और सबसे अहम सवाल - दादा, क्या संसद अध्यक्ष की कुर्सी भीष्म पितामह की तरह सत्ता के प्रति समर्पित होती है? क्या उसका हर काम, हर मुकाम सत्ता शीर्ष की रखवाली तक समाप्त हो जाता है? औऱ क्या आप इससे इनकार करेंगे कि ऐसा होने पर ही तो महाभारत हुआ? देश ने तो देखा है। गलत-सही की बात मैं नहीं कर रहा, लेकिन इतना तो आप भी मानेंगे दादा कि इसी रास्ते पर चलते हुए आप अपने उन साथियों और घर से बिल्कुल अलग हो गये, जो आपके हमकदम थे, हमसफर थे। सवाल यह कि आम आदमी क्या सबक ले? निष्ठाएं क्या इतनी ही तेजी से बदली जानी चाहिए?&lt;br /&gt;दादा, मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि मुझे आपकी बातों से सरासर इत्तेफाक है। मगर सवाल हैं कि सर उठा रहे हैं। इस देश में एक सबसे बड़ी खराबी थी, वह यह थी कि सवाल उठाने वालों का मुंह बंद कर दिया जाता था। यह सामंती प्रथा का लक्षण था। लोकतंत्र का मतलब ही होता है आवाज की रवानगी। इस रवानगी पर रोक लग गयी, सवाल उठाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो जवाब कहां से आएंगे? दादा, आप बताएं, जवाब कहां से आएंगे? सांसद अगले चुनाव में हारें या जीतें पर सवाल यह है कि सवाल तो फिर भी उठाना होगा, जवाब फिर भी ढूंढ़ने होंगे। होंगे कि नहीं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-6891686110046495621?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/6891686110046495621/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=6891686110046495621&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6891686110046495621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6891686110046495621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_20.html' title='दादा, आपने ये क्या कह दिया!'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-937312449865680400</id><published>2009-02-18T07:16:00.000-08:00</published><updated>2009-02-18T07:17:47.527-08:00</updated><title type='text'>मदारी से बंदर को मतलब नहीं</title><content type='html'>जी हां, आम चुनाव को लेकर बिहार में जो ग्रेट इंडियन तमाशा चल रहा है, उसको देखते हुए अभी यही तय करना बाकी है कि इस खेल में मदारी कौन है और उसके इशारे पर नाचने वाला बंदर कौन? कभी मदारी बंदर की शक्ल में दिख रहा है तो कभी बंदर मदारी की शक्ल में। नजारे तो यह भी नजर आ रहे हैं कि मदारी का बंदर उसे ही घुड़की दे रहा है। बात राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दो मजबूत खंभों जदयू और भाजपा की हो या फिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के तीन तिलंगों राजद, कांग्रेस व लोजपा की,  क्रिया बिल्कुल समान हैं, न्यूटन के थर्ड गति नियम के अनुसार  प्रतिक्रिया  भले बराबर और विपरीत हो। पर, यह बिहारी फंडा है, ग्रेट इंडियन तमाशे में घुसा बिहारी फंडा, नतीजे के लिए सब्र करना होगा।&lt;br /&gt;अभी राबड़ी सरकार के दिनों की यादें कइयों के जेहन में ताजा होंगी। शैडो मुख्यमंत्री के खिलाफ भाजपा के सुशील मोदी लगभग हर रोज विधान सभा में अपनी ऊर्जा खपाते रहते थे। इसके लिए सदन में ही उन्हें क्या-क्या न सुनना पड़ता था। जीभ खींच लेंगे, झाड़ू से मारेंगे। अब जब पति लालू ही ठेठ गंवई स्टायल में ओपन कास्ट चैनल थे, जेल से शासन चलाने का दावा पूरा कर चुके थे तो पत्नी क्या करतीं। मोदी सब कुछ बर्दाश्त करते विपक्ष की भूमिका निभाते जा रहे थे। उभार लोगों के बीच भी कुछ कम कायम नहीं था। लोगों को याद होगा, तब सुशील मोदी नरेन्द्र मोदी की तरह दिख रहे थे। जोश से लबरेज, होश से लैस, दाढ़ी युवा तुर्क नेता की याद दिलाती थी। पर, ग्रेट इंडियन तमाशे ने जब बिहार का रुख लिया तो वे छतरी के नीचे आ गये। कहा तो गया जदयू की छतरी के नीचे, पर दिखा नीतीश कुमार की छतरी के नीचे। नीतीश यानी डेवलपमेंट मैन। नीतीश यानी अपराध और अपराधियों को खत्म करने का दावा करने वाला नेता। नीतीश यानी आनंद मोहन और मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों का समर्थन प्राप्त नेता भी। खैर, बात हो रही थी मोदी की। सरकार बनी तो मुख्यमंत्री पद के दावेदार मोदी बन गये उपमुख्यमंत्री। तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा की भांति बिहार की जनता ने देखा उन्हें हर जगह. हर सभा में नीतीश के साथ, हंसते, मुसकाते, माला पहनते। जो संकट पैदा हुआ, वह यह था कि पूरी कवायद में भाजपा गोल हो गयी। मोदी जी के कंधे पर भाजपा और मोदी जी कहां, यह सवाल आम भाजपाइयों के मन में आज भी सालता है। भाजपा का चेहरा बन गया जदयू का मुखौटा यानी पूरी पहचान का ही संकट। अब राधा मोहन सिंह, जो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं, भलें चिल्ला लें, गुहार लगा लें, होना वही है जो मोदी जी चाहेंगे। और जो सूरतेहाल है, उससे तो यही लगता है कि मोदी जी वही चाहेंगे जो नीतीश बाबू चाहेंगे। भाग-दौड़ शुरू है, गणित बिठाये जा रहे हैं, पर बिहारी फंडे से बिहार में ही अपना वजूद बचाने के लिए इस पार्टी को मशक्कत करनी पड़ रही है, आगे भी बहुत पसीने बहाने पड़ेंगे। सीटों की घोषणा अभी बाकी है, आने वाला समय सबकुछ साफ कर देगा। वैसे भाजपा के लोग अब खुलकर यह कहने लगे हैं कि मोदी बिहार में भाजपा को मटियामेट कर ही दम लेंगे। यदि भाजपा ने उनका निष्कासन तय किया तो वे जदयू के एलानिया मेंबर होंगे, मजबूत खंभे होंगे।&lt;br /&gt;दूसरी धूरी संप्रग, जिसके दो धड़े राजद और लोजपा राष्ट्रीय स्तर पर भले कांग्रेस की छतरी के नीचे दिख रहे हों, पर इस तमाशे का बिहार एपीसोड बिल्कुल अलग परिदृश्य प्रस्तुत करता है। दिल्ली में उन्हें छाया देने वाली कांग्रेस का यहां तो साया तक गायब है। एक आम बिहारी से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का नाम पूछकर देखिए, मेरा दावा है, वह नहीं बता पायेगा। सत्येन्द्र नारायण सिंह ने जो लुटिया डुबोयी, वह आज तक डूबी हुई है। नतीजा, नारंगी की तरह जावों में बंटे राजद, लोजपा और कांग्रेस दिल्ली में एक दिख रही हों, पर यहां तो अलग-अलग रस बांटती ही चल रही हैं। पिछली बार लालू ने अपने करिश्मे से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार खड़े किये और ज्यादा सीटें ले गये। नतीजा, राम विलास पासवान को आज भी रेल मंत्रालय छिनने का गम साल रहा है। इस बार वे कोई चूक नहीं करना चाहते। चालीस सीटों वाले इस प्रदेश में अपने लिए उन्होंने सोलह सीटों का दावा ठोक दिया है और साफ कर दिया है कि यदि इसे नहीं माना गया तो वे चालीस की चालीस सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे। कांग्रेस की तो कोई बात नहीं, पर लालू सकते में हैं। लालू को याद होगा कि विधान सभा चुनाव में रामविलास की जिद से गठबंधन नहीं बन पाने की सूरत में बिहार की गद्दी उनके हाथों से जाती रही थी। बिहार विधान सभा को आज भी वे हसरत भरी निगाहों से देखते हैं। तो ग्रेट इंडियन तमाशे के इस बिहारी फंडे में मदारी का खेल तो चालू है, पर मदारी कौन और बंदर कौन है, यह अभी तय होना है। जो दिख रहा है, उसे देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि फिलहाल मदारी से बंदर को फिलहाल कोई मतलब नहीं है। ग्रेट इंडियन तमाशे यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा अभी जारी रहेगी। धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-937312449865680400?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/937312449865680400/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=937312449865680400&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/937312449865680400'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/937312449865680400'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post_18.html' title='मदारी से बंदर को मतलब नहीं'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-1555986534031272457</id><published>2009-02-17T07:36:00.000-08:00</published><updated>2009-02-17T07:45:07.428-08:00</updated><title type='text'>बिहार में ग्रेट इंडियन तमाशा</title><content type='html'>ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव का अभी बिगुल ठीक से बजा भी नहीं है, पर पहलवान हैं कि ताल ठोकने लगे हैं। वैसे तो  इस प्रकार का समां पूरे देश में बंधा हुआ है, पर बिहार में, भई, यह कुछ खास अंदाज में ही सरंजाम पाता दिख रहा है। अखाड़े आबाद हो गये हैं और मुकाबले की छटपटाहट गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले जुबानों की सुर्खियों पर चढ़ी दिखने लगी है। घात-प्रतिघात में बोले जा रहे शब्दों के नमूने अभी भले ऊपरी स्तर पर ही हों, पर उनका रंग आम मानस पर चढ़ता भी दिख रहा है। जीत जायेंगे हम का बोलबाला कुछ यूं फिजा में तैर रहा है, मानो मतदान कल ही होने वाला है, फैसला कल ही आने वाला है। और इसका श्रेय उन तीन दिग्गजों के नाम जाता है, जो धुरी के रूप में पब्लिक के सामने, ऊपर और अगल-बगल सुदर्शन चक्र की भांति घूम रहे हैं। पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले ये तीन दिग्गज हैं- एनडीए यानी जदयू और भाजपा के संयुक्त प्रयासों के क्षत्रप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद सुप्रीमो व केन्द्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा लोजपा किंग व केन्द्रीय रसायन-उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान। सरकारी अभियान की आड़ में अब ग्रेट इंडियन तमाशे की खासियत देखिए।&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विकास यात्रा शुरू कर रखी है। सरकारी अभियान, सरकार गांवों की ओर, जरूरत अभी ही। क्यों? क्योंकि चुनाव जो सिर पर है। इसके तहत वे न केवल गली-गली घूम रहे हैं, बल्कि जिले के एक गांव में रात्रि विश्राम भी कर रहे हैं। शाम में लग रही है चौपाल और गांव में लग रहा है जनता दरबार। अगले रोज शहर में जनसभा। अब भई, मुख्यमंत्री घूमेगा तो सरकारी अमला-जमला भी घूमेगा। और जब काफिला होगा ऐसा तो समां बंधेगा कैसा? हां, कहना चाहता हूं कि समां तो खूब बंधेगा, पर काम कुछ नहीं होगा। जी हां, काम ऐसे होता ही नहीं है। ऐसे कहीं काम होता है क्या? यह तो सरकारी पैसे से चुनाव की तैयारी का फंडा है। बिहारी फंडा? हींग लगे न हल्दी, रंग भी चोखा आये। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, लागू हो जाये पूरे देश में भई।&lt;br /&gt;उधर, रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव। ठेठ गंवई स्टायल। प्रतिद्वंद्वी पर पलटवार। प्रतिद्वंद्वी दो। नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। घूम रहे हैं जिला दर जिला। रेल का सहारा। कर रहे हैं घोषणा दर घोषणा। रेलवे के मुहाने को खोल दिया है बिहार की ओर। फायनल पारी। चुनाव में जीतना जो है। कहीं लाइनें बिछ रही हैं तो कहीं रेलमंडल खुल रहे हैं। गाड़ियों के फेरे से काम नहीं चल रहा तो गाड़ियां ही बढ़ायी जा रही हैं। अभी आपने देखा होगा कि भाई साहब ने बजट और अंतरिम बजट का अंतर ही खत्म कर डाला। चार महीने बनाम पांच साल की घोषणा तक रेल बजट में की गयी। यह चुनावी अखाड़े के पहलवान की ललकार थी, जिसे पूरे हिंदुस्तान ने सुनी और समझी, बिहार ने तो शिद्दत से महसूस भी किया। अब चौक-चौराहों पर लालू ही लालू हैं। वाहवाही, तालियां, जिंदाबाद यानी मकसद पूरा। ग्रेट इंडियन तमाशा, बिहारी फंडा। लागू हो जाये पूरे देश में भई।&lt;br /&gt;और अपने राम विलास पासवान। रेल नहीं मिली तो सेल ही सही। बेतिया जाकर खुलवा दिया स्टील प्लांट। टार्गेट फिक्स, सालोसाल की बात तो छोड़िये, कुछ ही महीनों में आने लगेंगे उत्पादन। अधिकारी बेचारे हलकान हैं, परेशान हैं, पर काम तो करना ही है। नेताजी की इज्जत का सवाल है। सेहत सुधारने की दिशा में बिहार सरकार बहुत कुछ कर रही है, कोई बात नहीं, केन्द्र से प्रोग्राम आ रहे हैं, कोई बात नहीं, नेताजी तो गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले शिविर खोलकर लोगों का इलाज करवाएंगे ही। अब कोई सोचता हो तो सोचे कि आखिर सेल को लोगों के इलाज से क्या मतलब, वह भी मुफ्त? मगर, नहीं। नेताजी को तो मतलब है। अब रेल नहीं, सेल ही सही, नीतीश-लालू को ललकारना जो है। जनता बिना सेवा क्या सुनेगी? ललकार खूंखार हो चुकी है। मंच पर हमेशा साथ दिख रहे हैं सूरजभान, जिनका कहना है कि लोग जब उन्हें बास कहता है, किंग कहता है तो अच्छा लगता है। और सबसे बड़ी खासियत। तीनों नेताओं का टार्गेट वोट एक ही है। दलित जाति, पिछड़े लोग। अब इसमें कांग्रेस ने अपना वजूद खो दिया, भाजपा की मिट्टी पलीद होने पर लगी है तो कोई क्या करे? फिलहाल इतना ही। ग्रेट इंडियन तमाशा यानी महासंग्राम यानी आम चुनाव पर चर्चा जारी रहेगी। धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-1555986534031272457?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/1555986534031272457/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=1555986534031272457&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1555986534031272457'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/1555986534031272457'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='बिहार में ग्रेट इंडियन तमाशा'/><author><name>Kaushal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12277773294643772968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_TpbCKw4S_3Q/SVIPEjQCn4I/AAAAAAAAABc/MPkCFgglZ0k/S220/kk+shukla.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-8765419976580757134</id><published>2009-01-21T10:37:00.000-08:00</published><updated>2009-01-21T10:40:48.696-08:00</updated><title type='text'>श्मशान की एक रात...</title><content type='html'>बस वाले से हमने कहा-हमें छोला श्मशान घाट के पास उतार देना। कंडक्टर समेत समूची बस ने हमें ऐसे देखा मानो हम उनकी जात से बाहर के हों। श्मशान घाट के पास पुलिया पर हमें उतारकर बस चलती बनी। एक अधखुली दुकान वाले से पूछा-श्मशान घाट किधर है? मरघट सामने है-उसने बताया। रात के दस बजे थे। आसपास के सूनेपन से लगा कि रात काफी गहरी हो चुकी है। बारिश हो रही थी। भींगते हुए हम श्मशान घाट की तरफ बढ़े। रास्ते में हमें शेड दिखा। बारिश से बचने के लिए वहां पहुंचे। फर्श पर दो चबूतरे बने हुए थे। शेड के बाहर पेशाब करते दिखे सज्जन (नशे में धुत) हमारे पास आए। गौर से देखा। हमने पूछा-ये चबूतरे क्यों बने हैं?॥जब आप मरेंगे, आपके ये दोस्त मरेंगे, मैं मरूंगा तो श्मशान घाट ले जाने से पहले अर्थी यहीं रखी जाएगी। वे नरेश चौहान थे। उनके इस जवाब से माहौल भुतहा लगने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां से चलकर हम विश्राम (श्मशान) घाट के गेट पर पहुंचे। वहां लिखा था-रात दस बजे के बाद अंतिम संस्कार नहीं होता। गेट बंद था। अंदर दोनों तरफ छोटे-छोटे घर बने हुए थे। इनमें से एक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का दफ्तर था। दूसरा विश्राम घाट के प्रबंधक नारायण सिंह कुशवाहा का निवास। दफ्तर के पास बैठे सज्जन को आवाज देकर हमने कहा, कुशवाहा जी से मिलना है। उन्होंने कहा-वे तो गए। सुबह मिलेंगे। कहा-तो आपसे ही कुछ बात करनी है। वे आए। हमने बताया-कुछ लिखना है, रात भर यहीं बैठना चाहते हैं। अखबार का नाम बताया तो उन्होंने दरवाजा खोल दिया। बातचीत के दौरान चाय पिलवायी और बताया कि मैं ही नारायण सिंह हूं। परिवार के साथ यहीं रहता हूं। हमारी इच्छा के मुताबिक कुशवाहा जी ग्यारह बजे हम दोनों को वहां छोड़ आए, जहां मुरदे जलाए जाते हैं। एक बड़े शेड के नीचे बने सोलह खानों में से दो पर अब चिता जल रही थी। उनके आसपास मंडरा रहे थे चार खूंखार कुत्ते। दो हमें देखकर झपटे। कुशवाहा जी ने रोका। वे हमें वहां से कुछ दूर एक शेड के नीचे बिठाकर चले गए। एक बेंच पर बैठ गए। जहां हम बैठे थे, उसके पीछे यानी दक्षिण में नाला था। उत्तर की ओर जीवित लोगों के लिए विश्राम स्थल बना था। पश्चिम की ओर झाड़-झंखाड़ और पूरब की ओर जीवन-मृत्यु का चक्र दिख रहा था। आबादी के नाम पर दक्षिण में कबाड़खाना नाम की बस्ती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने जल रहे दो मुरदों में एक युवक का था, जिसने आत्महत्या कर ली थी। दूसरी चिता एक बुजुर्ग की थी। दोनों चिताओं के शोले अब भी दहक रहे थे। पास मंडरा रहे कुत्तों के अलावा कहीं दूर भी कुत्ते भौंक रहे थे। बूंदाबांदी अब भी हो रही थी। पास में प्लास्टिक पर पानी गिर रहा था। खड़-खड़ की आवाज हो रही थी। कुत्तों के चुप होते ही माहौल अजीब सा हो गया। डर हमें आगोश में लेने की कोशिश कर रहा था। एक अनजाने रोमांच का इंतजार, जो साढ़े दस बजे तक था, वह अब उतना नहीं था। इतने में किसी फैक्ट्री से सायरन की आवाज गूंजी। हमें लगा, जैसे पास में ही शंख बजा हो। हम जीवन-मौत को छोड़कर फ्रायड की बात करने लगे। फिर स्टेशन से रेलगाड़ी की आवाज आई। लगा, आबादी पास ही है और हम आश्वस्त हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवा बारह बजे अचानक दो कुत्ते उछलकर खडे़ हो गए। लगा, दो मुरदे उठकर खड़े हुए। बोलते हुए हमारे मित्र चुप हो गए। ...आसपास पसरे भय को झटककर हम फिर बातचीत करने लगे। बूंदाबांदी बंद हो चुकी थी। प्लास्टिक पर पानी नहीं गिर रहा था। कुत्ते नहीं भौंक रहे थे। लगा, जैसे हवाएं भी बंद हो चुकी हों। पास में रेलगाड़ी गुजरने की आवाज न आती तो कहीं कुछ नहीं। पता चला, लोग मरघट सा सन्नाटा क्यों कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बातचीत धीमी हो रही थी। हमारा सारा ध्यान इस बात पर था कि यह वक्त गुजरता क्यों नहीं। डर को दूर करने के लिए हमने तय किया-डर तो दिमाग में होता है। असर भी हुआ। हमें लगा, भारी दबाव हमारे ऊपर से हट गया। बातचीत की गाड़ी फिर बढ़ी।&lt;br /&gt;सवा एक हो चुका था। मरघट में होने का भय फिर दबोचने लगा। इस भय के बावजूद, मुझसे कहीं ज्यादा हमारे मित्र को किसी रोमांचकारी घटना का इंतजार था। क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं था। जाने कैसे॥बात फिर भूतों की होने लगी। बातचीत एकतरफा हो गई। मुझे लगा, अब मैं सोच नहीं सकता तो बोलूं कैसे? लगा, मेरे दिमाग पर किसी और शक्ति का नियंत्रण हो और वह सोचने पर मजबूर कर हो कि एक झक सफेद कपड़ा पहने कोई आदमकद आकृति अभी निकल पड़ेगी। अपने आप से पूछा, क्या घिग्घी बंधना इसे ही कहते हैं?  रात डेढ़ बजे हमने मृत्यु से जुड़े सारे तथ्यों को याद किया। कुछ मुक्त हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बातचीत अब भी एकतरफा थी। मैं सिर्फ सुन पा रहा था। पौने दो बजे मैंने अपने मित्र से कहा-कुछ देर मैनेजर के पास चलकर बैठें। मेरे इतना बोलते ही दहकती चिताओं के पास बैठे चारों कुत्ते उठकर भौंकने लगे। इन खूंखार कुत्तों को देखकर उपजा डर भी मुझे मरघट के पास बैठने का साहस नहीं दे पा रहा था। लेकिन मेरे मित्र कुत्तों को देखकर कुशवाहा जी के पास जाने की हिम्मत छोड़ बैठे। पर मैं उन्हें जबरन उठाकर ले गया। चिता की बगल से गुजरते वक्त कुत्ते तेजी से झपटे। लगा चीर-फाड़ दिए गए। हम दोनों चुपचाप खड़े हो गए। कुत्तों ने जगह-जगह से सूंघा और छोड़ दिया। हम मृत्यु प्रमाणपत्र दफ्तर के पास जाकर बैठ गए। भय भाग गया। दफ्तर और चिता की दूरी सत्तर-अस्सी मीटर थी। कुशवाहा जी सपरिवार आराम की नींद सोए हुए थे। मच्छरों ने परेशान करना शुरू कर दिया तो हम टहलने लगे। ढाई बजे फिर दफ्तर के पास ही बैठ गए। बैठते ही पेट्रोलिंग (पुलिस) वाले आ गए। गेट पर जीप रोकी। हमने कुशवाहा जी के परिवार के एक सदस्य को जगाया। पुलिसवालों ने उससे पूछा-ये लोग कौन हैं? वह बता नहीं पाया। हमने बताया, अखबार से हैं। अच्छा-अच्छा कहकर आठ-दस मिनट गेट पर ही खड़े रहे। भाव भंगिमा कह रही थी, पगला गए हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पौने तीन बजे लगा, जैसे हम कुछ छोड़ रहे हैं। फिर एक अनचाहे रोमांच को पाने की इच्छा जोर मारने लगी। भय दूर हो चुका था। जयंत जी बैठे-बैठे सो रहे थे। जबरन उठाया। वहां ले गए, जहां चिता जल रही थी। कुत्तों के डर से यहां वे आना नहीं चाह रहे थे। पर अब कुत्ते जा चुके थे। दोनों ने राहत की सांस ली। वहीं जाकर बैठ गए, जहां शुरुआत में आकर बैठे थे। बैठते ही बिजली चली गई। घुप्प अंधेरा। लगा मरघट के सारे भूत अब हम पर हमला कर देंगे। मैं सस्वर हनुमान चालीसा पढ़ने लगा। मेरे घोर वामपंथी मित्र भी मेरे सुर में सुर मिला रहे थे। मिनट दर मिनट एक दूसरे को टटोलकर देख रहे थे, हैं भी या नहीं?  मेरे मित्र का पता नहीं, पर भय की अधिकता की वजह से मुझे भय का अहसास भी नहीं हो पा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः रातभर का सबसे कठिन दौर गुजरा। सवा तीन बजे बिजली आ गई। धड़कनों पर काबू पाया। एक मन हुआ वापस कुशवाहा जी के पास भाग जाएं। पर मन मारकर बैठे रहे। अब तक हमें लगने लगा था कि अंधेरे में कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा। हम भयमुक्त हो रहे थे। इस कदर कि बस्ती में किसी बच्चे की जोर-जोर से रोने की आवाज भी हमें नहीं डरा पा रही थी। अब हमें मुरदों के जलने से फैली चिरांध का भी अहसास हो रहा था। हम उस गंध से परेशान होने लगे। चिताएं बुझ चुकी थीं। हल्की बारिश के साथ जोर-जोर से हवा चलने लगी। सांय-सांय की आवाज के चलते हमें फिर लगा कि हम मरघट में बैठे हैं। ठंडी हवा सिहरन पैदा कर रही थी। वक्त तीन पैंतीस का था। कौए अब कांव-कांव करने लगे। दूर कहीं से कोयल की आवाज भी आ रही थी। हमें रातभर में कुछ भी अलग न देख पाने की निराशा घेरने लगी थी। अब हमारी बातचीत बिल्कुल सामान्य थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवा चार बजे मसजिद में अजान हुई। पीछे बस्ती के घर अब साफ-साफ दिखने लगे। हमारे मित्र ने कहा, अब कुछ नहीं होगा, चलिए। गेट खुलवाकर हम श्मशान घाट से निकल पडे़। बस पकड़ी। घर आकर खूब सोए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह रात हमने कुछ साल पहले श्मशान घाट में गुजारी थी। साथ में मेरे मित्र जयंत सिंह तोमर भी थे। तोमर साहब मुरैना के हैं। फिलहाल बच्चों को पत्रकारिता पढ़ाते हैं। दिन, साल महीने नहीं दे रहे। वह रात मुझे आज भी कल की ही लगती है। श्मशान घाट भोपाल का है।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-8765419976580757134?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/8765419976580757134/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=8765419976580757134&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8765419976580757134'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8765419976580757134'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/01/blog-post_21.html' title='श्मशान की एक रात...'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7756487261519769544</id><published>2009-01-07T08:44:00.002-08:00</published><updated>2009-01-07T08:50:50.712-08:00</updated><title type='text'>मुखिया जी से शिकायत कब तक?</title><content type='html'>याद करें, मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकियों के हमले के तुरंत बाद क्या प्रतिक्रिया थी? पूरे देश के साथ-साथ सरकार के स्वर में भी यह बात शामिल थी कि पाक को सबक सिखाया जाएगा। यह स्वर गायब हो चुका है? जनता के स्वर में निराशा का पुट है तो सरकार की चेतावनी भी अब घिघियाहट सी लगती है। इतना तो तय हो ही चुका है कि हम अपने दम पर कुछ नहीं कर सकते। पाक के खिलाफ कारॆवाई की बात तो छोड़ दें, उन आतंकियों के खिलाफ कारॆवाई के लिए भी हम बाकी देशों की चिरौरी कर रहे हैं, जिन्होंने हमारी नाक में दम कर रखा है। न जाने कितने सालों से पाक भारत के खिलाफ आतंकियों को शह दे रहा है, उनकी मदद कर रहा है। बावजूद इसके हमें हर हमले के बाद नए सिरे से हमले में पाकिस्तानी आतंकियों की संलिप्तता के सुबूत देना देने पड़ते हैं। इस बार भी हम वही कर रहे हैं। आपत्ति इस बात पर नहीं है। पाक की करतूतों की जानकारी पूरी दुनिया को होनी चाहिए। कूटनीतिक प्रयास जारी रहें। संभव है, इसके नतीजे बाद में आएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल नहीं दिमाग की बात करें तो कोई नहीं कहता कि हमें पाक पर हमला कर देना चाहिए। लेकिन इन दिनों भारत और पाकिस्तान के सुर पर विचार करें तो बात चोरी और सीनाजोरी वाली लगती है। पाकिस्तानी आतंकियों ने हमें इतनी बड़ी चोट दी, इसके बावजूद पाकिस्तान धौंस भरे स्वर में बात कर रहा है। और इक्का-दुक्का बेमतलब के बयानों को छोड़ दें तो हमारी सारी सक्रियता इस बात को लेकर है कि अमेरिका और बाकी देश मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाएं। इतना तो हमने भी मान ही लिया है कि हमारे किए कुछ नहीं होने वाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात और। दुनिया भर में अमेरिकी दादागीरी की बात को लेकर कभी-कभी अपने यहां भी बहस होती है। सरकार भी कहती है कि हमारी नीतियां या हम अमेरिका से नहीं प्रभावित होते। ये बातें कितनी निरथॆक हैं, यह एक बार फिर साबित हुई है। भारत पर आतंकियों के हमले के बाद हम फिर अमेरिका पर ही टकटकी लगाए बैठे हैं। सारी उम्मीदें वहीं हैं। अमेरिका दबाव बनाए तो पाक आतंकियों के खिलाफ कोई कारॆवाई करे। वरना वह तो यह भी मानने को तैयार नहीं कि हमला पाकिस्तानियों ने किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानेगा भी क्यों? आपने ऐसा किया ही क्या है? और अमेरिका आपके लिए किस हद तक दबाव बनाएगा, यह तो उसे ही तय करना है। विश्व ग्राम के अघोषित मुखिया जी गांव के इस दुस्साहसी घर के साथ अपने रिश्ते भी देखेंगे। और यह किसे पता नहीं होगा, गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत आज भी पूरी दमदारी के साथ मौजूद है। मार खाने के बाद मुखिया जी से शिकायत करके अपने कतॆव्य की इतिश्री मान लेने वाले लोग आगे भी पिटते रहते हैं। गांव में भी लोग उसीसे भिड़ने से बचते हैं, जो मारपीट भले न करता हो, मारपीट का जवाब देने की हैसियत रखता हो। फिलहाल हमारी स्थिति तो जवाब देने वाली नहीं, मुखिया जी से शिकायत करने वाली ही लगती है। आखिर क्यों नहीं पाकिस्तान को भी उसी की भाषा में जवाब दिया जाए। ऐसे भी पाकिस्तान कहता तो यही है। आप आईएसआई पर हमले की बात करते हैं तो वह रॉ पर आरोप लगाता है। आप जैश, लश्कर प्रमुख और दाऊद को मांगते हैं तो वह बाल ठाकरे, छोटा राजन की सूची सौंपता है। आपके सुबूतों के जवाब में दुनिया को आपके खिलाफ तैयार सीडी सौंपता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम भी देते रहें दुनिया को सफाई। आखिर पाकिस्तान के खिलाफ सुबूतों के दम पर हम विश्व समुदाय से अपने साथ खड़े होने की उम्मीद करेंगे तो उन्हें यह भी तो बताना होगा कि नहीं, पाकिस्तान जो कह रहा है, हम वैसा कुछ नहीं करते। इसका मतलब हमें अकारण ही बचाव की मुद्रा में आना होगा। जो हम करते नहीं, उसकी सफाई देनी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे लेकर बहुत किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन आखिर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति क्यों नहीं बननी चाहिए?  कब तक हम हर हमले के बाद दुनिया के सामने घिघियाते रहेंगे कि पाक को रोको। यह तो तय है कि पाक के खिलाफ क्या किसी के भी खिलाफ युद्ध की स्थिति में हम नहीं है। युद्ध तो केवल दुनिया का दादा अमेरिका ही छेड़ सकता है। भले ही वह एकतरफा क्यों न हो?&lt;br /&gt;युद्ध के अधिकार और स्थिति से वंचित भारत को भी तो आखिर अपने बचाव के लिए कुछ न कुछ करना होगा। क्या यह जैसे को तैसा की रणनीति के अलावा वतॆमान परिस्थितियों में कुछ और हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार तो यह भी लगता है कि मुंबई पर हमले के बाद से लेकर अब तक हमारी सरकार तय ही नहीं कर पाई है कि उसे करना क्या है। यह मानने में सचमुच हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारे पास वैसे नेतृत्व का अभाव है जो ऐसे मौकों पर उचित निणॆय ले सके। बात सिफॆ प्रधानमंत्री की नहीं है, पूरी सरकार ही इस मामले में लचर दिखाई दे रही है। हमारे नेता गाहे-बगाहे यह दोहराकर देश को संतुष्ट करने की कोशिश भर कर रहे हैं कि हमारे सारे विकल्प खुले हैं। विकल्प बताने को कोई नहीं कहता लेकिन देशवासी न जाने यह बात कितने सालों से सुन रहे हैं। हर बड़े हमले के बाद यह बात बार-बार दोहराई जाती है। होता कुछ नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश की जनता भी हर बार इस तरह की बातें सुन-सुनकर उसी रंग में रंग गई लगती है। वरना कहां हमले के बाद का शोर और कहां अब की उदासीनता। हमले के बाद जितना शोर हमारे नेता मचा रहे थे, जनता भी कुछ उसी अंदाज में उतना ही शोर मचा रही थी और अब वह भी शांत हो गई। आखिर भारत के खिलाफ पाक की इतनी बड़ी-बड़ी साजिशों के बावजूद क्यों नहीं कोई जनांदोलन इस बात के लिए उपजता कि पाक को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए? आखिर जनतंत्र में सबकुछ होता भी तो जनता की इच्छा से ही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7756487261519769544?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7756487261519769544/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7756487261519769544&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7756487261519769544'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7756487261519769544'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='मुखिया जी से शिकायत कब तक?'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7176024968757814463</id><published>2008-12-27T06:26:00.000-08:00</published><updated>2008-12-27T07:28:36.852-08:00</updated><title type='text'>वेशभूषा, आप और आपका मिजाज</title><content type='html'>यह तो सभी जानते हैं कि हर चीज के कम से कम दो पहलू हो सकते हैं। ठीक ठंडा-गरम की भांति। मगर जैसा कि ओशो कहते हैं कि ठंडा व गरम दो चीज नहीं होते, बल्कि एक ही चीज तापमान के दो रूप हैं। थोड़ा कम जो तापमान है, वह ठंडा है। थोड़ा ज्यादा जो तापमान है, वह गरम है। सोचने का मुद्दा यह है कि तापमान के बदल जाने से वस्तु की प्रकृति कितनी बदल जाती है!संदर्भ बदलता हूं। गमछा (अंगोछा या तौलिया) किसके घर में नहीं होता। सोचिए, आप इसका कैसा इस्तेमाल करते हैं? हाथ-मुंह पोंछते हैं, और क्या। अब इस गमछे को आप कंधे पर लेकर घूम रहे हैं। लोग आपको साधारण समझते हैं, आपका मनोमस्तिष्क भी एक साधारण मानव सा बना रहता है। इसी गमछे को जरा पगड़ी की तरह सिर पर बांध लीजिए। नकाबपोश की तरह चेहरे पर कस लीजिए। क्या होगा? लोगों के सामने आपकी पहली जो छवि प्रस्तुत होगी, वह एक बदमाश, गुंडे, लफंगे की होगी। लोगों की तो छोड़िए, आप खुद भी मिजाज में तल्खी, गरमी महसूस करने लगेंगे। तो यह देखा आपने कि एक गमछे के पहनने-बांधने का तरीका बदलने से मनुष्य की प्रकृति कितनी बदल जाती है।मूंछों का किस्सा कहना चाहूंगा। हो सकता है आपको अपनी मूंछों का हमेशा ख्याल न रहता हो। मगर मेरे कहने पर जरा मूंछों को बढ़ाइए, उस पर ताव देना शुरू कीजिए। आप देखेंगे कि जितनी बार आप मूंछों को ताव देते हैं, उतनी बार मिजाज में गरमी का प्रवेश होता है। मूंछों की कोरों को कटवा लीजिए, छंटवा लीजिए, मिजाज बिल्कुल सामान्य बना रहेगा।अब जरा इस पर गौर फरमाइए। एक फटा कुर्ता और मैला-कुचैला पाजामा पहना कोई व्यक्ति आपके बिस्तर पर बैठना चाहता है। आप बैठने देंगे? यदि वह बैठ भी गया तो बहुत देर तक नाक-भौं सिकोड़ते रहेंगे। हो सकता है, उसके जाने के बाद आप चादर को ड्राई-क्लीनर को भेज दें। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि साफ-सुथरा सूट-बूट में कोई व्यक्ति आपके घर आया और आप उसे अपने बिस्तर पर बिठाने में इसलिए हिचक गये कि उसका ड्रेस कहीं पहले से बिछी चादर से गंदा न हो जाये, खराब न हो जाये। उपाय न रहा और वह उसी बिस्तर पर बैठ गया तो वह तो नाक-भौं सिकोड़ता ही रहेगा और जल्दी उठ जाने की हड़बड़ी दिखाता ही रहेगा और जव वह उठकर चला जायेगा तो आप भी लेंगे राहत की सांस।तो कुल मिलाकर बात इतनी है कि आपका ड्रेस सेंस आपके व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव डालता है। इससे आप लापरवाह नहीं हो सकते। रात में सोने के लिए पहने जाने वाले कपड़ों में किसी मेहमान के पास नहीं जा सकते। मेहमान के घर जाने वाले कपड़ों में लक-दक होकर आप दफ्तर नहीं जा सकते। दफ्तर में पहने जाने वाले कपड़ों में आप पूजा पर नहीं बैठ सकते। पूजा पर बैठने वाले कपड़ों में किसी समारोह में हिस्सा नहीं ले सकते। और यदि आप इस ड्रेंस सेंस का ख्याल किये बिना घूमते-फिरते रहे, कहीं के कपड़ों में कहीं पहुंचते रहे तो आपकी क्या छवि बनेगी, यह क्या कहने की जरूरत है? हो सकता है, लोग आपको पागल तक कहने लगें। तो व्यक्तित्व विकास के लिए संवाद पर नियंत्रण के बाद जो ख्याल करने की बात है, वह है ड्रेस सेंस। आज इतना ही, व्यक्तित्व विकास पर अभी बातें जारी रहेंगी।&lt;br /&gt;विचारः आसमानी बिजली हमेशा एक ही जगह नहीं गिरती। अभी इधर गिरी है तो कभी उधर भी गिरेगी। इधर गिरी है तो कुछ बच भी गया है, उधर गिरेगी तो कुछ बचेगा भी, इसकी क्या गारंटी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री कौशल शुक्ला हमारे मित्र हैं। इन दिनों मुजफ्फरपुर में हैं। ..विचार के लिए विचार के नाम से उनका ब्लॉग है। अपने ब्लॉग पर वे व्यक्तित्व विकास पर सीरीज में लेख लिख रहे हैं। इस श्रृंखला की यह चौथी कड़ी है। कौशल जी से अनुमति लेकर उसे यहां भी पोस्ट किया गया है। अच्छा लगे तो अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7176024968757814463?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7176024968757814463/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7176024968757814463&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7176024968757814463'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7176024968757814463'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/12/blog-post_27.html' title='वेशभूषा, आप और आपका मिजाज'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-8826802637534522488</id><published>2008-12-17T10:33:00.000-08:00</published><updated>2008-12-17T10:37:19.176-08:00</updated><title type='text'>पाकिस्तान भी तो यही कह रहा था</title><content type='html'>&lt;p&gt;महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद हुए या मारे गए? यह बहस थमी तो नई बहस आगे बढ़ाई गई है। इस बहस की शुरुआत दरअसल पाकिस्तानी मीडिया ने की थी। वहां भी बहस आशंका के रूप में थी, करकरे को गोली मालेगांव धमाकों से जुड़े लोगों ने तो नहीं मारी? पाकिस्तानी मीडिया की आशंका पाक सरकार को स्वर देने की कवायद थी। अब कुछ दिनों बाद केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एआर अंतुले भी यही बात कह रहे हैं। पूरा देश जिस केंद्र सरकार से पाकिस्तान पर हमले की मांग कर रहा है, उस सरकार का एक वरिष्ठ मंत्री उसी पाक के सुर में सुर मिला रहा है। इसे ही सियासत कहते हैं। यहां देश की भावनाएं नहीं देखी जाती, वोट देखा जाता है। क्या करेंगे, राजनीति को यूं ही तो दलदल नहीं कहा जाता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंतुले की एक और बात पर गौर करें। अंतुले कहते हैं पाकिस्तानी आतंकियों के पास एटीएस प्रमुख करकरे को मारने की कोई वजह नहीं थी। मतलब, मुंबई पर आतंकी हमलों में जितने लोगों ने जान गंवाई, उन्हें मारने की आतंकियों के पास वजह थी। (लगे हाथों अंतुले यह भी बता देते तो ज्यादा अच्छा रहता कि वह वजह क्या है)। अंतुले का यह बयान कहीं न कहीं आतंकियों की कारॆवाई को एक आधार भी देता है। हमारे केंद्रीय मंत्री का बयान हमें बताता है कि आतंकी बेवजह किसी को नहीं मारते। पाक परस्त आतंकी अरसे से भारत में खूनखराबा कर रहे हैं। हम मानते हों या नहीं, मंत्री जी मानते हैं कि इसकी वजह है। और वो मानते हैं, तो आपको सुनना-पढ़ना होगा। क्या करेंगे, अभिव्यक्ति की आजादी तो उनके लिए भी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हो सकता है, कुछ लोग अंतुले की आशंका से सहमत हों। तब भी इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना ही माना जाएगा। अगर इस तरह की कोई आशंका है, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए। जांच में यह बात स्थापित होती, तब कही जाती। जांच किए जाने की बात अंतुले भी कह रहे हैं। अंतुले केंद्र के वरिष्ठ मंत्री है। सरकार के स्तर पर अपनी बात रखते। जांच करवाते। तब तक इस पर मुंह खोलने से परहेज करते। लेकिन इतनी शांति से उनका मकसद कहां पूरा होता। पता नहीं, अब भी उनका मकसद पूरा हो पाएगा या नहीं। हो सकता है लेने के देने पड़ जाएं। दरअसल भारतीय राजनीति के कुछ पुराने योद्धा देश की जनता को वतॆमान समय के हिसाब से देख ही नहीं पाते। ये लोग देश की जनता को उसी वक्त के हिसाब से देखते हैं, जब इन्हें विस्मृति दोष नहीं हुआ था। उन्हें याद नहीं कि जनता काफी समझदार हो चुकी है। राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों ने भी यही बताया है। किसी राज्य की जनता ने बयान के आधार पर वोट नहीं दिए। वोट काम पर डाले गए। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-8826802637534522488?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/8826802637534522488/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=8826802637534522488&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8826802637534522488'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/8826802637534522488'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/12/blog-post_17.html' title='पाकिस्तान भी तो यही कह रहा था'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-7186085832873007409</id><published>2008-12-12T23:34:00.000-08:00</published><updated>2008-12-12T23:39:11.609-08:00</updated><title type='text'>मां भारती</title><content type='html'>मां तेरे अचॆन को व्याकुल हैं मेरे अंतर की नारी&lt;br /&gt;किंतु नहीं मैं इसकी सच्ची अधिकारी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेवा पथ कदम बढ़ाए थे कई बार&lt;br /&gt;बीच डगर में खींच लाया ये निष्ठुर संसार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूप दीप चंदन रोली, सब कुछ था मेरे पास&lt;br /&gt;किंतु दहलीजों तक सिमट गया दीवारों का भाग्य। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कतॆव्य बने बंधन, बंद हुआ मुक्ति का द्वार&lt;br /&gt;उफन रही नदी को बांधेगी कब तक तट की मर्यादा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन तो आएगा ज्वार, उस दिन आऊंगी तेरे द्वार&lt;br /&gt;सच्ची होगी मेरी आरती, पुकारेंगी मुझे स्वयं मां भारती।&lt;br /&gt;विजयलक्ष्मी सिंह&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-7186085832873007409?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/7186085832873007409/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=7186085832873007409&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7186085832873007409'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/7186085832873007409'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/12/blog-post_12.html' title='मां भारती'/><author><name>विजयलक्ष्मी सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11471232638132773239</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-428689574993669046</id><published>2008-12-06T10:43:00.000-08:00</published><updated>2008-12-06T10:49:37.201-08:00</updated><title type='text'>फिर उठा है देशप्रेम का ज्वार</title><content type='html'>&lt;p&gt;देश पर मर-मिटने वालों की कमी तो हिंदुस्तान में कभी नहीं रही। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद देशप्रेम का जो ज्वार दिख रहा है, वह उत्साहित करनेवाला है। पत्र-पत्रिकाओं में लिखे जाने वाले लेख, पाठकों के पत्र, मोबाइल के जरिए आने वाले संदेश बताते हैं कि मुंबई के आतंकी हमलों ने आम जनता को देश के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है। क्या लोगों को लगने लगा है कि नेताओं के भरोसे रहने का वक्त गुजर चुका है? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दरअसल नेताओं के प्रति इस कदर नाराजगी पहले कभी नहीं देखी गई। यह नाराजगी किसी एक दल या एक नेता के प्रति नहीं, बलि्क सभी से है। नेताओं से लोग जितने निराश हुए हैं, लोगों का खुद पर भरोसा उतना ही बढ़ा है। इसकी एक बानगी जबलपुर में देखने को मिली। बताया जाता है कि यहां के १०० युवकों ने स्थानीय कलक्टर को यह लिखकर दिया है कि वे देश के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। यह अभिव्यक्ति अकारण नहीं है। दरअसल,  चंद आतंकियों ने मुंबई को जिस तरह साठ से ज्यादा घंटों तक बंधक बनाए रखा, उससे लोगों का यह विश्वास हिल गया है कि सरकारें हमें महफूज रखेगी। भरोसे की इस मौत ने लोगों के अंदर आक्रोश भी पैदा किया। इसी आक्रोश ने केंद्रीय गृहमंत्री, एक मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री को विदा करने पर मजबूर किया। इंतजार है लोगों के देशप्रेम के ज्वार व  भरोसे के कत्ल के खिलाफ आक्रोश के और सकारात्मक नतीजों का। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-428689574993669046?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/428689574993669046/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=428689574993669046&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/428689574993669046'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/428689574993669046'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html' title='फिर उठा है देशप्रेम का ज्वार'/><author><name>विजयलक्ष्मी सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11471232638132773239</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-353896148475728571</id><published>2008-12-03T11:55:00.000-08:00</published><updated>2008-12-03T11:58:14.047-08:00</updated><title type='text'>इस बार भी नहीं छलकेगा सब्र का पैमाना</title><content type='html'>एक बार फिर पूरे भारत में पाक के खिलाफ माहौल बन रहा है। कई ब्लॉगर पाकिस्तान पर हमले की इच्छा और उम्मीद जता रहे हैं। भारत के हर कोने से आने वाली आवाजें भी कुछ इसी तरह की हैं। देश की हालत संसद पर हमले के बाद भी ठीक इसी तरह की थी। हर देशभक्त की इच्छा थी कि आतंक को पालने-पोसने वाले को करारा जवाब मिलना ही चाहिए। सीमा पार के आतंकी ठिकानों पर कारॆवाई होनी ही चाहिए। लेकिन उस वक्त भी हम हिम्मत नहीं दिखा पाए। आज फिर वही हालात हैं। टीवी पर दिखने वाले आक्रोश को छोड़ भी दें तो हर देशवासी की इच्छा यही होगी कि देश के दुश्मनों को करारा जवाब मिलना चाहिए। लेकिन यह इच्छा इस बार भी अधूरी ही रहेगी। अंतरराष्ट्रीय दबाव और युद्ध का अथॆशास्त्र हमें सीमा पार किसी भी कारॆवाई से रोके रखेगा। प्रधानमंत्री सब्र के इम्तहान की बात करते हैं। इसी सब्र की दुहाई संसद पर हमले के बाद भी दी गई थी। तब के प्रधानमंत्री ने भी बार-बार यही बात दोहराई थी। तब भी हमने अंततः मान लिया था कि अभी सब्र का पैमाना छलकने का वक्त नहीं आया है। इंतजार करें, इस बार भी हम यही मानेंगे। मिला-जुलाकर यही कि हमारे सब्र को हम नहीं नियंत्रित करते। कह सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय दबाव ही इसे नियंत्रित करता है। देखिए न, जैसे ही यह आशंका हुई कि पाक या पाक अधिकृत कश्मीर के खिलाफ भारत कारॆवाई की हद तक जा सकता है, अमेरिकी विदेश मंत्री दौड़ी-दौड़ी आईं। यह कहने कि पाक हर तरह का सहयोग करने को तैयार है। हमने उससे कह दिया है। मतलब पाक तो हमारी बात मानता है। और हम आपसे भी कहते हैं कि आप भी पाक के खिलाफ कोई कारॆवाई न करें। (अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पहले ही कह चुके हैं, इस हमले में पाक की संलिप्तता के सुबूत नहीं है।)। सभी मसले बातचीत से सुलझाएं। हम तो यह भी कहने की हालत में नहीं है कि महोदया कोंडोलिजा राइस,  आतंक फैलाने वाले देश के नाम पर ही तो आपके देश ने इराक और अफगानिस्तान को तबाह कर दिया। लेकिन क्या करें, नहीं कह सकते। पानी में रहकर मगर से बैर तो नहीं हो सकता है न। जमा खातिर रखें, पाक के खिलाफ चेतावनियों की भाषा से आगे की बात नहीं होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-353896148475728571?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/353896148475728571/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=353896148475728571&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/353896148475728571'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/353896148475728571'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/12/blog-post_03.html' title='इस बार भी नहीं छलकेगा सब्र का पैमाना'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-4686998681867433756</id><published>2008-12-01T12:13:00.000-08:00</published><updated>2008-12-01T12:24:57.639-08:00</updated><title type='text'>हे प्रभु, इन्हें माफ करना</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;टिप्पणी एक- &lt;/strong&gt;कुछ महिलाएं और बहने पाउडर-लिपिस्टिक लगाकर कैंडल मार्च निकालकर पश्चिमी सभ्यता का परिचय देती हैं। यह व्यवहार अलगाववादियों जैसा है जिनका लोकतंत्र में यकीन नहीं। इन महिलाओं को राजनेताओं के खिलाफ नारेबाजी की जगह पाकिस्तान और आईएसआई के खिलाफ नारेबाजी करनी चाहिए। ...&lt;strong&gt;मुख्तार अब्बास नकवी&lt;/strong&gt;, भाजपा नेता (नेताओं के विरोध पर)।             &lt;strong&gt;टिप्पणी दो-&lt;/strong&gt; अगर संदीप शहीद नहीं होता तो उसके घर कुत्ता भी नहीं जाता। ...वीएस अच्युतानंद, केरल के मुख्यमंत्री ( शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के दुखी पिता द्वारा आक्रोश जताए जाने के बाद)। &lt;strong&gt;टिप्पणी तीन- &lt;/strong&gt;मुंबई जैसे बड़े शहर में छोटी-मोटी बातें तो होती रहती है। &lt;strong&gt;आरआर पाटिल&lt;/strong&gt;, पूवॆ उपमुख्यमंत्री-महाराष्ट्र। (हमले को रोक पाने संबंधी सवाल पर)                                                            &lt;strong&gt;सवाल एक&lt;/strong&gt;-क्या ये लोग अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं?                                                           &lt;strong&gt;सवाल दो&lt;/strong&gt;-इन्हें सद्बबुद्धि मिले इसके लिए क्या करना होगा?                                                               &lt;strong&gt;सवाल तीन&lt;/strong&gt;-भारत की जनता आखिर इतनी सहनशील क्यों है?&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-4686998681867433756?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/4686998681867433756/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=4686998681867433756&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4686998681867433756'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/4686998681867433756'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/12/blog-post_01.html' title='हे प्रभु, इन्हें माफ करना'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-2846913097846299876</id><published>2008-11-29T10:21:00.000-08:00</published><updated>2008-11-29T10:32:51.809-08:00</updated><title type='text'>सवाल</title><content type='html'>&lt;p&gt;साठ घंटे, 183 लोगों की मौत। बीस जांबाज शहीद। 40 अरब की चपत (एसोचैम के मुताबिक)। ...फिर भी जीत गए जंग। कैसे? क्या सिफॆ आतंकियों को मार गिराने से? क्या इतने के बावजूद हम उनके जिंदा रहने की उम्मीद कर रहे थे? इस सवाल का मतलब सिफॆ इतना है कि हम आत्ममुग्धता की हालत में न रहें। आतंकियों की इतनी बड़ी कारॆवाई हमारी कमजोरी के बिना संभव नहीं थी। टटोलें, कहां कमजोर हैं हम? वरना हालात और बुरे होंगे।  &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-2846913097846299876?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/2846913097846299876/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=2846913097846299876&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2846913097846299876'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/2846913097846299876'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html' title='सवाल'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-3088316700401678281</id><published>2008-11-28T23:36:00.001-08:00</published><updated>2008-11-28T23:36:33.539-08:00</updated><title type='text'>यह कैसी बहस?</title><content type='html'>एक ब्लॉग पर टिप्पणियों के माध्यम से यह बहस चल रही है कि आतंकियों की गोलियों का शिकार बने एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद कहलाने का हक रखते हैं या नहीं? पूरी बहस महज बौद्धिकता के प्रदशॆन के लिए मौत के बाद किसी के चरित्रहनन जैसा ही है? &lt;br /&gt;शहीद नरकगामी नहीं होते..पर टिप्पणियों को देखकर लगता है, जैसे खुद को प्रबुद्ध साबित करने के लिए कुछ लोग, मर चुके कुछ लोगों की चीर-फाड़ में लगे हों। करकरे क्या किसी भी आदमी के अतीत के सभी पन्ने सुनहरे ही नहीं होते। कुछ पन्नों पर काली स्याही से लिखी कुछ इबारतें भी होती हैं। टिप्पणियां करनेवाले भी अपने अंदर टटोलकर देखें तो एेसा ही पाएंगे। घर बैठकर जुगाली करना बहुत आसान होता है। आतंकी हमले के बीच सिफॆ छुपने की बात सोचने वाले लोग ही किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की बजाय तंज कर सकते हैं। वरना इतना तो सच है ही कि हेमंत करकरे हमले के बाद तुरंत अपने दायित्वों का निवॆहन करने निकल पड़े थे। ड्राइंगरूम में अलसाए हुए टीवी नहीं देख रहे थे। साध्वी की गिरफ्तारी जायज है या नाजायज यह अदालत के सिवा कोई और कैसे तय कर सकता है? यह गलत भी हो तो केवल साध्वी को गिरफ्तार भर कर लेने से उनका शहीद कहलाने का हक नहीं छिन जाता। वैसे तो आत्मप्रचार के लिए जानबूझकर किसी की मौत पर मजमा लगाना ही जायज नहीं माना जा सकता। कोई शहीद कहा जाएगा या नहीं यह तो बाद की बात है। अपनी संस्कृति और परंपरा तो यही कहती है कि हम किसी की मौत के बाद उसके बारे में अच्छा ही अच्छा सोचते और कहते हैं। कम से कम इस परंपरा का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए। वैसे भी इस पूरी बहस से नुकसान भले ही हो, किसी का भला होते तो नहीं दिखता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-3088316700401678281?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/3088316700401678281/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=3088316700401678281&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/3088316700401678281'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/3088316700401678281'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/11/blog-post_28.html' title='यह कैसी बहस?'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-3390362121400864391</id><published>2008-11-24T00:04:00.000-08:00</published><updated>2008-11-24T00:33:12.860-08:00</updated><title type='text'>इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं</title><content type='html'>मालेगांव धमाके की जांच कर रही एटीएस बड़ी जल्दबाजी में है। रोज-रोज नए-नए खुलासे कर रही है। ऐसा जताया जा रहा है जैसे एटीएस बड़ी समझदारी के साथ गुत्थी सुलझाती जा रही है। हर खुलासे को मीडिया मैं जोर-शोर से उछाला जा रहा है। एटीएस और मीडिया की भी भाषा इन खुलासों को लेकर ऐसी ही होती है, जैसे ki बिना मुकदमा चलाए, बिना अदालत ka फैसला आए- निर्णय सुना दिया गया हो। एटीएस ने जिसकa नाम भर ले लिया वह अपराधी। समझ में नहीं आता ki एटीएस खुलासा करने ke मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों बरत रही है? हो सकता है, एटीएस जो खुलासे कर रही है-सच हों। उसke पास सुबूत हों, तथ्य हों। पर इन तथ्यों और सुबूतों को अदालत में परखा जाना तो अभी बाकी है। अदालत में यह तय होना अभी बाकी है ki क्या वास्तव में ये सारे लोग आतंकी हरकतों यानी धमाको में लिप्त हैं, जिनका नाम एटीएस ले रही है। lekin इससे पहले ही पूरी दुनिया में यह संदेश जा chuka है ki भारत में हिंदुओं ने भी आतंकवादी संगठन बना लिया है। इस आतंकी संगठन से जुड़े लोग धमाके कर रहे हैं। ऐसा है या नहीं, इसके पक्ष-विपक्ष में तमाम तर्क दिए जा रहे हैं। इन बातों को छोड़ दें तो जब तक अदालत ka फैसला आएगा पूरी दुनिया में यह बात स्थापित हो चुकी होगी िक भारत के हिंदू जवाबी आतंकी कार्रवाई कर रहे हैं। मान लिया जाए िक अदालत एटीएस द्वारा बताए जा रहे सभी आरोपियों को निर्दोष मान ले, तब क्या यह स्थापना खत्म की जा सकेगी? क्या तब हिंदू आतंकवादी शब्द, जिसे मीडिया में जोर-शोर से उछाला जा रहा है, खत्म हो जाएगा? या यह धब्बा तब भी बना रहेगा। इसके उलट यह मान लें िक अदालत में साबित हो जाता है िक एटीएस ·के द्वारा बताए गए और गिरफ्तार सभी लोग धमाकों में शामिल रहे हैं। तब भी कुछ सवाल हैं-क्या गिरफ्तार kiye गए पुरोहित, साध्वी, दयानंद जैसे चंद लोग पूरे हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं? आखिर हिंदू आतंकवादी क्यों, सिर्फ अपराधी या आतंकवादी क्यों नहीं? हां, यही आपत्ति मुस्लिम आतंकवादी कहने पर भी लागू होना चाहिए। और ऐसी आपत्तियां पूरे विश्व में जोर-शोर से उठती भी रहती हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है ki जब कश्मीर के मुस्लिम युवक kiसी आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं तो समझदार माने/कहे जाने वाले लोग उसे भटके हुए चंद युवकों की कार्रवाई बताते हैं। आश्चर्य होता है ki वही समझदार लोग हिंदू आतंकवादी शब्द पर आपत्ति नहीं करते। एटीएस की थ्योरी सही भी हो तो यहां तो सचमुच चंद भटके हुए लोग हैं। एक जमाना था जब भारत में होने वाली हर आतंकी कार्रवाई के लिए पड़ोसी देश को जिम्मेदार ठहराया जाता था। बात-बात पर उसे आतंकियों को संरक्षण देने वाला देश कहा जाता था। हिंदू आतंकवादी शब्द को आज जिस जोर-शोर से प्रचारित kiya जा रहा है, कल को कोई भी पड़ोसी देश अपने यहां होने वाली आतंकी गतिविधियों के लिए हमें जिम्मेदार ठहराने लगे, तो क्या होगा? हमें सोचना ही होगा ki हमारी अभी ki जल्दबाजी के ऐसे भी परिणाम हो सकते हैं। खासकर मीडिया, अदालत के फैसले के पहले ही फतवा जारी करने की अपनी आदत से बाज आए। िकसी भी जांच एजेंसी की बातों को नतीजे जैसा प्रचारित करने की मीडिया की आदत पर रोक तो लगनी ही चाहिए। अन्यथा होता यह है ki आरोप को ही, जांच एजेंसी की बातों के आधार पर खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया चीख-चीखकर सत्य और तथ्य ka रूप दे देता है। दुखद तो यह भी है ki मीडिया में आरोपों की बात जितनी जोर-शोर से आती है, अदालत में आरोप खारिज होने पर मीडिया की आवाज उतनी ही धीमी होती है। इतनी धीमी ki अधिसंख्य लोग तो उसे सुन भी नहीं पाते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-3390362121400864391?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/3390362121400864391/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=3390362121400864391&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/3390362121400864391'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/3390362121400864391'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-6130035274197363162</id><published>2008-10-27T10:26:00.000-07:00</published><updated>2008-10-27T11:12:34.520-07:00</updated><title type='text'>दीपावली की शुभकामनाएं</title><content type='html'>सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-6130035274197363162?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/6130035274197363162/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=6130035274197363162&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6130035274197363162'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6130035274197363162'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='दीपावली की शुभकामनाएं'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6090308263257230919.post-1549815951323302959</id><published>2008-06-16T12:51:00.000-07:00</published><updated>2008-06-16T13:24:44.084-07:00</updated><title type='text'>बहुत शोर सुनते थे...</title><content type='html'>क्या विहिप इनदिनों राम मंदिर मुद्दे से कतरा कर निकलने कि ताक में है? या राम मंदिर के मुद्दे को एक औजार कि तरह अपने पास रखने के लिए इसे लटकाए रहना चाहती है? दरअसल दूसरा सवाल, पहले सवाल का जवाब है। राम मंदिर मुद्दे को लटकाए रखने के लिए विहिप फिलहाल इससे कतरा कर निकल जाना चाहती है। हरिद्वार में विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक का सोमवार को समापन हुआ। बैठक तीन दिनों तक चली। इस बैठक के पहले बहुत शोर हुआ इस बात का कि विहिप यहाँ राम मंदिर के निर्माण कि तिथि घोषित कर सकती है। तिथि तो घोषित नही की गई। अंतिम दिन यह जरूर कहा गया कि विहिप मंदिर निर्माण का मसला अगली संसद पर छोडती है। संदेश है कि अगले आम चुनाव में इतने रामभक्त या कहें मंदिर समर्थक जीतकर आ जायेंगे, जिससे कि मंदिर निर्माण में कोई अड़चन नही आएगी। इस संदेश को और साफ करें &lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;तो विहिप &lt;/span&gt;k&lt;/span&gt;अ मतलब है कि जिन्हें मन्दिर बनवाना है वे रामभक्त को ही चुनें। रामभक्त यानी बीजेपी के उम्मीदवार। जाहिर सी बात है, विहिप तिथि का ऐलान भले कर ले, वह फिलहाल &lt;span class=""&gt;मंदिर b&lt;/span&gt;अनवाने कि स्थिति में नही है। स्थिति जो भी उसे तो राम मंदिर के नाम पर वोट cहहिये, जिसके लिए विहिप तमाम तरह के प्रयत्न करती रहती है। ऐसे में विहिप की इस लटकाने वाली निति का अर्थ है कि तिथि घोषित कर, फिर मंदिर बनवाने में नाकाम रहकर अपने ऊपर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगने देना चाहती है और लोगों की आस भी बंधाये रखना चाहती है। यही वजह है कि तीन दिनी बैठक में विहिप ने हिंदू आस्था के अन्य मुद्दों पर बातें की। जैसे गंगा मुक्ति और मंदिर मुक्ति की। विहिप ने उत्तरकाशी में धरने पर बैठे पर्यावरणविद डॉक्टर गुरुदास अग्रवाल को समर्थन कर ऐलान किया। अग्रवाल बिजली के लिए गंगा के प्रवाह को रोकने के खिलाफ धरने पर बैठे हैं। विहिप ने दूसरा मुद्दा उन मंदिरों कर उठाया जिनका सरकार ने अधिग्रहण कर लिया है। विहिप कर कहना है, सरकार (केन्द्र की) इन मंदिरों- मठों को मुक्त करे। जाहिर है विहिप आस्था के मुद्दों को छोड़ना नहीं चाहती और राम मंदिर मुद्दे को औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है। हालांकि इससे विहिप के उन समर्थको को निराशा भी हुई है जो हरिद्वार की बैठक में तिथि घोषित होने की उम्मीद  पाल बैठे थे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-1549815951323302959?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/1549815951323302959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=1549815951323302959&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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बात</title><content type='html'>बात चाहे किसी की हो, सुनी जानी चाहिए। यह अलग बात है कि यहाँ बातें सुनी  नहीं देखी जाएगी। क्या फर्क पड़ता है। भूमिका बांधने का कोई खास मतलब तो है नहीं। शुरुआत से ही शुरू करें।  न जानें कहाँ-कहाँ भटकते हुए यहाँ तक पहुंचे हैं। यहाँ तक पहुँचने में जो चीजें पीछे छूट गयीं, उनकी बहुत याद आती है। कई dafa तो ऐसा लगता है, जैसे सब कुछ bekar हो। sidhi si बात यह है की यहाँ हम सिर्फ़ अपने मन की बात करना चाहते हैं, जो शायद kahin और  नहीं कर &lt;span class=""&gt;paate । &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;http://example.domain&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6090308263257230919-6019071074641586786?l=purushottamk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://purushottamk.blogspot.com/feeds/6019071074641586786/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6090308263257230919&amp;postID=6019071074641586786&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6019071074641586786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6090308263257230919/posts/default/6019071074641586786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://purushottamk.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='मेरी बात'/><author><name>पुरुषोत्तम कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14737475432350019352</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_q4tsydpeXTs/SY8isY_BXHI/AAAAAAAAAQk/-G9CGGE04TM/S220/p2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
